दयाशंकर शुक्ल सागर

Showing posts with label मकाऊ डायरी. Show all posts
Showing posts with label मकाऊ डायरी. Show all posts

Sunday, December 8, 2019

घर लौटते फिल्मी परिंदे


 मकाऊ डायरी 4


और अब घर वापसी का वक्त आ गया है। किसी को दिल्ली  की फ्लाइट पकड़नी है तो किसी को मुंबई की। लेकिन इसके लिए पानी के छोटे समुद्री जहाज फैरी से हांगकांग एयरपोर्ट तक जाना होगा। सब फैरी पकड़ने की हड़बड़ी में हैं। इन सब में वह सैलानी नहीं हैं जो आईफा के बहाने मकाऊ  घूमने  आए थे। इसमें केवल वे हैं जो सिर्फ आइफा अवार्ड के लिए यहां आए थे। सब यानी एक टूटा हाथ लिए  शाहरुख  खान नई फिल्म 'गुलाबी गैंग' के साथ फिल्मों में  वापस आ रही माधुरी दीक्षित, पूरे अवार्ड फंक्शन में शाहरुख के साथ चिपकी रही अनुष्का शर्मा, बिना ऐश्वर्या के अभिषेक बच्चन, कामयाबी की आधी अधूरी खुशी लिए शुक्राणुओं के नए दानवीर विक्की डोनर उर्फ आयुष्मान खुरान, अपने स्‍मार्ट शौहर सिद्धार्थ की बांहें थामे विद्या बालन, खूबसूरत दिया मिर्जा, हारे हुए खिलाड़ी शाहिद कपूर, फिल्मों के बोझा की गठरी से दबे अनुपम खेर, शबाना को मिस करते जावेद अख्तर, दक्षिण भारतीय डांसर प्रभुदेवा, प्रियंका की चंचल बहन परिणीति  चोपड़ा  आइफा के 14 अवार्ड का दांव जीते बर्फी के निर्देशक अनुराग बसु और मैं।
इत्तेफाक से हम सबकी टिकटें फैरी के स्पेशल क्लास में उपर के डैक पर थी। मै समझ गया कि अब मजा आने वाला है। अब जो होगा उसकी स्क्रिप्ट जावेद अखतर नहीं, मैं लिखूंगा और ये फिल्मी कहानी नहीं बल्कि एक रिएलिटी शो होगा। और बिलकुल यहीं हुआ। शाहरुख, अनुष्का और माधुरी के साथ वीआईपी केबिन में बंद हो गए। ये सब खुद को सुपर स्टार की श्रेणी में रखना ज्यादा पसंद करते हैं। आईफा अवार्ड में यह लोग अलग-अलग रहे। इन लोगों ने अपने साथ बाडीगार्ड रख छोड़े थे। इनके बाडीगार्ड सलमान खान की तरह शालीन नहीं थे। वह फैन्स को इनके पास फटकने तक नहीं दे रहे थे। जाहिर है, उनकी गलती नहीं क्योंकि वे अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे थे।
लेकिन बाकी सब डैक पर पहुंचते ही मस्ती के मूड में आ गए। यह तय हुआ कि अब डम्ब शॅराड्स खेला जाएगा। दो टीमें बनेंगी। एक टीम का कोई सदस्य एक्टिंग कर इशारों से किसी फिल्म का टाइटल बताएगा। दूसरी टीम  को उस फिल्म का सही नाम बताना होगा। पर किस टीम में कौन होगा। अनुपन ने कहा ब्वायज वर्सेज गर्ल्स की टीम बन जाए। दीया ने कहा नहीं प्लीज वी आर नॉट  स्कूल गोइंड किड्स। यानी हम स्कूल जाते बच्चे नहीं हैं। जावेद ने कहा ठीक है मैं गर्ल्स  की टीम में हो जाता हूं। खेर ने कहा हां आप उसी साइड के हैं। सब हंसने लगते हैं। और खेल शुरू हो गया और साथ में शोर भी। जैसे सकूली बच्चे खेल रहें हों। हंसी-मजाक, किस्से कहानियां सब साथ-साथ चल रहे थे। खेर किसी के बारे में बता रहे थे। ओके विक्की डोनर हो गया अब वार्सिलोना। उसने कहा क्या बाहर से लो ना। मैनो कहा नहीं वार्सिलोना। सब हंसने लगे।
खेर और सिद्धार्थ आयुष्मान खुराना को लेकर डैक के कोने में चले जाते हैं। वहां एक फिल्म का नाम तय होता है। फिल्म का नाम बंदिनी है। खुराना डिब्बा बंद करने का इशारा करते हैं। लड़कियां बंद तक पहुंच जाती हैं। खुराना कहते हैं इसके आगे छोटा सा वर्ड है। दीया कहती हैं बंदना। पर ये कोई फिल्म नहीं। लेकिन बंद से बंदिनी समझाना उन्हें मुश्किल पड़ता है। अंत में झल्लाकर उनके मुंह बंदिनी निकल जाता हैं। लड़कियां चिल्लाती हैं बंदिनी बंदिनी। खेर कहते हैं, चिटिंग चिटिंग। इसने बता दिया था। परिणीति कहती है नहीं बताया था। लड़कियां कहती हैं  हे हे हे हम जीत गए। खेर कहते हैं मैंने पहली बार किसी हारी हुई टीम को इतना खुश देखा है। सब हंसने लगते हैं। शहिद कहते हैं अब मैं जा रहा हूं। और वहा दूसरी ओर खड़े हो जाते हैं। अब जावेद साहब 'पार' फिल्म का  समझाने की कोशिश करते हैं। लड़कियां नहीं समझा पा रहीं। काफी देर हो गई खेर कहते हैं, भई मैं तो अब सोने जा रहा हूं।
खेल काफी देर तक चलता रहा। बीच-बीच में राजनीति भी चल रहीं हैं। चीन में बर्फी को आईफा के चैदह अवार्ड लड्डू मिले। शुगर ज्यादा हो गई। जावेद मेरे बगल में खड़े अनुपम खेर के कान में  कुछ फुसफुसाते हैं- 'डोंट टेल मी यार कि अनुराग बसु को अंग्रेजी  नहीं आती। अगर नहीं आती तो वह हालीवुड की फिल्में कैसे देखता।' फिर दोनों को जोर से हंसने लगते हैं। बताते चलें कि बालीवुड में चर्चा हैं कि अनुराग की फिल्म बर्फी के कुछ सीन हालीवुड की फिल्म 'द नोटबुक' से उड़ाए गए हैं। बहरहाल जो भी इतना तो समझ में आ गया कि  आईपीएल के मैचों की तरह फिल्‍मों के सारे अवार्ड फिक्‍स होते हैं। बर्फी में शानदार अदाकारी के बावजूद प्रियंका चोपडा को बेस्‍ट हीरोइन का अवार्ड नहीं मिलना था सो वह नहीं आईं। उनकी बहन परिणित चोपडा आईं उन्‍हें परफार्म करना था। विद़या बालन आईं क्‍योंकि उन्‍हें बेस्‍ट एक्‍टेस का अवार्ड लेना था। जिन्‍हें पता था कि उन्‍हें अवार्ड मिलना है वो आते हैं। या फिर वे आते हैं जिन्‍हें अवार्ड फंकशन में पैसे लेकर नाचना गाना है।
  किनारा आ गया। और सफर खत्म हुआ। अब हम सबको अपने-अपने जहाज पकड़ने हैं। फिल्म वालों को पहली बार इतने करीब देखा है। मुझे न जाने क्यों लगा ये बेचारे दोहरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।
सार्वजनिक जीवन में ये चमकते सितारे हैं। पर इनकी प्राइवेट लाइफ हमारी आप की तरह है। कभी खुशी कभी गम, कभी हंसी मजाक तो कभी जलन और ईर्ष्या। उस दिन ग्रीन कारपेट पर चलते वक्त अनुपप खेर को देखकर भीड़ खुशी के मारे चीखी थी। खेर ने अपने सभी फैन्स से हाथ जरूर मिलाया लेकिन उनका चेहरा भाव शून्य था। वह  थोड़ा  आगे बढ़े तो मैंने उनसे अकेले में पूछा था- उनसे हाथ मिलाते वक्त कम से कम एक मुस्कुराहत तो आप के चेहरे पर ला सकते थे। मेरे सवाल पर खेर नाराज हो गए थे शायद। कहने लगे खुशी अंदर होती है, जरूरी नहीं कि वह दिखई जाए। मैंने कहा रहने दीजिए, ये कहने की बातें हैं। खेर ने चिढ़ कहा आप कुछ भी सोचिए। और वह आगे बढ़ गए।
सच पूछिए तो तब मुझे बुरा नहीं लगा  था। खेर के अभिनय का मैं कायल हूं। खेर ही नहीं हर सफल कलाकार के अंदर कुछ ऐसा होता है जो उसे असाधारण बनाता है। और एक पूरी टीम होती है जो सुपर मैन या सुपर वुमन बना देती है। वर्ना बिना मेकअप के रूप रंग से ये सारे कलाकार उतने ही साधारण हैं जितने कि हम और आप। यह रहस्य न खुल जाए इसलिए वे हमसे दूरी बनाकर रहते हैं। खैर शाम ढल गई है। परिंदे घर लौट रहे हैं। मेरा भी मन भर गया। अब घर लौटने का वक्‍त आ गया है। अलविदा मकाउ।

अतृप्त सपनों के शहर में


 मकाऊ डायरी 1


नई दिल्ली से हांगकांग एयरपोर्ट तक आने में केवल पांच घंटे लगे। अंतर्राष्ट्रीय विमान आमतौर पर 750 और 950 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार का चलते हैं। एक लम्बी झपकी लेने के बाद पता ही नहीं चलता कि कब तकरीबन पूरा चीन पार करके आप उसकी अंतिम सीमा तक आ गए। और मजा देखिए आप प्लेन में रात एक बजे सोते हैं और पांच घंटे के सफ़र के बाद आँख खुलने पर पता चलता है कि हांगकांग में सूरज को निकले चार घंटे बीत चुके हैं। लेकिन हर तरफ से पहाडियों से घिरा और चकाचौंध से भरा हांगकांग उस वक्त आकर्षित नहीं करता जब आपको सपनों का कोई और दूसरा शहर बुला रहा हो।

दफ़तर की तरफ से  मकाऊ जाने का जब न्‍यौता मिला तो सच जानिए इस शहर के बारे में कुछ जानकारी नहीं थी सिवाए इसके कि वहां जबरदस्‍त तरीके से जुआ खेला जाता है। लेकिन जुए में मेरी कोई दिलचस्‍पी नहीं थी क्‍योंकि फ़लश के सिवा मुझे जुए का कोई खेल नहीं आता। ये जुआ भी मैं सिर्फ दीपावली की रातों में खेलता हूं वह भी ज्‍यादातर अपने भाई और बहनोई के साथ जिन्‍हें लूटने और जिनसे लुटने में खूब मजा आता है। हारे तो गम नहीं और जीते तो मजा ही मजा। खैर मकाऊ में बालीवुड के फिल्‍मी सितारों का मेला जुटने वाला था और मुझे आईफा अवार्ड का आंखों देखा हाल लिखना था। मैं जानता था इस काम में मजा आने वाला है। पर मन में थोडी घबराहट थी कि मेरे पास  मकाऊ का वीजा नहीं है।     
हालांकि मुझे बार बार बताया गया कि चिन्‍ता की कोई जरूरत नहीं क्‍योंकि मकाऊ घूमने के लिए बीजा की आवश्‍यक नहीं। लेकिन बिना वीजा के देश की सीमा लांघना डरावना जोखिम है। पर जोखिम उठाने का भी तो अपना मजा है। बताया गया था कि हांगकांग एयरपोर्ट तक हवाई जहाज से जाना है। इसके आगे का सफ़र आपको छोटी-सी फैरी पूरा कराएगी। फैरी यानी समंदर में चलने वाला एक छोटा जहाज। इस जहाज का बंदरगाह ठीक हांगकांग का एयरपोर्ट से जुडा है। हांगकांग का इमिग्रशन बिना पार किये आप एक भूमिगत शटल से ठीक फैरी के अन्दर तक पहुँच जायंगे। पर शर्त यह है की आपको फैरी का टिकट भारत में ही नेट के जरिये ख़रीदना होगा। ये टिकट ही वीजा का काम करता है। एअरपोर्ट से मकाऊ का रास्ता  एक घंटे का है। मकाऊ एक प्रायदीप है। पहाडियों से घिरी खाड़ी के नीले पानी पर फैरी फिसलती हुई चलती है। इस पानी से धोड़ा ही ऊपर उड़ान भरते या एअरपोर्ट पर हवाई जहाज गजब का कौतुक पैदा करता है।



सपनों का शहर यानी मकाऊ दक्षिणी चीन सागर के किनारे बसे सारे देश मकाऊ को 'सिटी ऑफ़ ड्रीम्स' के नाम से ही जानते हैं। मकाऊ और हांगकांग अलग देश नहीं है। ये दोनों चीनी जनवादी गणराज्य का हिस्सा है। इन्हें सन 2000 शुरू होने से थोडा ही पहले  चीन ने विशेष प्रसाशनिक क्षेत्र का दर्जा दिया। एक ज़माने में मकाऊ पुर्तगाल का उपनिवेश हुआ करता था। जैसे कभी हमारा गोवा था। 16 वी सदी के शुरू में ही पुर्तगालियो ने गोवा और मकाऊ जैसे समंदर के किनारे बसे इलाको को व्यापारिक ठिकाना बनाया और धीरे से इन इलाको की हूकुमत अपने कब्जे में ले ली। गोवा को तो पुर्तगालियो ने सीधे फतह किया था लेकिन मकाऊ पर कब्ज़ा बड़ी चालाकी से किया। 1513 में जार्ज एलबर्स पहला पुर्तगाली था जिसने चीन की धरती पर कदम रखा। फिर पुर्तगाली व्यापारियों ने मकाऊ के समुद्री किनारे को एक बंदरगाह के रूप में विकसित किया। उन्होंने 20 किलोग्राम सालाना चांदी के बदले मकाऊ बंदरगाह को किराये पर ले लिया। 1863 तक ये सिलसिला जरी रहा। तब तक कई पुर्तगाली यहाँ के वाशिंदे बन चुके थे। वह सत्ता में प्रशासनिक दखल चाहने लगे। 1883 में पुर्तगाली तानाशाहों का दौर ख़त्म हुआ। ये सीनेट सिर्फ सामाजिक और आर्थिक मामले देखने के लिए बनी थी वह भी एक चीनी प्राधिकारी की निगरानी में। लेकिन एक शुरुआत तो हो गई। अफीम युद्ध के बाद मकाऊ अधिकारिक रूप से पुर्तगाल के कब्जे वाला इलाका हो गया। 70 के दशक में पुर्तगाली तानाशाह का दौर ख़त्म हुआ। और 1974 में नई पुर्तगाली सरकार या अपने उपनिवेशों को मुक्त करने का फैसला लिया। पुर्तगाल ने पहली बार मकाऊ को चीन का एक हिस्सा माना। और उसे चीनी जनवादी गणराज्य का एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र माना। चीन-पुर्तगाल के संयुक्त समझौते के तहत मकाऊ 1999 में अगले 50 साल के लिए चीनी गणराज्य का हिस्सा हो गया। लेकिन यहाँ एक देश और दो प्रणाली के सिद्धान्त की शुरुआत हुई। यानि विदेश मामले और रक्षा को छोड़ हांगकांग और मकाऊ पर चीन का कई दखल नहीं है। दोनों की अपनी अलग करेंसी है अलग पुलिस और अलग इमिग्रेशन व्यवस्था है। उनकी अर्थव्यवस्था स्वतंत्र है और जीवन शैली पूरी तरह का आजाद। यहाँ की 90 प्रतिशत आबादी चीनी है लेकिन चीन के लड़ाका अंदाज़ का अलग एक अनोखे तरह की संप्रभुता का मजा ले रही है। सरकार के मुखिया के नाम पर यहाँ एक चीफ है जिसकी कैबिनेट में पाँच नीति सचिव हैं। ये सचिव एक 11 सदस्यों की कमेटी की सलाह पर कम करते हैं। यहां के  स्थानीय निवासियों ने अपनी पूरी राजनीतिक सम्पभुता न कभी पुर्तगालियो को दी न दबंग चीन को। और समंदर के किनारे एक खुबसूरत सा देश बसा लिया जहां सपनो के इन्द्रधनुष में रंग भरे जाते हैं। 


जारी


Monday, September 9, 2013

मकाऊ तुम्‍हें जीत कर जाने नहीं देगा सलीम


 मकाऊ डायरी 3


और इस वक्त मैं दुनिया के सबसे बड़े जुआघर में हूँ। होटल के इस कसीनो में कोई दो हजार मेजों पर जुआ चल रहा है। मकाऊ में सुबह के पाँच बजे हैं और कसीनो खचाखच भरा है। रात भर जुआ चला और अब भी चलेगा। ये खेल 24 घंटे चलता है। करोडों रुपये का दांव लगता है। दुनिया भर के धनकुबेर हारते हैं लेकिन उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं होती। यहाँ सब जुआरी नहीं हैं, कुछ मेरे तरह दर्शक भी हैं। यहाँ दर्शक बनने पर कोई मनाही नहीं है क्योंकि चालाक कसीनो वाले जानते हैं ये दर्शक भी थोड़ी देर में जुआ खेलने पर मजबूर हो जायंगे। और मेरे साथ यही हुआ। पहले दो दिन मैं यहाँ सिर्फ़ दर्शक था। तीसरे दिन सब खेल कुछ समझ में आया तो लगा किस्मत पर दांव लगाया जा सकता है। मैंने अपने मित्र ली यान से पूछा कि कैसा रहेगा। वह मुस्कुराया और चीनी में कुछ बोला मैंने पूछा इट-मीन्स। उसने अंग्रेजी में इसका मतलब बताया की दुनिया का कोई जुआघर आपको जीतकर नहीं जाने देता । जुआ घर से मकाऊ तुम्हें जीत के जाने नहीं देगा। थोड़ी देर के लिए आप जीत भी जाए लेकिन अंततः आपको हारना है । पर मैं तय कर चुका था। खेलने के लिए आपके पास हांगकांग डालर होने चाहिए। मैंने अमेरिकी डालर का जो फारेक्स प्लस प्री पेड कार्ड बनाया था वह यंहा नहीं चलता क्योंकि इस कार्ड पर आपका नाम नहीं होता। दूसरा विकल्प था मैं एटीएम का इतेमाल करूँ। जुआघर में तमाम एटीएम हैं। लेकिन एटीएम या मेरे कार्ड को स्वीकार नहीं किया। बेशक ये मेरी नहीं बल्कि एचडीऍफ़सी बैंक की विश्‍वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। लेकिन मैं खुशकिस्मत था की मेरे एटीएम ने काम  नहीं किया। देखिये आगे क्या हुआ।
मेरे पर्स में 100 हांगकांग डालर के दो नोट थे। यानी करीब दो हजार रूपये। किस्मत आजमाने के लिए इससे शुरुआत हो सकती थी। कम से कम कहने को हो जाता की हमने भी मकाऊ के कसीनो में दांव लगाया। हालाँकि मैं जानता था इस पैसे से मैं दो दांव से ज्यादा नहीं खेल सकता लेकिन शुरुआत हो सकती है।
हो सकती है उस खेल में डालर या तो दोगुना होता है उस खेल का नाम 'बकाए' है। इस खेल में डालर या तो दोगुना होता है या फिर सारा पैसा डूब जाता है। सिर्फ एक मिनट का खेल है। मेज पर दो विकल्प हैं। 'बैंकर' और 'प्लेएर'। आपको अनुमान लगाना है कि 'बैंकर' जीतेगा या 'प्लयेर'। अगर आपको लगता है कि 'बैंकर' जीतेगा तो मेज पर जहाँ 'बैंकर' लिखा है वहां 100 डालर का एक सिक्का रख दीजिये। आप चाहे तो 100 डालर के दस या सौ सिक्के भी रख सकते हैं। अगर आपको लगता है कि इस बार प्लयेर जीतेगा तो सिक्के प्लयेर वाले खाने पर रखिये। जुआ खिलाने वाला एक मशीन से 'बैंकर' और प्लयेर के लिए ताश के 3 -3 पत्ते निकालेगा। ये पत्ते आपको स्क्रीन पर दिखेंगे। वह एक बटन दबाएगा। अगर प्लयेर जीता तो दांव पर लगाये गए आपके सिक्के अपनी जगह मौजूद हैं। अब खेल खिलने वाला या वाली उतने ही सिक्के के दोगुने सिक्के वहीँ रख देंगे। ये सरे सिक्के आपके। यानि 100 डालर के बदले 200 डालर। 1000 डालर के बदले 2000 डालर। 20,000 डालर कि जगह 40,000 डालर। यानी दिमाग लगाने कि कोई गुंजाइश नहीं। एक या दो। मैंने प्लयेर पर 200 डालर लगाये थे और एक मिनट में मेरे पास 400 डालर थे। मूल धन 200 डालर मैंने जेब में रखे और जीते हुए 200 डालर को इस बार 'बैंकर' के खाने पर रख दिया। मशीन ने 3 -3 पत्ते निकाले। बटन दबाया।'प्लयेर' के खाने में अन्य 5 खिलाडियों के सारे सिक्के मेज के नीचे छुपे डिब्बे में गिर गए। 'बैंकर' के खाने पर मेरे 200 डालर और बैंकर पर दांव लगाने वाले 7 और खिलाडियों के सिक्के मुस्करा रहे थे। क्योंकि हम सब जीते थे। अब मेरे पास 600 डालर थे। मैंने अपने आप से कहा बस इतना काफी है अब दूसरा खेल समझा जाय। बगल की मेज पर कई हिंदुस्तानी जुआ खेल रहे हैं। इस खेल का नाम रूलेट है। ये दुनिया भर के कसीनो का लोकप्रिय खेल है। इससे पहले ये खेल मैंने किसी फिल्म में देखा था। एक कटोरा आकर मशीन में गेंद घूमती रहती है। वह जिस नम्बर पर रूकती है वह नम्बर जीत जाता है। उस नम्बर पर आपने जितने डालर लगाये हैं उससे 36 गुना डालर आपको मिलेंगे। उस नम्बर के आसपास के नम्बरों पर अगर आपने दांव लगाया है तो आपको 8 गुना पैसा मिलेगा। इवन और आड़ नम्बर पर भी पैसा लगा सकते हैं। इसमें आपका पैसा दोगुना हो जायेगा। इसी तरह से सारे खेल चलते रहते हैं। इस खेल में सबकुछ आपकी किस्मत पर है।
रोचक खेल था। समझ में भी आ गया। मैंने अपनी जेब से 100 -100 के डालर के 6 सिक्के अलग-अलग खेलो में लगा दिए। मैंने पहला दांव 21 नंबर पर लगाया था क्योंकि ये मेरी जन्मतिथि है। इसमें लगे थे 200 डालर। बाकि 400 डालर अलग खेलों पर। कटोरानुमा छोटी-सी मशीन में वो छोटी-सी गेंद घूमी और 15 ,18 ,19 नंबर पर अटकी हुई 21 पर आकर रूक गई। जुआ खिलाने वाली लड़की ने 7200 डालर गिन कर मेरे सामने रख दिए। मेज के आसपास बैठे अन्य जुआरियों  की जैसे चीख निकल गई। अब मैं सात हजार डालर का मालिक था। यानी करीब 56,000 रूपये। एक घंटे के खेल में मैं 2000 से कहल शुरू कर 56,000 रूपये जीत चुका था। पर ज्यादातर लोग मेरी तरह खुशकिस्मत नहीं। मुझे वहां एक भी हिंदुस्तानी ऐसा नहीं दिखा जिसका चेहरा ख़ुशी का दमक रहा हो। मैं वहां अकेला हूँ, जो खुश हूँ।
सुबह के सात बज गए हैं। मैं रत भर यही खेलता रहा।नींद का दूर-दूर तक कोई निशान नहीं।मैं कसीनो में घूमता रहा। जो खेल थोडा भी समझ में आता खेल लेता। कभी हारता कभी जीतता। सच पूछिए तो हरने के लिए मेरे पास मेरा कुछ नहीं था। वह सारे हांगकांग डालर इसी कसीनो ने मुझे दिए थे।और एक वक्त ऐसा आया जब मेरी जेब में सिर्फ 200 डालर बचे थे। ब्बकी सब मैं हर चुका था।आब मैं भी उन्ही हारे हुए लोगों की भीड़ के बीच शामिल हूँ।
56,000
रूपये हारने का दुःख है। इस फ्री का पैसे से मैं अपने मित्रों के लिए कई सरे गिफ्ट लेकर लौट सकता था। पर अब नहीं।मुझे अपने चीनी मित्र की बात याद आई-'जुए में आप कभी नही जीतते हमेशा गवांते हैं'। और ये सही है।पर इस अनुभव ने मुझे अंतररास्ट्रीय स्तर का जुआरी जरूर बना दिया।ये कोई फ़ख करने की बात कतई नहीं है लेकिन अनुभव एक एसी चीज है जो आप खरीद नहीं सकते न किसी जुए में जीत सकते हैं। ये बड़ी कीमती चीज है।खासतौर से तब जब इसके लिए आपको कोई कीमत न चुकानी पड़े।









शहर में घूमता जिंदा डायनासोर


 मकाऊ डायरी 2



और ये सचमुच सपनों का शहर है। तीन तरफ से पहाड़ियों के बीच बसे इस शहर में बहुमंजिली इमारतों का जंगल है। इन इमारतों में ज्यादातर होटल हैं या जुआ खिलाने वाले कसीनो या फिर स्पा, बार या नाइट क्लब। यह सभी जगहें उन अतृप्‍त सैलानियों के लिए हैं जो अपने शहर से ऊब चुके हैं और उन्हें ऐसी किसी जगह की तलाश है जहां आकर सारी वर्जनाएं खत्म हो जाती हैं। समंदर के जहाज फैरी से उतर कर मकाऊ शहर में दाखिल होते आपको यह नहीं लगेगा कि आज किसी प्राचीन पुर्तगाली शहर में आ गए। एयरपोर्टनुमा बंदरगाह से निकल कर जैसे ही हम बाहर निकले चीनी लड़कियों का समूह हाथों में तमाम तरह के कार्ड और हैंडबिल लिए खड़ा था। चीयर्स गर्ल की तरह दिखने वाली ये लड़कियां उन तमाम बड़े होटलों की प्रचारक हैं जो आने वाले नए सैलानियों को पर्चे बांट कर बताती हैं कि उनका यहां क्या खास है। और देखते-दखते मेरे हाथों में कार्ड का एक ढेर लग जाता है। मुझे बताया गया है कि यहां के सब होटल वैनेशिया की शटल फैरी टर्मिनल के आगे खड़ी मिल जाएगी। और शानदार शटल वहां खड़ी थी। अपनी सीट पर बैठकर मैं उन तमाम कार्ड और हैंडबिल को पलटता हूं जो मुझे प्रचारक लड़कियों ने दिए थे। ऊपर के पहले ही कार्ड पर छपे शब्द थोड़ा चौकाते हैं। द शो ऑफ  सीक्रेट फैंट्सीज।  किट नाऊ आन सेल। यानी खुफिया फंतासियों का शो। फैंटसी के इस शो में क्या है? इसका अंदाजा कार्ड पर छपी तस्वीर से लग जाता है। कार्ड पर अंग्रेजी में छपा मजमून बताता है कि सपनों के शहर में देखिए वह फैंटसी जो स्त्री-पुरुष की अंतरंग इच्छाओं को नई उड़ान देती है। कार्ड के भीतरी पन्ने पर इस शो को देखने का अंदाज भी कम दिलचस्प नहीं है। छपे नक्शे में बताया गया है कि स्टेज के एकदम सामने की सीटें ए रेणी की हैं जिनका टिकट 1000 डालर का है। बी श्रेणी के टिकट स्टेज से दूर ए श्रेणी के पीछे हैं जिनका मूल्य 700 डालर है। एक तीसरी श्रेणी भी है सबसे पीछे जहां आप खड़े होकर ही ये शो देख सकते हैं। इसका दिकट 500 डालर का है।
शटल आकर ठीक होटल वैनेशिया के गेट पर रुकती है। विशाल क्षेत्र में फैला ये होटल अपने आप में टूरिस्टों के आर्कषण का केंद्र है। होटल में दाखिल होते लगेगा जैसे आप किसी रोमन साम्राज्य के विशालकाय महल में दाखिल हुए हैं। ये अलग बात है कि ये महल 21वीं सदी की सभी सुख-सुविधाओं से लैस है। होटल की लाबी में विलुप्त हो चुके एक दैत्याकार डायनासोर का कंकाल आपका स्वागत करेगा। पर यहां एक जीवित डायनासोर भी है जो आने वाले पर्यटकों का मनोरंजन कर रहा है।
डरावने डायनासोर के विशालकाय लबादे में कोई इंसान छुपा है। चारों ओर से भीड़ उसे घेरे हैं। सैलानी उसकी तस्वीरें ले रहे हैं और यह डायनासोर उनके करीब पहुंच कर उन्हें डरा देता है। डायनासोर के साथ हैट लगाए उसका मास्टर भी है। जो डरे हुए लोगों को उसकी बनावटी डायनासोर से बचता है।
 
करीब 25 मंजिला होटल में चेक इन करने के बाद अब में दूसरी मंजिल पर हूं। लेकिन ये मंजिल होटल की अंतिम मंजिल लगती है। क्योंकि मेरे ऊपर खुला आसमान है। बादलों से घिरा नीला आसमान। जैसे किसी खूबसूरत मौसम में बदली छाई रहती है। इस मंजिल पर दुनिया की सबसे बेहतरीन दुकानें हैं। हर तरह की ज्वैलरी शाप से लेकर हर तरह का फैशन स्टोर। दूसरी ओर खुले आसमान के नीचे फूड कोर्ट है। दुनिया के सारे रेस्त्रां यहां आपको मिल जाएंगे। और दुनिया के हर कोने से आए हजारों सैलानी इन व्यंजनों का लुत्फ उठा रहें हैं। लेकिन मैं उपर देखता हूं कि बादल के सारे टुकडे वहीं मौजूद हैं जहां अब से एक घंटा पहले थें। ओह तो ये कृत्रिम यानी बनावटी बादल हैं। यानी चैबीस घंटे इस नीले आसमान पर बदली छाई रहती है। यहां न चांद दिखता है न सूरज। सिर्फ खुला आसमान और बादल हैं। और लगता है कि हम किसी परी देश में हैं और इन बादलों के बीच से अभी कोई परी उतर कर जमीन पर आ जाएगी। ये वाकई सपनों की सपनों की दुनिया है। सपनों का शहर है। यहां सपने और फंतासियां बिकती हैं। सिर्फ आपकी जेब में हांगकांग डालर हों। फिर सपनों को खरीदिए और मजा लीजिए  मकाऊ का।