दयाशंकर शुक्ल सागर

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Wednesday, October 2, 2013

दुबई का मुशायरा और एक आतंकी की खता

अरबों के देश में-2



दुबई के उस शानदार हिन्दुस्तानी स्कूल के बड़े से आडिटोरियम में मुशायरे की सारी तैयारी पूरी हो चुकी है। लेकिन इस बार ऐन मौके पर राहत इंदौरी नहीं आए। राहत भाई के शायरी पढ़ने के अंदाज पर दुबाईवाले भी गजब फिदा हैं। शेर पढ़ने का उनका नाटकीय ढंग सबको भाता है-‘किसने दस्तक दी ये दिल पे, कौन है? फिर राहत भाई इस लाइन को अपने खास अंदाज में एक-एक लफ्ज पर जोर देकर तीन बार दोहराएंगे। फिर मुशायरे में थोड़ा समां बांधेंगे-‘मैं शेर पढ़ कर बताता हूं मुन्नवर भाई आप सुन कर बताइएगा।’ फिर अगली लाइन में चौकाएंगे-‘आप तो अंदर हैं, बाहर कौन है?’ इस तरह पब्लिक को किसी हुनरमंद मदारी की तरह खुश करके राहत भाई खूब तालियां बटोरते हैं। लेकिन इस बार वह दुबई नहीं आए। रेहान भाई ने बताया कि उनके जिस्म में शक्कर की गिनती अचानक इतनी बढ़ गई है कि डाक्टर ने घर से निकलने से मना कर दिया। ये अफवाह नहीं पक्की खबर थी। क्योंकि इस मामले में राहत भाई अक्सर ये कह कर सब पर इलजाम लगाते हैं कि ‘अफवाह थी कि मेरी तबियत खराब है/ लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया।’ अरे भाई लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया कि आप खुद बे-परहेजी के शिकार हो गए। पर मैं जानता हूं शायरों की दुकान ऐसे ही चलती है।
लेकिन मकबूल शायर मुन्नवर राना सुबह की फ्लाइट से वक्त पर आ गए। मुशायरे का अब सारा दारोमदार उन्हीं पर है। मुन्नवर राना को दुबई के ये बच्चे ‘बाबा’ कहते हैं। बाबा ने मंच का जिम्मा बखूबी संभाला। उन्होंने शुरूआत एक कहानी से की- एक हवाई जहाज बादलों के तूफान में फंस गया। सारे मुसाफिर डरे हुए थे। सबके होश उड़े थे। लेकिन एक लड़का निडर बैठा खेल रहा था। लोगों ने उससे पूछा ‘तुम्हें डर नहीं लग रहा।’ लड़के ने कहा ‘नहीं क्योंकि ये जहाज मेरा बाप चला रहा है।’ ऐसे ही इन बच्चों ने ये जिम्मेदारी मुझे दी है। अब इस जहाज को मुझे संभालना है। बच्चे बेफिक्र हो गए। 
मुन्नवर भाई अपने फन में माहिर हैं। उन्हें मुशायरा हिट करने का हुनर मालूम है। अच्छे शेरों का उनके पास खजाना है। आसान और मुख्तसर से लफ्जों में वह गहरी बात कह जाते हैं। मां और बेटियों पर नाजुक शेर पढ़ते हुए बाजवक्त वे इतने जज्बाती हो जाते हैं कि उनकी बड़ी-बड़ी आंखें भर आती हैं। और तब उनकी आंखों में ममता का समन्दर साफ दिखता है जो बेशक उस अरब सागर से भी गहरा होता है जिसे हम लांघ कर यहां तक आए हैं। ‘सरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं हम जो इस मुल्क की मिट्टी को मां कहते हैं।’उनकी शायरी मीर तकी मीर की शायरी की तरह क्लासिकल है गालिब की तरह अर्थपूर्ण लेकिन उनकी हर शायरी में दर्द मरसिये जैसा है। उनके अंदर का शायर न मायखाने से लड़खड़ाते हुए बाहर निकलता दिखता है और न तवायफ के कोठे से उतरता हुआ। न ये शायर हसिनाओं की जुल्फों से खेलता है और न हुस्नो इश्क के कसीदे पढ़ता है। ये शायर कभी नन्हा फरिश्ता बनकर मां के आंचल से लिपटना चाहता है कभी बूढ़ा बाप बनकर आंगन से विदा होती चिड़ियों को जाते देखकर फूट फूट कर रोना चाहता है।
खैर इससे पहले मुशयरा शुरू हो जनाब आफताब अल्वी यानी हमारे राजी भाई ने अवार्ड के लिए मुझे मंच पर आमंत्रित किया। और अब उनकी स्क्रिप्ट का चौंकाने वाला आगाज और अंदाज देखिए-‘लीटररी एक्सीलेंस अवार्ड के लिए हमने जिस शख्सियत का इंतखाब किया है उनके किरदार और उनकी कलम के कई पहलू हैं और तमाम पहलू बड़े रोशन और मुस्तनद हैं। कभी उनका कलम तलवार होता है तो कभी उसी कलम से वो मजलूमों के जख्मों पे मरहम भी रख देते हैं। दयाशंकर शुक्ल सागर कलम का ऐसा ही सिपाही है जिसने कम उम्र में अपनी कलम से ऐसा इंकलाब बरपा किया है जिसकी सताइश सिर्फ हिन्दुस्तान में ही नहीं उन तमाम मुमालिक में की जा रही है जहां इंसानी दर्द पर आंसू बहाने वाले लोग मौजूद हैं। और उनके कलम की रोशनी वहां वहां महसूस की जा रही है जहां जहां जुल्म के अंधेरे सिर उठाने की कोशिश कर रहे हैं। आप सब जानते हैं ये अवार्ड उन्हें उस बा-मकसद और बा-मानी बहरीर के लिए पेश किया जा रहा है जिसका उनवान था ‘इस आंतकवादी की खता क्या है।’
उर्दू के ये दिलफरेब लफ्ज ऐसे थे जैसे दिल्ली के मशहूर शायर मिर्जा सौदा लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला की शान में कसीदे पढ़ रहे हों। अगर मैं सच में नवाब होता तो सौदा की तरह राजी मियां को भी ‘मलिकुश्शुअर’ यानी कवि सम्राट की उपाधि से नवाज देता। कसीदे ऐसे ही होते हैं जैसे फ्रांस के फूलों के त्योहार में लोग एक दूसरे पर फूलों की बौछार करते हैं। खैर मेजबान का फर्ज भी है कि वह अपने मेहमान की शान में कसीदे पढ़े वह भी ऐसा मेहमान के जिसे अवार्ड दिया जाना है। वरना मैं नाचीज कलमकार अपनी हैसियत बखूबी जानता हूं। मैं अपने बरक्स कोई मुगालता नहीं पालता। मेरा दिल जानता है कि तनख्वाह के लिए महीने की पहली तारीख का मुझे कितनी शिद्दत से इंतजार रहता है। जानता हूं हमारे मुल्क में कलम से इंकलाब लाना नामुमकिन है जहां की हर चीज बिकाऊ है। बाजार में एक चीज जो सबसे सस्ती है वह ईमान है। अखबारनवीसी के शुरूआती दौर में जब मैंने पहली बार बसपा की बीट देखनी शुरू की तो बाबू सिंह नाम का एक शख्स मायावती का चपरासी हुआ करता था। बाद में वह केबिनेट मंत्री बन गया। देखते देखते वह करोड़पति हो गया। सुनते हैं वह किसी अखबार का मालिक भी बन गया है। आजकल जेल में है। कल छूट जाएगा। न जाने कितने पत्रकारों को नौकरी देगा। क्या आप सोचते हैं वहां नौकरी करने वाले पत्रकार इंकलाब लाएंगे?
लालच और मुफलिसी ने हर दूसरे इंसान को इस हद तक खुदगर्ज बना दिया है कि कोई किसी के लिए फिक्रमंद नहीं। संवेदनाएं मर चुकी हैं और जज्बात कत्ल हो रहे हैं। उस दिन मैं अखबारनवीसी के अपने पच्चीस साल के अनुभव से पहली नजर में आतंकवादी की उस मां को देखकर समझ गया कि उसका बेटा आतंकवादी नहीं है। जिसके घर में एक बूढ़ी मां और पांच अनब्याही बहनें हो वह आतंकवादी कैसे हो सकता है? लखनऊ, फैजाबाद और बनारस में जब बम के धमाके हो रहे थे तब वह कलकत्ता के कलपुर्जे जोड़ने वाले एक बड़े कारखाने में काम कर रहा था। उसकी लाचार मां कारखाने का हाजिरी रजिस्टर और बैंक में उसके मुफलिस एकाउंट के दस्तावेज लेकर लखनऊ की कचहरी में जमानत के लिए घूम रही थी। उसके वकील ने मुझे उसकी मां से मिलवाया था। बेशक आतंकी का वह हिम्मती वकील भी अपने दूसरे साथी वकीलों की नफरत का शिकार था। सारे दस्तावेज इकट्ठा करने के बाद मैं पूछते पूछते थक गया लेकिन यूपी पुलिस के डीजीपी से लेकर इस केस के इंक्वाइरी आफिसर तक ये बताने को राजी नहीं हुए कि उसके खिलाफ ऐसा क्या सबूत मिल गया कि वह आतंकी है। सिवाए इसके कि उसका नाम बांगलादेश के किसी आतंकी से मिलता जुलता है।  उस ‘आतंकी’ के पास तो मोबाइल फोन तक नहीं था कि पुलिस साबित करती कि वह पाकिस्तान या दुबई के लश्कर-ए-तोएबा के किसी आतंकी सरगना के सम्पर्क में है। पुलिस प्रेस कान्फ्रेंस में उसे बांग्लादेश का एक खूंखार आतंकवादी बता रही थी जबकि उसका स्थायी पता बंगल के नार्थ 24 परगना जिले का था। खबर छपी और आखिर यूपी की पुलिस को उसे छोड़ना पड़ा। लेकिन आतंकवादी होने का जेल में उसने जो सदमा उठाया उसका क्या? मुझे तो इस स्टोरी के लिए वजीरे आजम तक से इंटरनेशनल अवार्ड मिल गया पर उन बेगुनाहों की खबर कौन लिखेगा जो आज भी ‘आतंकवादी’ बने हिन्दुस्तानी जेलों में एडिया रगड़ रहे हैं। ये सवाल मुझे अक्सर परेशान करता है। इसलिए राजी की इंकलाब लाने वाली लफ्फाजी पर मैं बहुत खुश नहीं हुआ।
खैर अब हम मुशायरे पर वापस लौटते हैं। मुन्नवर भाई, हबीब हाशमी, वासिफ फारुखी, डा. तारिक कमर, उस्मान मिनाई, अनिल चौबे, नजमा नूर, शाहिद नूर, अनु सपन, नोमान शौक और अलताफ जिया सबने बारी बारी से अपनी शायरी की। इनमें शायद ही कोई ऐसा शायर या कवि हो जिसे दुबई की पब्लिक ने शोर मचा कर दोबारा पढ़ने के लिए न बुलाया हो। ईटीवी के डा. तारिक कमर ने अपनी खूबसूरत नज्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ पढ़ी। गंगा पर सूफिययाना अंदाज में शायरी मैंने पहली दफा सुनी। बनारस से आए हास्य कवि अनिल चौबे ने अपने चचा एनडी तिवारी पर खूब  फिकरे कसे। बोले-बेचारे बुजुर्ग तिवारीजी खून लेने के लिए पूरा देश पीछे पड़ गया। कोर्ट कचहरी पुलिस वाले सब। फिर चौबे जी ने चौपाई पढ़ी -‘नही कोई जोर चलता है, महज रिक्वेस्ट होता है/इश्क में दौलत-ए-दिल का बड़ा इनवेस्ट होता है/जवानी में मुहब्बत की जिन्हें गिनती नहीं आती /बुढ़ापे में उन्हीं का तो डीएनए टेस्ट होता है।’ सबसे ज्यादा तालियां चौबेजी ने बटोरी। बाद में मैंने और हमारे दुबई के दोस्त हरीश मिश्रा ने चुटियाधारी चौबेजी की खूब खिंचाई की। चौबेजी खुद दुबले पतले मरियल से हैं। हरीश बोले-पंड़ितजी आपका तो बुढ़ापे में डीएनए टेस्ट भी नहीं हो सकता क्योंकि उसके लिए खून चाहिए। मैंने कहा-अपनी चोटी से पकड़े जाएंगे क्योंकि अब तो कम्बखत बाल भी दिल की फिसलन के राज फाश कर देते हैं। बेचारे हास्य कवि चौबे जी संकुचा गए। बताते चले कि यह वही कवि हैं जिन्होंने कलयुग में सूपनखा को खोज निकाला। वो तो भला हो अखिेलेश यादव का कि चुनाव जीत कर सरकार बना ली वरना मायावती के राज में पंड़ित जी जेल में रामचरित मानस के लिए चौपाई लिख रहे होते।   
और यकीन जानिए दुबई के शेख राशिद आडिटोरियम में मुशायरा सचमुच सुपर हिट रहा। सुबह साढे़ तीन बजे तक पूरा आडिटोरियम खचाखच भरा था। काली शेरवानी में रेहान, अफताब और फरहान के चेहरे दमक रहे थे। चटक गुलाबी ब्लाऊज और गुलाबी किनारे वाली क्रीम साड़ी के खालिस हिन्दुस्तानी लिबास में खूबसूरत शाजिया की खुशी से चहक रही थी। जैसे निकाह के बाद घर से बेटी की बारात विदा हुई हो।
जारी

Tuesday, October 1, 2013

डरावना रेगिस्तान और दोस्तों का दुबई


अरबों के देश में-1


 

लखनऊ से पाकिस्तान और फिर अरब सागर पार करते हुए दुबई का सफर सचमुच दिलचस्प है। अरब सागर पार करें तो हवाई जहाज से नीचे डरावना रेगिस्तान साफ दिखने लगता है। ये रेगिस्तान फिल्मों में दिखने वाला साफ सुथरा और सलीकेदार नहीं है। बल्कि ये सीमेंट जैसी काली परतदार रेत का रेगिस्तान है जिसमें रेत की गहरी और खौफनाक खाइयां हैं। ये बहुत नया रेगिस्तान है जहां कभी अरब सागर रहा होगा। दूर-दूर तक सिर्फ सन्नाटा। सभ्यता का कहीं कोई नामोनिशान नहीं। न कोई दरख्त, न पौधा, न हरियाली, न परिंदे, न जिंदगी का कोई और नामो निशान।  जहाज की खिड़की से इस रेगिस्तान को देखते हुए जिस्म कई दफा इस ख्याल से सिहर गया कि खुदा न खास्ता कोई गरीब यहां इस वीराने में फंस जाए तो उसका क्या अंजाम हो?

लेकिन जहाज जैसे दुबई के आसमान पर पहुंचा तो नजारा बदला हुआ था। एक तरफ ईरान दूसरी ओर ईराक और तीसरी तरफ सऊदी अरब। इन तीन देशों के ठीक बीच परर्शियन गल्फ में समन्दर के किनारे दुनिया की सबसे शानदार और खूबसूरत इमारतों का जंगल।  दुबई के अल-मकदूम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एयर इंडिया एक्सप्रेस का थका हुआ जहाज हॉफते-हॉफते सही पर वक्त से थोड़ा पहले पहुंच गया। सामने इमीग्रेशन काउंटर पर सिर से पांव तक अरब के परम्परागत सफेद लिबास में लिपटे इमीग्रेश्न के अफसर। दो काउंटर पर काले लिबास में महिला अफसर बैठी हैं। सबके सिर ढके हुए हैं। लेकिन चेहरे पर बुर्का नहीं। वे मर्दों से भी डील कर रही हैं। फितरत से सब के सब सरल और सहज। न सिक्योर्टी का तामझाम न तलाशी की दहशत। मेरे पास वीजा की सिर्फ फोटो स्टेट कापी है। पासपोर्ट देखने के बाद उस अरबी अफसर ने उसी फोटो स्टेट वीजा पर ठप्पा लगाया और अरबी में कुछ बोला जिसका मतलब था- ‘दुबई का आपका स्वागत है।’ दुबई का ये एयरपोर्ट दुनिया का अकेला एयरपोर्ट है जहां आप सिर्फ 20 सकेंड में इमीग्रेशन की सारी औपचारिकताएं पूरी कर स्मार्ट गेट से शहर में दाखिल हो सकते हैं। मुझे अमेरिका के न्यू जर्सी का इमीग्रेशन काउंटर याद आया जहां तलाशी के नाम पर बस कपड़े नहीं उतारे थे। 

किसी भी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से बाहर निकलने से पहले मैं फॉरन करेंसी एक्सचेंज से रुपए को उस देश की मुद्रा में परिवर्तित कराता हूं। इससे थोड़ी सहूलियत हो जाती है। मैंने दस हजार रुपए दिए बदले में 540  दिरहम मिले। दिरहम दुबई की करेंसी है। सौ-सौ के 5 नोट और दस के 4 नोट।  सरदार मनमोहन सिंह के राज में अपने देश के रुपए की औकात देखकर हमेशा की तरह फिर शर्मिदगी हुई। चुपचाप नोट मैंने अपने पर्स में रख लिए।

दुबई में मैं मुशायरा और कवि सम्मेलन के एक जलसे में शिरकत करने आया हूं। यह सालाना जलसा ‘हमारी एसोसिएशन’ नाम की संस्था कराती है। अप्रवासी भारतीयों की यह संस्था हर साल मुन्नवर राना, राहत इंदौरी, इकबाल अशार, डा. तारिक कमर जैसे शायरों और कुमार विश्वास जैसे कवियों को आमंत्रित करती है। साथ में किसी एक हिन्दुस्तानी साहित्यकार या पत्रकार को ‘मोइन-उर-रहमान किदवाई लिटररी एक्सीलेंस अवार्ड’ से नवाजती है। इस साल के अवार्ड के लिए मुझे चुना गया था। मुझे बताया गया कि ये अवार्ड मेरी स्टोरी ‘इस आंतकी की खता क्या है’ और ‘महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग’ जैसी नामुराद किताब के लिए दिया जा रहा है जिसे तारीफ कम और लानते ज्यादा मिलीं।  दुबई में ‘हमारी ऐसोसिएशन’ कोई पांच साल पहले वजूद में आई। रेहान लखनऊ से और शाजिया किदवई और फरहान वास्ती बाराबंकी से कई साल पहले दुबई में नौकरी करने आए थे। रेहान लाजवाब स्वाद वाली आईसक्रीम कंपनी बास्किन राबिन से जुड़े हैं। शाजिया अबूधाबी कामर्शियल बैंक से। आफताब अल्वी मुम्बई में श्रीराम जनरल इंशोरेंस ग्रुप से जुड़े हैं और बाराबंकी मसौली के मीठी जवान वाले फरहान वास्ती भी किसी मल्टी नेशनल कंपनी के कारिंदे हैं। सभी तरक्कीपसंद और शेरो शायरी के जबरदस्त शौकीन हैं। अरबों के इस देश में बाराबंकी के बड़ा गांव की शाजिया का आत्मविश्वास तो गजब है। वह पढ़ी लिखी होशमंद और खूबसूरत खातून हैं। अपने दिल को बखूबी समझती हैं और परदेस में अपनी मुशकिलात से वाकिफ हैं। अपनी ड्यूटी से वक्त निकाल कर हिन्दुस्तान की ये बिटिया अपने दोस्तों के साथ मुशायरे को कामयाब बनाने की तैयारियों में जुटी है। उनके शौहर भी साथ में हैं। शाजिया कहती हैं ये सिलसिला एक शौक के रूप में शुरू हुआ था जो अब एक जूनन बन गया है। 

दुबई में आधी से ज्यादा आबादी हिन्दुस्तानियों की है। ये सब अपने मुल्क को बेतरह मिस करते हैं। सो एक दिन ख्याल आया कि क्यों न यहां हर साल एक मुशायरा और कवि सम्मेलन कराया जाए। दुबई हिन्दुस्तानी कल्चर से बावस्ता होगा। शुरू में तो इन लोगों ने अपनी तनख्वाह के पैसे जोड़ कर मुशायरा कराया। यह प्रोग्राम कामयाब हुआ तो दुबई में कुछ बड़ी कंपनियों के स्पांसर भी मिल गए। यू-ट्यूब पर जारी मुशायरे के वीडियो को अब तक लाखों लाइक हासिल हो चुकी हैं। बाद के सालों में हमारी एसोसिएशन ने आर्थिक रूप से कमजोर शायर व कवियों की मदद के लिए बैनेफिशरी अवार्ड शुरू किया। पिछले दो साल में ये अवार्ड शायर अजमल सुल्तानपुरी व बुद्ध देव शर्मा को दिया गया। हमारी एसोसिएशन ने साहित्यकारों के लिए लिटररी अवार्ड भी शुरू किया। पिछले साल ये अवार्ड प्रो. वली उल्लाह हक अंसारी को मिला। प्रो. अंसारी लखनऊ में पर्शियन के अकेले प्रोफेसर हैं जिन्हें राष्ट्रपति अवार्ड भी मिल चुका है। इस साल के लिटटरी एक्सीलेंस अवार्ड के लिए इस खाकसार को चुना गया। सबसे बड़ी बात जिस मुहब्बत और खुलूस से नौजवान अप्रवासियों की ये टोली भारत से आए मेहमान शायरों और कवियों की खातिरदारी में पलक पावड़े बिछा देती है वह वाकई दिल छू लेने वाली है।

मुझे बताया गया था कि एयरपोर्ट की लॉबी आपको कोई रिसीव करने आएगा। लेकिन लॉबी में मुझे कोई नहीं दिखा। मैं वहीं एयरपोर्ट पर कोस्टा कैफे में मीडियो अमेरिकैनो का आर्डर देकर उनका इंतजार करने लगा। वहीं बगल की कुर्सियों पर लखनऊ के डा. तारिक कमर के संग कुछ और शायर भी बैठे अपने मेजबान का इंतजार कर रहे थे। हालांकि मैं तब उनमें से किसी को नहीं पहचानता था। आधा घंटा बीत गया पर कोई नहीं आया। ऐसा पहली दफा हुआ कि मेरे पास आयोजकों का स्थानीय फोन नम्बर भी नहीं था। न पता था कि कहां जाना है। अजनबी देश में यह अनुभव सचमुच खौफनाक है। कुछ रेगिस्तान के वीराने में फंसने की दहशत सरीखा अनुभव जो मैंने जहाज पर महसूस किया था। लेकिन अल्लाह का शुक्र है ये हालात ज्यादा देर नहीं टिके। भीड़ में रेहान का मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखा तो राहत की सांस ली। रेहान ने आते ही देरी के लिए माफी मांगी और बताया कि वे शाम के ट्रैफिक में फंस गए थे। रेहान भाई से तीन महीने पहले लखनऊ में मुलाकात हुई थी इंन्दिरा प्रतिष्ठान के एक मुशायरे में। उनसे एक पुराने दोस्त आफताब अल्वी ने मिलवाया था। रेहान मियां बेहद शरीफ और सलीकेदार इंसान हैं। उनके चहेरे का भोलापन आकर्षित करता है। उनके चेहरे में एक खास तरह की खुद एतिमादी यानी आत्म विश्वास झलकता है ये कहने की जरूरत नहीं कि ये खुद एतिमादी इंसान के किरदार के लिए कितनी जरूरी है। 

खैर आफताब को हम लोग राजी के नाम से जानते हैं। राजी अखबारनवीसी के शुरूआती दिनों के दोस्त हंै। तब वे अपने बड़े भाई शहाब अल्वी के साथ हफ्तेवार अखबार ‘मानस मेल’ निकाला करते थे। तब मैंने उर्दू हफ्तेवार ‘जदीद मरकज’ से अपना करियर शुरू किया था। आफसेट प्रेस जमाना था। कटिंग पेस्टिंग से अखबार निकलता था। खबर लिखने से लेकर उसे ब्राडशीट पर चिपकाने तक का काम हमें खुद करना पड़ता था। हमारे एडीटर हिसाम सिद्दीकी नफासतपंसद और जिन्दा दिल इंसान थे। तनख्वाह कम देते थे लेकिन काम की पूरी आजादी देते थे। वह कलम से इंकलाब लाने के कायल थे। तब मुलायम की नाक के बाल हुआ करते थे। उन्होंने समाजवादी जिन्दाबाद के खूब नारे लगाए। मुलायम को मुसलमानों का कायल बनाने के गुनाह में वह भी शामिल थे। पर अब सुनते हैं समाजवादी लीडर खंजर लेकर उनकी तलाश में हैं। खैर प्रेस में बेहद घरेलू माहौल था और उनकी शरीके हायात और हमारी साहेबा भाभी लाजवाब बिरयानी बनाती और सबको प्यार से खिलाती थीं। जुमे रात को देर रात तक काम चलता और हम अखबार बिछा कर डुंडे के कबाव और आलमगीर की दुकान के मस्त पराठे और सालन खाते थे। क्या हसीन दिन थे वे। मेरे पिताजी कहते लड़का ‘मलेच्छ’ हो गया और हाथ से जाता रहा। वे मेरे पेशे पर लानत मलानत भेजते नहीं थकते। लेकिन वक्त सब बदल देता है। वक्त के साथ राजी से राब्ता भी टूट गया। वह मुम्बई में श्रीराम जनरल इंशोरेंस डिवीजन का नेशनल हैड बन गया और मैं कम्बखत अखबारनवीसी की गलियों में भटकते हुए दुनिया भूला बैठा।  

अल-मकदूम एयरपोर्ट से हमारी कार बाहर निकली तो बातें शुरू हो गईं। बातचीत हिन्दुस्तान के हालात से शुरू होकर मुजफ्फर नगर के दंगों पर खत्म हुई। रेहान ने बताया कि यहां हम सबका दिल कैसे हर वक्त हिन्दुस्तान में अटका रहता है। स्टेलाइट डिश टीवी से घर पर हर वक्त सिर्फ हिन्दुस्तानी चैनल चलते रहते हैं। ये चैनल मुल्क से बिछड़ने का दर्द कम कर देते हैं। बालिका वधु, कामेडी विद कपिल, सीआईडी जैसे टीवी सीरियल हर हिन्दुस्तानी घर में मकबूल हैं। घर की चहारदीवारी में लगता ही नहीं कि आप परदेस में हैं। रेहान याद करते हैं कि कैसे वह दस साल पहले दुबई में भारत-पाक क्रिकेट के लिए वह अपने एक पाकिस्तानी रिश्तेदार से भिड़ गए थे। और फोन पर उन्होंने अपने पाकिस्तानी रिश्तेदार की मादर-फादर कर दी थी। बातचीत में मेरे लिए एक नई चीज ये निकल कर आई कि नई पीढ़ी पूरी तरह से हिन्दुस्तानी हो गई है। अब भारत-पाक मैच में पाक जीतने पर गलियों में पटाखे नहीं फूटते। 80 और 90 के दशक में ऐसा खूब होता था। दरअसल भारत के तमाम मुसलमानों के रिश्तेदार पाकिस्तान में बसे थे। पाकिस्तान से उनका एक स्वभाविक लगाव था। वह पराया मुल्क नहीं था। जबकि हिन्दुओं ने मुल्क के तकसीम होते ही पाकिस्तान को दुश्मन देश मान लिया। मुसलमान ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि उनके चचा, मामू, खालू सब वहीं बस गए थे। वे दुश्मन कैसे हो सकते थे। लेकिन मुसलमानों की नई पीढ़ी का पाकिस्तान से ऐसा कोई सीधा लगाव नहीं रह गया। यहीं इतना बड़ा कुनबा हो गया कि उनको कौन याद करे। अब पाकिस्तान, हिन्दुस्तानी सैनिकों की लाशें सरहद से इधर भेजता है तो उनका भी खून खौल उठता है। यह सच है। रेहान बताते हैं कि ‘यहां दुबई में मेरे केवल एक जिगरी दोस्त हैं हरीश मिश्र जो लहसुन प्याज तक नहीं खाते । हमने अपने शाकाहारी पंड़ित मेहमानों को संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं को दी है।’ फिर मैंने पूछा नान वेज पंड़ित मेहमानों के लिए क्या इंतजाम है? रेहान भाई ने हंसते हुए कहा उनके लिए तपन दुबे हैं ना, वह भी मिश्राजी की तरह इंदौर से हैं। अपन तपन वाले। अमिताभ बच्चन की हेयर स्टाइल वाले तपन मुस्कुराने लगे।

जारी