दयाशंकर शुक्ल सागर

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Thursday, August 29, 2013

देखो कितना डरा सहमा है सबसे बड़ा दरोगा

 
मेरी अमेरिका डायरी 1


न्यू जर्सी के अत्याधुनिक एयरपोर्ट पर उतरा हूं। माहौल खुशनुमा है। बीती रात यहाँ हल्की बूंदाबांदी हुई है। सफेद नीले आसमान पर बादल के टुकडे़ एयरपोर्ट पर खड़े विमानों के ऊपर चक्कर लगा रहे हैं। आगे बाल्टीमोर का जहाज पकड़ने के लिए हम इमीग्रेशन विंडो की तरफ बढ़ रहे हैं। तभी अचानक। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी के लोग हमें घेर लेते हैं। पासपोर्ट और वीजा की जाँच के बाद शुरू होता है सवालों का दौर। इलेक्ट्रानिक आइटम में क्या-क्या है? लैपटाप, कैमरा? पिछले छह महीने में आपने उसे किसी दोस्त या किसी अजनबी को तो नहीं दिया? यात्रा से पहले लैपटाप बनने के लिए किसी वर्कशाप तो नहीं भेजा था? क्या किसी व्यक्ति ने आपको कोई सामान दिया है? सवाल खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं।मेरे साथ सरदार हरविंदर सिंह भी इन सवालों से ऊब चुके हैं। करीब छह फुट की वह अश्वेत महिला कस्टम अफसर हमारी परेशानी समझ चुकी है। वह एक हाथ से अपनी कमर में टंगी काले मूठवाली भारीभरकम रिवाल्वर संभालती है और मुस्कुराते हुए बेहद शालीनता से कहती है-‘सॉरी फार अनकनवीनियंस, यू मे गो अहेड’ (असुविधा के लिए खेद है आप आगे बढ़ सकते हैं।) आगे बढ़ते वक्त सरदार जी ने बताया कि अब तो नई दिल्ली एयरपोर्ट पर अमेरिकी जहाज कांडीनेटल एयरवेज के सारे कर्मचारी सुरक्षा अधिकारी की तरह बर्ताव करने लगे हैं। जिन्हें जहाज पर चढ़ते यात्रियों की लाइन सीधी रखने का काम मिला है वह भी पूछते हैं कि यूएस क्यों जा रहे हैं? क्या काम है? कब लौटेंगे? हद तो तब हो गई जब दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कांटीनेंटल के विशालकाय जहाज पर चढ़ने से पहले यात्रियों के जूते उतरवा लिए गए। सरदारजी ने बताया कि ऐसी तलाश केवल यूएस जाने वाले जहाजों पर ली जाती है।
लेकिन अभी अगली मुसीबत इंतजार कर रही थी। बाल्टीमोर के लिए चेक इन करते वक्त नए सुरक्षा चक्र से गुजरना था। लैपटाप, कैमरा, मोबाइल जैसे सारे इलेक्ट्रानिक सामान निकाल कर टोकरी में स्कैन के लिए डाल दिए। पर जैसे ही मैटल डिटेक्टर से गुजरे बीप-बीप की आवाज शुरू हो गई। सुरक्षाकर्मी एलर्ट हो गए। थोड़ी घबराहट हुई। सामने खड़े सुरक्षा कर्मी ने बेल्ट की तरफ इशारा किया। बैल्ट उतार दी। फिर डिटेक्टर से गुजरे तो वही बीप-बीप की आवाज। सबकी निगाहें ऐसे घूर रही थी जैसे मेरी पतलून की जेब रिवाल्वर छिपी हो। इससे पहले मैं कुछ समझूं सुरक्षा कर्मी ने तलाशी शुरू कर दी। पीछे की जेब से पर्स निकाला। शायद उसमे रखे सिक्के मैटल डिटेक्टर को पसंद नहीं आ रहे थे। सुरक्षाकर्मी ने पर्स निकाल कर जाँच की टोकरी में डाल दिया। मैटल डिटेक्टर को इस बार मुझ पर दया आ गई। बिना बीप की आवाज के मैं सुरक्षा द्वार पार कर गया। मैंने राहत की सांस ली।पर मेरे आगे सरदारजी अभी तक फंसे थे। एक महिला सुरक्षाकर्मी उनकी उंगलियों के निशान ले रही थी। सरदारजी ने बताया कि शायद उस गोरी मेम को यकीन था मेरी पगड़ी में विस्फोटक छिपा है। लेकिन पगड़ी की जाँच को लेकर सिखों के विरोध के चलते उन्होंने पड़ताल का नया लेकिन शालीन तरीका इजाद किया। महिला सुरक्षा कर्मी ने सबसे पहले सरदारजी के हाथ किसी केमिकल से साफ कराए। फिर उनसे कहा गया वह खुद अपनी पगड़ी को चारों तरफ से छूएं। इसके बाद सुरक्षाकर्मी ने सरदारजी के दोनों हाथों का एक कागज पर इप्रेशन लिया। इस कागज को एक मशीन में डाल दिया। स्क्रीन पर लिखकर आया-‘नो एक्सप्लोसिव डिटेक्टेड।’ यानी कोई विस्फोटक नहीं मिला। सरदारजी की सांस में सांस आई। वह धीरे से बुदबुदाए-वाहे गुरूजी का खालसा वाहे गुरूजी की जय। सरदारजी बेतरह डरे हुए थे। मैं सोच रहा था केवल सरदारजी ही नहीं सारी दुनिया का दरोगा अमेरिका भी डरा हुआ है।