दयाशंकर शुक्ल सागर

Thursday, July 24, 2014

नौकरशाहों के जूते के नीचे लोकतंत्र


हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के कुलपति अरूण दिवाकर नाथ वाजपेयी अपने हरदोई के हैं। उन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय से डाक्टरेट की डिग्री ली। लम्बा डील डौल, लम्बी श्वेत-श्याम दाढ़ी, तेज से भरी आकर्षक आंखें। पहली दफा उन्हें देखा तो यह कहे बिन नहीं रह पाया कि आपके व्यक्तित्व में जबलपुर झलक रहा है। वह मेरा इशारा समझ कर खूब जोर से हंसे। बोलो-जबलपुर में रहकर आप ओशो से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। खैर ब्यूरोक्रेसी एंड डेवलपमेंट विषय पर आयोजित सेमिनार में मुझे बुलाया गया था। मुख्य अतिथि नागालैंड के पूर्व गवर्नर डा. अश्विनी कुमार थे जो हिमाचल विवि के ही प्रोडक्ट हैं। आमतौर पर मैं आकदमिक किस्म के सेमिनारों में जाने से बचता हूं। लेकिन कुलपति साहब का विशेष आग्रह था। कार्ड में नाम भी छप गया था। सो जाना पड़ा। वक्ताओं में कई आईएएस, आईपीएस मौजूद थे। मैंने अपने व्याख्यान के शुरू में ही कह दिया था कि वाइसचांसलर साहब ने मुझे बुलाकर बहुत जोखिम भरा काम किया है। क्योंकि नौकरशाहों के बारे में मेरा अनुभव व मेरी राय कतई अच्छी नहीं। मनरेगा हो स्कूलों में सिलाई मशीन योजना। नौकरशाहों ने कैसे इन अच्छी योजनाओं को लूटखसोट का केन्द्र बना दिया।
शुरूआत मैंने रोम से की। लोकतंत्र का जन्‍म एथेंस में हुआ था। लोकतंत्र एक ग्रीक धारण है। लेकिन इतिहास कहता कि जिस आदमी लोकतांत्रिक मूल्‍यों के विचार को जन्‍म दिया था उसी को एथेंस के लोगों ने जहर देकर मार डाला। लेकिन अगर आप रोम के इतिहास को बारीकी से पढ़ें तो पाएंगे सुकरात को एथेंस के लोगों ने नहीं, एथेंस की ब्‍यूरोक्रेसी और सत्ता ने मारा था।
उसी रोम में एक मशहूर दार्शनिक हुआ है काटो। उसे काटो द यंगर भी कहते थे। उसका जन्म ईसा मसीह के जन्म से कोई ९५ साल पहले हुआ था।  देखिए सदियों पहले ब्यूरोक्रेसी के बारे में उसकी क्या राय थी। उसने कहा था, ‘एक नौकरशाह सबसे घृणित व्यक्ति होता है। हालांकि गिद्धों की तरह उसकी भी जरूरत होती है, पर शायद ही कोई गिद्धों को पसंद करे। गिद्धों और नौकरशाहों में अजीब तरह की समानता है। मैं अभी तक किसी ऐसे नौकरशाह से नहीं मिला हूं, जो क्षुद्र, आलसी, क़रीब-क़रीब पूरा नासमझ, मक्कार या बेवकूफ़, जालिम या चोर न हो। वह ख़ुद को मिले थोड़े-से अधिकार में ही आत्ममुग्ध रहता है, जैसे कोई बच्चा गली के कुत्ते को बांधकर ख़ुश हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर कौन भरोसा कर सकता है?’
मैंने पैनल में साथ बैठे नौकरशाहों से माफी मांगते हुए साफ कहा कि अकादमिक बहस के लिए सौम्य भाषा मेरे पास नहीं। मेरे शब्दकोष में ऐसे ही तीखे शब्द हैं जैसे रोमन दार्शनिक काटो के पास थे। मुझे अच्छा लगता है जब अपने अखबार में टाइम्स आफ इंडिया आईएएस के लिए बाबू शब्द का प्रयोग करता है।
 आप देखिए सदियों पहले ब्यूरोक्रेसी के बारे में जो राय दार्शनिकों की थी उसमें आज भी ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। वह रोम हो या भारत। दरअसल सिविल सर्विसेज को ब्रिटिश हुकमत भारत ले कर आई। उनका मकसद आईएएस के जरिए भारतीय गुलामों पर राज करना था। और वह इसमें कामयाब भी हुए।  आजादी के बाद हमारे आईएएस इस मानसिकता से उबर नहीं पाए। वह खूद को उसी एलीट क्लास में रखते हैं और जमीन और उसकी जरूरतों से दूर चले जाते हैं। और सरकार ने उन्हें एक खास तरह की इम्युनिटी दे रखी है जिसका वह रिटायर होने तक फायदा उठाते हैं। मजे की बात है कि खुद ब्रिटेन में आज नौकरशाही केवल महारानी के दरबार तक महदूद है।  वहां पब्लिक से टेक्नोक्रेट और विशेषज्ञ डील करते हैं। करीब करीब सभी ‌‌विकसित देशों में यही चलन है। लेकिन आपनी जोड़तोड़ की राजनीति में मशगूल हमारे नेताओं के पास जनता के लिए वक्त नहीं। उन्होंने हुकूमत के सारे अधिकार नौकरशाहों को दे रखे हैं। और जब सत्ता संभालते मोदी ने ब्यूरोक्रेट्स के पंख खोलने की बात की तो मैं समझ गया इन नौकरशाहों के भरोसे भारत में अगले पांच सालों में अच्छे दिन नहीं आने वाले।

Wednesday, July 23, 2014

तुम निर्भया हो तो क्या हुआ



तुम निर्भया हो तो क्या हुआ
रहती हो
दरिंदों के शहर में
यहां 170 फीट गहरे हैंडपम्प से
पानी की जगह निकलता है लाल खून
तुम निर्भया हो तो क्या हुआ
21 करोड़ की आबादी में
किसी अस्पताल
किसी स्कूल की चहारदीवारी में
किसी भूखे भेड़िए की तरह
दरिंदे तुम्हारे जिस्म को नोचेंगे
चीखती रहोगी तुम
रात के सन्नाटे में
तुम्हें कोई बचाने नहीं आएगा
तुम निर्भया हो तो क्या हुआ
तुम डरोगी जब तक तुम्हारी आत्मा
तहस नहस न हो जाए
वो तुम्हारी नंगी लाश पर चादर डालने से पहले
तस्वीरें खींचेंगे फिर
फेसबुक पर शेयर करेंगे
तुम्हें झूठे नाम देंगे
तुम्हें दूसरी निर्भया कहेंगे
चौराहे पर तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर रखकर
सूखी मोमबत्तियां जलाएंगे
तुम निर्भया हो तो क्या हुआ
भेडियों के इस शहर में
तुम्हें डरना होगा
डर कर रहना होगा
तुम अकेली हो
तुम निर्भया हो तो क्या हुआ
वो कल तुम्हें भूल जाएंगे
और अपने गुस्से को समेट कर
रख लेंगे
किसी तीसरी निर्भया के लिए !


 

Wednesday, July 16, 2014

चर्चिल के गाल पर बेटियों का तमाचा


शिमला का ऐतिहासिक पीटरहाफ कभी ब्रिटिश वायसरायों और गर्वनर जनरलों का शानदार घर हुआ करता था। वे यहां गर्मियां बिताते थे। आजादी के बाद यह महल पंजाब हाईकोर्ट में तब्दील हो गया। कहते हैं महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे पर मुकदमा यहीं चला था। हिमाचल जब अलग राज्य बना तो इस भवन को राजभवन बना दिया गया। लेकिन यह भवन इतना बड़ा था कि बाद के देसी गर्वनरों ने इसमें रहने से ही इंकार कर दिया। कुछ लोग कहते हैं कि एक गर्वनर को तो यहां रात में वायसराय का भूत सताने लगा था। इसी दहशत में यहां बड़ी भारी आग लग गई थी। और तब इस महल को ठीक ठाक करके हिमाचल के पर्यटन विभाग ने महंगे होटल में तब्दील कर दिया। जिस घर में कभी भारत के गर्वनर जनरल रहते हों उस घर में रात बिताने का अपना अलग और रोमांचक अनुभव है। होटल में दाखिल होते ही आपको इसकी भव्यता का अंदाजा आसानी से हो जाएगा जो बेशक दुनिया के बड़े से बड़े सात सितारा होटल में संभव नहीं है।
खैर इस आलीशान महल में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं। मेरी दिलचस्पी सिर्फ उन बच्चों में थी जिन्होंने रात दिन मेहनत कर मेरिट में अपनी जगह बनाई। मुझे शिमला आकर पता चला कि देश में प्रतिभाओं को सम्मानित करने की परम्परा सबसे पहले 2002 में जिस अखबार ने शुरू की, वह अमर उजाला था। बाद में इसी आइडिया को दूसरे अखबारों ने यूपी व अन्य राज्यों में अपनाया। खैर यह भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात नहीं। अहम बात यह है कि मीडिया समूह इन आयोजनों के जरिए सामाजिक सरोकारों से सीधे जुड़ रहे हैं। यह एक अच्छी पहल है। बिनोवा भावे ने प्रतिभा की बड़ी सटीक व्याख्या की है। प्रतिभा का मायने है बुद्धि में नयी नयी कोपलों का फूटते रहना। नई कल्पना, नया उत्साह, नई खोज और नई स्फूर्ति। ये सब प्रतिभा के लक्षण हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के हाथों मैडल पा कर हिमाचल के सुदूर गांवों से आए बच्चों के चेहरों पर मैंने आज प्रतिभा की यही चमक, यही उत्साह और स्फूर्ति देखी। एक गरीब बच्ची ने तो मुख्यमंत्री  को बीच रास्ते में रोक लिया। अपने असहाय पिता की ओर इशारा करते हुए बोली-देखिए मेरे पापा चल फिर नहीं सकते। उनके पास मुझे आगे पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है। मुख्यमंत्री ने अपने सक्रेट्री से कहा कि इस बच्ची और उसके पिता को सचिवालय ले आओ। मुख्यमंत्री के काफिले में ही ये बिटिया सचिवालय गई। मुख्यमंत्री ने फौरी राहत के लिए उसे दस हजार रुपए दिए और उसकी आगे की पढ़ाई की निजी तौर पर जिम्मेदारी ले ली।  यह सब मेरी आंखों के सामने हुआ। मैं गांव की उस बहादुर लड़की का हौसला देखकर दंग था। आज देश की हर लड़की को इसी तरह के हौसले की जरूरत है। बेटियां पढ़ेंगी तभी आगे बढ़ेंगी। और अपना हक हासिल करेंगी।

लौटते वक्त में पीटरहाफ की शानदार इमारत को देख रहा था। बेशक इन बच्चों को सम्मानित करने के लिए हमने एकदम सटीक जगह का चुनाव किया था। आत्माओं में मुझे यकीन नहीं लेकिन वायसराय की अगर रुहें यहां होगी तो यह देखकर बेशक चकित होंगी कि उनके छोड़े भारत में दूध बेचने वाले, राजगीर, मजदूर और गरीब किसानों की बेटियां कामयाबी के किस शानदार सफर पर आगे बढ़ रही हैं। मुझे चर्चिल भी याद आया जो कहा करता था-भारत के लोग अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे देश और आजादी को संभाल सकें। बेटियों की ये कामयाबी चर्चिल के मुंह पर एक करारा तमाचा है।


  

Friday, July 4, 2014

गालिब की डायरी


शिमला के हसीन मौसम में अपने प्यारे शायर मिर्जा गालिब की डायरी दस्तम्बू पढ़ रहा हूं। देख रहा हूं मिर्जा 1857 के बागियों से किस कदर नफरत करने लग गए थे। उन कम्बख्तों ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया था। दरअसल उन्होंने इंसाफपंसद और सितारों जैसी चमक रखने वाली मल्लिका विक्टोरिया के सम्मान में कसीदा लिखा था। जो दिल्ली से मुम्बई होता हुआ लंदन पहुंचा था। उन्हें उम्मीद थी कि मल्लिका उन्हें सोने के गहनों के अलावा मेहरखान की उपाधि से नवाजेंगी। साथ ही जिन्दगी भर घर बैठे तनख्वाह देंगी जिसे अंग्रेजी में पेंशन कहते हैं। लेकिन बुरा हो इन बागियों का। एहसान फरामोश और गद्दार सिपाहियों ने इंकलाब लाकर सब चौपट कर दिया।
पता नहीं क्यों ये सब पढ़कर गालिब के लिए गुस्सा नहीं आया। हर शायर या कवि से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह इंकलाब का झंडा बुलंद करे। उसकी अपनी जिन्दगी है। अपना फैसला है।
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन
मिर्जा गालिब का यह शेर बचपन से सुनता आ रहा था। इतना तो अंदाजा था कि गालिब शराब के बेइंतिहा शैकीन रहे होंगे। बाद में यह भी समझ में आ गया कि वह हमारे जफर भाई और तमाम तरक्कीपसंद मुस्लिम दोस्तों की तरह अधूरे मुस्लिम संस्कारों और धार्मिक बंधनों से आजाद थे। अपनी दिलचस्प डायरी दस्तम्बू में उन्होंने लिखा कि रात के वक्त वह सिवाए विलायती शराब के और कुछ नहीं पीते थे। जिस दिन नहीं मिलती थी उन्हें नींद नहीं आती थी। 1857 के उस दौर में दिल्ली में अंग्रेजी शराब बला की महंगी हो गई थी और हमारे गालिब साहिब फक्कड़ थे। ऐसे में उन्हें महेश दास नाम का एक दोस्त मिल गया। देखिए गालिब साहेब उनके लिए क्या लिखते हैं- 'अगर ईश्वर से प्रेम करने वाला और दूसरों पर लुटाने वाला समन्दर जैसे दिल वाला महेश दास देशी शराब जो रंग में विलायती शराब की तरह और खुशबू में उससे ज्यादा बेहतर शराब मेरे लिए नहीं भेजते तो न जाने मेरा क्या होता। मैं जिन्दा न रहता और इसी प्यास में अल्लाह को प्यारा हो जाता। ...ज्ञानी महेश दास ने मुझे वह अमृत मुहैया करा दिया है जिसे सिकन्दर ने अपने लिए खोजा था।'
गदर के वक्त मुसलमानों को वैसे भी शक की नजर से देखा जाता था। एक अंग्रेज अफसर ने गालिब को बुलवा लिया। टूटी फूटी हिन्दी में पूछा- तुम मुसलमान है? गालिब हंस कर बोले-आधा। अंग्रेज अफसर हैरत में पड़ गया। बोला-ये क्या बात है। मिर्जा बोले-शराब पीता हूं सुअर नहीं खाता। अफसर ने हंस कर उन्हें छोड़ दिया।
यह सब पढ़कर मुझे एक और किस्सा याद आ गया जो फिराक गोरखपुरी साहेब सुनाया करते थे। यह किस्सा मैंने इलाहाबाद में फिराक के दोस्त अकील रिजवी साहेब से सुना था। गालिब से एक मौलाना ने कहा-शराब पीना गुनाह है। गालिब का सेंस आफ ह्यूमर गजब था। वह बोले-पीएं तो क्या होता है? मौलाना ने कहा-सबसे बड़ी बात यह कि उसकी दुआ कबूल नहीं होती। मिर्जा बोले आप जानते हैं शराब कौन पीता है? अव्वल तो वह कि जिसके सामने ओल्ट टाम (ब्रिटिश राज में मशहूर शराब) की बोतल बा-सामान सामने हा‌जिर हो। दूसरे जिन्दगी बे-फिक्र हो और तीसरी सेहत अच्छी हो। अब आप फरमाइए जिसके पास ये तीनों चीजें हों उसे और क्या चाहिए जिसके लिए वह दुआ करे?

Monday, March 3, 2014

लुगानो यानी स्वर्ग का एक शहर

मेरी यूरोप डायरी-7

लुगानो स्टेशन पर उतरा तो लगा किसी हिल स्टेशन की दोपहर है। हवाओं में खास तरह की ठंडक है। सांस लीजिए तो बर्फ अंदर तक अटक जाती है। वह बर्फ नहीं सिर्फ उसका अहसास है। यूरो रेल का प्लेटफार्म किसी एयरपोर्ट के लाउंच जैसा साफ सुथरा है। बनावट में ये स्टेशन हिन्दुस्तान के किसी सामान्य रेलवे स्टेशन से अलग नहीं है। लेकिन भीड़ भाड़ बिलकुल नहीं। दूर दूर तक बमुश्किल दो चार लोग नजर आ रहे हैँ। चारों तरफ एक अजीब तरह का सन्नाटा पसरा है। कहीं कोई आवाज नहीं शोर नहीं आवाज नहीं। ट्रेन आगे सरक कर धीरे-धीरे आंखों से ओझल हो गई। सामने पहाड़ दिखने लगे।
मैं पलटा तो पीछे अनादि खड़ा था। जैसा कि मैंने बताया था वह यूनिवर्सिटी ऑफ लुगानों से पीजी कर रहा है। शायद कंप्यूटर सांइस में। यहां हास्टल में रहता है नहीं शायद ‌किराए के मकान में। अनादि ने बताया कि यहां मकान महंगे नहीं है। दो तीन स्टूडेंट मिल कर एक फ्लैट ले लेते हैँ। काम चल जाता है। मैं अनादि को वह सामान देता हूं जो उसकी मां ने उसके लिए बहुत प्‍यार से भेजा था।। मालपुआ, गुझिया, मठरी यही सब कुछ होगा उस डिब्बे में।  
हम सीढ़ियों से चढ़कर उसके रूम तक पहुंचते हैं। उसे रूम कहना गलत होगा। यह एक हवादार घर है। खुला खुला सा। सामने शीशे की बड़ी-बड़ी खिड़कियां हैं। और खिड़कियों के उस पार प्राकृतिक सौंदर्य। पर्वत, झरने, नदी, पेड़, हरियाली सब कुछ। उनके इधर इस पार खूबसूरत पुरानी इमारतें, चौड़ी सड़कें, पार्क और सलीके से बसे लोग। अनादि बताता है कि यहां का जीवन कितना शांत और ठहरा हुआ है। लेकिन जिन्दगी ऐसी नहीं है। जिन्दगी झरने से बहती हुई है। अगर आपकी जेब में स्विज फ्रेंस हैं तो सारे ऐश्‍वर्य आपके लिए हैँ। दिलचस्प है कि यूरोप में होने के बावजूद स्वीटजरलैंड में यूरो डालर नहीं चलता। क्योंकि तकनीकी तौर पर स्वीटजरलैंड यूरोपीयन यूनियन का हिस्सा नहीं। पूरे स्वीटजरलैँड में स्विज फ्रेंस नाम की करेंसी चलती है। अनादि अपने आधुनिक किचन में जाकर जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार करता है क्योंकि हमें अभी बाहर घूमने के लिए निकलना है।
 लुगानो स्वीट्जरलैंड का एक मशहूर पर्यटन स्‍थल है। चारों तरफ से पहाडों से घिरा एक खुशनुमा शहर। करीब आधा दर्जन से ज्यादा म्यूजियम और पुरानी ऐतिहासिक इमारतें इस खामोश शहर की पहचान हैं। कैंटोनल डी आर्ट म्यूजियम में बाइबिलिक आर्ट की गजब चित्रकारी हैँ। ओक की लकड़ी पर ये ऑयल पेंटिंग शायद मि‌मलिंग हैंस की है। सूली पर चढ़ाने से पहले ईसा मसीह को जनता के दर्शन के लिए लाया जा रहा है। अद्भुत....पहली सदी के राजनीतिक महौल की एक जीवंत तस्वीर। शायद पन्द्रहवीं सदी की। ऐसी कई और दुर्लभ तस्वीरें हैँ यहां। एक मूर्ति यहां 16वीं सदी के ईसाई संत ऑथानासियुस की है। उनके बारे में एक दिलचस्प किस्सा है। उन्हें जब शहर की एक मशहूर वेश्या से मिलवाया गया तो वह जोर जोर से रोने लगे। पूछा गया कि क्यों रो रहे हैं आप? संत बोले-मुझे दो बातों को लेकर गहरा दुख हुआ। एक तो यह कि इस वेश्या का कोई भविष्य नहीं। और दूसरी बात यह कि मैं ईश्वर को हासिल करने के लिए इतनी कोशिशें नहीं करता जितनी ये और बदचलन मर्दों को खुश करने के लिए करती है। 

लेक लुगानों का खास आकर्षण है। इस झील का विस्तार कई किलोमीटर तक है। लुगानों के पश्चिम में एक टूरिस्ट स्पॉट है गेनड्रिया। बस का ड्राइवर हमें उस पहाड़ी हाईवे पर उतार देता है। हाईवे पर एक तरफ चट्टाने हैं, दूसरी तरफ नीचे बहुत गहराई में लम्बी झील। नीचे नीली झील के किनारे खूब सारे झोपड़नुमा घर बनें हैं। वीकएंड में यहां लोग छुट्टी मनाने आते है। हम झील के किनारे घूम रहे हैं। तस्वीरें खींच रहे हैं। ऊपर हाईवे पर आए तो वापसी की कोई बस नहीं दिख रही। हम पैदल आगे बढ़ते गए। एक टनल के नीचे अकेला पुलिस वाला दोनों तरफ से आने वाली कारों की चेकिंग कर रहा था। यह स्विट्जरलैंड और इटली का बार्डर है। पुलिस वाला बताता है कि इटली में शराब, सिगरेट और मांस सस्ता है। इटली से आने वाला हर वाहन चालक रुककर पुलिसवाले को बताता है कि उसके पास यह सब नहीं है। कार के अंदर सरसरी निगाह डालकर वह उसे जाने देता है। जिस वाहन पर उन्हें शक होता है उन्‍हें किनारे रोक कर वे ठीक से तलाशी लेते हैं। पूरी शालीनता से।  लौटते वक्त हमें कोई बस नहीं मिलती। हम पैदल लुगानों की तरफ बढ़ जाते हैं। इशारा करने पर एक दम्पत्ति अपनी कार रोक देते हैं। पूछते हैं यू आर इंडियन्स? हम हां में सिर हिला देते हैं। हिन्दू ऑर मुस्लिम। हम दोनों एक दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं। अनादि धीमें से हिन्दू बोलता है। और कार का दरवाजा हमारे खुल जाता है और हम आधे घंटे के सफर के बाद लुगानों सिटी पहुंच जाते हैं। अनादि बताता है कि आतंकवाद खासकर 9/11 की घटना के बाद यहां के लोग डरे हुए हैं। यहां कोई पाकिस्तानी या किसी भी मुसलमानों को लिफ्ट नहीं देता। सोच कर अफसोस होता है। चंद अहमक लोग कैसे पूरी कौम को बदनाम कर देते हैं।
जारी

वायलन बजाने वाले भिखारी और काल्विन कालेज

मेरी यूरोप डायरी-5

कल ही तय हो गया था कि आज शहर घूमना है। इलसा तीन दिन से शहर दिखाने के लिए पीछे पड़ी थी। मैं ही लगातार टाल रहा था। सुबह आकर होटल के रिसेप्‍शन पर डेरा डाल दिया। रिेसेप्‍शन से फोन आया कि नीचे इलसा मेरा इंतजार कर रही है। मैँ बस नहा के निकला ही था। घड़ी देखी ठीक दस बज रहे थे। मैं जानता हूं इलसा वक्त की पक्की है। मुझे कई बार लगा कि स्वीट्जरलैंड की सारी घड़ियों में वक्‍त इलसा ही सेट करती है। न एक मिनट इधर न उधर। समय के पाबंद लोगों से मुझे बहुत घबराहट होती है। लगता है कि किसी फौजी कैम्प में हूं। मैं उससे कहता कि तुम जरूर हिटलर के खानदान की होगी। हालांकि वह मूलतः जर्मन है लेकिन हिटलर का नाम सुन कर भड़क जाती। उसे हैरत होती है कि हम हिन्दुस्तानी कितनी सहजता से हिटलर का नाम ले लेते हैं।
मैँ तैयार होकर नीचे आता हूं तो देखता हूं वह गुस्से में बैठी है। सोचता हूं दुनिया की सारी लड़कियां एक जैसा गुस्सा क्यों दिखाती हैं। सफाई देने के बजाए मैं ब्रेकफास्ट के लिए होटेल के रेस्‍त्रां की तरह बढ़ जाता हूं। वह पीछे से अंग्रेजी में कहती है-तुम नहीं सुधरोगे। इलसा  की बेतकल्‍लुफी मुझे पसंद है। कन्वेशन से पहले ही वह भारत में फोन से मेरे सम्पर्क में थी। प्रायोजक संस्‍था ने उसे हमारी देखभाल के लिए नियुक्त किया था। हमउम्र थी इसीलिए औपचारिकताएं बहुत जल्द विदा हो गई थीं। मुझे शहर घुमाना उसके शेड्यूल लिस्ट में नहीं था। लेकिन एक चीज जो हमारे शेड्यूल में पहले दिन ही शामिल हो गई थी वह थी- दोस्ती।
ब्रेकफास्ट के दौरान मैंने उसे दोस्ताना लिहाज में हिदायत दी कि वह मुझसे किसी टुरिस्ट गाइड की तरह बर्ताव न करे। वैसे भी यहां मेरे शरीर की घड़ी का वक्‍त कलाई में बंधी घड़ी से मैच नहीं कर रहा। भोर में चार बजे तो नींद आती है। आधी रात खिड़की से देखता हूं कि सड़क पर क्या तमाशा हो रहा है। मैंने उसे उस रात सड़क पर चल रहा प्रेमी-प्रेमिका के झगड़े का किस्सा सुनाया। वह खूब हंसी। उसे भरोसा नहीं हुआ। उसने कहा-यू आर लायिंग। मैंने कहा-नहीं सच वह लड़की उसे बार-बार छू रही थी और लड़का बार-बार बोल रहा था-डोंट टच मी। वह खूब हंसी और इस हंसी में उसका गुस्सा जाने कहां गिर गया।   

हम टहलते हुए कार्नवीन मेट्रो स्टेशन पहुंचते हैँ। सिर्फ दो सड़कें पार करनी पड़ीं। इसके सामने हमें ट्राम पकड़नी है। इस इंटरचेंज स्टेशन पर हर सुबह वायलन वादकों का झुंड दिखता है। आज भी दिख रहा है। सब के सब लम्बे पुराने ओवर कोट में हैं और हाथ में वायलन है। मैँ इलसा से पूछता हूं ये ढेर सारे वायलन वादक कौन हैं? वह इशारे से कहती है अभी पता चल जाएगा। हम शहर की तरफ जाने वाली ट्राम में बैठ जाते हैं। अंदर से ट्रामें हमारी दिल्ली की मेट्रो जैसी हैं। लेकिन भीड़ भाड़ बिलकुल नहीं है। कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों के बाहर पूरा शहर साफ दिखता है। मैं खिड़की से बाहर देखने लगता हूं। ड्राम में वायलन की एक धुन सुनाई पड़ती है। मुझे पता नहीं चला ये वायलन बजाने वाले कब ट्राम में आ गए। वायलन की धुन सुखद लगती है। लेकिन मैं देखता हूं बाकी यात्री अपने में गुम हैं। थोड़ी देर बाद वह वायलन बजाना बंद करके अपने ओवरकोट की जेब से एक गिलास निकलता है। यात्री उसमें सिक्के डालने लगते हैं। मैं इलसा को बताता हूं-ऐसा मैंने अपने देश में पूर्वांचल और नार्थ ईस्ट की ट्रेनों में खूब देखा है। कभी कोई बांसुरी बजा कर पैसा मांगता है कभी इकतारा बजा कर। वह वायलन वादक मेरे पास आता है। मैं भी अपनी जेब से एक सिक्का निकाल कर उसके गिलास में डाल देता हूं। उस वक्त ध्यान नहीं रहता कि वह सिक्का कितने का था। बाद में याद आया वह स्विज फ्रेंस था। एक यूएस डालर के बराबर। यानी करीब पचास रुपए। ईनाम थोड़ा महंगा हो गया। बाद में सोचता हूं।
किसी भी दूसरे यूरोपीय शहर की तरह जिनेवा शहर को भी हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं। एक नया और दूसरा पुराना। जाहिरी तौर पर पुराना शहर ज्यादा खूबसूरत है। इमारतों में प्राचीन रोमन वास्तु ‌शिल्प दिखता है जो मैंने और भी कई यूरोपीय देशों में देखा है। ये खामोश इमारतें आपको खास तरह से आकर्षित करती हैं। इलसा ने जब मुझे काल्विन कालेज की इमारत दिखाई तो मैं चौंका। एक तन्हा सी खामोश इमारत। मैंने सानिया को बताया कि एक काल्विन कालेज हमारे लखनऊ में भी है। इस बार चौंकने की बारी इलसा की थी। क्योंकि जान काल्विन जिनेवा की रूह हैं। इस शहर को बसाने में और यहां के लोगों में रूहानियत भरने में जॉन काल्विन का बड़ा नाम हैं। वह जिनेवा के आध्यात्मिक गुरु थे जैसे हमारे यहां कभी गौतम बुद्ध या महावीर रहे हों। ऐसे जॉन काल्विन का लखनऊ से भी कोई रिश्ता हो सकता है क्या? मैं मजा ले रहा था। क्योंकि मैं जानता था कि लखनऊ में गोमती नदी के ठीक किनारे 'कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज' की नींव 11 मार्च 1891 को अवध और आगरा प्रान्त के मुख्य आयुक्त सर आक्लैन्ड काल्विन ने रखी थी। तब इस कालेज में केवल रजवाडों और ताल्लुक़ दार के बच्चे ही दाखिला ले सकते थे। इसमें दाखिला लेने की अकेली और आखिरी शर्त थी कि वह राजघराने या किसी ताल्लुकदार का बेटा हो या उनका गोद लिया हुआ हो। यह संस्था विशुद्ध रूप से पैसे वाले बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा दिलाने के लिये स्थापित की गयी थी। लेकिन इलसा अंत तक इस बात पर डटी रही कि ब्रिटिश कमिश्नर आक्लैंड का खानदान कहीं न कहीं से हमारे जॉन काल्विन से जुड़ा होगा। इस बात को न मानने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी।
सारा दिन हम शहर में भटकते रहे। इस खूबसूरत शहर के मैं अपनी आंखों में बसा लेना चाहता हूं। बेहद साफ सुथरी सड़कें, खूबसूरत चौराहे, चमचमाती दुकानें और एक से एक खूबसूरत इमारतें। इलसा  मुझे हर इमारत के बारे में बता रही थी। वह बताती है कि जिनेवा का पूरा पुराना शहर हैरिटेज साइट के रूप में घोषित है। यहां ज्यादातर इमारतें 1830 से 1945 के बीच की बनी हैँ। एक इमारत देख कर मैं चौंका था। वह ‌रशियन आर्थोडक्स चर्च है। उसे ये लोग रुस द जिनेवा कहते हैँ। इस इमारत के गुम्बद स्वर्ण के हैँ। इन गुम्बदों के ऊपर क्रास के निशान बने हैं। पता नहीं क्यों ये गुम्बद मुझे अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के गुम्बदों की याद दिला रहे हैँ।
शाम ढलने लगी है। हम थक चुके हैं। सड़क के किनारे बने एक ओपन रेस्‍त्रां में बैठ गए। काफी और कुछ स्नैक्स का आर्डर दिया। मैंने इलसा से पूछा उसके नाम का मतलब क्या है? उसका जवाब था- गॉड आफ माई ओथ। ज्यादातर जर्मन लड़कियों के नाम का यही अर्थ है। वह मुस्कुराने लगी। मैंने कहा- कुछ समझ में नहीं आया-गॉड आफ माई ओथ? क्या मतलब हुआ इसका? उसने मुस्कुराते हुए कहा- By my oath, you can trust me. यानी मेरी कसम तुम मेरा यकीन कर सकते हो। मैं लाजवाब हो जाता हूं।

स्विट्जरलैंड के गांव में एक शाम

मेरी यूरोप डायरी-6

दूर तक फैली आल्पस की पर्वत शृंखला। नीचे लाल खपडैल के बने घर। छतों पर, पेड़ों की बारीक टहनियों पर, रसोई की चिमनियों पर, बिजली के तारों पर हर तरफ बर्फ की हल्की चादर। झरने, झीलें और खुला आसमान। ट्रेन की विशालकाय खिड़कियों से दिख रहे ये अद्भुत नजारे आंखों को यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि हां, ये हकीकत है और आप जन्नत की सैर पर हैं।
जिनेवा में मेरा काम खत्म हो चुका है। मेरे पास चार दिन और बचे हैं। हम लोगों को दैनिक खर्च के लिए 75 यूएस डालर मिलते हैं। पूरे ट्रिप के पैसे एडवांस में मिल गए हैं। मैं हिसाब लगाता हूं मेरी जेब में करीब 700 यूएस डालर हैं। यह बहुत काफी हैं। इस पैसे से मैं यूरोप के कुछ और देश घूम सकता हूं। मैं जानता हूं संजैन वीजा मेरे पास है। इस वीजा पर मुझे कोई रोकेगा नहीं।
मेरे सामने स्वीट्जरलैँड का टूरिस्ट मैप है। इसकी एक सीमा जर्मनी से मिलती है दूसरी फ्रांस से और तीसरी इटली से। इलसा बताती है कि समय के इस बजट में आप सिर्फ एक तरफ निकल सकते हैँ। मैंने इटली जाना तय किया। क्योंकि वह लुगानों के रास्ते में हैं। वहां मेरा रिश्ते का भाई अनादि यूनिवर्सिटी ऑफ लुगानों से पीजी कर रहा है। सबसे पहले मुझे वहीं जाना है। लेकिन घूमते हुए।
 जिनेवा से लुगानों पहुंचने के लिए मुझे स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न, ज्यूरिख पार करते हुए इटली की सीमा तक पहुंचना था। करीब 800 किलोमीटर का सफर। स्विट्जरलैंड घूमने का इससे अच्छा बहाना क्या हो सकता था। एक एयरबैग में दो-तीन दिन के कपड़े भर कर यूरो ट्रेन में सवार हो गया। यूरो रेल अन्तराष्ट्रीय ट्रेन है। ये यूरोप के तमाम देशों को एक दूसरे से जोड़ती है। इसकी रफ्तार कई दफा हवाई जहाज को मात करती है। ट्रेन के अंदर का दृश्य किसी रेस्टोरेंट जैसा है। साफ सुथरा और भीड़ भाड़ से दूर। आपकी चेयर के आगे एक छोटी मेज भी होगी जिस पर आप लैपटाप रखकर अपना काम कर सकते हैँ।
ट्रेन की खिड़की से देखता हूं स्विट्जरलैंड के गांव अब शहर से जुड़े फार्म हाउस में तब्दील हो गए हैं। दीवारें पत्थर की और छतें खपड़ैल की जैसे हमारे देश में होती हैं। हर घर के बाहर कार और गाएं बंधी है। पहचान के लिए गायों पर रंग लगाए गए है। शायद अपने गोरुओं पर पहचान के लिए रंग लगाने की परंपरा करीब-करीब सभी संस्कृतियों में रही है। मेरा पहला ठिकाना मुंड है। इलसा ने मुझे बताया था कि स्‍वीट्जरलैँड की हसीन वादियों में खोना है तो मुंड जरूर रूकना। ये लगभग ग्रामीण इलाका है। समुद्र तल करीब 1200 मीटर ऊपर बसे इस इलाके को यूनेसको ने इसे वल्ड नेचुरल हैरिटेज साइट घोषित किया है।

पहली बार मुंड नाम सुन कर मैँ चौंका था। क्योंकि पुरानी भूली बिसरी स्मृतियों में यह शब्द कुछ जाना पहचाना था। याद आया लखनऊ के हमारे स्कूल में मधुमिता मुंड नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी। उसके पिता शायद फौज में थे। उसके बाल अजीब तरह से घुंघराले थे। वह शायद मुंड जनजाति से थी। ये जनजाति शायद छोटा नागपुर के पास की है। ये लोग झारखण्ड, उडीसा से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैले हैँ। महान क्रान्तिकारी बिरसा मुंडा शायद इसी जनजाति से हों। पता नहीं । लेकिन मैंने कभी उससे पूछा नहीं। खैर मुंड स्विट्जरलैँड की एक पुरानी मुंसीपैलटी थी। अब एक छोटा सा कस्बा कह लीजिए। ऊंची पर्वतश्रृंखलाओं के बीच बसा एक मोहक कस्बा। जंगली लकड़ियों के बने पुराने घर। लकड़ियों के रंग वक्त के साथ काले पड़ गए हैं। उनकी ढलानदार छतें उन छतों पर शाख से टूटे पत्ते। मुझे बताया गया कि सर्दी के दिनों में ये ढलानदार छतें सफेद बर्फ की चादर से से ढक जाती हैं। पेडों पर भी बर्फ होती है टहनियों और पत्तियों पर भी। पर इन दिनों बर्फ नहीं है। मौसम साफ और चमकदार है। धूप में गर्माहट है। वर्ना साल के नौ महीने यहां बर्फ रहती है। दूर पहाडी पर बड़ी नोकदार सींगों वाली भेड़े दिख रही हैं। सफेद और काली भेंड़े। उनके शरीर पर लम्बे-लम्बे बाल हैं जो बर्फ से उनकी हिफाजत करते हैं। प्रकृति ने उन्हें यहां जीने लायक बना दिया है।

 मैं आसापास घूम रहा हूं। अकेले। यहां के लोग अंग्रेजी नहीं जानते। सिर्फ जर्मन बोलते हैँ। इसलिए किसी से बातचीत भी संभव नहीं। जिन्दगी में पहली बार ऐसा हुआ कि आप किसी से बात करना चाहते हो पर नहीं कर सकते। अंग्रेजी के सिर्फ कुछ शब्द मदद कर रहे थे। एक सस्ता सा होटल मिल गया। पूरी तरह लकड़ी से बना एक साफ सुथरा होटल।  टूरिस्ट नहीं हैं इसलिए भीड़ भाड़ भी नहीं है। शाम ढल चुकी है। अब क्या करुं? सोचता हूं। होटल के बार में जाकर बैठूं। हां ये विचार दिलचस्प है। बार में हल्की पीली रोशनी है। चारों तरफ बिखरी कुर्सियों पर लोग बैठे हैं। स्‍त्री-पुरुष सब हैँ। बीच में बॉन फायर का इंतजाम है। शायद इसीलिए इस बड़े कमरे में गर्माहट है। मैँ एक मेज के किनारे अपना ग्लास लेकर बैठ जाता हूं। धीमा स्वीज संगीत पूरे वातावरण में तारी है। बाइस साल पुरानी बैलविनी सिंगल माल्ट के साथ अब ये संगीत धीरे धीरे मेरी चेतना पर हावी हो रहा है। जीवन के बारे में सोच रहा हूं और किस्मत के बारे में। कितनी अप्रत्याशित है जिन्दगी। आज यहां स्वीट्जलैंड की अनजान सी जगह मुंड में हूं। फिर स्कूल के दिन याद आते हैं। मधुमिता याद आती है। उसके दोस्त याद आते हैं। अपने दोस्त याद आते हैं। वे दिन कितने मस्त थे। स्कूल कैम्पस में इमली का पेड़ था। हम इमली अपने लिए नहीं तोड़ते थे। वो सारी शरारतें याद आती हैं। होटों पर मुस्कुराहट आ जाती है।     
मैं अपने कमरे में लौट आता हूं। दूर लकड़ी के बने तमाम घरों में रोशनी है। कितनी शांति है चारों तरफ। चांदनी रात में पूरा कस्बा जगमग है। दूर अंधेरे में पहाडों का रंग और स्याह होता जा रहा है। मैं थक गया हूं। अब सोना चाहता हूं।