दयाशंकर शुक्ल सागर

Tuesday, May 19, 2020

एक इंसान जो तितलियों के लिए घर बनाता है



जैव विविधता के प्रयोग -2


ऐसा आदमी सच में आपको अजीब लगेगा जो दीमक और चूहों के लिए घर बनाता हो। या तितलियों को अपने फार्म हाउस में रहने का निमंत्रण देता हो और मधु मक्खियों को अपने खेतों में बुलाता हो ताकि उनके परागण से खेतों में उसकी फसलें लहलहा उठें। आप खामोशी से कितने बड़े काम कर गुजरते हैं। न प्रचार की लालसा न प्रसिद्ध की अभिलाषा। बस एक निष्काम कर्मयोगी की तरह प्रकृति से अंतरसंबंध बनाने की साधना। Akhilesh Kumar Mishra जी का फार्म हाउस उनके जिस पैतृक खेतों के बीच बना उसे गांव वाले भुतहा कहते थे। पंडितजी के पिता खुद दारोगा थे और उनका बेटा भी जब पुलिस में चला गया तो गांव वालों ने सोचा कि अब ये परिवार गांव लौटने वाला नहीं। शहरों में नौकरी करने वालों के साथ प्रायः ऐसी ही धारणा जुड़ी हुई है। जमीन से उजड़े लोग कहां वापस लौटते हैं। शहर उनको निगल लेता है या उन्हें अपना गुलाम बना लेता है। मजदूर सिर्फ वे नहीं जो ईंट सिमेंट उठाते हैं। सफेद कमीज पहने भी बहुत से मजदूर हैं जो भले मरसडीज से चलते हैं लेकिन दफ्तरों में मालिकों की गुलामी करते हैं। भले गांव में उनके बाप दादाओं की सैकडों एकड़ जमीन परती यानी बेकार पड़ी है। पंडित जी अपने बाप दादाओं की इस जमीन को 'ईश्वर का उपहार' मानते हैं। जब वे यहां आए तो उन्होंने देखा कि उनके बागों के पेडों के तनों पर दीमक लग गए हैं। उनकी जडों में खेतों में चूहों ने बिल बना लिए थे। ठीक वैसे ही जैसे मेरे लखनऊ के घर पर लगे आम्रपाली पेड़ पर दीमक लग गए थे। और किसी की सलाह पर मैंने पेड़ के तने पर कीटनाशक छिड़क कर कितनी आसानी से उन दीमकों से निजात पा ली थी। लेकिन मिश्रजी ने ऐसा नहीं किया। दरअसल दीमक अपने भोजन के लिए सूखी चीजों पर आक्रमण करते हैं और लकड़ी खोखली होने लगती है। लेकिन उन्होंने दीमकों और चूहों के खाने के लिए अलग ब्लाक बना दिए। थोड़ी सी सूखी घास और मिट्टी का ढेर। फिर मदर टरमाइट वहां आ गई। इनकी कालोनी अरबों खरबों की आबादी वाली होती है। और देखते देखते असंख्य दीमकों का परिवार वहां बस गया। ऐसे ही फंफूद हैं। वे भी एक तरह से कीट है जो प्रायः 80 फीसदी फसलों को नष्ट कर देते हैं। अक्सर किसान इन फफूंद को कीटनाशकों से इन्हें खत्म कर देते हैं। लेकिन पंडितजी ऐसा नहीं करते। वे इन्हें भी बचाते हैं। इसी को हम जैव विविधता या बायो डायवरसिर्टी कहते हैं। यानी प्रकृति को नष्ट किए बिना उसके साथ रहना। और इसके पीछे एक रहस्यमय विज्ञान है। खेतों में इन दीमकों, फफूंदियों का रहना बेहद जरूरी है। दरअसल हमारे खेतों में दो तरह के कीटाणु होते हैं। मित्र कीट और शत्रु कीट।  मित्र कीट मिट्टी के कल्चर को क्रिएट करते हैं। वे शत्रु कीट से लड़ते हैं। उन्हें विकसित नहीं होने देते। जब हम खेतों में कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं तो वे मित्र कीटों को भी मार डालते हैं।     
 उनके बाग में फूल तो खिल गए। लेकिन उस बियाबान इलाके में तितलियां कहां से आएं? तो उन्होंने अपनी बगियां में ऐसे फूल लगाए जिनसे तितलियां प्यार करती हैं। कहते हैं तितलियों का दिमाग़ बहुत तेज़ होता है। देखने, सूंघने, स्वाद चखने व उड़ने के अलावा जगह को पहचानने की इनमें अद्भुत क्षमता होती है। दिन के समय जब यह एक फूल से दूसरे फूल पर उड़ती है और मधुपान करती है तब इसके रंग-बिरंगे पंख बाहर दिखाई पड़ते हैं। पंडितजी ठीक इसी वक्त उनकी तस्वीरें अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लेते हैं। वयस्क होने पर ये तितलियां आमतौर पर ये उस पौधे या पेड़ के तने पर वापस आती हैं, जहां इन्होंने अपना शुरूआती वक्त बिताया होता है। इसी तरह 'हनी लविंग फ्लावर' का लालच देकर वे मधु मक्खियों को अपने यहां ले आए। फूल तो लगा लिए अब इन मधु मक्खियां  रोका कैसे जाए? उन्होंने इसका भी अध्ययन किया। दरअसल मधु मक्खियां बहुत लम्बी लम्बी यात्राएं करती हैं। इससे उनके शरीर का तापमान बहुत बढ़ जाता है। इसके लिए उन्होंने फार्म हाउस में एक छोटा सा तालाब बनाया।
तालाब के ऊपर उड़ कर मधु मक्खियां पानी के वाष्प से ठंडक पाती हैं और उनका तापमान सामान्य हो जाता है। ऐसी जगह रहना कौन नहीं चाहेगा जहां उनके लिए हर सुविधा मौजूद हो। सुबह ध्यान के वक्त ये तितलियां और मधु मक्खियां उनके इर्द गिर्द होती हैं। पंडितजी कहते हैं कुछ मेरी आंतरिक प्रज्ञा और कुछ इनकी आंतरिक प्रज्ञा मिलकर हम दोनों को शहर के कोलाहल से दूर इस शांत वातावरण में एक साथ रहने पर मजबूर करती है। अब हम दोनों एक दूसरे को नहीं छोड़ सकते। और वे अपनी श्रीमतीजी की तरफ देखकर मुस्कुरा कर कहते हैं-'और इनको इलाहाबाद जाना है तो जाएं।'





प्रकृति की गोद में जिन्दगी की खोज




मेरे एक मित्र हैं Akhilesh Kumar Mishra। बेहद संवेदनशील, विद्वान और भले मानस। आध्यात्मिक किस्म के इंसान हैं। पुलिस इंटेलीजेंस में बड़े अफसर थे। इलाहाबाद के पॉश इलाके में उनका घर है। बच्चे बड़े होकर नौकरी करने चले गए। घर काटने को दौड़ता था। सो रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बनारस के पास अपने गांव में जीवन जीने का फैसला किया। उन्हें लगा प्रकृति के आंचल में ही वे ईश्वर के सबसे ज्यादा करीब रह सकते हैं। उनकी जीवन संगनी भी तकरीबन उन्हीं के मिजाज की हैं लेकिन वे थोड़ी व्यवहार कुशल भी हैं। एक लम्बा अरसा शहर में गुजारने के बाद गांव की जिन्दगी आसान नहीं थी। सो उन्होंने साफ कह दिया कि वह एक शर्त पर गांव जाएंगी कि वहां वे सारी चीजें मौजूद हों जो उनके शहर के घर पर थीं। खास तौर से किचन क्योंकि स्‍वदिष्ट और दिव्य व्यंजन बनाने की कला में उन्हें महारत हासिल है। सो पंडितजी ने अपने गांव में ही शहरी सुख सुविधाओं से लैस सादा लेकिन भव्य एक फार्म हाउस बनवा दिया। वहां एसी, टीवी, फ्रिज जनरेटर, माड्युलर किचन यानी सब कुछ। फिर शुरू हुआ उनका ग्रामीण जीवन। अब वे पिछले कई सालों से अपने खेतों में धान, गेहूं, तिलहन से लेकर तमाम तरह की शाक सब्जी सब उगाते हैं। उनके बागों में आपको आम, लीची, केले से लेकर अंगूर तक। दूध के लिए उन्होंने गाय भी पाली है। उनके खेत और बागों में रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल बिलकुल नहीं होता। यानी ये एक तरह आर्गिनिक फार्मिंग का प्रयोग है। उगते सूरज यानी ब्रह्म मर्हूत में चिड़ियों की चहचहाट के साथ पंडितजी का दिन शुरू होता है। ये उनके ध्यान का वक्त होता है। इसके बाद फूलों से भरी मेज पर नाश्ता, खेतीबाड़ी, चैनल पर दिन भर की खबरें, दोपहर के भोजन, शाम की चाय, खेतों के भ्रमण और अपने हाथों से लगाए पौधों को निहारने में सारा दिन कब और कैसे गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। रात में दूर झिंगुरों की आवाज में कब वे नींद की आगोश में चले जाते हैं वह ये आज तक खुद ही नहीं समझ पाए। इस बीच वे एक काम और करते हैं जिसका जिक्र करना मैं भूल गया। वे रोज दिन की चाय के बाद अपने खेतों में उगी ताजा सब्जियों, फलों, किसी सुबह खिले खूबसूरत फूल की तस्वीर अपने मित्रों को व्हाट़स एप पर शेयर करते हैं। मैं नहीं समझ पाया कि ऐसा वे अपने मित्रों को जलाने के लिए करते हैं या आधुनिक जीवन की खोखली जिन्दगी जी रहे हम मित्रों से अपनी खुशी बांटने के लिए। जितना मैं उन्हें जानता हूं वे शायद हमें प्रेरित करने के लिए ऐसा करते हैं..कि ये जीवन भी संभव है। जिससे हम अजनबी हैं।
जीवन जाने का ये एक विकल्प है जो 21वीं सदी के इस भाग दौड़ वाले वक्त में उन्होंने अपने लिए चुना। आप कह सकते हैं ये एक काल्पनिक जीवन है। या परियों की कोई अवास्तविक कहानी। इस दुनिया में जहां हर इंसान बैलगाड़ी की तरह अपनी बंधी बंधाई लकीर पर चल कर अपनी जिन्दगी का मकसद खोज रहा हो और उसे अचानक महसूस होता है कि ये जिन्दगी वो जिन्दगी तो नहीं जिसकी उसे तलाश थी। खासतौर से इस कोराना काल ने दुनिया के बड़े-बड़े भौतिकवादियों को जीवन के खालीपन का अहसास करा दिया। सारी सम्पन्नताओं के बावजूद जिन्दगी बिना कुछ किए इतनी शारीरिक और मानसिक थकावट भी दे सकती है इसकी कल्पना किसने की थी? इस आधुनिक सभ्यता में एक छोटी-सी महामारी की घटना ने हमें संज्ञा शून्य कर दिया। अब वक्त आ गया है कि हम इस पर गंभीरता से मंथन करें। 




Sunday, May 3, 2020

एक ठहरी सी उदास जिन्दगी

#लॉकडाउन जिन्दगी


क्वारंटाइन में मैं अकेले उदास कमरे में कैद हूं। बारहवीं मंजिल के इस तन्हा फ्लैट की बॉलकनी से सड़क की तरफ देखता हूं... खाली, वीरान, अंतहीन सड़क। जिस पर कल तक भीड़-भाड़ और आती-जाती हजारों कारों की हार्न की कर्कश आवाजें गूंजती थीं। आज अजब खामोशी है। इन लंबी, सीधी, सुनसान सड़कों के किनारे खड़े अकेले तन्हा उदास पेड़। दूर दूर तक कोई इंसान नहीं। सिर्फ कुछ आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाजें, नीरवता को भंग करती हैं। चौराहे पर पत्‍थरों के कुछ महापुरुषों की मूर्तियां हैं, जिनके चेहरों पर भी मुर्दानगी दिखती है। भरी दोपहरी में हर तरफ एक अजीब-सी डरावनी निस्तब्धता है, जो अपने चारों तरफ शोकपूर्ण माहौल तैयार कर रही है। इसे मरघट का सन्नाटा कहूं या जीवन की चिर-प्रतीक्षित शांति। हमेशा जीवन्त रहने वाला ये शहर इतना निष्प्राण मुझे कभी नहीं लगा। वक्त कैसे अनोखे ढंग से बदलता और चौंकाता है। हमें अक्सर भीड़ से भरी इस दुनिया में अकेलेपन का अहसास होता था। पर अब लॉकडाउन के इस अकेलेपन में अचानक गुम हुई उस भीड़ ने हमारी संवेदनाओं को सुन्न कर दिया है। अब चारों तरफ पसरी खामोशी और उसके दबाव ने, अकेलेपन को और गहरा कर दिया है।
कितनी अजीब अहसास है यह। जब आपके चारों तरफ दुनिया मर रही हो, सायरन बजाती सफेद रंग की सरकारी लाश गाड़ियां शवों को ढो रही हों और आप घरों में कैद जिन्दा हों। न केवल जिन्दा हों बल्कि आपको गहरी नींद भी आ रही हो। और आप सपने भी देख रहे हों। कुछ आशा से भरे और कुछ खौफनाक सपने। रातों में लॉकडाउन की कुछ तस्वीरें फिल्म के निगेटिव के टुकड़ों की तरह आंखों के लैंस के सामने से गुजरती हैं। जो दिन भर टीवी स्क्रीन पर चल रही खबरों से भटक कर आपके जेहन के किसी कोने में आकर अटक-सी गई हों। न्यूयार्क में डा. उमा मधुसूदन अपने घर के सामने हरे भरे लॉन की मखमली घास पर खड़ी हैं। और सामने सड़क पर उनके इलाज से ठीक हुए मरीज अपनी-अपनी कार से उनके घर के सामने एक कतार में गुजरते हैं। एक के बाद एक.. दर्जनों कारें। और फिर वे ठीक हुए मरीज कार की खिड़की से अपना हाथ हिला कर अपनी डाक्टर का अभिनंदन करते हैं। इस सम्मान से अभिभूत, लॉन में खड़ी डा. उमा, तेज चलती हवा से फूलों की किसी नाजुक डाली-सी झुक जाती हैं। उनकी आंखें भींगी हुई हैं और गला बेतरह रुंधा हुआ है। फिर सपने करवट बदलते हैं। एक दूसरी तस्वीर आंखों के सामने गुजरती है, हमारे अपने किसी शहर की। एक डाक्टर को भीड़ दौड़ा रही है। उनके हाथों में पत्‍थर हैं, मजबूत डंडे हैं। सफेद एप्रन में वह महिला डाक्टर लम्बी अंधेरी गलियों में बदहवास भागी जा रही है। हिंसक भीड़ उसके पीछे भागती है। उसे ठोकर लगती है। वह नीचे गिर जाती है। डरी हुई कहती है- 'प्लीज मुझे मत मारो। मैं तो आप लोगों का इलाज करने आई थी। मैं चली जाउंगी। अस्पताल में और मरीज मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। प्लीज, मुझे मत मारो' मैं डर कर उठ जाता हूं। कितना डरावना ख्वाब है ये। ये ख्वाब है या हकीकत। शायद ये कोई ख्वाब है। पर कितना भयावह है ये सपना। ईसा मसीह को सूली पर कीलों से ठोंकने के जैसा डरावना।   
अखबार सिर्फ मौत के आंकड़े छापते हैं। मृतक की कोई शिनाख्त नहीं होती। उनका कोई पता नहीं होता। उनकी कोई उम्र नहीं होती। उनकी सिर्फ संख्या होती है। मौत दबे पांव आती है। हर तीसरे दिन उसकी गिनती दोगुनी हो जाती है। अल्बेयर कामू के उपन्यास 'प्लेग' का नायक डा. रियो याद आता है। वो कहता है-"इस बार भी प्लेग से उतने ही लोग मरते और दफनाए जाते हैं जितने कि पुराने जमाने में प्लेग में दफनाए जाते थे। लेकिन अब हम मौतों के आकड़े रखते हैं। आपको मानना पड़ेगा इसी का नाम प्रगति है।" हां, तो मैं अखबारों की बात कर रहा था, जो पहले से बहुत दुबले हो गए हैं। जैसे उनकी आत्मा किसी ने निचोड़ ली हो। उनके चमकदार पन्नों पर अब बड़े-बड़े इश्तेहार नहीं छपते। पत्रकार अपने चेहरों को मास्क से छिपा कर अस्पतालों, नमाजगाहों, कब्रिस्तानों और श्मशान घाटों पर खबरें ढूंढ़ते हैं। फिर विचलित करने वाली अफवाहे और खबरें छापते हैं। वे बताते हैं कि कैसे दूर शहरों में घरों में क्वारेंटाइन बच्चे, अपनी मरती हुई मां के अंतिम दर्शन वीडियो कॉल पर कर रहे हैं। अपना सगा बेटा पिता का अंतिम संस्कार करने को राजी नहीं। इलाके का तहसीलदार एक अजनबी को मुखाग्नि दे रहा है। बेटे ने जलती हुई चिता से पूरी सामाजिक दूरी बना ली है। इंसानी रिश्ते कितने ठंडे, बेज़ान और निर्विकार हो गए हैं। और वे जो सिर पर सजने वाले मुकुट की शक्ल में 29 कांटेदार प्रोटीनों से घिरे इस नामुराद नोवल कोरोना वायरस से ठीक हो गए, उनके लिए मेडिकल स्टॉफ तालियां बजा रहा है। अस्पताल के कोरीडोर में नर्सें उन्हें विदाई दे रही हैं। मरते हुए आदमी को अचानक लगता है कि वह जिन्दा बच गया। वह तय करता है कि अब वह अपनी जिन्दगी को पूरी शिद्त से जीएगा। वह आत्मा की उन सारी ऊंचाइयों को छुएगा जो उसकी पहुंच से अब तक बहुत दूर थीं। लेकिन वह फिर अपनी उसी पुरानी दुनिया में लौट आता है जो अब उसके लिए पूरी तरह बदल चुकी है। जहां अदृश्य अनोखा रहस्यम वायरस अब भी जिन्दा है और सबको डरा रहा है।   
ये कैसा वक्त हैं। ये कैसा दौर है। पूरी दुनिया बेतरह डरी हुई है। मैं भी डरा हुआ हूं। हर चीज से डरता हूं। चेहरे पर हर वक्त चिपके रहने वाले अपने ही मास्क से। घर में आई हरी सब्जियों से, दूध के पैकटों से। बार-बार हाथ धोने वाले साबुन से या सामने टंगे आइने से । मुझे अर्जेंटीना का कवि होर्खे लुई बोर्खेज याद आता है। जो आइनों से डरता है। आइना देखकर उसे एक भयानक अनुभव होता है, जैसे वह कहीं फंस गया है और आइने के उस फ्रेम से कहीं बाहर नहीं निकल सकता। आइना देखकर उसे एक मायावी भ्रम होता है कि जैसे कहीं उसके प्रतिरूप का अस्तित्व है। जैसे हर इंसान का एक अपना अक्स है, जिसकी वजह से हर चीज संदिग्‍ध, अवास्तविक और सवालिया बन जाती है।
दरअसल कामू की किताब 'प्लेग' में प्लेग की महामारी नाजियों का प्रतीक है। उसके क्वारेंटाइन कैम्प, नाजियों के कंस्ट्रेशन कैम्प हैं। उसके डॉक्टर नाजियों के खिलाफ लड़ते सेनानी हैं। तो क्या ये कोरोना महामारी पूंजीवादी वर्चस्व का प्रतीक है। जहां दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बनने के लिए किसी गुप्त प्रयोगशाला में कृत्रिम वायरस बनाया जाता है और उसे इंसानों के बीच छोड़ दिया जाता है। इस बीमारी का राज छुपाने के लिए डाक्टर को वायरस का इजेंक्‍शन देकर मार दिया जाता है। वुहान का सच अपनी डायरी में दर्ज करने वाली लेखिका को धमकाया जाता है। हम सबको मौत का डर दिखा कर क्वारेंटाइन कैम्पों का कैदी बना लिया जाता है। अगर नहीं, तो हर तरफ ये दैहिक थकान, मानसिक उदासी, हताशा और नैराश्य क्यों? क्या हमारी खूबसूरत दुनिया का अंत इसी तरह होना है। क्या हम विनाश की तरफ बढ़ रहे हैं।  जिसकी चेतावनी ये प्रकृति और शून्यवादी देते रहते हैं। मुझे फिर कामू याद आता है और हमें यकीन दिलाता है कि - हम शून्यवादियों की बातें न सुने जो कहते हैं दुनिया विनाश की ओर बढ़ रही है और एक दिन सब कुछ खत्म हो जाएगा। इस बात पर यकीन न कर बैठें। सभ्यताएं इतनी जल्दी नहीं मरा करतीं और अगर दुनिया खत्म होगी तो भी यह इस अनंत ब्रह्मांड की पहली घटना नहीं होगी। सभ्यताएं बनती और मिटती रही हैं। हम एक बड़े त्रासद दौर से गुजर रहे हैं। त्रासदी और नैराश्य में अंतर है। त्रासदी का सुखद पक्ष यह है कि वह हमें झकझोर कर अपने हालात से उबरने की प्रेरणा देती है जबकि आदमी की निराशा उसे ले डूबती है।

Sunday, December 8, 2019

घर लौटते फिल्मी परिंदे


 मकाऊ डायरी 4


और अब घर वापसी का वक्त आ गया है। किसी को दिल्ली  की फ्लाइट पकड़नी है तो किसी को मुंबई की। लेकिन इसके लिए पानी के छोटे समुद्री जहाज फैरी से हांगकांग एयरपोर्ट तक जाना होगा। सब फैरी पकड़ने की हड़बड़ी में हैं। इन सब में वह सैलानी नहीं हैं जो आईफा के बहाने मकाऊ  घूमने  आए थे। इसमें केवल वे हैं जो सिर्फ आइफा अवार्ड के लिए यहां आए थे। सब यानी एक टूटा हाथ लिए  शाहरुख  खान नई फिल्म 'गुलाबी गैंग' के साथ फिल्मों में  वापस आ रही माधुरी दीक्षित, पूरे अवार्ड फंक्शन में शाहरुख के साथ चिपकी रही अनुष्का शर्मा, बिना ऐश्वर्या के अभिषेक बच्चन, कामयाबी की आधी अधूरी खुशी लिए शुक्राणुओं के नए दानवीर विक्की डोनर उर्फ आयुष्मान खुरान, अपने स्‍मार्ट शौहर सिद्धार्थ की बांहें थामे विद्या बालन, खूबसूरत दिया मिर्जा, हारे हुए खिलाड़ी शाहिद कपूर, फिल्मों के बोझा की गठरी से दबे अनुपम खेर, शबाना को मिस करते जावेद अख्तर, दक्षिण भारतीय डांसर प्रभुदेवा, प्रियंका की चंचल बहन परिणीति  चोपड़ा  आइफा के 14 अवार्ड का दांव जीते बर्फी के निर्देशक अनुराग बसु और मैं।
इत्तेफाक से हम सबकी टिकटें फैरी के स्पेशल क्लास में उपर के डैक पर थी। मै समझ गया कि अब मजा आने वाला है। अब जो होगा उसकी स्क्रिप्ट जावेद अखतर नहीं, मैं लिखूंगा और ये फिल्मी कहानी नहीं बल्कि एक रिएलिटी शो होगा। और बिलकुल यहीं हुआ। शाहरुख, अनुष्का और माधुरी के साथ वीआईपी केबिन में बंद हो गए। ये सब खुद को सुपर स्टार की श्रेणी में रखना ज्यादा पसंद करते हैं। आईफा अवार्ड में यह लोग अलग-अलग रहे। इन लोगों ने अपने साथ बाडीगार्ड रख छोड़े थे। इनके बाडीगार्ड सलमान खान की तरह शालीन नहीं थे। वह फैन्स को इनके पास फटकने तक नहीं दे रहे थे। जाहिर है, उनकी गलती नहीं क्योंकि वे अपनी ड्यूटी पूरी कर रहे थे।
लेकिन बाकी सब डैक पर पहुंचते ही मस्ती के मूड में आ गए। यह तय हुआ कि अब डम्ब शॅराड्स खेला जाएगा। दो टीमें बनेंगी। एक टीम का कोई सदस्य एक्टिंग कर इशारों से किसी फिल्म का टाइटल बताएगा। दूसरी टीम  को उस फिल्म का सही नाम बताना होगा। पर किस टीम में कौन होगा। अनुपन ने कहा ब्वायज वर्सेज गर्ल्स की टीम बन जाए। दीया ने कहा नहीं प्लीज वी आर नॉट  स्कूल गोइंड किड्स। यानी हम स्कूल जाते बच्चे नहीं हैं। जावेद ने कहा ठीक है मैं गर्ल्स  की टीम में हो जाता हूं। खेर ने कहा हां आप उसी साइड के हैं। सब हंसने लगते हैं। और खेल शुरू हो गया और साथ में शोर भी। जैसे सकूली बच्चे खेल रहें हों। हंसी-मजाक, किस्से कहानियां सब साथ-साथ चल रहे थे। खेर किसी के बारे में बता रहे थे। ओके विक्की डोनर हो गया अब वार्सिलोना। उसने कहा क्या बाहर से लो ना। मैनो कहा नहीं वार्सिलोना। सब हंसने लगे।
खेर और सिद्धार्थ आयुष्मान खुराना को लेकर डैक के कोने में चले जाते हैं। वहां एक फिल्म का नाम तय होता है। फिल्म का नाम बंदिनी है। खुराना डिब्बा बंद करने का इशारा करते हैं। लड़कियां बंद तक पहुंच जाती हैं। खुराना कहते हैं इसके आगे छोटा सा वर्ड है। दीया कहती हैं बंदना। पर ये कोई फिल्म नहीं। लेकिन बंद से बंदिनी समझाना उन्हें मुश्किल पड़ता है। अंत में झल्लाकर उनके मुंह बंदिनी निकल जाता हैं। लड़कियां चिल्लाती हैं बंदिनी बंदिनी। खेर कहते हैं, चिटिंग चिटिंग। इसने बता दिया था। परिणीति कहती है नहीं बताया था। लड़कियां कहती हैं  हे हे हे हम जीत गए। खेर कहते हैं मैंने पहली बार किसी हारी हुई टीम को इतना खुश देखा है। सब हंसने लगते हैं। शहिद कहते हैं अब मैं जा रहा हूं। और वहा दूसरी ओर खड़े हो जाते हैं। अब जावेद साहब 'पार' फिल्म का  समझाने की कोशिश करते हैं। लड़कियां नहीं समझा पा रहीं। काफी देर हो गई खेर कहते हैं, भई मैं तो अब सोने जा रहा हूं।
खेल काफी देर तक चलता रहा। बीच-बीच में राजनीति भी चल रहीं हैं। चीन में बर्फी को आईफा के चैदह अवार्ड लड्डू मिले। शुगर ज्यादा हो गई। जावेद मेरे बगल में खड़े अनुपम खेर के कान में  कुछ फुसफुसाते हैं- 'डोंट टेल मी यार कि अनुराग बसु को अंग्रेजी  नहीं आती। अगर नहीं आती तो वह हालीवुड की फिल्में कैसे देखता।' फिर दोनों को जोर से हंसने लगते हैं। बताते चलें कि बालीवुड में चर्चा हैं कि अनुराग की फिल्म बर्फी के कुछ सीन हालीवुड की फिल्म 'द नोटबुक' से उड़ाए गए हैं। बहरहाल जो भी इतना तो समझ में आ गया कि  आईपीएल के मैचों की तरह फिल्‍मों के सारे अवार्ड फिक्‍स होते हैं। बर्फी में शानदार अदाकारी के बावजूद प्रियंका चोपडा को बेस्‍ट हीरोइन का अवार्ड नहीं मिलना था सो वह नहीं आईं। उनकी बहन परिणित चोपडा आईं उन्‍हें परफार्म करना था। विद़या बालन आईं क्‍योंकि उन्‍हें बेस्‍ट एक्‍टेस का अवार्ड लेना था। जिन्‍हें पता था कि उन्‍हें अवार्ड मिलना है वो आते हैं। या फिर वे आते हैं जिन्‍हें अवार्ड फंकशन में पैसे लेकर नाचना गाना है।
  किनारा आ गया। और सफर खत्म हुआ। अब हम सबको अपने-अपने जहाज पकड़ने हैं। फिल्म वालों को पहली बार इतने करीब देखा है। मुझे न जाने क्यों लगा ये बेचारे दोहरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं।
सार्वजनिक जीवन में ये चमकते सितारे हैं। पर इनकी प्राइवेट लाइफ हमारी आप की तरह है। कभी खुशी कभी गम, कभी हंसी मजाक तो कभी जलन और ईर्ष्या। उस दिन ग्रीन कारपेट पर चलते वक्त अनुपप खेर को देखकर भीड़ खुशी के मारे चीखी थी। खेर ने अपने सभी फैन्स से हाथ जरूर मिलाया लेकिन उनका चेहरा भाव शून्य था। वह  थोड़ा  आगे बढ़े तो मैंने उनसे अकेले में पूछा था- उनसे हाथ मिलाते वक्त कम से कम एक मुस्कुराहत तो आप के चेहरे पर ला सकते थे। मेरे सवाल पर खेर नाराज हो गए थे शायद। कहने लगे खुशी अंदर होती है, जरूरी नहीं कि वह दिखई जाए। मैंने कहा रहने दीजिए, ये कहने की बातें हैं। खेर ने चिढ़ कहा आप कुछ भी सोचिए। और वह आगे बढ़ गए।
सच पूछिए तो तब मुझे बुरा नहीं लगा  था। खेर के अभिनय का मैं कायल हूं। खेर ही नहीं हर सफल कलाकार के अंदर कुछ ऐसा होता है जो उसे असाधारण बनाता है। और एक पूरी टीम होती है जो सुपर मैन या सुपर वुमन बना देती है। वर्ना बिना मेकअप के रूप रंग से ये सारे कलाकार उतने ही साधारण हैं जितने कि हम और आप। यह रहस्य न खुल जाए इसलिए वे हमसे दूरी बनाकर रहते हैं। खैर शाम ढल गई है। परिंदे घर लौट रहे हैं। मेरा भी मन भर गया। अब घर लौटने का वक्‍त आ गया है। अलविदा मकाउ।

अतृप्त सपनों के शहर में


 मकाऊ डायरी 1


नई दिल्ली से हांगकांग एयरपोर्ट तक आने में केवल पांच घंटे लगे। अंतर्राष्ट्रीय विमान आमतौर पर 750 और 950 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ़्तार का चलते हैं। एक लम्बी झपकी लेने के बाद पता ही नहीं चलता कि कब तकरीबन पूरा चीन पार करके आप उसकी अंतिम सीमा तक आ गए। और मजा देखिए आप प्लेन में रात एक बजे सोते हैं और पांच घंटे के सफ़र के बाद आँख खुलने पर पता चलता है कि हांगकांग में सूरज को निकले चार घंटे बीत चुके हैं। लेकिन हर तरफ से पहाडियों से घिरा और चकाचौंध से भरा हांगकांग उस वक्त आकर्षित नहीं करता जब आपको सपनों का कोई और दूसरा शहर बुला रहा हो।

दफ़तर की तरफ से  मकाऊ जाने का जब न्‍यौता मिला तो सच जानिए इस शहर के बारे में कुछ जानकारी नहीं थी सिवाए इसके कि वहां जबरदस्‍त तरीके से जुआ खेला जाता है। लेकिन जुए में मेरी कोई दिलचस्‍पी नहीं थी क्‍योंकि फ़लश के सिवा मुझे जुए का कोई खेल नहीं आता। ये जुआ भी मैं सिर्फ दीपावली की रातों में खेलता हूं वह भी ज्‍यादातर अपने भाई और बहनोई के साथ जिन्‍हें लूटने और जिनसे लुटने में खूब मजा आता है। हारे तो गम नहीं और जीते तो मजा ही मजा। खैर मकाऊ में बालीवुड के फिल्‍मी सितारों का मेला जुटने वाला था और मुझे आईफा अवार्ड का आंखों देखा हाल लिखना था। मैं जानता था इस काम में मजा आने वाला है। पर मन में थोडी घबराहट थी कि मेरे पास  मकाऊ का वीजा नहीं है।     
हालांकि मुझे बार बार बताया गया कि चिन्‍ता की कोई जरूरत नहीं क्‍योंकि मकाऊ घूमने के लिए बीजा की आवश्‍यक नहीं। लेकिन बिना वीजा के देश की सीमा लांघना डरावना जोखिम है। पर जोखिम उठाने का भी तो अपना मजा है। बताया गया था कि हांगकांग एयरपोर्ट तक हवाई जहाज से जाना है। इसके आगे का सफ़र आपको छोटी-सी फैरी पूरा कराएगी। फैरी यानी समंदर में चलने वाला एक छोटा जहाज। इस जहाज का बंदरगाह ठीक हांगकांग का एयरपोर्ट से जुडा है। हांगकांग का इमिग्रशन बिना पार किये आप एक भूमिगत शटल से ठीक फैरी के अन्दर तक पहुँच जायंगे। पर शर्त यह है की आपको फैरी का टिकट भारत में ही नेट के जरिये ख़रीदना होगा। ये टिकट ही वीजा का काम करता है। एअरपोर्ट से मकाऊ का रास्ता  एक घंटे का है। मकाऊ एक प्रायदीप है। पहाडियों से घिरी खाड़ी के नीले पानी पर फैरी फिसलती हुई चलती है। इस पानी से धोड़ा ही ऊपर उड़ान भरते या एअरपोर्ट पर हवाई जहाज गजब का कौतुक पैदा करता है।



सपनों का शहर यानी मकाऊ दक्षिणी चीन सागर के किनारे बसे सारे देश मकाऊ को 'सिटी ऑफ़ ड्रीम्स' के नाम से ही जानते हैं। मकाऊ और हांगकांग अलग देश नहीं है। ये दोनों चीनी जनवादी गणराज्य का हिस्सा है। इन्हें सन 2000 शुरू होने से थोडा ही पहले  चीन ने विशेष प्रसाशनिक क्षेत्र का दर्जा दिया। एक ज़माने में मकाऊ पुर्तगाल का उपनिवेश हुआ करता था। जैसे कभी हमारा गोवा था। 16 वी सदी के शुरू में ही पुर्तगालियो ने गोवा और मकाऊ जैसे समंदर के किनारे बसे इलाको को व्यापारिक ठिकाना बनाया और धीरे से इन इलाको की हूकुमत अपने कब्जे में ले ली। गोवा को तो पुर्तगालियो ने सीधे फतह किया था लेकिन मकाऊ पर कब्ज़ा बड़ी चालाकी से किया। 1513 में जार्ज एलबर्स पहला पुर्तगाली था जिसने चीन की धरती पर कदम रखा। फिर पुर्तगाली व्यापारियों ने मकाऊ के समुद्री किनारे को एक बंदरगाह के रूप में विकसित किया। उन्होंने 20 किलोग्राम सालाना चांदी के बदले मकाऊ बंदरगाह को किराये पर ले लिया। 1863 तक ये सिलसिला जरी रहा। तब तक कई पुर्तगाली यहाँ के वाशिंदे बन चुके थे। वह सत्ता में प्रशासनिक दखल चाहने लगे। 1883 में पुर्तगाली तानाशाहों का दौर ख़त्म हुआ। ये सीनेट सिर्फ सामाजिक और आर्थिक मामले देखने के लिए बनी थी वह भी एक चीनी प्राधिकारी की निगरानी में। लेकिन एक शुरुआत तो हो गई। अफीम युद्ध के बाद मकाऊ अधिकारिक रूप से पुर्तगाल के कब्जे वाला इलाका हो गया। 70 के दशक में पुर्तगाली तानाशाह का दौर ख़त्म हुआ। और 1974 में नई पुर्तगाली सरकार या अपने उपनिवेशों को मुक्त करने का फैसला लिया। पुर्तगाल ने पहली बार मकाऊ को चीन का एक हिस्सा माना। और उसे चीनी जनवादी गणराज्य का एक विशेष प्रशासनिक क्षेत्र माना। चीन-पुर्तगाल के संयुक्त समझौते के तहत मकाऊ 1999 में अगले 50 साल के लिए चीनी गणराज्य का हिस्सा हो गया। लेकिन यहाँ एक देश और दो प्रणाली के सिद्धान्त की शुरुआत हुई। यानि विदेश मामले और रक्षा को छोड़ हांगकांग और मकाऊ पर चीन का कई दखल नहीं है। दोनों की अपनी अलग करेंसी है अलग पुलिस और अलग इमिग्रेशन व्यवस्था है। उनकी अर्थव्यवस्था स्वतंत्र है और जीवन शैली पूरी तरह का आजाद। यहाँ की 90 प्रतिशत आबादी चीनी है लेकिन चीन के लड़ाका अंदाज़ का अलग एक अनोखे तरह की संप्रभुता का मजा ले रही है। सरकार के मुखिया के नाम पर यहाँ एक चीफ है जिसकी कैबिनेट में पाँच नीति सचिव हैं। ये सचिव एक 11 सदस्यों की कमेटी की सलाह पर कम करते हैं। यहां के  स्थानीय निवासियों ने अपनी पूरी राजनीतिक सम्पभुता न कभी पुर्तगालियो को दी न दबंग चीन को। और समंदर के किनारे एक खुबसूरत सा देश बसा लिया जहां सपनो के इन्द्रधनुष में रंग भरे जाते हैं। 


जारी


Tuesday, July 16, 2019

ये मोह मोह के धागे

ये मोह के धागे वाकई अनूठे रिश्तों में जाकर उलझ गए। दूध के रिश्ते के आगे खून के रिश्ते फीके पड़ गए। जिसे नौ महीने अपने गर्भ में पाला। जो उन्हीं के खून का अंश है। उसके लिए एक भी आंसू नहीं। उसे देखने की कोई तड़प नहीं। उससे मिलने की कोई बेताबी नहीं। मातम है तो उससे बिछड़ने का, जिसे पांच महीने सीने से लगा कर रखा। आप इन अभिभावकों के चेहरे देखिए। पोर पोर में बसी हुई इस अबूझ पीड़ा को कोई भला क्या नाम दे सकता है। शायद ईश्वर ने इंसान को ऐसा ही बनाया है।
उस दिन कोर्ट में दोनों मांएं बिलख रही थीं। बेटी की मां अंजना ने कोर्ट में एक बार कहने की कोशिश भी की कि मुझे अब तक विश्वास नहीं हो रहा कि डीएनए रिपोर्ट सही है। इस पर कोर्ट को बताना पड़ा कि डीएनए की एक नहीं तीन-तीन रिपोर्ट सामने हैं। सब एक ही बात कह रही हैं। इस मामले को आप लोग खुद निपटा लें तो बेहतर है। हम कोई आदेश जारी नहीं करना चाहते। मामले के निपटारे के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। बेटे के माता-पिता चाहते थे कि उनका बेटा उन्हें तुरंत मिल जाए। ये पांच महीने उनके लिए पांच जनम की तरह लग रहे हैं। लेकिन बिटिया के मां बाप बेटे को अपने पास कुछ दिन और रखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अन्नप्राशन के धार्मिक अनुष्ठान तक रुक जाने का आग्रह किया। बेटे की मां शीतल और पिता अनिल को लगा, जब पांच महीने इंतजार कर लिया तो पांच दिन और सही। वे इस परिवार से संबंध बिगाड़ना नहीं चाहते थे। क्योंकि उस मुंहबोली बेटी अमानत से उन्हें दोबारा भी मिलना था। इसलिए मान गए। अब सब कुछ ठीक रहा तो 26 अक्तूबर को दोनों बच्चों की अदला बदली हो जाएगी।
यह सब एक फिल्मी पटकथा की तरह है। एक बुरे दु:स्वप्न की तरह। दोनों दंपति कमला नेहरू अस्पताल की लापरवाही का शिकार हुए। अंजना का एक प्यारा सा बेटा पहले से है। इसलिए इस दंपति पर शक नहीं किया जा सकता कि इस पूरे प्रकरण में इनकी कोई गलती हो सकती है। जैसा कि अंजना और उनके पति ने कहा कि उन्होंने अस्पताल वालों की बात पर यकीन किया। जो उन्होंने कहा, वह मान लिया। अब कोई अपना बच्चा कैसे किसी को दे दे। दूसरी तरफ शीतल और अनिल का दर्द भी जायज था। उनकी साढे़ तीन साल की एक प्यारी बेटी अराध्या पहले से है। उन्हें पहले बताया - बेटा हुआ है, फिर गोद में बेटी थमा दी। पहली डीएनए रिपोर्ट में ही साफ हो गया था कि वह बेटी उनकी नहीं। हर डीएनए रिपोर्ट उनके पक्ष में थी। तो अपना बेटा पाने के लिए उनकी लड़ाई जायज थी।
लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं है। मानव स्वभाव अजीब है। वह हर क्षण सुख में जीना चाहता है। वही ठहर जाना चाहता है। वह दुख को भी सुख में बदलना चाहता है। चाहे सच उसके विपरीत हो। मासूम और प्यारी अमानत जैसी बेटी पाकर कौन उसके मोह में न पड़ जाए। अनिल बताते हैं, उसे घर में सब काकू कहते हैं। वह सबको पहचानने लगी है। उसे बोलो- हैलो काकू तो वह पलट कर देखती है और हंसने लगती है। कहीं बाहर रहता हूं तो फोन पर मेरी आवाज सुनना चाहती है। साढ़े तीन साल की छोटी अराध्या को भी उससे प्यार हो गया है। कहती है - मुझे अराध्या मत कहो। काकू की दीदी कहो। वह अपने पिता से कहती है - पापा यार, मत दो इसे। न्यू काकू को भी ले आओ। बेटे की मां ने अदालत से दरख्वास्त की कि उसे पांच दिन की छुट्टी दी जाए ताकि वह ज्यादा से ज्यादा वक्त अपनी अमानत के साथ बिता सके।
उधर, जितेंद्र-अंजना का हाल इससे भी ज्यादा बुरा है। पूरा परिवार एक अजीब तरह के मातम में डूबा है। सारे रिश्तेदार घर पर जमा हैं। अंजना का रो-रो कर बुरा हाल है। वह चौबीस घंटे दूसरे के बेटे को सीने से चिपटाए रखती है। उसे एक पल के लिए भी अलग नहीं होने देती। सारी रात जगकर बेटे को निहारती रहती है। जितेंद्र को घर जाने से डर लगता है। वह दिन भर खलीनी के जंगल में अपने दोस्तों के साथ बैठा रोता रहता है। जितेंद्र कहते हैं - किसी के साथ इससे ज्यादा बुरा कुछ नहीं हो सकता। हमें बेटे की ऐसी कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन अब इसके साथ मन जुड़ गया है सबका। इसे अपने से दूर करने की हम कल्पना करके ही सिहर जाते हैं।
तो आप देखिए ये माया मोह के धागे कितने मजबूत होते हैं। कई बार खून के रिश्ते भी इसके आगे बेमानी हो जाते हैं। सब गहरी पीड़ा और सदमे में हैं। जिंदगी भी कभी-कभी कैसे मजाक करती है।
लेकिन यहां डरावना सवाल बेटे बेटी के बीच फर्क का है। अनिल-शीतल का परिवार क्या तब भी ऐसी ही लड़ाई लड़ता अगर उनकी बेटी बदली होती? जितेंद्र-अंजना का परिवार क्या तब भी इतना बिलखता अगर एक बेटी उनसे जुदा हो रही होती। बेशक इसका जवाब हां या ना दोनों में हो सकता है। मानवीय स्वभाव और प्रवृत्तियों के बारे में कुछ भी यकीन से कह पाना लगभग असंभव है।
सबसे अच्छी बात यह कि हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सौहार्दपूर्ण माहौल में मामला निपट गया। दोनों परिवार पूरे हो गए। एक बेटा और एक बेटी। एक हादसे ने अपर और लोअर हिमाचल के दो परिवारों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया, जिसका कोई नाम नहीं।
लेकिन अनिल-शीतल की इस लड़ाई का एक बड़ा फायदा यह हुआ कि केएनएच और इसी तरह के अन्य जच्चा बच्चा अस्पतालों के होश ठिकाने आ गए। केएनएच में अब बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसके फुटप्रिंट लिए जाने लगे। अब अस्पताल वाले बच्चे के जन्म के वक्त उनके अटेंडेंट को लेबर रूम में बुला लेते हैं और बच्चे को दिखाकर नाल काटते हैं। लेकिन इसकी अलग दिक्कतें हैं जो बाद में सामने आएंगी। यह घटना सारे अस्पतालों के लिए एक सबक है।       
                                              

सोचा न था विश्वकप पर मर्सिया लिखना पड़ेगा



क्रिकेट मे मेरी ‌दिलचस्पी वर्ल्डकप तक है। क्योंकि वर्ल्डकप चार साल में एक बार आता है। मैं भी उन लोगों में से हूं जो एक जमाने से मानते हैं कि क्रिकेट वक्त को बर्बाद करने वाला खेल है। टेस्ट मैच में तो ये बात सौ फीसदी सही थी। लेकिन वन डे और फिर 20-20 ने खेल को थोड़ा दिलचस्प बना दिया। इसीलिए विश्वकप-19 के भारत के तकरीबन सारे मैच देख डाले। टीम इंडिया सर्वाधिक सात मैच जीत कर टैली के टॉप पर पहुंच गई थी। ये वाकई सम्मानजनक स्थिति थी। पूरे देश में उत्साह की लहर थी। सबको उम्मीद थी कि इस बार टीम संतुलित है। हम लगातार मैच जीत रहे हैं। इसलिए अंत में विश्व कप हमारा है। लेकिन सेमीफाइनल का तकरीबन जीता हुआ मैच हम जिस तरह हारे उससे सवाल उठा कि क्या वाकई विराट टीम विश्वकप की ट्राफी को जीतने के लिए तैयार थी? क्या हमारा खेल वाकई चैम्पियन वाला था? आप भावुक होकर नहीं बल्कि बिलकुल तथ्यों और तर्कों के आधार पर नतीजा निकालिए।
केएल राहुल, रोहित शर्मा और कोहली के अलावा तीसरा कौन-सा बल्लेबाज था जिस पर हम हमेशा यकीन कर सकते थे? इसी तरह बुमराह के अलावा और कौन-सा गेंदबाज था ‌जिसे बल्लेबाज के ठीक कदमों पर गेंद फेंकने का जादू आता हो। आप कह सकते हैं कि हर गेंदबाज बुमराह नहीं हो सकता जैसे हर बल्लेबाज सचिन नहीं हो सकता। बेशक भुवनेश्वर कुमार, चहल, या बाद में आए शमी या जड़ेजा की गेंदबाजी बुमराह के साए तले आत्मविश्वास से लबरेज रही। इसलिए इस श्रृंखला में गेंदबाजों से किसी को कोई शिकायत नहीं हो सकती। ये अच्छे संकेत हैं क्योंकि इस विश्वकप में भारत के पास पहली बार अच्छे गेंदबाजों की एक फौज तैयार थी। वर्ना हमेशा भारतीय टीम अपने बल्लेबाजों के दम पर ही मैदान में उतरती थी। बुमराह के रूप में हमें गेंदबाजी का बादशाह मिल गया है।
लेकिन हमारी बल्लेबाजी और उसका क्रम जरूर सोचने जैसा है। शिखर धवन के जाने के बाद आखिरी मैच तक हमें चार नम्बर का खिलाड़ी नहीं मिला। हर दूसरे मैच में प्रयोग हुए। मैं अंत तक नहीं समझ पाया कि घोनी यें वर्ल्डकप क्यों खेल रहे हैं? सिर्फ रिटायरमेंट से पहले विश्वकप खेलने की अपनी अंतिम हसरत पूरी करने के लिए। ये वही धोनी थे जिनने कप्तान रहते टीम इंडिया के शानदार खिलाड़ियों को सिर्फ इसलिए चलता कर दिया था कि वे उम्रदराज हो गए हैं और वे अब फुर्तीले नहीं रहे। इस ‌विश्वकप में धोनी टेस्ट मैच की तरह मैच खेल रहे थे। वह चाह कर भी लम्बी शॉट नहीं खेल पा रहे थे क्योंकि बढ़ती उम्र के कारण उनका रिफलेक्स एक्‍‍शन कमजोर हो चुका है। गेंद की गति मैदान में उनके दिमाग के सोचने समझने की गति से कहीं तेज थी। और ऐसा भी नहीं कि हमें एक योग्य विकट कीपर की सख्त जरूरत थी। एक जमाना था जब हम वीकट के पीछे दस्ताने पहने खड़े एक योग्य कीपर के लिए तरसते थे। लेकिन सेमीफाइनल में हम तीन-तीन विकेटकीपरों के साथ खेल रहे थे। श्रृषभ पंत और दिनेश कार्तिक ये दोनों कीपर- बैड्समैन हैं जिन्हें हमने बतौर बल्लेबाज ये मैच खिलाया। क्या हम इन दोनों में किसी एक को कीपर बना कर धोनी की जगह एक अच्छा बल्लेबाज नहीं खिला सकते थे?
हमारा मध्यक्रम अपाहिज था। टीम के पास कोई फिनीशर नहीं था। धोनी के अंध भक्तों का एक समूह था जिसने उन्हें मोदी मान पर नारा गढ़ दिया-माही है तो मुमकिन है। जबकि सब जानते हैं कि ये सच नहीं है। लता दीदी को भी धोनी के लिए बहुत भावुक होने की जरूरत नहीं। उम्र के साथ भटके हुए सुर से निराश होकर हम रेडियो बंद कर सकते हैं लेकिन एक उम्रदराज खिलाड़ी का खराब खेल करोडों लोगों के दिल तोड़ जाता है।
हमने इस पर अंत तक ध्यान इसलिए नहीं दिया क्योंकि राहुल ,रोहित और कोहली की तिकड़ी ही इतने ज्यादा रन बना रही थी कि बाद के खिलाड़ियों पर किसी का ध्यान नहीं गया। रोहित ने 7 मैच में 5 शतक जड़े। एक शतक राहुल का भी था। कोहली के पास तो खैर हाफ संचुरी की श्रृंखला रही। किसी ने नहीं सोचा कि शुरू के ये तीनों बल्लेबाज शुरू के तीन ओवर में ही निपट गए तो क्‍या होगा? और वही हुआ। क्रिकेट तकनीक से ज्यादा दिमाग का खेल है। ये खेल आप दबाव में सहज रूप से नहीं खेल सकते। अंतिम तक जीत के लिए एक जुझारूपन और एक जिद बहुत जरूरी है। ये जुझारूपन हमारी क्रिकेट में न पहले कभी था न अब है। खैर हम टूर्नामेंट से बाहर हो गए। क्या फर्क पड़ता है। गालिब के शेर को थोड़ा बदल के कहूं तो क्रिकेट-ए-खस्ता के बगैर कौन से काम बंद हैं रोइए जार जार क्या,