दयाशंकर शुक्ल सागर

Friday, May 13, 2022

8वीं सदी का इश्क


 "मेरे प्यारे चच, तुम्हारी पलकों के बाणों ने मेरे दिल को निशाना बना कर उसे घायल कर दिया है. तुम से अलग होने का डर जंजीर की तरह मेरी गर्दन पर बंधा रहता है. इसलिए तुम्हारे राज्य में कोई ऐसा दवाखाना है जो मेरे रोग का इलाज कर सके? क्या तुम्हारे समाज के हाथ से मेरी गर्दन से लटकी नैतिकता की जंजीर हटा सकते हैं? मेरी गर्दन को अपने प्यार के हार और मेरे कानों को अपने स्नेह की बाली से सजाओ. अगर तुमने ये नहीं किया तो मैं जी के क्या करूंगी और खुद को खत्म कर लूंगी. मेरे प्रिय मेरे दिल को खुश कर दो और इसे अपने अलगाव के दर्द से आजाद कर दो. हे प्रिये, अगर तुमने मुझसे मुंह फेर लिया, तो मैं तुम पर  इल्जाम दूंगी, कि तुम मेरे साथ अन्याय कर रहे हो."  

क्या आप यकीन करेंगे ये खत 8वीं सदी में सिंध के राजा की पत्नी रानी सोहनन देवी ने अपने युवा वजीर चच को लिखा था. 8वीं सदी में लिखा गया- 'फतह-ए-नामा सिन्ध' उर्फ चचनामा दुनिया की अकेली ऐसी प्रमाणिक ऐतिहासिक किताब है जो हमें भारत में मुसलमानों के पहले हमले का आंखों देखा हाल बताती है. इस किताब का लेखक गुमनाम है. 13वीं में पहली बार इस मूल अरबी किताब का फारसी अनुवाद इल्तुतमिश के दरबारी अली कुफी ने किया. फिर 1900 में पहली बार इस फारसी किताब का अनुवाद सिंध के मशहूर साहित्यकार मिर्ज़ा कालिचबेग फ्रिडुनबेग ने अंग्रेजी में किया. 120 साल पुरानी ये दुलर्भ अंग्रेजी किताब अभी हाल में मेरे हाथ लगी. किताब का एक अंश मैंने हिन्दी में अनुवाद करके आपके सामने रखा है. युवा चच एक विद्वान ब्राह्मण था जिसके पिता मंदिर के पुजारी हुआ करते थे. चच सिंध के राजा राय सहिरस के दरबार में काम मांगने आया था. और उसकी विद्वता से प्रभावित होकर राजा के वजीर ने उसे अपने साथ रख लिया. "चचनामा" बताता है कि लंबे कद का ब्राह्मण चच सुंदर चेहरे और गोरे रंग का युवक था. रानी सोहनन देवी उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई. चच की कद-काठी पर रानी मोहित और मुग्ध थी, और उसे चच से पहली नजर में प्रेम हो गया. हालांकि उनकी उम्र में बड़ा फासला था. वह चोरी छुपे चच को प्रेम पत्र लिखने लगी. लेकिन चच बुद्धिमान ब्राह्मण था. चच ने रानी सोहनन को जवाब लिखा-"मैं राजा के प्रति वफादारी से बंधा हूं. राजाओं के हरम की ओर देखना जिन्दगी से हाथ थोने जैसा है. ये इस दुनिया में बदनामी और दूसरी अज्ञात दुनिया में पाप का सबब है. जब राजाओं का प्रकोप अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच जाता है तो उसे रोकने का कोई उपाय नहीं, कोई दवा नहीं. इसके अलावा, मैं ब्राह्मण हैं और मेरे पिता और भाई तपस्वी हैं, और वे अभी भी अपने प्रार्थना स्‍थल पर बैठे हैं. अंत में हमें सब कुछ भगवान को ही सौंपना है. मुझे ऐसी बेवफाई मंजूर नहीं है. मैं राजा की सेवा में हूं. और मुझे हमेशा इसी उम्मीद और डर बीच रहना होगा. ये ऐसी बात है  जिसे कोई बुद्धिमान पुरुष स्वीकार नहीं कर सकता. चार चीजों में विश्वास नहीं रखना चाहिए- एक संप्रभु, अग्नि, वायु, और पानी. मैं अपने सिर ये तोहमत नहीं मढ़ सकता. तुम मुझसे यह चीज कभी नहीं पा सकती." 

विद्वान चच ने इस अधेड़ उम्र की रानी के इस प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया. उस जमाने में ये कोई मामूली बात नहीं थी. लेकिन रानी ने भी अपनी कोशिशें नहीं छोड़ीं. और जैसा कि ऐसे मामलों में प्रायः होता है चच के प्रति उसका प्‍यार और बढ़ गया. उसने जवाब लिखा- - "अगर तुम मुझे प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम मुझे अपना चेहरा तो मुझे रोज दिखा सकते हो. कम से कम मेरा ये हक तो मुझसे मत छीनो. मौसम और कभी बे-मौसम मैं तुम्हारी सुंदरता के बारे में सोच सकूं तकि वो रूप मेरे दिलो दिमाग में ताजा रहे. और मैं तुमसे मिलने की उम्मीद कभी खोना नहीं चाहती. तुमसे मिलन के लिए खुद को दिलासा दूं. (आगे रानी ने एक कविता लिखी. )  मेरी खुशनसीबी/ मैं तुम्हें साल-दर-साल देखूं? या भले अपनी पूरी जिन्दगी में सिर्फ एक रात  तुम्हारा तसव्वुर करूं/ हे मेरे आदर्श ! /मैं तुम्हारे सोचकर कभी निराश न होऊं? मैं इंतजार करूंगी/कम से कम एक दिन तुम्हारे साथ मिलन की रात."

राजा वृद्ध था और कुछ ही सालों में उसकी स्वभाविक मृत्यु हो गई. राजा की कोई संतान नहीं थी सो रानी ने चच से शादी कर सिंध की कमान उसके हाथ सौंप दी. यहीं से चचवंश शुरू हुआ. बाद में इसी चच का बड़ा बेटा मशहूर राजा दाहिर बना. पहले मुस्लिम आक्रमणकर्ता के रूप में जाने गए मुहम्मद बिन कासिम ने जब भारत पर हमला किया तो वहां का राजा दाहिर था. दाहिर केवल सिंध का नहीं बल्कि कन्नौज से लेकर कश्मीर तक उसका राज था. तो इस तरह भारत में मुसलमानों से पहला मुचैटा ब्राह्मणों ने लिया था. आगे तो सब इतिहास है. 


  


Saturday, April 23, 2022

'पिंजरे में कैद गणेश' जी'


दयाशंकर शुक्ल सागर
 "जो लोग इतिहास नहीं जानते वे इसे दोहराने के लिए अभिशप्त हैं." 18वीं सदी के आयरिश मूल के ब्रिटिश राजनेता, अर्थशास्त्री और दार्शनिक एडमंड बर्क का ये उक्ति हर युग के लिए मौजू है. 12वीं सदी के अंत में जब विदेशी आक्रान्ता शहाबुद्दीन गौरी और उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली के हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़ कर उसके मलबे से कुतुब मिनार और उसी परिसर में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण कराया था तब उसने सोचा भी नहीं होगा कि 21वीं सदी में इतिहास की गलतियों को सुधारने के नाम पर वो और उसकी ये इमारतें हिन्दूवादी संगठनों के निशाने पर होंगी. कुतुब मिनार परिसर में हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां मस्जिद की दिवारों और खम्बों पर सदियों से अंकित हैं. लेकिन कभी सांसद रहे राष्ट्रीय संस्मारक प्रा‌धिकरण के चेयरमैन तरूण विजय ने बीती 25 मार्च को संस्कृति मंत्रालय को लिख कर जैसे सोए हुए किसी जिन्न को जगा दिया. इस पत्र में उन्होंने लिखा- 'कुतुब मिनार परिसर में  गणेशजी को पैर के स्तर पर रखा गया है. वहां जान बूझकर गणेशजी को उल्टा लटका देख हिंदुओं को रोजाना अपमान झेलना पड़ रहा है. पिंजरे में एक और गणेश की मूर्ति जहां लोग अपना जूते पहन कर जाते है.' ("the daily humiliation Hindus have to face there seeing deliberately put upside down Ganpati at the foot level and another Ganesh sculpture in the cage where people put their shoes. पत्र में उन्होंने भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला दिया है जिसमें " सभी के लिए समानता और न्याय की भावना" की बात कही गई है. ( lt is against the Constitution of lndia's spirit of equality and justice for all.")  तरूण विजय ने भारत सरकार से 'कुतुब मीनार में "उल्टे गणेश और पिंजड़े में बंद गणपति" को इस कंपाउंड को निकाल कर सम्मान के साथ राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने का आग्रह किया है. ("the Ulta Ganesh and the Ganesh in cage in Qutub Minar compound may kindly be taken out and kept in national museum with respect. lt can be done within the AMASR Act, 1958.") कई लोगों को भाजपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य के भावुकता से भरे इरादे नेक लग सकते हैं पर बात उस वक्त और पेचीदा हो गई जब कुछ हिंदूवादी संगठनों ने दिल्ली की साकेत कोर्ट में  इस पर एतराज जताते हुए उन "मूर्तियों को परिसर में ही सम्मानजनक ढंग से रखने और उनकी पूजा अर्चना करने की इजाजत" देने की अपील दायर कर दी. और कोर्ट ने बीती 13 अप्रैल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को मस्जिद से हिंदू देवताओं की मूर्तियों को हटाने पर रोक लगाकर और यथा स्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए.
पिंजड़े की तस्वीर

कोई और वक्त होता तो बात बेशक आई-गई हो जाती. लेकिन इस दौर में जबकि हर तरफ हिन्दुत्व की लहरें हिलौरे मार रही हैं, ये मामला संगीन हो गया है. देखा जाए तो कुतुब मिनार और उसके परिसर में मौजूद मस्जिद को लेकर विवाद नया नहीं है. खुद देश का पुरातत्व विभाग मानता है कि कुतुब मिनार परिसर में शहाबुद्दीन गौरी के सिपाहसलार ऐबक ने हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़ कर उसके मलबे से कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई. यह एक आक्रान्ता का शक्ति प्रदर्शन था जिसे उसने कुव्वत-उल-इस्लाम यानी इस्लाम की कुवत (Might of Islam) का नाम दिया. ये ऐतिहासिक तथ्य है जो मस्जिद के मुख्य दरवाजे पर खुद कुतुबुद्दीन ऐबक ने अरबी में इन शब्दों में अंकित कराया कि- "इस जामी मस्जिद की तामीर (महीने) वर्ष 587 (1191-2 ई.) में सेना के महान और गौरवशाली सेनापति, (नाम) कुतुब-द-दौलतवा-दीद, अमीरुइउमरा ऐबक सुल्तानी द्वारा की गई थी, खुदा अपने बंदों को ताकतवर बनाए. इसके (मस्जिद के ) निर्माण में 27 मंदिरों की सामग्री व धन (हर मंदिर की सम्पत्ति 2,000,000 देलीवाल थी) का इस्तेमाल किया गया,"  ( this Jami Masjid was built in (the months of) the year 587 (1191-2 A.D.) by the Amir, the great and glorious commander of the army, (named) Qutbu-d-daulatwa-d-did, the AmiruIumara Aibak Sultani, may God strengthen his helpers. The materials of 27 temples on each of which 2,000,000 Deliwals has been spent, were used in (the construction of) this mosque)* ( एएसआई के तत्कालीन अधीक्षक जे.ए. पेज द्वारा अरबी से अंग्रेजी में किया गया  ये अनुवाद 'मेमरी आफ द आर्किलाजिकल सर्वे आफ इंडिया नं 22 में 'एन हिस्टारिकल मेमोरी ऑन द कुतुब: दिल्ली' शीषक से प्रकाशित लेख से लिया गया है.)  *(‘Memoirs Of The Archeological Survey Of India’ No. 22 under the heading ‘An Historical Memoir On The Qutub: Delhi’ authored by J.A. Page, the then Superintendent Archeological Survey of India,) दरवाजे पर अगर यह इबारत न भी लिखी गई होती तो भी खुले मस्जिद परिसर में देवी-देवताओं की मूर्तियां और  इसके आंगन के चारों तरफ के खंबों और दीवारों पर मंदिर की वास्तुकला साफ तौर पर दिखाई देती है. भारत में शुरूआती मस्जिदों में एक ये इमारत आज तकरीबन खंडहर में तब्दील हो चुकी है. कुतुब मिनार के एकदम बगल में बनी ये मस्जिद अब भारतीय पुरातत्व सवेक्षण की निगेहबानी में है. चूंकि मस्जिद परिसरों में चारों तरफ मूर्तियां हैं इसलिए पुराविदों को य‌हां कभी नमाज पढ़े जाने के संकेत नहीं मिले. ज्यादातर खम्बों और दिवारों पर अंकित मूर्तियां अब पूरी तरह से टूट चुकी हैं और आम पर्यटक के लिए पहचान कर पाना कठिन है कि कौन सी मूर्ति किस देवी देवता की है. हालांकि तरूण विजय और तमाम हिन्दू संगठन व इतिहासकार इनकी पहचान गणेश, विष्णु, गंगा, सूर्य, गंगा, यमुना, दशावतार, कृष्णा जन्म, नवग्रह,यक्ष यक्षिणी, महावीर, नटराज, यंत्र आदि देवताओं से करते रहे हैं. लेकिन चूंकि गणेश की प्रतिमाएं अपनी लंबी सूंड के कारण अलग से पहचानी जाती हैं इसलिए मौजूदा विवाद भी गणेश प्रतिमाओं को लेकर उठ खड़ा हुआ है. 


क्या है विवाद 

पहली विवादित प्रतिमा कुतुब मिनार परिसर की मस्जिद के आंगन के दांए सिरे पर रखी है. विवाद के कारण पिछले दिनों एएसआई ने इस कोने को बैरीकेट टेप ( Barricade Tape) लगा कर घेर दिया है ताकि आम पर्यटक वहां न आ सकें. (देखें फोटो)


दरअसल यह प्रतिमा करीब डेढ़ फीट शिलाखंड पर अंकित है. इस प्रतिमा को फर्श पर झुक कर ही ठीक से देखा जा सकता है. पूर्व सांसद तरूण विजय को आपत्ति है कि पर्यटक प्रतिमा के इर्द गिर्द जूते पहन कर घूमते हैं क्योंकि उन्हें मालूम ही नहीं कि यहां गणेश जी की प्रतिमा रखी है.

वे कहते हैं कि "मैंने एएसआई अफसरों से सिर्फ ये कहा कि इस प्रतिमा को कम से कम पैडेस्टल पर रख दिया जाए ताकि ये हर दिन अपमानित न हो पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी, इसलिए पत्र लिखना पड़ा"  दूसरी विवादित प्रतिमा मस्जिद में आंगन की तरफ एक खम्बेम के पास लगी है. दूसरी विवाद उल्टी गणेश प्रतिमा को लेकर है. (देखें फोटो) प्रसिद्ध इतिहासकार डा. डीपी तिवारी कहते हैं कि "हो सकता है आक्रान्ताओं ने मस्जिद जल्दबाजी में बनवाई इसलिए मलबे से पत्थपर पर अंकित ये प्रतिमा उल्टी लग गई हो.

क्योंकि मुसलिम कारीगरों के लिए वो सिर्फ एक पत्थर का टुकड़ा ही था." लेकिन प्रसिद्ध पुराविद और दिल्ली संस्मारकों के कई साल पुरातत्व अधीक्षक रहे डा. बीआर मणि ऐसा नहीं मानते. उन्होंने कहा ये जानबूझ कर हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए किया गया. पत्‍थरों में अंकित कई मूर्तियां तोड़ी गईं और जो नहीं टूटीं उसे प्लास्टर से ढक दिया गया."  पूर्व सांसद विजय कहते हैं कि कम से कम इस गलती को तो अब सुधारा जा सकता है. पर दीवार में अंकित इस प्रतिमा को निकाल कर दोबारा कैसे ठीक किया जा सकता है? जवाब में विजय कहते हैं- "ये एएसआई जाने कि इसे कैसे ठीक करना है. लेकिन हिन्दूओं के लिए अपने इष्टदेव को रोज अपमानित होते देखना अच्छा नहीं लग रहा है." 

गणेश की तीसरी विवादित प्रतिमा वह है जिसे पूर्व सांसद "पिंजड़े में कैद बताते हैं." ये प्रतिमा मस्जिद की दाई तरफ की बाहरी दीवार में एकदम नीचे पत्थर पर अंकित है. क्योंकि ये प्रतिमा बाहरी दीवार के सबसे निचले पत्थर पर बनी है इसलिए सदियों के थपेडे़ इस पर नहीं पड़े. ये यहां मौजूद मूर्तियों में से सबसे साफ सुधरी प्रतिमा हैं जिसमें गणेश स्पष्ट दिखते हैं. (देखें फोटो) लेकिन इसे पुरातत्व विभाग ने लोहे की जाली से घेर रखा है जिसे "पिंजड़ा" कहा जा रहा है. डा. मणि कहते हैं 1995 तक वे यहां थे तब तक इस प्रतिमा को जाली से नहीं ढका गया था. 'पिंजरे' का नया विवाद उठने के बाद एएसआई ने यहां भी अपने सिक्योटी गार्ड बैठा दिए. अब किसी पर्यटक को इस जाली के पास जाने की इजाजत नहीं. अगर आप जिद करेंगे तो कोई हैरत की बात नहीं कि एएसआई के सिक्योर्टी गार्ड आपके साथ जोर जबरदस्ती करने लगें. एक सिक्योटी गार्ड ने बताया कि "ये आदेश ऊपर से मिले हैं कि जाली के पास किसी को जाने न दिया जाए." 


फिर इस प्रतिमा को पिंजड़े में कैद क्यों करना पड़ा? इसमें जवाब में एएसआई के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि इस प्रतिमा की लोग पूजा करने लगे थे. इस पर टीका चंदन लगाने लगे. लोग यहां प्रसाद भी चढ़ाने लगे. जबकि प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958  (एएमएएसआर एक्ट) के तहत पुरातत्व सम्पत्ति के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की इजाजत नहीं है. इसलिए सख्ती इतनी है कि कुतुब मिनार परिसर में दाखिल होने के दौरान सभी तरह की प्रसाद सामग्री जब्त कर ली जाती है. पुरातत्व के एक कर्मचारी ने बताया कि जिन्हें मालूम है वे गणेश जी के लिए चढ़ावा लेकर आ जाते हैं. ऐसी ही गेट पर जब्त नारियल आदि प्रसाद सामग्री कभी भी देखने को मिल जाएगी. (देखें फोटो) विवाद उठते ही आनन फानन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण हरकत में आ गया. 17 अप्रैल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली सर्किल के अतिरिक्त महानिदेशक डा. आलोक त्रिपाठी अपनी टीम के साथ मस्जिद परिसर में अपने मोबाइल फोन से इन मूर्तियों की तस्वीरें खींचते नजर आए. एडीजी त्रिपाठी ने हालांकि इंडिया टुडे से इस प्रकरण पर विस्तार से बात करने से ही इंकार कर दिया. गणेश प्रतिमा को जाली में बंद रखने के बारे में पूछे जाने पर त्रिपाठी ने कहा कि "यहां सब कुछ एएमएएसआर एक्ट के मुताबिक है." तरूण विजय के पत्र पर उन्होंने बस इतना कहा कि "एएसआई हर शिकायत का अपने स्तर पर संज्ञान लेता है."     

लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं जो इस पूरे प्रकरण को सोची समझी साजिश मान रहा है. अलीगढ़ मुस्लिम विवि के मध्यकालीन इतिहास के प्रोफेसर सै.अली नदीम रिजवी कहते हैं- "इत्तला मिली है कि वहां बहुत दिनों से सुनियोजित तरह से मूर्तियों को झाड़ पोछ कर सामने सजाया जा रहा हैं ताकि बखेड़ा खड़ा करके मुल्क को बांटा जा सके." जबकि डा. मणि कहते हैं- "ये संभव ही नहीं कि वहां कोई भी छेड़छाड़ की जा सके. क्योंकि इस परिसर को यूनेस्को ने वर्ल्ड हैरिटेज साइट घोषित किया है. यहां का एक भी पत्‍थर यहां से वहां किया गया तो इससे ये दर्जा छिन सकता है."   

प्रो. रिजवी कहते हैं कि कोई भी संस्मारक या मान्युमेंट न मंदिर होता है न मस्जिद. वहां कोई धार्मिक गतिविधि करना गैर कानूनी है. ये वैसा ही ही कि कल कोई कहे कि मैं संग्रहालय में रखी किसी देवी देवता की पूजा वहीं करूंगा भजन कीर्तन करुंगा. या ब्रिटिश म्यूजियम में कई सदियों पुराने बड़े-बडे़ ताजिए रखे हैं. मैं शिया मुसलमान हूं और मैं वहां कल जाकर मजलिस या मातम करने लगूं ? आखिर इस मुल्क को हम कहां ले जा र‌हे हैं?" पुराविद डा. मणि भी नहीं चाहते कि इन संस्मारकों के साथ कोई भी छेड़छाड हो. या यहां से कोई भी मूर्ति संग्रहायल भेजी जाए. लेकिन वे कहते हैं- "ये गणेश जी का अपमान नहीं बल्कि इससे उन्हें उल्टा लगाने वाले शासकों के चरित्र का पता चलता है. लेकिन ये बात सबको पता होनी चाहिए." पूर्व सांसद का भी जोर इसी बात पर ‌है कि ये कहानी वहां लिख कर प्रदर्शित की जाए.       

         

‘कुतुब मिनार उपासना एक्ट के दायरे से बाहर’

                                                                   याचिका कर्ता हरिशंकर जैन
कुतुब मिनार विवाद की ये पूरी कहानी शुरू होती है दो साल पहले जब 'भगवान विष्णुम और जैन तीर्थांकर भगवान ऋषभदेव' ने ‌दिल्ली की कोर्ट में सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के खिलाफ एक याचिका दाखिल की. दिलचस्प है हिन्दुस्तानी कानून में मूर्तियां खुद मुकदमा दायर कर सकती हैं. क्योंकि ‌सुप्रीम कोर्ट ने अपने तमाम फैसलों में 'देवता' को एक व्यक्ति के रूप में मान्यता दी है.रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के चर्चित मुकदमे में अयोध्याम के 'रामलला विराजमान' खुद वादी थे और उनकी तरफ से मुकदमा करने वाले रामलला के 'नेक्स्टर फ्रैंड' देवकी ननंद अग्रवाल थे. तो जाहिर है ये याचिका भी इन भगवानों के 'नेक्स्ट  फ्रैंड' के रूप में एडवोकेट हरिशंकर जैन और रंजना अग्निहोत्री की और की तरफ से दायर की गई. ये दोनों वरिष्ठ अधिवक्ता राममंदिर मामले में रामलला के वकीलों की टीम का हिस्सा रहे हैं. जैन अब लखनऊ छोड़ कर सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे हैं. दिसम्बर 2020 में दायर याचिका में उनका कहना था कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट (1862) के बाद से ही इस तथ्य की पुष्टि की है 27 हिंदू और जैन मंदिरों को ध्वस्त करने के बाद उसके मलबे से कथित कुव्वत-उल-मस्जिद बनाई गई. खुद कुतुबुद्दीन ऐबक ने ये तथ्य मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार पर अंकित किया है. भारत सरकार ने कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद परिसर को 16 जनवरी 1914 संरक्षित स्मारक घोषित किया और तब से इसका प्रशासनिक नियंत्रण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली सर्कल के पास है.  याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अधिग्रहण की तारीख पर, मंदिरों और देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई नहीं था इसलिए प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1904 की धारा 10 के तहत उन्हें पक्ष रखने का कोई मौका नहीं दिया गया था. इस तरह याचिका में कुतुब मिनार परिसर को हिन्दुओं का पूजा स्थतल मानते हुए वहां मौजूद देवी देवताओं की पूजा, दर्शन व उपासना करने की इजाजत देने मांग की गई थी. इस याचिका में कुतुब मिनार परिसर को भारत सरकार द्वारा गठित किसी हिन्दू ट्रस्ट के हवाले करने की भी मांग है. याचिका में कहा गया कि प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 की धारा 16 और 19 इसकी इजाजत देता है.   

लेकिन साकेत कोर्ट ने 29 नवम्बर 2021 को पूजा स्थल ((विशेष उपबंध) ) अधिनियम, 1991 (THE PLACES OF WORSHIP (SPECIAL PROVISIONS) ACT, 1991 )का हवाला देते हुए ये याचिका रद कर दी.  पूजास्थल एक्ट कहता है कि 15 अगस्त, 1947 को मौजूद देश में किसी भी उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा जैसा वह उस दिन विद्यमान था. कोर्ट ने अपने फैसले में इस एक्ट की व्याख्या करते हुए कहा-"इस एक्ट का मकसद देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र बनाए रखना है. हमारे देश का एक समृद्ध इतिहास रहा है और उसने बहुत चुनौतीपूर्ण समय देखा है. फिर भी, इतिहास को समग्र रूप से स्वीकार करना होगा.  क्या ये हो सकता है कि अच्छे को बरकरार रखा जाए और खराब को हमारे इतिहास से हटा दिया जाए?"  ("The purpose of the Places of Worship Act, 1991 was to maintain the secular character of this nation. Our country had a rich history and has seen challenging times. Nevertheless, history has to be accepted as a whole. Can the good be retained and bad be deleted from our history? Thus, harmonious interpretation of both the statutes is required to give full force to the objective behind the Places of Worship Act, 1991") बहस के दौरान वादी के वकील ने 'राष्ट्रीय शर्म' के मुद्दे पर कुछ बातें कहीं. इस पर कोर्ट ने कहा- "भारत का सांस्कृतिक रूप से समृद्ध इतिहास रहा है. इस पर कई राजवंशों ने शासन किया. हालांकि इससे किसी ने इनकार नहीं कि अतीत में गलतियाँ की गई थीं, लेकिन ऐसी गलतियाँ हमारे वर्तमान और भविष्य की शांति भंग करने का आधार नहीं हो सकतीं. कानून हमारे इतिहास और राष्ट्र के भविष्य की बात करता है. इतिहास के वाहक के रूप में राष्ट्र को इसका सामना करने की जरूरत है. आजादी अतीत के घावों को भरने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था. कानून को अपने हाथ में लेने वाले लोगों के जरिए ऐतिहासिक गलतियों का समाधान नहीं किया जा सकता है." ("India had a culturally rich history. It has been ruled over by numerous dynasties. During arguments, the Ld. Counsel for plaintiff has vehemently argued on the point of national shame. However, nobody has denied that wrongs were committed in the past but such wrongs cannot be the basis for disturbing peace o f our present and future.")

 याचिका खारिज होने के बाद हिन्दूवादी पक्ष के वकीलों ने सिविल कोर्ट में ही अपील दायर की जिसमें कहा गया कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की संबंधित धाराएं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अधिग्रहित कुतुब मिनार जैसे इमारतों पर लागू नहीं होतीं. खुद पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की धारा-3 में ये बात साफ तौर पर कही गई है. वादी की अपील पर साकेत कोर्ट ने भारत सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को नोटिस जारी कर दिया है. उधर कांग्रेस नेता व सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील सलमान खुर्शीद इंडिया टुडे से कहते हैं - "ये पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की गलत व्याख्या है. ये सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि एएसआई की इमारतें इस एक्ट के तहत शामिल हैं या नहीं."  

इंडिया टुडे' ने एएसआई के वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष गुप्ता से इस बारे जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि वे इस बारे में कोई बयान देने के लिए अधिकृत नहीं हैं. नोटिस मिली है और इसका जवाब तैयार किया जा रहा है. उधर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली सर्किल के अतिरिक्त महानिदेशक डा. आलोक त्रिपाठी  ने कहा कि अब ये मामला अदालत में है इसलिए हम अभी कोई टिप्पणी नहीं कर सकते. 

 लेकिन इसी बीच पूर्व राज्यसभा सदस्य और पूर्व सांसद तरूण विजय के संस्कृति मंत्रालय को पत्र लिख कर नया विवाद खड़ा कर दिया. उन्होंने 'कुतुब मीनार परिसर में 'उल्टे गणेश' और 'पिंजड़े में बंद गणपति' को कुतुब परिसर से निकाल कर सम्मान के साथ राष्ट्रीय संग्रहालय के पत्र के जारी होते ही भगवान ऋषभ देव के 'सखा' हरिशंकर जैन ने कोर्ट में एक अंतरिम राहत की याचिका जारी करते हुए कहा कि "ये राष्ट्रीय शर्म का विषय है करोडों हिन्दुओं के आराध्य गणपति की मूर्ति अपमानजनक हालत में पड़ी हुई है. ये एएसआई निदेशक की जिम्मेदारी है कि वे न केवल इस परिसर में बाकी अपनी सभी साइटों पर देवी देवताओं के सम्मान का ख्याल करें. एएसआई को कोई अधिकार नहीं है कि वह परिसर से इन मूर्तियों को राष्ट्रीय अभिलेखागार या कहीं और स्थांतरित करे. " जैन की इस प्रार्थना पर कोर्ट बीती 13 अप्रैल को परिसर से प्रतिमाएं न हटाने और यथा स्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए. कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 17 मई 2022 तय की है. 

जाहिर है पहली नजर में ये सारा मामला पुराने जख्म कुरेदने जैसा है. लेकिन भगवान ऋषभदेव के 'नेक्स्टर फ्रैंड' हरिशंकर जैन कहते हैं-"ये जख्म कुरेदना नहीं पुराने जख्म का उभार है. आखिरी आजादी मिलती क्यों हैं ताकि हम पुरानी गलतियों को सुधार सकें." जैन ताजा मिसाल देकर कहते -"आज जो रूस, यूक्रेन के साथ कर रहा है क्या उसे कभी यूक्रेन की आने वाली पीढ़ी भूलेंगी फिर हम विदेशी आक्रान्ताओं को कैसे भूल जाएं?" इस पर इंडियन मुस्लिम लॉयर कांउसिल के महासचिव आबिद हुसैन कहते हैं कि "पुराने जख्म कुरेदने से सिर्फ तकलीफ और नफरत ही पैदा होती है. बेहतर ये है कि हम पुरानी बातों को भूल कर आगे बढ़े."


END

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Friday, March 18, 2022

कश्मीर फाइल्स के बहाने

 


कहानी कहानी होती है. आधा सच और आधा फसाना. लेकिन 90' के कश्मीर के कत्ले आम के बारे में जितना मैंने पढ़ा और सुना है 'कश्मीर फाइल्स' की कहानी सौ फीसदी सच है. कुछ साल पहले जब मैं पहली दफा जम्मू के कश्मीरी पंडितों के रिफयूजी कालोनी में गया था तो दिल सच में भर आया था. कश्मीर की हरी भरी वादियों को छोड़कर उनकी दुनिया यहां दो कमरे के बंद अंधेरे उमस भरे घरों में कैद हो गई थी. मैंने महसूस किया वे अपना दर्द जाहिर नहीं होने देते थे. लेकिन अपनी आंखों में गहरी पीड़ा को चाह के भी वे छुपा नहीं पाते. आंखें जो बताती थीं कि कैसे कश्मीर में उनका शारीरिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक नरसंहार हुआ. कोई 15000 परिवार जम्मू में बस गए. कई अन्य परिवार दिल्ली, लखनऊ और दूसरे शहरों में पलायन कर गए. तीस साल में जैसे कई पीढ़ियां गुजर गईं.  तो विवेक रंजन अग्निहोत्री ने अपनी फिल्म 'कश्मीर फाइल्स'  में सच दिखाया. वैसा सच जैसा वो है. नंगा, दर्दनाक और कड़वा सच. जिस सच को दिखाने की हिम्मत तीस साल तक बालीवुड नहीं जुटा पाया. क्योंकि सच कहने और उसे सार्वजनिक करने के अपने खतरे हैं. गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग का सच मैंने अपनी किताब #अधनंगा फ़कीर में कहने की कोशिश की तो तमाम लानते मलानते झेलनी पड़ी. इस कहानी पर फिल्म बनाने के लिए बालीवुड के कई निर्देशकों से मेरी बात हुई. पर स्क्रिप्ट पसंद आने बावजूद कोई इस विषय को छूने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाया. इसलिए मैं अग्निहोत्री का दर्द समझ सकता हूं. मैं नहीं जानता कि आपने कभी स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म शिंडलर्स लिस्ट देखी या नहीं. दुनिया के सिनेमा में ये फिल्म मील का पत्‍थर है. इसे न जाने कितने आस्कर मिले. इसका हर दृश्य दिल और ‌दिमाग को झकझोर देने वाला है. ये फिल्म हिटलर की हैवानियत को दिखाती है जो उसने पोलिश-यहूदी शरणार्थियों के साथ किया.  हिटलर तो फिर गैस चैम्बरों में यहूदियों को नंगा करके उनका सामुहिक कत्ल करता था लेकिन कश्मीरी पंडितो के साथ हुई हैवानियत उससे कहीं ज्यादा खौफनाक है. शिंडलर्स लिस्ट में 50 साल पुराने जन संहार की घटना को फिल्म के जरिए दिखाया गया है. जबकि कश्मीर का जनोसाइट तो अभी 30 साल पुराना है. पर फिल्म के बहाने पूरे नरैटिव को हिंदू बनाम मुस्लिम बना दिया गया.  फिल्म शिंडलर्स लिस्ट को सारी दुनिया ने सराहा. कला की दृष्टि से भी और कंटेंट के नजरिए से भी. मुझे लगता है कि  'कश्मीर फाइल्स' का आकलन भी इसी नजरिए से करना चाहिए. फिर जिन्हें राजनीति करना है करेंगे. सबसे मजेदार प्रतिक्रिया तो अभिव्यक्ति की आजादी का झंडा उठा आजादी की भीख मांगने वाले झूठे मक्कार सेकुलरों की दिख रही है. ये अरुधंती राय जैसे वही सेकुलर हैं जिन्हें कश्मीरी आतंकियों की हिंसा अभिव्यक्ति की आजादी नजर आती है लेकिन कश्मीरी पंडितों के दर्द की अभिव्यक्ति में उन्हें असहिष्णुता दिखाई दती है. तथ्यों और कला के आधार पर फिल्म का मूल्यांकन करने के बजाय वे फिल्म पर लानत मलानत भेज रहे हैं.  

और फिल्म पर  भगवा दक्षिणपंथियों का तमाशा तो और भी ज्यादा दिलचस्प है. वे ऐसा दिखा रहे हैं कि फिल्म देखकर उन्हें पहली बार इलहाम हुआ कि कश्मीरी पंडितों पर कितना अत्याचार हुआ. ऐसा कतई नहीं है कि कश्मीरी पंडितों पर 90' में हुए इस्लामिक कट्टरपंथियों के जघन्य अत्याचारों से ये हिंदू झंडबदार अनजान थे. जब ये सब हुआ केन्द्र में अब तक के सर्वाधिक कमजोर प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार थी. इस सरकार की अर्थी को कंधा देनी वाली यही बीजेपी थी जो अपने राज्यों में 'कश्मीर फाइल्स' को टैक्स फ्री कर रही है. तब इसी बीजेपी के आडवाणी जैसे लीडरान कश्मीरी पंडितों को बचाने के बजाए सत्ता में आने के लिए रथ यात्रा निकलाने की रणनीति बना रहे थे. जम्मू में रहते मैंने महसूस किया कि मोदी सरकार पहली बार कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को लेकर सचमुच संजीदा है. आर्टिकल 370 हटा कर और पंडितों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू कराके ये सरकार ने साबित भी कर दिया. अभी जम्मू के एक मित्र ने मुझे बताया कि पोर्टल बनाकर कश्मीरी पंडितों की जमीनें वापस उनके नाम की जा रही हैं. कश्मीर में देसी और दुबई की विदेशी कंपनियां करोडों का विनिवेश करने जा रही हैं. संभवतः इसी महीने मोदी जी जिसकी शुरूआत करेंगे.

फिल्म में ज्यादातर कश्मीरी मुसलमानों को पाकिस्तान परस्त और हिंदुओं से नफरत करने वाली कौम की तरह दिखाया गया है. कश्मीर का यही कड़वा सच है. वे देश को अमूमन 'इंडिया' कह कर पुकारते हैं गोया वे कश्मीर में नहीं पाकिस्तान में हों. मैं कश्मीर के गांव-गांव हफ्तों घूमा हूं. वे आजादी के 75 साल बाद भी इंडिया पर यकीन नहीं कर पाए हैं. खुद कश्मीरी पंडितों के संगठन बताते हैं कि घाटी में अब तक कोई 650 (आरटीआई में ये गिनती 89 बताई गई है.) कश्मीरी पंडित मारे गए . श्रीनगर पुलिस के आरटीआई में दिए आंकड़े बताते हैं कि आतंकी हमलों में अब तक कोई 1635 गैर हिन्दू मारे गए. ये एक अलग नजरिया है कश्मीर को देखने समझने का. क्या इस नजरिए पर कोई फिल्म बना सकता है?  

कश्मीर के साथ इतिहास ने हमेशा से बेइंसाफी की. 12वीं सदी में कल्हण जब 'राजतरंगिणी' लिख रहे थे और देख रहे थे कि किस तरह महमूद गजनी के हमलों से बेजार उत्तर भारत के बदहवास  हिन्दू भागकर कश्‍मीर में शरण ले रहे हैं. वे अपने साथ बेशकीमती ग्रंथ साथ ला रहे थे. और देखते-देखते कश्मीर विद्वान ब्राह्मणों का केन्द्र बनता जा रहा था. 1192 यानी राजतरंगिणी की रचना पूरी होने के 44 साल बाद मुहम्मद गौरी ने भारत पर हमला का यहां मुस्लिम राज स्‍थापित किया. एक तिब्बती राजकर्मी रेंचन ने हिन्दू राजा की बेटी कोट रानी से ब्याह रचाया. वह हिन्दू बनना चाहता था पर कश्मीरी पंडितों ने ये स्वीकार नहीं किया. तो वो मुसलमान बन गया. उसकी मौत के बाद कोट रानी द लास्ट क्वीन आफ कश्मीर के नाम से मशहूर हुई. सच पूछिए तो 'कश्मीर फाइल्स' यहां से खुलती है. तो जो अग्निहोत्री ने कश्मीर फाइल्स में दिखाया वो एक बानगी भर है. असली इतिहास तो अभी बताया और दिखाया जाना बाकी है. लेकिन उसे देखने के लिए कलेजा मजबूत करना होगा. 


Saturday, March 20, 2021

नीड़ का निर्माण फिर फिर




मैंने देखा है दुनिया में हर बड़े काम का क्रेडिट पुरुष ले उड़ते हैं। जबकि हर पुरुष के परिश्रम के पीछे एक स्‍त्री का श्रम और उसकी साधना छुपी होती है। एक पुरानी और मशहूर कहावत है दुनिया के हर सफल आदमी के पीछे स्‍त्री होती है लेकिन हैरत की बात यह कि वह मुझे स्‍त्री कभी दिखती नहीं। वह कभी सामने नहीं आ पाती। पति-पत्नी का केवल एक साथ रहना दांपत्य नहीं। दांपत्य के बहुत गहरे अर्थ हैं। यह वह शब्द है जो स्त्री और पुरुष दोनों को एक बंधन में बांधकर एक करता है। दाम्पत्य प्रेम का सटीक अर्थ है-दूसरे की मौजूदगी का आनंद लेना। और परस्पर सम्मान इसका आधार है। सफल दांपत्य जीवन के सात सूत्र हैं-संयम, संतुष्टि, संतान, संवेदनशीलता, संबल, संकल्प और सर्म्पण। ऐसा मैंने शास्‍त्रों में पढ़ा है। आज की प्रेरणा दायक कहानी इसी दांपत्य जीवन पर। 



जीवन के तीसरे पड़ाव में आकर एक पुरुष शहरी जिन्दगी छोड़कर ग्रामीण जीवन जीने का सपना बुनता है कि दूर गांव में एक हमारा छोटा-सा घर होगा। घर के सामने एक बड़ा-सा बगीचा होगा। जिनके फूलों पर हर वक्त तितलियां मंडराती होंगी। जैविक खेती से दूर दूर तक लहलहाते खेत होंगे। और वह अपनी पत्नी को इसके लिए प्रेरित करता है। और ये कामना एक ऐसी पत्नी से जिसने कभी खेत नहीं देखे। जो 35 साल अपने वैवाहिक जीवन में अपने ससुराल के पैतृक गांव में केवल दो बार आई हो। जिसका जीवन आसाम के चाय बगानों की ठेठ अंग्रेजी संस्कारों में बीता हो। फिर शादी के बाद इलाहाबाद आने पर रसूखदार पति के साथ एक लम्बा सामाजिक जीवन। बड़ी महफिलों, जलसों, क्लब की पार्टियों और तमाम सामाजिक आयोजनों में जाना। सुख सुविधाएं के साथ प्रशंसा, पद, प्रतिष्ठा और परिचयों का एक विशाल दायर छोड़ कर एक गांव में आकर बसने के फैसले में पति का साथ देना। और गांव भी क्या दूर दूर तक फैले सूखे खेत और आम के कुछ पेडों का झुरमुठ। जा‌हिर है ये कोई आसान फैसला नहीं था।    

मेरे एक मित्र हैं अखिलेश कुमार मिश्र बेहद संवेदनशील, विद्वान और भले मानस। आध्यात्मिक किस्म के इंसान हैं। पुलिस इंटेलीजेंस में बड़े अफसर थे। इलाहाबाद के पॉश इलाके में उनका घर है। बच्चे बड़े होकर नौकरी करने चले गए। घर काटने को दौड़ता था। सो रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बनारस के पास अपने गांव में जीवन जीने का फैसला किया। उन्हें लगा प्रकृति के आंचल में ही वे ईश्वर के सबसे ज्यादा करीब रह सकते हैं। और यहां से शुरू होती है मिश्र दम्पति के संघर्ष की एक यात्रा। दो साल पहले उनकी पत्नी किरण मिश्रा तीसरी बार चंदौली के पास अपने ससुराल के पैतृक गांव आईं। उनके  इरादा अपने गांव में आर्गनिक फार्म हाउस बनाना था। जैविक खेती का एक ऐसा प्रयोग आसपास के इलाकों में एक मिसाल बने। उनके लिए एक उदाहरण बनना जो गांव छोड़ कर शहरों में जा बसते हैं और फिर कभी लौट के नहीं आते। जो चंद लोग रिटायरमेंट के बाद कोशिश करते भी हैं वह बीच में हार थक कर लौट जाते हैं। लेकिन मिश्र दम्पति उनमें से नहीं थे। पहले चार दिन, फिर सात ‌दिन फिर पन्द्रह दिन के लिए इलाहाबाद से गांव आना एक जरूरत बन गई। जैसे जैसे फार्महाउस का निर्माण चल रहा था, इलाहाबाद पीछे छूटता जा रहा था। जरूरत ज्यादा यहां महसूस हो रही थी। यहां की व्यवस्था देखना, हर रोज मजदूरों का हिसाब करना, कभी ईंट कम पड़ जाना कभी सीमेंट के ट्रक का फंस जाना। एक समस्या से मुक्ति मिलती तो दूसरी व तमाम समस्याएं सामने खड़ी मुस्कुराती। पूरे दो साल लगे इस घरौंदे को बनाने में। इस दरमियान वे कभी टूटते, बिखरते, कभी निराश हो जाते। फिर एक दूसरे को समझाते, सम्‍भालते, हौसला देते लेकिन उम्मीद का दामन कभी छूटने नहीं देते। किरण जी कहती हैं-इस सबके दौरान इलाहाबाद के शहरी जीवन से दूर रहने की तकलीफ लगातार मन में रहती। कभी दो दिन के इलाहाबाद वाले घर लौटती कर लगता पूरे घर को अपनी आगोश में समेट लूं। कभी-कभी चुपके से अपने पति की नजर बचाकर वे रो भी लेती थीं। लेकिन इसके साथ फार्महाउस से लगाव भी बढ़ता जा रहा था क्योंकि यहां के पत्ते को संवारने मे हमारी कोशीशें थीं। हम हर चीज को बड़ी बारीकी से चुनते। चाहे वो कोई पौधा हो या कमरे का पर्दा। चाहे हैंडपम्प लगाने की जगह चयन हो या अन्न रखने का स्टोर बनाने के लिए जगह का चुनाव। एक मोह के धागे से नीड़ का निर्माण यहां भी शुरु हो चुका था। उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। धीरे-धीरे फार्म हाउस आकार लेने लगा। वे अपने दोस्तों को फार्म हाउस की फोटो मोबाइल पर भेजतीं। किरण जी कहती हैं- 'गांव के फार्म हाउस, हरे भरे खेत, रंग बिरंगे फूल, स्वादिष्ट रसीले फल, हरी ताजी सब्जियों की तस्वीरें देखकर रश्क करते तो मैं बिना पंख के आसमानों मे उड़ने लगती हूं। न जाने दिन में कितनी बार ईश्वर को धन्यवाद देती। जिसकी कभी मैंने कल्पना नही कि ईश्वर ने मुझे उस खुशी से नवाजा।' 

सबसे मजेदार कमेंट उनके भाई का था-'अरे ये‌ क्या नौटंकी लगाकर रखी हो तुमने किरण? कभी शानदार घर की फोटो भेजती हो‌, कभी फूलों से भरे लान की, कभी खेत खलिहानों में भी उतर जाती हो, सब्जियां भी उगा लेती हो। रामोजी स्टुडियो तो नही पहुंच गई तुम? आखिर माजरा क्या है?' तब उनकी बहन ने तुरंत उन्हें विडियो काल करके फार्म हाउस का लाइव नजारा दिखाया। वह चकित और हतप्रभ रह गए। भाई बोला-'मेरे पास शब्द नहीं है कि इसकी सुन्दरता को व्यक्त कर पाऊं तुमसे। तुम दोनों ने बहुत बारीकी से यहां की प्लानिंग की है। उजाड़ जगह को जन्नत बना दिया।'

अब फार्म हाउस बन कर तैयार है। उनके दोस्त टूरिस्ट की तरह वहां घूमने आते हैं। खेतों में उनका वक्त कब कट जाता है पता ही नहीं चलता। किरण कहती हैं- 'मुझमें कितना बदलाव आ गया है, मैं खुद हैरान हूं। बारिश मुझे बहुत पसंद हैं। बे-मौसम बारिश के तो कहने ही क्या? एक एक बूंद पर मैं झूम जाती थी। पर अब ....बारिश के साथ ही सोचती हूं इस बारिश  से हमारी फसल को नुकसान तो नहीं होगा?' सब्जियों की क्यारियों मे रोज जाकर देखना कि आज कौन-सी सब्जी कितनी है? उनको तोड़ना, सबमें बांटना सूकून देता है? अचानक ही निकल आए सब्जी, आम, फल व फूलों को देखकर मैं खुशी के मारे लगभग चिल्ला पड़ती हूं। चीजों को बनाना कितना कठिन है। फिर जब वो बन जाती है तो हम सब कठिनाइयां भूल जाते हैं। सामने दिखती है एक मुकम्मल तस्वीर। लोग तो चमकदार तस्वीर में ही उत्सुक हैं। तस्वीर के पीछे की कहानी तो बस कहानी ही रह जाती है। लेकिन फिर भी दोस्तों से बहुत संबल मिलता है।' 

तो मिश्र दम्पति का ये फैसला मुश्किल था। लेकिन ऐसे ही फैसलों में जीवन में अनुभव का एक और मजबूत घेरा बनता है। सोंधी मिट्टी की खुशबुओं और गांव के साफ नीले भीगे आसमान के पीछे उम्मीद की एक किरण हमेशा छुपी रहती है। इसी उम्मीद का नाम तो जिन्दगी है। जो इतनी बुरी नहीं जितनी की हमें अक्सर महसूस होता है। 

   

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Thursday, September 24, 2020

किसानों की कमाई से नेताओं की मौज

 


हिन्दी अखबारों में भी खेती किसानी की कवरेज को बहुत तब्बजो नहीं दिया जाता है. इसलिए कोई रिपोर्टर उसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता. खेती की खबरें और कवरेज केवल कृषि निदेशालय तक महदूद रहती है. कोई पन्द्रह साल पहले जब मैं राजनीतिक और सचिवालय की कवरेज से ऊब गया तब मैंने खुद आगे बढ़कर एग्रीकल्‍चर बीट की पेशकश की जो मुझे मिल गई. तो मैं पहली बार मंडी परिषद के दफ्तर गया. ये मेरे दफ्तर के पास ही था. जब पहली बार मंडी परिषद में दाखिल हुआ तो लगा किसी फाइव स्टार होटल में आ गया हूं. शानदार इमारत, चमचमाती इटेलियन टाइल्स की फर्श,  कमरों में वुडन वर्क. पहली नजर में लगा ही नहीं किया इस दफ्तर का खेती किसानी से कोई लेना देना होगा. कोई किसान तो इस दफ्तर में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता था. तब मुझे पता चला कि अरबों रूपए की ये इमारत किसानों के पैसों से ही बनी है. उस जमाने में भी मंडी अफसर के आला अफसर और मंत्रीजी की आलीशान कारों की खरीद और उसका खर्च भी किसानों के पैसे से चलता था. दरअसल सरकार किसानों के बेचे गए अनाज से तब कोई ढाई फीसदी मंडी टैक्स लेती थी. कायदे से इस पैसे का इस्तेमाल सरकार को मंड़ियों को बेहतर बनाने और गांवों में सम्पर्क मार्ग बनाने, इन सड़कों की मरम्मत और इन्हें गड्ढा मुक्त करने में खर्च करना चाहिए था. ताकि किसान आसानी से अपनी उपज लेकर मंडी तक पहुंच सके. लेकिन हर साल करोडो में आने वाले मंडी शुल्क का इस्तेमाल मंत्री और अफसर राजशाही पर खर्च करते थे. राज्य में चाहे किसी की सरकार हो. लेकिन कागजों पर गांव की सड़कें गड्ढामुक्त होती रहीं. न कोई उन्हें देखने वाला न जांच करने वाला. ये कच्चा काम था इसलिए इसका आडिट भी नहीं होता है. मंडी परिषद के कुछ गिने चुने ठेकेदार, नेता और अफसरों से मिलकर पैसे बनाने लगे. इसके इलावा भी हजार तरीके हैं यहां पैसा कमाने के वहां. देखते देखते मंडी परिषद सबसे कमाऊ विभाग बन गया. आज इससे कभी न कभी जुड़ा हर नेता और अफसर करोड़पति बन गया है. न भरोसा हो तो जांच करावा के देख लीजिए. अब जब से नया कानून आया है मंडी से जुड़े अफसर कर्मचारियों के होश उड़े हुए हैं. यूपी के किसानों को न पहले ज्यादा मतलब था मंड़ियों से न अब रहेगा. मंडी रहे या चूल्हे भाड़ में जाए. लेकिन पंजाब और हरियाणा में ऐसा नहीं है. किसानों को साहूकारों और दलालों से बचाने के लिए रोहतक के सर छोटू राम ने आजादी से पहले ही यहां देश में पहली मंडी की स्‍थापना की. समझ लीजिए खुद किसान रहे छोटू राम पंजाब-हरियाण के छोटे गांधी थे. आज भी उनका नाम वहां  के किसान सम्मान से लिया जाता है. तो उनके कारण जो मंडी कानून बना वह पंजाब हरियाणा के किसानों की ताकत बन गया और वहां की अर्थव्यवस्‍था की धुरी भी.मंडी की वजह से कि वहां के किसान शुरू से ही धन सम्‍पन्न हैं. अब उन्हें लग रहा है कि ये मंडियां खत्म हो जाएंगी तो वे एक बार फिर बड़े साहूकारों के चंगुल में फंस जाएंगे. इसीलिए इन बिलों का वहां सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है.       

 

तो कहने का मतलब चीजें इतनी आसान भी नहीं जितनी की ‌ऊपर से दिखती हैं. इन विवा‌दित बिलों के प्रभावों को बड़े परिपेक्ष्य में देखने और समझने की जरूरत है. सतही तौर पर अगर आप कोई नतीजा निकालेंगे तो बाद में बहुत पछताएंगे. क्योंकि आप किसान भले न हों एक उपभोक्ता हैं और उससे भी पहले आप इस देश के प्रबुद्ध नागरिक हैं. ये हमेशा याद रखिएगा नेता कोई संत-महात्मा हो या ईश्वर का भेजा गया कोई देवदूत. आखिर में वह नेता ही होता है.


Thursday, September 17, 2020

ज्योतिष विद्या का रहस्य




क्या आप ज्योतिष विद्या पर यकीन करते हैं? बहुत सालों तक मैं नहीं करता था. ये बड़ी बेढंगी बात लगती है कि आपसे लाखों मील दूर बैठे ग्रह नक्षत्र आपके जीवन को संचालित करें? क्या ये संभव है? अब जबकि मैं ज्योतिष विज्ञान का अध्ययन कर रहा हूं कह सकता हूं कि हां ये संभव है. न केवल संभव है बल्कि ये सब बहुत दिलचस्प है. ज्योतिष विद्या एक विज्ञान है. ये विशुद्ध गणित हैं। एक ग्रह है चन्द्रमा उसके उतार चढ़ाव से इतने बड़े समन्दर में लहरे उठती और गिरती हैं तो हम तो सिर्फ इंसान हैं जिसके शरीर में 60 फीसदी पानी है. इन दिनों मैं ज्योतिष विद्या पढ़ रहा हूं. मैंने अपनी कुंडली भी पढ़ी, जिसमें साफ साफ लिखा है- आप दूसरों को ज्ञान बांटेंगे? पढ़कर मुझे हंसी आ गई. आगे पढ़ता गया तो और बातें भी सच निकलती चली गई. अपने शुरूआती अध्ययन में जितना मैं ज्योतिष विज्ञान समझ पाया वह ये कि जिस वक्त हम जन्म लेते हैं ठीक उसी वक्त ब्रह्मांड में मौजूद ग्रह नक्षत्र हमारे जीवन की पूरी कहानी लिख देते हैं. ठीक उसकी वक्त तय हो जाता है कि हम अपने जीवन में क्या काम करने के लिए पैदा हुए हैं? हमारा जीवन कैसा होगा? हम परिवार कैसा होगा? हमारा चरित्र कैसा होगा‍‍? हमारा जीवन कितना होगा? इसी को जन्म कुंडली कहते हैं. ये सब उतना ही सटीक और वैज्ञानिक है जितना 2+2=4. लेकिन दिक्कत ये है कि हूबहू भविष्य बताने वाली इस गणित के मास्टर बहुत कम हैं. आप मुझे बस अपने जन्म का सही समय दिन, घंटे, मिनट और सेकेंड बता दें और ये बता दें कि आपका जन्म दुनिया के किस कोने में हुआ है. मैं या कोई और भी बहुत आसानी से कंप्यूटर से गणना करके बता देगा कि आपके के जन्म के समय ग्रह‌ और नक्षत्र कितने आकांक्ष पर थे और उन्होंने आपके जीवन पर क्या असर डाला जिसकी वजह से आप आज इस स्थिति में हैं. मैं आपके व्यक्तित्व के बारे में जो बातें बताऊंगा वह 90 फीसदी सही होंगी. अगर सही नहीं हैं तो इसका सिर्फ एक मतलब है कि आपके जन्म के समय के बारे में जानकारी कहीं गलत होगी. वर्ना ये गणना 100 फीसदी सही बैठती है. मजे की बात ये है कि इसमें कोई विवाद नहीं है. 

तो पहली बात जन्म कुंडली एक सेटालाइट पिक्चर की एक तरह है. ये आपके जीवन का फोटोग्राफ है. आपके जन्म के समय आसमान के ग्रह नक्षत्रों की जो तस्वीर खिंच गई उसे कोई नहीं बदल सकता. वो तस्वीर आपके जीवन से जुड़ गई जो आपकी मौत तक आपको पीछा नहीं छोड़ने वाली.  दूसरी बात ज्योतिष शास्‍त्र कहता है कि आपके जीवन में सुख दुख, अच्छे और बुरे दिन, यश अपयश ये सब जो आते जाते हैं उसकी वजह वर्तमान के ग्रह नक्षत्रों के मूवमेंट हैं जो आपके जीवन पर तात्कालिक असर डालते हैं. क्योंकि आपका जन्म एक खास ग्रह नक्षत्र के डिजाइन में हुआ है तो मौजूदा ग्रह नक्षत्रों की बदलती लोकेशन उस पर निरन्तर असर डालती रहती है. तो जीवन में कभी खुशी कभी गम के पीछे की थ्योरी की वजह यही है. 

तो अब तक जो बातें मैंने बताईं उससे साफ है कि आपका जीवन आपके नियंत्रण में बिलकुल नहीं है. आपके नियंत्रण में सिर्फ कर्म है. हो सकता है कि आप बहुत योग्य हैं, बहुत काबिल हैं बहुत कर्म करते हैं लेकिन फिर भी आप कामयाब नहीं हैं.तो इसके पीछे वजह आप नहीं है. आपके ग्रह नक्षत्र हैं जो आपके सारे कर्म के बावजूद आपको आगे नहीं बढ़ने देते. जबकि आपसे कहीं मूर्ख इंसान तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते जाता है. माफ कीजिए आप पाएंगे कि उसकी जन्म कुंडली में यही लिखा है. इसी को किस्मत या डेस्टनी कहते हैं. लेकिन इससे आप निराश कतई न हो. अपना कर्म जारी रखें. उससे आप भले आपको मनचाहा नतीजा न हासिल हो लेकिन अगर आपने थक कर किस्मत से हार मान ली और कर्म छोड़ दिया तो यकीन जानिए आपकी हालत बद से बद्तर हो जाएगी. और मजे की बात ये कि ये बात भी आपकी जन्म कुंडली में कहीं जरूर लिखी होगी.  

मेरी अब तक की बनी समझ से ज्योतिषी का काम बस यही खत्म हो जाना चाहिए. वो इसके आगे आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. क्योंकि वो किसी भी कीमत पर आपकी किस्मत नहीं बदल सकता. हां वो अपनी जेब भरने के लिए आपसे ग्रह शांति के लिए पूजा-यज्ञ-हवन आदि करने की सलाह दे सकता है. या फिर आपको कोई खास पत्‍थर सा रत्न पहनने की सलाह दे दे. लेकिन मुझे नहीं लगता इससे कोई बहुत असर पड़ता होगा. कुछ लोगों को पत्‍थर पहनने से कोई फायदा मिला भी होगा लेकिन ये सिर्फ संयोग या इत्तेफाक है. इसके पीछे कोई सांइस होगी ऐसा नहीं है. या अगर हो तो उसका आविष्कार अभी तक तो नहीं हुआ है. लेकिन आप ये मानिए कि ज्योतिष एक विज्ञान है लेकिन इसके जानकार चंद ऊंगलियों पर गिने जाने वाले लोग हैं. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 99 फीसदी ज्योतिषी फ्राड हैं. उनका ज्योतिष का ज्ञान बहुत सीमित है. लेकिन उसी से उनका काम खूब अच्छे से चल जाता है. क्योंकि लोगों को अपना भविष्य जानने में रूचि है. जिसका कोई मतलब नहीं. अपना भविष्य जानना निरी बेवकूफी है खास तौर से तब जब आप जानते हैं कि उस भविष्य को दुरुस्त करने के लिए आप या कोई और कुछ नहीं कर सकता. ये बात निराशाजनक जरूर है लेकिन जो है सो है. क्या कीजिएगा आप?  



Wednesday, September 9, 2020

अंधेर नगरी चौपट राजा

 



बनारस में एक है ठठेरी बाजार. लॉकडाउन से थोड़ा पहले ही मैं वहां गया था. बनारस के संगीतज्ञ मर्मज्ञ और काशी संगीत समाज के संयोजक कृष्णकुमार रस्तोगी के निधन पर. वे भी ठठेरी बाजार में रहते थे. गजब प्रतिभाशाली व्यक्तित्व थे लेकिन उन पर फिर कभी. तो ये ठठेरी बाजार पतली से एक गली है जहां कभी ठठेरे रहे होंगे. लेकिन आज कल तो इस गली के दोनों तरफ तरह तरह की मिठाई, नमकीन, अचार, पापड़ और न जाने कितनी चटपटी चीजों की दर्जनों दुकानें हैं. इसी गली में बनारस का मशहूर राम भंडार है. बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद जहां की पूड़ी कचौड़ी खाए बिना बनारस दर्शन अधूरा है. इसी गली में चौखंबा के पास हिंदी के प्रसिद्व साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र का घर हुआ करता था, जो आज भी भारतेंदु भवन के नाम से उपेक्षित पड़ा है. उनके पोते पर पोते आज भी वहां रहते हैं. आज इन्हीं भारतेंदु जी की जयंती है. भारतेंदु जी मुझे बचपन से याद रहे हैं अपने प्रसिद्ध नाटक 'अंधेर नगरी' के कारण. उनका अंधेर नगरी चौपट राजा का मशहूर नाटक हर युग में प्रासंगिक है, जिसमें एक विवेकहीन और निरंकुश शासन व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए राजा को अपने ही कर्मों द्वारा नष्ट होते दिखाया गया है. कहते हैं भारतेंदु ने इसकी रचना बनारस के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक ही दिन में की थी. इस नौजवान ने केवल 35 साल में दुनिया छोड़ दी लेकिन उससे पहले उन्होंने इस देश को एक भाषा दी जिसे आधुनिक हिंदी कहते हैं. क्योंकि उससे पहले हिन्दी अलग अलग बोलियों में बोली और लिखी जाती थी. खड़ी बोली जिसे मैं लिख रहा हूं और आप पढ़ रहे हैं वो भारतेंदु जी की ही देन है. तो आप समझ सकते हैं कि हिंदी में ये कितना बड़ा योगदान है उनका. बचपन में बहुत कम उम्र में माता-पिता के गुजर जाने के बावजूद वे बहुत खुश मिजाज थे. पैसेवाले परिवार के खाते पीते आदमी थे. लेकिन उनमें अंग्रेजों के खिलाफ एक गहरा व्यंग्य और गुस्सा भी था. 1857 की क्रान्ति के बाद तब भारत नया नया ब्रिटेन की रानी के कब्जे में आया था. कोई 1877 का किस्सा है. इंग्लैंड का एक बड़ा अफसर एडवर्ड काशी आया था. काशी के कलेक्टर ने उनसे मिलने के लिए 500 रू की फीस रख दी. ये रकम बहुत ज्यादा थी. उस जमाने में बिजली तो थी नहीं मशाल जलाई जाती थी इसके लिए बाकायदा मशालची होते थे. तो भारतेंदु जी ने अपने मशालची को 500 रू देकर एडवर्ड के पास यह सिखा कर भेजा कि जब उनसे मिलना तो अंग्रेजी में बोलना-आई एम मशालची ऑफ मिस्टर भारतेंदु हरिश्चन्द्र. मशालची अफसर एडवर्ड को यही कह कर लौट आया. एडवर्ड का अहंकार टूट गया और वो मशालची को हैरत से बस देखे जा रहे थे. कलेक्टर शर्म से पानी पानी हो गया.                                                                                                                                                                                                                                                                                                               तो ये कहानी उन लोगों के लिए है जो मुझे कहते हैं- काहें #टेंशन लेकर बैठे हैं.. #मिडिया अपना काम कर रही हैं आप अपना करें.. हर समय आपके अनुसार थोड़ी चलेगी दुनिया.