दयाशंकर शुक्ल सागर

Monday, March 3, 2014

लुगानो यानी स्वर्ग का एक शहर

मेरी यूरोप डायरी-7

लुगानो स्टेशन पर उतरा तो लगा किसी हिल स्टेशन की दोपहर है। हवाओं में खास तरह की ठंडक है। सांस लीजिए तो बर्फ अंदर तक अटक जाती है। वह बर्फ नहीं सिर्फ उसका अहसास है। यूरो रेल का प्लेटफार्म किसी एयरपोर्ट के लाउंच जैसा साफ सुथरा है। बनावट में ये स्टेशन हिन्दुस्तान के किसी सामान्य रेलवे स्टेशन से अलग नहीं है। लेकिन भीड़ भाड़ बिलकुल नहीं। दूर दूर तक बमुश्किल दो चार लोग नजर आ रहे हैँ। चारों तरफ एक अजीब तरह का सन्नाटा पसरा है। कहीं कोई आवाज नहीं शोर नहीं आवाज नहीं। ट्रेन आगे सरक कर धीरे-धीरे आंखों से ओझल हो गई। सामने पहाड़ दिखने लगे।
मैं पलटा तो पीछे अनादि खड़ा था। जैसा कि मैंने बताया था वह यूनिवर्सिटी ऑफ लुगानों से पीजी कर रहा है। शायद कंप्यूटर सांइस में। यहां हास्टल में रहता है नहीं शायद ‌किराए के मकान में। अनादि ने बताया कि यहां मकान महंगे नहीं है। दो तीन स्टूडेंट मिल कर एक फ्लैट ले लेते हैँ। काम चल जाता है। मैं अनादि को वह सामान देता हूं जो उसकी मां ने उसके लिए बहुत प्‍यार से भेजा था।। मालपुआ, गुझिया, मठरी यही सब कुछ होगा उस डिब्बे में।  
हम सीढ़ियों से चढ़कर उसके रूम तक पहुंचते हैं। उसे रूम कहना गलत होगा। यह एक हवादार घर है। खुला खुला सा। सामने शीशे की बड़ी-बड़ी खिड़कियां हैं। और खिड़कियों के उस पार प्राकृतिक सौंदर्य। पर्वत, झरने, नदी, पेड़, हरियाली सब कुछ। उनके इधर इस पार खूबसूरत पुरानी इमारतें, चौड़ी सड़कें, पार्क और सलीके से बसे लोग। अनादि बताता है कि यहां का जीवन कितना शांत और ठहरा हुआ है। लेकिन जिन्दगी ऐसी नहीं है। जिन्दगी झरने से बहती हुई है। अगर आपकी जेब में स्विज फ्रेंस हैं तो सारे ऐश्‍वर्य आपके लिए हैँ। दिलचस्प है कि यूरोप में होने के बावजूद स्वीटजरलैंड में यूरो डालर नहीं चलता। क्योंकि तकनीकी तौर पर स्वीटजरलैंड यूरोपीयन यूनियन का हिस्सा नहीं। पूरे स्वीटजरलैँड में स्विज फ्रेंस नाम की करेंसी चलती है। अनादि अपने आधुनिक किचन में जाकर जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार करता है क्योंकि हमें अभी बाहर घूमने के लिए निकलना है।
 लुगानो स्वीट्जरलैंड का एक मशहूर पर्यटन स्‍थल है। चारों तरफ से पहाडों से घिरा एक खुशनुमा शहर। करीब आधा दर्जन से ज्यादा म्यूजियम और पुरानी ऐतिहासिक इमारतें इस खामोश शहर की पहचान हैं। कैंटोनल डी आर्ट म्यूजियम में बाइबिलिक आर्ट की गजब चित्रकारी हैँ। ओक की लकड़ी पर ये ऑयल पेंटिंग शायद मि‌मलिंग हैंस की है। सूली पर चढ़ाने से पहले ईसा मसीह को जनता के दर्शन के लिए लाया जा रहा है। अद्भुत....पहली सदी के राजनीतिक महौल की एक जीवंत तस्वीर। शायद पन्द्रहवीं सदी की। ऐसी कई और दुर्लभ तस्वीरें हैँ यहां। एक मूर्ति यहां 16वीं सदी के ईसाई संत ऑथानासियुस की है। उनके बारे में एक दिलचस्प किस्सा है। उन्हें जब शहर की एक मशहूर वेश्या से मिलवाया गया तो वह जोर जोर से रोने लगे। पूछा गया कि क्यों रो रहे हैं आप? संत बोले-मुझे दो बातों को लेकर गहरा दुख हुआ। एक तो यह कि इस वेश्या का कोई भविष्य नहीं। और दूसरी बात यह कि मैं ईश्वर को हासिल करने के लिए इतनी कोशिशें नहीं करता जितनी ये और बदचलन मर्दों को खुश करने के लिए करती है। 

लेक लुगानों का खास आकर्षण है। इस झील का विस्तार कई किलोमीटर तक है। लुगानों के पश्चिम में एक टूरिस्ट स्पॉट है गेनड्रिया। बस का ड्राइवर हमें उस पहाड़ी हाईवे पर उतार देता है। हाईवे पर एक तरफ चट्टाने हैं, दूसरी तरफ नीचे बहुत गहराई में लम्बी झील। नीचे नीली झील के किनारे खूब सारे झोपड़नुमा घर बनें हैं। वीकएंड में यहां लोग छुट्टी मनाने आते है। हम झील के किनारे घूम रहे हैं। तस्वीरें खींच रहे हैं। ऊपर हाईवे पर आए तो वापसी की कोई बस नहीं दिख रही। हम पैदल आगे बढ़ते गए। एक टनल के नीचे अकेला पुलिस वाला दोनों तरफ से आने वाली कारों की चेकिंग कर रहा था। यह स्विट्जरलैंड और इटली का बार्डर है। पुलिस वाला बताता है कि इटली में शराब, सिगरेट और मांस सस्ता है। इटली से आने वाला हर वाहन चालक रुककर पुलिसवाले को बताता है कि उसके पास यह सब नहीं है। कार के अंदर सरसरी निगाह डालकर वह उसे जाने देता है। जिस वाहन पर उन्हें शक होता है उन्‍हें किनारे रोक कर वे ठीक से तलाशी लेते हैं। पूरी शालीनता से।  लौटते वक्त हमें कोई बस नहीं मिलती। हम पैदल लुगानों की तरफ बढ़ जाते हैं। इशारा करने पर एक दम्पत्ति अपनी कार रोक देते हैं। पूछते हैं यू आर इंडियन्स? हम हां में सिर हिला देते हैं। हिन्दू ऑर मुस्लिम। हम दोनों एक दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं। अनादि धीमें से हिन्दू बोलता है। और कार का दरवाजा हमारे खुल जाता है और हम आधे घंटे के सफर के बाद लुगानों सिटी पहुंच जाते हैं। अनादि बताता है कि आतंकवाद खासकर 9/11 की घटना के बाद यहां के लोग डरे हुए हैं। यहां कोई पाकिस्तानी या किसी भी मुसलमानों को लिफ्ट नहीं देता। सोच कर अफसोस होता है। चंद अहमक लोग कैसे पूरी कौम को बदनाम कर देते हैं।
जारी

वायलन बजाने वाले भिखारी और काल्विन कालेज

मेरी यूरोप डायरी-5

कल ही तय हो गया था कि आज शहर घूमना है। इलसा तीन दिन से शहर दिखाने के लिए पीछे पड़ी थी। मैं ही लगातार टाल रहा था। सुबह आकर होटल के रिसेप्‍शन पर डेरा डाल दिया। रिेसेप्‍शन से फोन आया कि नीचे इलसा मेरा इंतजार कर रही है। मैँ बस नहा के निकला ही था। घड़ी देखी ठीक दस बज रहे थे। मैं जानता हूं इलसा वक्त की पक्की है। मुझे कई बार लगा कि स्वीट्जरलैंड की सारी घड़ियों में वक्‍त इलसा ही सेट करती है। न एक मिनट इधर न उधर। समय के पाबंद लोगों से मुझे बहुत घबराहट होती है। लगता है कि किसी फौजी कैम्प में हूं। मैं उससे कहता कि तुम जरूर हिटलर के खानदान की होगी। हालांकि वह मूलतः जर्मन है लेकिन हिटलर का नाम सुन कर भड़क जाती। उसे हैरत होती है कि हम हिन्दुस्तानी कितनी सहजता से हिटलर का नाम ले लेते हैं।
मैँ तैयार होकर नीचे आता हूं तो देखता हूं वह गुस्से में बैठी है। सोचता हूं दुनिया की सारी लड़कियां एक जैसा गुस्सा क्यों दिखाती हैं। सफाई देने के बजाए मैं ब्रेकफास्ट के लिए होटेल के रेस्‍त्रां की तरह बढ़ जाता हूं। वह पीछे से अंग्रेजी में कहती है-तुम नहीं सुधरोगे। इलसा  की बेतकल्‍लुफी मुझे पसंद है। कन्वेशन से पहले ही वह भारत में फोन से मेरे सम्पर्क में थी। प्रायोजक संस्‍था ने उसे हमारी देखभाल के लिए नियुक्त किया था। हमउम्र थी इसीलिए औपचारिकताएं बहुत जल्द विदा हो गई थीं। मुझे शहर घुमाना उसके शेड्यूल लिस्ट में नहीं था। लेकिन एक चीज जो हमारे शेड्यूल में पहले दिन ही शामिल हो गई थी वह थी- दोस्ती।
ब्रेकफास्ट के दौरान मैंने उसे दोस्ताना लिहाज में हिदायत दी कि वह मुझसे किसी टुरिस्ट गाइड की तरह बर्ताव न करे। वैसे भी यहां मेरे शरीर की घड़ी का वक्‍त कलाई में बंधी घड़ी से मैच नहीं कर रहा। भोर में चार बजे तो नींद आती है। आधी रात खिड़की से देखता हूं कि सड़क पर क्या तमाशा हो रहा है। मैंने उसे उस रात सड़क पर चल रहा प्रेमी-प्रेमिका के झगड़े का किस्सा सुनाया। वह खूब हंसी। उसे भरोसा नहीं हुआ। उसने कहा-यू आर लायिंग। मैंने कहा-नहीं सच वह लड़की उसे बार-बार छू रही थी और लड़का बार-बार बोल रहा था-डोंट टच मी। वह खूब हंसी और इस हंसी में उसका गुस्सा जाने कहां गिर गया।   

हम टहलते हुए कार्नवीन मेट्रो स्टेशन पहुंचते हैँ। सिर्फ दो सड़कें पार करनी पड़ीं। इसके सामने हमें ट्राम पकड़नी है। इस इंटरचेंज स्टेशन पर हर सुबह वायलन वादकों का झुंड दिखता है। आज भी दिख रहा है। सब के सब लम्बे पुराने ओवर कोट में हैं और हाथ में वायलन है। मैँ इलसा से पूछता हूं ये ढेर सारे वायलन वादक कौन हैं? वह इशारे से कहती है अभी पता चल जाएगा। हम शहर की तरफ जाने वाली ट्राम में बैठ जाते हैं। अंदर से ट्रामें हमारी दिल्ली की मेट्रो जैसी हैं। लेकिन भीड़ भाड़ बिलकुल नहीं है। कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों के बाहर पूरा शहर साफ दिखता है। मैं खिड़की से बाहर देखने लगता हूं। ड्राम में वायलन की एक धुन सुनाई पड़ती है। मुझे पता नहीं चला ये वायलन बजाने वाले कब ट्राम में आ गए। वायलन की धुन सुखद लगती है। लेकिन मैं देखता हूं बाकी यात्री अपने में गुम हैं। थोड़ी देर बाद वह वायलन बजाना बंद करके अपने ओवरकोट की जेब से एक गिलास निकलता है। यात्री उसमें सिक्के डालने लगते हैं। मैं इलसा को बताता हूं-ऐसा मैंने अपने देश में पूर्वांचल और नार्थ ईस्ट की ट्रेनों में खूब देखा है। कभी कोई बांसुरी बजा कर पैसा मांगता है कभी इकतारा बजा कर। वह वायलन वादक मेरे पास आता है। मैं भी अपनी जेब से एक सिक्का निकाल कर उसके गिलास में डाल देता हूं। उस वक्त ध्यान नहीं रहता कि वह सिक्का कितने का था। बाद में याद आया वह स्विज फ्रेंस था। एक यूएस डालर के बराबर। यानी करीब पचास रुपए। ईनाम थोड़ा महंगा हो गया। बाद में सोचता हूं।
किसी भी दूसरे यूरोपीय शहर की तरह जिनेवा शहर को भी हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं। एक नया और दूसरा पुराना। जाहिरी तौर पर पुराना शहर ज्यादा खूबसूरत है। इमारतों में प्राचीन रोमन वास्तु ‌शिल्प दिखता है जो मैंने और भी कई यूरोपीय देशों में देखा है। ये खामोश इमारतें आपको खास तरह से आकर्षित करती हैं। इलसा ने जब मुझे काल्विन कालेज की इमारत दिखाई तो मैं चौंका। एक तन्हा सी खामोश इमारत। मैंने सानिया को बताया कि एक काल्विन कालेज हमारे लखनऊ में भी है। इस बार चौंकने की बारी इलसा की थी। क्योंकि जान काल्विन जिनेवा की रूह हैं। इस शहर को बसाने में और यहां के लोगों में रूहानियत भरने में जॉन काल्विन का बड़ा नाम हैं। वह जिनेवा के आध्यात्मिक गुरु थे जैसे हमारे यहां कभी गौतम बुद्ध या महावीर रहे हों। ऐसे जॉन काल्विन का लखनऊ से भी कोई रिश्ता हो सकता है क्या? मैं मजा ले रहा था। क्योंकि मैं जानता था कि लखनऊ में गोमती नदी के ठीक किनारे 'कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज' की नींव 11 मार्च 1891 को अवध और आगरा प्रान्त के मुख्य आयुक्त सर आक्लैन्ड काल्विन ने रखी थी। तब इस कालेज में केवल रजवाडों और ताल्लुक़ दार के बच्चे ही दाखिला ले सकते थे। इसमें दाखिला लेने की अकेली और आखिरी शर्त थी कि वह राजघराने या किसी ताल्लुकदार का बेटा हो या उनका गोद लिया हुआ हो। यह संस्था विशुद्ध रूप से पैसे वाले बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा दिलाने के लिये स्थापित की गयी थी। लेकिन इलसा अंत तक इस बात पर डटी रही कि ब्रिटिश कमिश्नर आक्लैंड का खानदान कहीं न कहीं से हमारे जॉन काल्विन से जुड़ा होगा। इस बात को न मानने की मेरे पास कोई वजह नहीं थी।
सारा दिन हम शहर में भटकते रहे। इस खूबसूरत शहर के मैं अपनी आंखों में बसा लेना चाहता हूं। बेहद साफ सुथरी सड़कें, खूबसूरत चौराहे, चमचमाती दुकानें और एक से एक खूबसूरत इमारतें। इलसा  मुझे हर इमारत के बारे में बता रही थी। वह बताती है कि जिनेवा का पूरा पुराना शहर हैरिटेज साइट के रूप में घोषित है। यहां ज्यादातर इमारतें 1830 से 1945 के बीच की बनी हैँ। एक इमारत देख कर मैं चौंका था। वह ‌रशियन आर्थोडक्स चर्च है। उसे ये लोग रुस द जिनेवा कहते हैँ। इस इमारत के गुम्बद स्वर्ण के हैँ। इन गुम्बदों के ऊपर क्रास के निशान बने हैं। पता नहीं क्यों ये गुम्बद मुझे अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के गुम्बदों की याद दिला रहे हैँ।
शाम ढलने लगी है। हम थक चुके हैं। सड़क के किनारे बने एक ओपन रेस्‍त्रां में बैठ गए। काफी और कुछ स्नैक्स का आर्डर दिया। मैंने इलसा से पूछा उसके नाम का मतलब क्या है? उसका जवाब था- गॉड आफ माई ओथ। ज्यादातर जर्मन लड़कियों के नाम का यही अर्थ है। वह मुस्कुराने लगी। मैंने कहा- कुछ समझ में नहीं आया-गॉड आफ माई ओथ? क्या मतलब हुआ इसका? उसने मुस्कुराते हुए कहा- By my oath, you can trust me. यानी मेरी कसम तुम मेरा यकीन कर सकते हो। मैं लाजवाब हो जाता हूं।

स्विट्जरलैंड के गांव में एक शाम

मेरी यूरोप डायरी-6

दूर तक फैली आल्पस की पर्वत शृंखला। नीचे लाल खपडैल के बने घर। छतों पर, पेड़ों की बारीक टहनियों पर, रसोई की चिमनियों पर, बिजली के तारों पर हर तरफ बर्फ की हल्की चादर। झरने, झीलें और खुला आसमान। ट्रेन की विशालकाय खिड़कियों से दिख रहे ये अद्भुत नजारे आंखों को यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि हां, ये हकीकत है और आप जन्नत की सैर पर हैं।
जिनेवा में मेरा काम खत्म हो चुका है। मेरे पास चार दिन और बचे हैं। हम लोगों को दैनिक खर्च के लिए 75 यूएस डालर मिलते हैं। पूरे ट्रिप के पैसे एडवांस में मिल गए हैं। मैं हिसाब लगाता हूं मेरी जेब में करीब 700 यूएस डालर हैं। यह बहुत काफी हैं। इस पैसे से मैं यूरोप के कुछ और देश घूम सकता हूं। मैं जानता हूं संजैन वीजा मेरे पास है। इस वीजा पर मुझे कोई रोकेगा नहीं।
मेरे सामने स्वीट्जरलैँड का टूरिस्ट मैप है। इसकी एक सीमा जर्मनी से मिलती है दूसरी फ्रांस से और तीसरी इटली से। इलसा बताती है कि समय के इस बजट में आप सिर्फ एक तरफ निकल सकते हैँ। मैंने इटली जाना तय किया। क्योंकि वह लुगानों के रास्ते में हैं। वहां मेरा रिश्ते का भाई अनादि यूनिवर्सिटी ऑफ लुगानों से पीजी कर रहा है। सबसे पहले मुझे वहीं जाना है। लेकिन घूमते हुए।
 जिनेवा से लुगानों पहुंचने के लिए मुझे स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न, ज्यूरिख पार करते हुए इटली की सीमा तक पहुंचना था। करीब 800 किलोमीटर का सफर। स्विट्जरलैंड घूमने का इससे अच्छा बहाना क्या हो सकता था। एक एयरबैग में दो-तीन दिन के कपड़े भर कर यूरो ट्रेन में सवार हो गया। यूरो रेल अन्तराष्ट्रीय ट्रेन है। ये यूरोप के तमाम देशों को एक दूसरे से जोड़ती है। इसकी रफ्तार कई दफा हवाई जहाज को मात करती है। ट्रेन के अंदर का दृश्य किसी रेस्टोरेंट जैसा है। साफ सुथरा और भीड़ भाड़ से दूर। आपकी चेयर के आगे एक छोटी मेज भी होगी जिस पर आप लैपटाप रखकर अपना काम कर सकते हैँ।
ट्रेन की खिड़की से देखता हूं स्विट्जरलैंड के गांव अब शहर से जुड़े फार्म हाउस में तब्दील हो गए हैं। दीवारें पत्थर की और छतें खपड़ैल की जैसे हमारे देश में होती हैं। हर घर के बाहर कार और गाएं बंधी है। पहचान के लिए गायों पर रंग लगाए गए है। शायद अपने गोरुओं पर पहचान के लिए रंग लगाने की परंपरा करीब-करीब सभी संस्कृतियों में रही है। मेरा पहला ठिकाना मुंड है। इलसा ने मुझे बताया था कि स्‍वीट्जरलैँड की हसीन वादियों में खोना है तो मुंड जरूर रूकना। ये लगभग ग्रामीण इलाका है। समुद्र तल करीब 1200 मीटर ऊपर बसे इस इलाके को यूनेसको ने इसे वल्ड नेचुरल हैरिटेज साइट घोषित किया है।

पहली बार मुंड नाम सुन कर मैँ चौंका था। क्योंकि पुरानी भूली बिसरी स्मृतियों में यह शब्द कुछ जाना पहचाना था। याद आया लखनऊ के हमारे स्कूल में मधुमिता मुंड नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी। उसके पिता शायद फौज में थे। उसके बाल अजीब तरह से घुंघराले थे। वह शायद मुंड जनजाति से थी। ये जनजाति शायद छोटा नागपुर के पास की है। ये लोग झारखण्ड, उडीसा से लेकर पश्चिम बंगाल तक फैले हैँ। महान क्रान्तिकारी बिरसा मुंडा शायद इसी जनजाति से हों। पता नहीं । लेकिन मैंने कभी उससे पूछा नहीं। खैर मुंड स्विट्जरलैँड की एक पुरानी मुंसीपैलटी थी। अब एक छोटा सा कस्बा कह लीजिए। ऊंची पर्वतश्रृंखलाओं के बीच बसा एक मोहक कस्बा। जंगली लकड़ियों के बने पुराने घर। लकड़ियों के रंग वक्त के साथ काले पड़ गए हैं। उनकी ढलानदार छतें उन छतों पर शाख से टूटे पत्ते। मुझे बताया गया कि सर्दी के दिनों में ये ढलानदार छतें सफेद बर्फ की चादर से से ढक जाती हैं। पेडों पर भी बर्फ होती है टहनियों और पत्तियों पर भी। पर इन दिनों बर्फ नहीं है। मौसम साफ और चमकदार है। धूप में गर्माहट है। वर्ना साल के नौ महीने यहां बर्फ रहती है। दूर पहाडी पर बड़ी नोकदार सींगों वाली भेड़े दिख रही हैं। सफेद और काली भेंड़े। उनके शरीर पर लम्बे-लम्बे बाल हैं जो बर्फ से उनकी हिफाजत करते हैं। प्रकृति ने उन्हें यहां जीने लायक बना दिया है।

 मैं आसापास घूम रहा हूं। अकेले। यहां के लोग अंग्रेजी नहीं जानते। सिर्फ जर्मन बोलते हैँ। इसलिए किसी से बातचीत भी संभव नहीं। जिन्दगी में पहली बार ऐसा हुआ कि आप किसी से बात करना चाहते हो पर नहीं कर सकते। अंग्रेजी के सिर्फ कुछ शब्द मदद कर रहे थे। एक सस्ता सा होटल मिल गया। पूरी तरह लकड़ी से बना एक साफ सुथरा होटल।  टूरिस्ट नहीं हैं इसलिए भीड़ भाड़ भी नहीं है। शाम ढल चुकी है। अब क्या करुं? सोचता हूं। होटल के बार में जाकर बैठूं। हां ये विचार दिलचस्प है। बार में हल्की पीली रोशनी है। चारों तरफ बिखरी कुर्सियों पर लोग बैठे हैं। स्‍त्री-पुरुष सब हैँ। बीच में बॉन फायर का इंतजाम है। शायद इसीलिए इस बड़े कमरे में गर्माहट है। मैँ एक मेज के किनारे अपना ग्लास लेकर बैठ जाता हूं। धीमा स्वीज संगीत पूरे वातावरण में तारी है। बाइस साल पुरानी बैलविनी सिंगल माल्ट के साथ अब ये संगीत धीरे धीरे मेरी चेतना पर हावी हो रहा है। जीवन के बारे में सोच रहा हूं और किस्मत के बारे में। कितनी अप्रत्याशित है जिन्दगी। आज यहां स्वीट्जलैंड की अनजान सी जगह मुंड में हूं। फिर स्कूल के दिन याद आते हैं। मधुमिता याद आती है। उसके दोस्त याद आते हैं। अपने दोस्त याद आते हैं। वे दिन कितने मस्त थे। स्कूल कैम्पस में इमली का पेड़ था। हम इमली अपने लिए नहीं तोड़ते थे। वो सारी शरारतें याद आती हैं। होटों पर मुस्कुराहट आ जाती है।     
मैं अपने कमरे में लौट आता हूं। दूर लकड़ी के बने तमाम घरों में रोशनी है। कितनी शांति है चारों तरफ। चांदनी रात में पूरा कस्बा जगमग है। दूर अंधेरे में पहाडों का रंग और स्याह होता जा रहा है। मैं थक गया हूं। अब सोना चाहता हूं।      

Tuesday, February 4, 2014

जिनेवा के रेस्टोरेंट में बम्बई की बिरयानी

मेरी यूरोप डायरी-4

सुबह सो कर उठा तो मौसम साफ था। चमकदार धूप। रात आसपास बर्फबारी हुई इसलिए हवा में गहरी ठंडक है। लेकिन इस ठंडक में वह गलन और तीखापन नहीं जैसा हिन्दुस्तान की सर्दियों में दिखता है। मार्च में एक इनर, कमीज और कोट पहन लीजिए काम चल जाएगा। दस्तानों की जरूरत नहीं पड़ती। 
कल रात भी हवा में ऐसी ही ठंडक थी। सोचा आज होटल में नहीं बाहर डिनर लिया जाए। यूरोपीय खाना भी अजब है। ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में तकरीबन एक सी चीजें होती हैं। ब्रेड, बटर और उबले हुए बिना मसाले के तमाम तरह के गोश्त के व्यंजन। हिन्दुस्तानी रेस्‍त्रां खोजते-खोजते हम पैदल बहुत दूर निकल आए थे। पूछने पर मालूम चला था कि यहां एक सबसे अच्छा हिन्दुस्तानी रेस्टोरेंट है-रेस्टोरेंट बम्बई। और थोड़ी पूछताछ के बाद अब हम इस रेस्टोरेंट के सामने खड़े थे। हमने राहत की सांस ली। टहलते-टहलते भूख भी बढ़ गई थी। इससे ज्यादा खुशी इस बात की थी कि चार दिन बाद हमारी मेज पर जाने पहचाने व्यंजन होंगे। हिन्दुस्तानी सजावट के साथ रेस्टोरंट साफ सुथरा था। मैं रेस्टोरेंट के मैनेजर से बात करने लग तो चौंका। पता चला इस रेस्टोरंट का मालिक पाकिस्तानी है। रेस्टोरंट का नाम बम्बई इसलिए रखा क्योंकि यहां शुरू से हिन्दुस्तानी ज्यादा आते हैँ। पाकिस्तानी मालिक के पूर्वज भी बम्बई से पाकिस्तान जा कर बस गए थे। फिर पाकिस्तान छोड़कर जिनेवा आ गए। मैंने मैनेजर को बताया कि आपको पता है बम्बई अब हिन्दुस्तान से विदा हो गया। अब वहां मुम्बई है। मैँने कहा कि शुक्र है यहां राज ठाकरे का राज नहीं वर्ना रेस्टोरेंट के शीशी वीशे सब टूट गए होते। मैंनेजर हंसने लगा। उसने हैड शैफ को बुलकर हिदायत दी कि वह हमारा खास ख्याल रखे। रेस्टोरेंट में हर तरह के हिन्दुस्तानी व्यंजन मुहैया थे। मैं शाकाहारी नहीं हूं इसलिए विकल्प की कोई कमी नहीं थी।

संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कनवेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (एफसीटीसी) में आज मुझे अपनी रिपार्ट पेश करनी है। भारत की सीमा से लगे पाकिस्तान, भूटान, बंगलादेश और नेपाल की तरफ से होने वाली विदेशी सिगरटों की तस्करी पर। दफ्तर से छुट्टी लेकर करीब एक महीने भारत की सरहदों पर भटका था। तस्वीरों के साथ अच्छी रिपोर्ट तैयार हो गई थी। मेरा काम सिर्फ ये रिपोर्ट तैयार कर एक अन्तराष्ट्रीय संगठन- एफसीआई को देना था। ये एक तरह की स्कालरशिप थी। लेकिन बाद में उन्होंने तय किया कि जिस रिपोर्टर ने रिपोर्ट तैयार की वही इसे यूएन में पेश करे। आनन-फानन में यात्रा की तारीख तय हो गई। ये मेरी पहली विदेश यात्रा थी। बचपन से सुनता आया था कश्मीर भारत का स्वीट्जरलैंड है। कश्मीर जाने का बहुत मन था। पर कभीाछ  जा नहीं पाया। लेकिन उस दिन मेरे मेल के इनबाक्स में टिकट आया तो सीधे स्वीट्जरलैंड का। सच पूछिए तो उस वक्त मुझे ईश्वर के सेंस आफ ह्यूमर पर भी बहुत हंसी आई। पासपोर्ट तो मैंने एक साल पहले तभी बनवा लिया था जब मुझे भूटान जाना था। हालांकि मैं जानता था कि भूटान जाने के लिए आपका काम राशन कार्ड से भी चल जाएगा। वहां कोई भी हिन्दुस्तानी अपना कोई भी पहचान पत्र दिखा कर अराइवल वीजा बनवा सकता है। वहां पासपोर्ट की जरूरत नहीं। स्वीज वीसा लेने मुझे दिल्ली आना पड़ा था। स्वीज अम्बेसी बड़ी शालीनता से वीजा जारी कर दिया। वीजा हाथ में आया तो पता चला ये संजैन वीजा है यानी इस वीजे पर मैं पूरा यूरोप घूम सकता हूं। ये एक रोमांचक अहसास था।
खैर डब्लूएचओ की ये कान्फ्रेंस सीआईसीजी यानी सेंटर इंटरनेशल द कान्फ्रेंस जिनेवा में होनी थी। सेहत को लेकर चिन्तित करीब 250 देशों के प्रतिनिधि यहां इकट्ठा थे। थोड़ी घबराहट थी। पर सिगरेट के अवैध कारोबार पर मेरा पीपीटी तैयार था। सोचने लगा स्वामी विवेकानंद की तरह यहां मैं अपनी बात भाइयों-और बहनों के मशहूर सम्बोधन के साथ शुरू करुँ। पर जल्द ही इस ख्याल पर हंसी आ गई। यहां कोई आध्यात्मिक प्रवचन नही देना था। मुझे मालूम था कि रिपोर्ट पेश करने के बाद हमले शुरू हो जाएंगे। और यही हुआ पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रतिनिधियों ने सवाल उठा दिए। उनका कहना था कि भारत ने उन्हें बदनाम करने के लिए ये रिपोर्ट तैयार कराई है। वह तस्करी की वीडियो रिकार्डिंग पर भी यकीन करने को तैयार नहीं थे। मैँ निराश नहीं था क्योंकि मुझे पहले बता दिया गया था कि ये जरूर होगा। अन्तराष्ट्रीय सम्मेलनों में हर देश अपने आपको पाक साफ बताने की कोशिश करता है। यही वजह है कि अक्सर इन अन्तराष्ट्रीय सम्मेलनों किसी एक बात पर सहमति नहीं बन पाती।

फिर चाहे वह पर्यावरण से जुड़ा कोई मुद्दा हो या स्‍वस्‍थ्य से जुड़ा। दिन भर बहस चली और कोई नतीजा नहीं निकला। निकलना भी नहीं था। बाद में मैंने अपने पाकिस्तानी मित्र से पूछा-क्या यार तुम्हे पता नहीं है कि नेपाल की तरफ से पूरा बार्डर खुला है। तुम लोग सारी खुराफातें करते हो। और अन्तराष्ट्रीय सम्मेलनों में आकर सूफी संत बन जाते हो। वह हंसने लगा। बोला-यार नौकरी भी तो हिफजत करनी है। तुम ठहरे सहाफी जो चाहे सो लिख दो। हम सरकारी मुलाजिम हैं। हमें पहली ट्रेनिंग यही दी जाती है कि अन्तराष्ट्रीय मंच पर हर उस रिपोर्ट की मुखालफत करो जो आपके मुल्क को बदनाम करती हो चाहे वो कितनी सही क्यों न हो। अपने मंत्रालय के अफसर से पूछिए वह भी यही बताएंगे। अब मुझे इस नामुराद मसले ज्यादा डिबेट नहीं करनी थी। मेरा काम खत्म हो चुका था। मेरे सामने दुनिया की सबसे खूबसूरत धरती थी और नीला खुला आसमान था। मेरे सामने असल चुनौती ये थी कि मैं कम से कम वक्त में सात समन्दर पार के इस जहान को अपने भीतर समेट लूं। मेरा जेहन आगे की योजनाएं बनाने में मसरुफ हो गया।    

जारी


Wednesday, January 29, 2014

रावण जैसे मरना नहीं चाहते थे महात्मा

महात्‍मा गांधी का अंतिम दिन-2



बिरला हाउस में गोडसे की सेमी आटोमैटिक पिस्तौल की तीन गोलिया बापू के सीने में धंसी थी। मनु समझ नहीं सकी कि अचानक क्या हुआ। मनु ने नीचे देखा। उसे महात्मा के ‘सफेद वस्त्र पर सुर्ख रंग का
धब्बा फैलता नजर आया।’ बापू के हाथ जो सभा को नमस्कार करने के लिए उठे थे, धीरे - धीरे नीचे आ गये। उनका शिथिल शरीर धीरे से धरा पर लुढ़क गया। मनु की गोद में महात्मा हमेशा के लिए सो गए। उस वक्त शाम के 5 बजकर ठीक 17 मिनट हुए थे। गोली के धमाके से प्रार्थना सभा में भगदड़ मच गई। एक महात्मा का ऐसा दर्दनाक अंत। कोई पत्‍थर दिल इंसान भी इसकी कल्पना नहीं कर सकता था।
लेकिन पुणे का रहने वाला 38 साल का नौजवान नाथूराम गोडसे पत्‍थर ‌दिल रहा होगा।वह आरएसएस का सक्रिय सदस्य था जिसे बाद में जाहिरी तौर पर आरएसएस ने अपना कार्यकर्ता मानने से इंकार कर दिया था। हालांकि नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे ने अंत तक कहा कि उसके पूरे परिवार ने आरएसएस की सदस्यता ले रखी है। नाथूराम की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं थी। उसका असली नाम रामचन्द्र था। रामचन्द्र के जन्म से पहले उसके तीन भाई और एक बहन थी। नाथूराम के पिता पोस्ट आफिस में काम करते थे।उनका नाम विनायक वामनराव गोडसे था। रामचन्द्र के तीनों भाई पांच साल की उम्र से पहले ही चल बसे। पिता विनायक और मां लक्ष्मी को लगता कि अगला बेटा भी नहीं बचेगा। रामचन्द्र का जन्म हुआ तो गोडसे दंपति ने उसे लड़की की तरह पाला। वे उसे लड़कियों के कपड़े पहनाते। विनायक ने उसके लिए एक नथ भी बनवा कर पहना दी थी। उसे सब प्यार से नाथू-नाथू कह कर बुलाने लगे। रामचन्द्र का एक भाई और हुआ। तब जाकर रामचन्द्र को लड़की के रूप में छुटकारा मिला। लेकिन नाथू नाम से नहीं। उसका नाम रामचन्द्र की जगह नाथूराम हो गया। और संयोग देखिए महात्मा की मौत इस रामचन्द्र के हाथों ही लिखी थी।    

मनु को महात्मा के होठों से अंतिम शब्द ‘हे रा...’ सुनाई दिए थे। मनु के अलावा यह शब्द वहां खड़ी हजारों की भीड़ में किसी और ने नहीं सुने। इसलिए महात्मा के अंतिम शब्द ‘हे राम’ ही मान लिए गए। महात्मा की हत्या के बाद पूरे देश में भावुकता का जो माहौल बना था उसमें इस शब्द पर बहस की कोई गुंजाइश भी नहीं थी। महात्मा की समाधि से लेकर संपूर्ण गांधी वाङ्मय तक में ‘हे राम’ का प्रयोग किया गया।
बाद में खुद महात्मा के निजी सचिव प्यारेलाल ने ‘अत्यंत सावधानी और परिश्रमपूर्वक जांच’ करने के बाद नतीजा निकाला कि गांधीजी के मुंह से मूर्च्छित होते समय जो शब्द निकले थे वह ‘हे राम’ नहीं थे।  उन्होंने नए सिरे से खोज शुरू की। कई लोगों से बातचीत की।  और इस नतीजे पर पहुंचे कि बापू के  ‘अंतिम शब्द राम राम थे।’ ‘वह कोई आह्वान नहीं था परंतु सामान्य नाम स्मरण था।’ उन्होंने लिखा - ‘राम राम’ के बजाय ‘हे राम’ कर देना जनता की ऐसी ही भूलों का एक और उदाहरण है जो अंबर के टुकड़ों में घुन की तरह लगकर इतिहास में चिरकाल के लिए अंकित हो जाती हैं।’

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि प्यारेलाल को बापू के कथित अंतिम शब्दों पर संदेह क्यों उठा? वह खुद बापू के प्रिय थे और अंतिम दिनों तक उनके साथ थे। उन्होंने अपनी किताब पूर्णहुति में इसका जिक्र नहीं किया कि उन्होंने बापू के अंतिम शब्दों पर इतनी मेहनत क्यों की? क्या ये इतना जरूरी प्रश्न था?
मैंने गोडसे का कथन भी खोजा। उसका पूरा ध्यान गांधी पर रहा होगा। महात्मा को गोली मारने वाले हत्यारे नाथूराम गोडसे का दावा था कि महात्मा के मुंह से निकलने वाला अंतिम शब्द ‘आह’ था। ‘हे रा...’ या ‘हे राम’ या ‘राम राम’ नहीं। हत्यारे के दावे पर यकीन नहीं किया जा सकता लेकिन मनु के दिमाग में ‘हे रा...’ शब्द यूं ही नहीं आ गया था। महात्मा राम का नाम रटते हुए विदा लेंगे, ये बात उसके अवचेतन में कहीं मौजूद थी।
इस सिलसिले में मैंने महात्मा की पोती मनु की डायरी दोबारा पढ़ी। दिलचस्प संयोग है कि उस दिन भी 30 जनवरी थी। 30 जनवरी 1947। बापू तब मनु के साथ नोआखली के आमकी गांव में थे। ब्रह्मचर्य के प्रयोग पर उठे विवादों के दौरान महात्मा ने मनु से कहा - ‘यदि मैं रोग से मरूं, तो यह मान लेना कि मैं इस पृथ्वी पर दंभी और रावण जैसा राक्षस था। परंतु यदि राम नाम रटते हुए जाऊं तो ही मुझे सच्चा ब्रह्मचारी, सच्चा महात्मा मानना।’ और इत्तेफाक देखिए उसके ठीक एक साल बाद उसी दिन यानी 30 जनवरी, 1948 को महात्मा का देहावसान हुआ। मनु की डायरी ‘एकला चलो रे’ के नाम से पहली बार 1957 में बाजार में आई। यानी बापू की हत्या के नौ साल बाद। वह मनु ही थी जो इस बात का सबसे बेहतर प्रमाण दे सकती थी कि मोहनदास कर्मचंद गांधी वाकई एक ‘सच्चे ब्रह्मचारी और सच्चे महात्मा’ थे। क्योंकि प्रयोग के दौरान उसने नोआखली के जंगलों कई रातें महात्मा के साथ निर्वस्‍त्र सो कर बिताई थीं। और यह प्रमाण उसने 30 जनवरी, 1948 की शाम यह कह कर दे दिए कि महात्मा राम का नाम रटते हुए विदा हुए। निसंदेह उसके अवचेतन में कहीं रहा होगा कि महात्मा गांधी राम का नाम लेते हुए इस दुनिया से विदा होना चाहते थे। हालांकि ये प्रमाण भी महात्मा के ब्रह्मचर्य के प्रयोग की तरह अधूरे थे। मनु ने सिर्फ हे रा.... सुना था। अगर मनु की माने तो महात्मा राम का नाम पूरा नहीं ले पाए थे। मैँ आज भी सोचता हूं कि महात्मा के गले में यह शब्द क्यों
अटक गया? जीवन भर दूसरों को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले महामानव की मौत हिंसा से हुई। महात्मा के जीवन का विरोधाभास उनके अंतिम क्षणों तक उनके सामने खड़ा था।


'महात्मा गांधीः किताब ब्रह्मचर्य के प्रयोग' पुस्तक से

खुद को मुर्दा कहने लगे थे महात्‍मा गांधी

महात्‍मा गांधी का अंतिम दिन-1
 30 जनवरी 1948 को महात्मा की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। गांधीजी पर अध्ययन के दौरान उनके जीवन के कई अनझुए पहलुओं से दो चार हुआ। इस दौरान यह बात भी सामने आई कि महात्मा गांधी के अंतिम शब्द 'हे राम' नहीं थे।  इस प्रसंग को मैंने अपनी किताब 'महात्मा गांधीः किताब ब्रह्मचर्य के प्रयोग' में कलमबंद किया है। किताब आने पर इसे लेकर काफी विवाद भी उठा जिसकी खबरें गुगल पर मौजूद हैं। महात्मा के अंतिम दिनों के बारे में यदि आपके पास कुछ तथ्य हों तो साझा कीजिए। पढ़िए हत्या के दिन का घटनाक्रम-
 
अपनी मौत से एक महीना पहले तक महात्मा अकेले और अलग-थलग पड़ गए थे। इस दौर में उनके निजी सचिव प्यारेलाल ने उन्हें सबसे ज्यादा दुखी पाया। महात्मा ने किसी को पत्र लिखा कि ‘आलीशान भवन में मैं प्रेमी मित्रों के बीच घिरा हूं परंतु मेरे भीतर शांति नहीं है।’ महात्मा के पुराने मित्रों ने उनसे किनारा कर लिया था। उनकी जी हुजूरी में लगे रहने वाले सभी कांग्रेस नेता राजसत्ता की मद में डूब चुके थे। वे उनकी सुनते नहीं थे। महात्मा को डर था कि वह किसी भी दिन उनसे आकर कहेंगे - ‘इस बूढ़े की बात हमने बहुत रखी, अब वह हमें अपना काम क्यों नहीं करने देता।’ उनके रास्ते पर चलने वाले सीमांत गांधी और विनोबा जैसे कुछ संत रह गए थे। महात्मा देख रहे थे कि ‘कांग्रेस के भवन की एक के बाद दूसरी ईंट ढीली होकर गिर रही है। कांग्रेस निस्तेज हो गई है।’ देश सेवा के नाम पर तमाशा चल रहा है। दिल्ली की फैशनपरस्त अमीर औरतें बन - संवर कर निराश्रितों के कैंप में स्वयंसेवा करतीं। महात्मा उन्हें उलाहना देते - ‘निराश्रित कैसे आप का विश्वास और आदर कर सकते हैं। जबकि आप रेशमी साड़ियां पहने इंद्र की परियां बनकर उनके बीच आती हैं।’ वह कहते कि ये आजादी नहीं है। भारत स्वाधीन नहीं हुआ। राजधानी मुर्दों की नगरी दिखाई देती है। हर आदमी दूसरे के खून का प्यासा है। हिंदुस्तानी अपने हिंदुस्तानी भाई से डरता है। इसे आप स्वाधीनता कहेंगे? अपने अंतिम वक्त में महात्मा चिड़चिड़े हो चले थे। बात - बात पर कहते - ‘देखते नहीं मैं अपनी चिता पर बैठा हूं।’ कभी कहते - ‘तुम्हें मालूम होना चाहिए कि एक मुर्दा तुमसे यह कह रहा है।’
30 जनवरी, 1948 को जीवन के अंतिम क्षणों में मनु और आभा महात्मा के साथ थीं। प्रार्थना सभा जाते वक्त महात्मा का हाथ दो नवयुवतियों के कंधे पर था। महात्मा इन लड़कियों से बात कर रहे थे। यह अंतिम बातचीत कुछ इस तरह थी।
आभा ने कहा : ‘बापू आपकी घड़ी को जरूर यह लगता होगा कि आप उसकी परवाह नहीं करते। आप उसकी तरफ देखते ही नहीं।’
मैं क्यों देखूं, जब दोनों मुझे ठीक समय बता देती हो?
दोनों लड़कियों में से एक ने पूछा : ‘लेकिन आप तो समय बताने वाली लड़कियों की तरफ देखते ही नहीं।’ बापू फिर हंसे। प्रार्थना स्थल की सीढ़ियों तक पहुंचते हुए उन्होंने अंतिम बात कही : प्रार्थना में दस मिनट देर से पहुंचा हूं इसमें तुम्हारी गलती है। नर्सों का यह धर्म है कि यदि साक्षात् ईश्वर भी बैठा हो तो भी उन्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यदि किसी मरीज को दवा देने का समय हो और उसमें हिचकिचाहट हो तो मरीज तो मर जाएगा। यहां भी यही बात है। प्रार्थना में एक मिनट भी देर से आने से मुझे तकलीफ होती है।
और तभी नाथू राम गोडसे ने उन पर गोलियां बरसा दीं। जैसा कि बाद में मनु गांधी ने अपने बयान में कहा - ‘प्रार्थना सभा के बीच रस्सियों से घिरे रास्ते से जाते वक्त महात्मा ने जनता के नमस्कारों का जवाब देने के लिए लड़कियों के कंधों से हाथ उठा लिए। एकाएक भीड़ में से कोई भीड़ को चीरता हुआ उनकी ओर आया। मनु गांधी ने सोचा कि वह आदमी गांधीजी के पांव छूने के लिए आगे बढ़ रहा है। इसलिए उसने उसे वैसा करने के लिए झिड़का क्योंकि प्रार्थना को पहले ही देर हो चुकी थी। मनु ने उस आदमी का हाथ पकड़कर उसे रोकने की कोशिश की लेकिन उसने जोर से मनु को धक्का दिया जिससे उसके हाथ की ‘भजनावली’, माला और गांधीजी का पीकदान नीचे गिर गया। ज्यों ही वह बिखरी चीजों को उठाने के लिए झुकी, वह आदमी गांधीजी के बिलकुल सामने खड़ा हो गया और पिस्तौल से जल्दी - जल्दी तीन गोलियां दाग दीं। ‘गांधीजी के मुंह से जो अंतिम शब्द निकले, वे थे ‘हे रा...।’
जारी

Monday, January 27, 2014

लेक दा जिनेवा के किनारे एक शाम

मेरी यूरोप डायरी-3




रात में पहाड़ों पर बर्फ पड़ी थी और नीचे भी। पहाड़ जिनेवा शहर से बस थोड़ी दूरी पर हैं। उसकी बर्फ से ढकी सफेद चादरें साफ दिखती है। हवा में ठंडक बढ़ गई है। बर्फ के कुछ फाहे अभी तक पेड़ों की टहनियों पर अटके हैं। उन घोसलों पर भी बर्फ जमी है जो स्विट्जरलैंड के लोगों ने अपने पक्षियों के रहने के लिए शाखों पर बनाए हैं। चिड़ियों के ये कृत्रिम घरोंदे बहुत सुंदर हैं।  आज कान्फ्रेंस नहीं थी। सुबह होटल के कमरे से तैयार होकर निकला तो पूरे शहर में हैरतनाक ढंग से सन्नाटा पसरा था। इस सन्नाटे की वजह पूछने पर पता चला संडे़ को पूरा स्विट्जरलैंड बंद रहता है। रेस्त्रां को छोड़कर कोई दुकान नहीं खुलती।
दिन में घूमने के लिए हम ‘लेक दा जिनेवा’ की तरफ आ गए हैं। पूरा जिनेवा शहर इस नीली खूबसूरत झील के किनारे बसा है। शहर में आकर ये विश्व प्रसिद्ध झील बड़ी नजाकत से नदी में तबदील हो जाती है। इस नदी के दोनों तरफ 17वीं व 18वीं सदी की खूबसूरत और विशालकाय इमारतें। हर इमारत यूरोपियी वास्तुशिल्प का एक अद्वितीय नमूना है।
 पाकिस्तान दोस्त डॉ. असलम फुआद साथ हैं। कराची में डब्लूएचओ के लिए काम करते हैं। एक और दोस्त प्रणय भी साथ में हैं जो अक्सर जिनेवा आते रहते हैं। करीब 50 किलोमीटर लम्बी इस झील का कहीं छोर नहीं दिखता। किनारे पक्की सड़क बनी है। झील के समानंतर एक अंतहीन पार्क। झील के किनारे बसे इस पार्क में सबकुछ है। पुरानी खूबसूरत इमारतें, म्यूजियम, मूर्तियां, स्क्लपचर सब कुछ। झील के किनारे एक स्विस महिला की पत्थर की मूर्ति है। जो
 घुटने के बल बैठकर पीछे जिनेवा शहर की ऊंची इमारतों की तरफ देख रही है। उस निर्वस्त्र मूर्ति में जरा भी अश्लीलता नहीं दिखती। कोलम्बिया की दो लड़कियां मूर्ति के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाना चाहती हैं। वह कैमरा आगे बढ़ाते हुए फोटो खींचने का आग्रह करती हैं। उनके कैमरे से उनकी फोटो खीचता हूं। उनमें से एक कहती है- आर यू इंडियन? मेरे ‘हां’ कहने का इंतजार किए बिना वह कहती
 हैं-‘नमस्ते’। फिर खिलखिला कर हंसने लगती हैं। गैलेडिया बताती है कि वह हिन्दी फिल्मों की शौकीन है। शाहरुख खान उसे बहुत पसंद है। कोलम्बिया में हिन्दुस्तानी संगीत बहुत पसंद है। खासकर गानों की धुनें। हम आगे बढ़ते हैं। एक स्विज दम्पति अपने नन्हें बच्चों के साथ झील के किनारे बैठे हैं। दूध से सफेद तीन बच्चे। रंग बिरंगे गर्म कपड़ों में तीनों बच्चों की उम्र एक-सी है। शायद दो साल के रहे होंगे।
 दम्पति की इजाजत लेकर हम इन बच्चों की तस्वीरें लेने लगते हैं। उन्हें बताता हूं कि मैं भारत से हूं और डा. असलम पाकिस्तान से। अपने बच्चों के साथ खेलती वह युवती हैरत भरे स्वर में पूछती है-‘यू बोथ ऑर टुगैदर।’ यानी आप दोनों एक साथ। हम बताते हैं कि यही सच है। दूरियां दो मुल्कों में है दिलों में नहीं। उन्हें यह सुनकर अच्छा लगता है। पर उन्हें अभी तक यकीन नहीं कि असलमपाकिस्तानी है।शाम ढलने लगी है। सेहत के लिए फिक्रमंद कई लड़कियां उस शांत पार्क में दौड़ रही हे। एक दूसरे में गुम प्रेमी जोड़े बैंचों पर बैठे हैं। ठंड में वह थोड़ा और सिमट गए हैं। हमें शहर लौटना है। वापसी ‌के लिए सिटी बस पकड़नी है। एक खम्बे पर लगी हरे रंग तख्ती पर बस स्टाप लिखा है। उसी पर एक टाइम टेबिल भी लगा है। इस स्टाप पर अगली बस का वक्त शाम 6.24 मिनट है। मैं घड़ी देखता हूं
 जिस पर मैंने स्विस टाइम सेट किया है। घड़ी ठीक 6.24 बता रही है और तभी सिटी बस स्टाप पर आकर रुक जाती है। हम दंग हैं। एकदम सही टाइमिंग। क्या महज इत्तेफाक है। एक स्‍थानीय मित्र बताते हैं कि नहीं...शहर की हर रेड लाइट पर सेंसर लगे हैँ। इसलिए रेड लाइट बस का साथ देती है। ठीक वक्त पर बस अपने नियत स्टाप पर आकर ब्रेक लगाती है। हम बस में बैठ गए हैँ। दूर से देखता हूं दुकानों की शो विंडों रोशनी से जगमगाने लगे हैं। महंगी स्वीज घड़ियां शो केस में सजी है। एक शो रूम में ऐश्वर्य राय बच्चन का एक आदमकद पोस्टर किसी स्विस घड़ी का प्रचार करता दिख रहा है। दुकानों के दरवाजे तक शीशे के हैं। अंदर की तेज चमकदार रोशनी से लगता है कि हर दुकान खुली है। पर ऐसा नहीं है। दुकानों के अंदर यह रोशनियां हमेशा जलती रहती हैं। चाहे दुकान खुली हो बंद। यानी विंडों शापिंग के लिए चौबीस घंटें का आमंत्रण। अब हम सड़क पर तेजी से झील को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। दूर घुटने के बल बैठी महिला की मूर्ति हमें अब तक देख रही है। उदास निगाहों से। कह रही है अलविदा जिनेवा लेक फिर मिलेंगे कभी इस झील के किनारे।
 जारी