दयाशंकर शुक्ल सागर

Thursday, October 30, 2014

परोपकार का सच


शिमला के जिस घर में मैं रहता हूं उसके आगे की सीधी चढ़ाई है। करीब एक किलोमीटर की सीधी पहाड़ी की चढ़ाई। सड़क सकरी है लेकिन एकदम खड़ी। सीधे ९० डिग्री की चढ़ाई। सुबह ढहलने जाता हूं तो सांस फूलने लगती है। रास्ते में दम भरने के लिए कम से कम तीन ब्रेक लेने पड़ते हैं और फिर सड़क के अंतिम सिरे पर बनी बैंच पर बैठ कर सुस्ताता हूं। जिस मोहल्ले में मैं रहता हूं उसका नाम ओल्ड बीयर खाना है। पहले यहां डाल्टन नाम के किसी अंग्रेज की बियर फैक्ट्री होती थी। इसलिए यह पूरा इलाका डाल्टन स्टेट के नाम से जाना जाता है। फैक्ट्री तो अब उजड़ गई लेकिन यहां के लोग बियरखाना नहीं भूल पाए। मोहल्ले का नाम यही हो गया।
शिमला में आमतौर पर रिटायर और बुजुर्ग लोगों की भरमार है। मैं देखता हूं कैसे रोज तमाम बुजुर्गवार इस सीधी चढ़ाई पर हॉफते कांपते ऊपर चढ़ते हैं। इन्हें देखकर एक अजीब तरह की पीड़ा होती है। एक सुबह दफ्तर के लिए निकला तो देखा कि एक करीब ७० पार की बुजुर्ग महिला सड़क की आधी चढ़ाई चढ़ चुकी थी। सर्द हवा में भी पसीने से तरबतर। वजनी शरीर। वह बुरी तरह हॉफ रही थीं। चाल में लड़कड़ाहट थी शायद उन्हें गठिया था। मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी। लेकिन उनका हाल देखकर मुझे कार रोकनी पड़ गई। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि मैं आगे नहीं बढ़ पाऊंगा। वह समझ गईं कि मैं उन्हें लिफ्ट देना चाहता हूं। वह आगे आईं और मैंने कार का अगला दरवाजा खोल दिया। वह किसी तरह कार में दाखिल हुईं। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे शहर के बाहर हैं और उन्हें चेकअप के लिए अस्पताल जाना था। दफ्तर पहुंचने में देर हो गई लेकिन उन्हें अस्पताल छोड़कर मुझे एक खास तरह के सुख और शांति का अहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे एक बोझ-सा दिल पर था जो उतर गया। अगर मैं ऐसा न करता तो दिन भर परेशान और तकलीफ में रहता। सारा दिन एक अपराध बोध दिमाग पर तारी रहता।  यह कतई परोपकार नहीं था।
बहुत साल पहले मैंने एक कहानी पढ़ी या कहीं सुनी थी। एक साधु के दो शिष्य अंतिम परीक्षा के लिए तीन महीने बाद आश्रम लौटै। साधु ने दोनों से पूछा-इन तीन महीनों में तुमने परोपकार का कौन सा सर्वश्रेष्ठ काम  किया। पहले शिष्य ने बताया कि वह रात में नदी के किनारे गुजर रहा था। मैंने डूबते हुए आदमी की चीख सुनी। चाहता तो आगे बढ़ जाता। कोई देखने वाला नहीं था। नदी का पानी भी ठंडा और बर्फीला था। लेकिन मैं उसे बचा कर बाहर निकाल लाया। साधु ने कहा यह तो कोई परोपकार न हुआ। न बचाते तो जीवन भर उस आदमी की चीख तुम्हारा पीछा करती। तुम्हारी आत्मा तुम्हे कोसती। इससे बचने के लिए तुमने यह कृत किया।      
अब दूसरे शिष्य का नम्बर आया। उसने बताया कि वह जंगल से गुजर रहा था। उसने देखा कि उसका जानी दुश्मन ठीक पहाड़ के किनारे लेटा है। एक करवट लेता और हजारों फीट गहरी खाई में गिरता। मैं जानता था कि बचाने पर वह मुझे गालियां ही देता। फिर भी मैंने उसे बचा लिया। लेकिन जैसा कि मैंने कहा वह मुझे गांव में घूम-घूम कर गालियां ही दे रहा है। सबसे कह रहा है मैं मरने गया था लेकिन इस कम्बखत ने मुझे बचा लिया। पर मुझे संतोष है कि मैंने परोपकार किया। कहानी सुनने के बाद साधु ने कहा तुम्हारा प्रयास पहले से बेहतर है लेकिन परोपकार ये भी हीं क्योंकि तुम अहंकार से भरे हो। जिस कृत से अंहकार निर्मित हो वह परोपकार नहीं हो सकता।
तो जैसा कि मैंने पहले कहा था मैंने जो किया वह कतई परोपकार नहीं था। यह एक पीड़ा से मुक्ति थी। अपनी पीड़ा से मुक्त होने के लिए ही यह नेक काम हुआ। अब मैं अक्सर बुजुर्ग नागरिकों को बिन मांगे लिफ्ट देता हूं। मैं जानता हूं यह कृत मेरे सद्कर्मों के खाते में नहीं जुड़ने वाला। क्योंकि यह कृत्य एक तरह की पीड़ा और अपराधबोध से मुक्त होने के लिए किया जा रहा है। मैं जानता हूं इसमें कोई छद्म अहंकार भी नहीं है। चाहे अनचाहे संस्कारों की गठरी आपको ढोनी ही पड़ती है।



 

Thursday, October 16, 2014

तुम अब तक कहां थे कामरेड


मुझे उन दोस्तों से कतई हमदर्दी है जिन्हें साहित्य में जरा भी दिलचस्पी नहीं। वह नहीं जानते कि जीवन में वह क्या खो रहे हैं। लेखक तो खैर लिखने के लिए अभिशप्त है। वह ता-उम्र शब्दों और कल्पना की उड़ानों से मुक्त नहीं हो पाता। नहीं लिखता फिर भी झटपटाता रहता है। वह पिंजरे में बंद किसी पक्षी की तरह फड़फड़ाता है। कोई पन्द्रह साल पहले एक कथा संग्रह 'कामरेड का कोट' मेरे हाथ लगा था। यह कथा संग्रह सृंजय नाम के किसी लेखक का था। यह कहानी पहली दफा हंस के शायद फ़रवरी, १९८९ अंक में छपी थी। तब इस पर मेरी नजर नहीं पड़ी थी। लेकिन कहानी एकदम से चर्चा में आ गई। यह कहानी आज़ाद भारत में वामपंथ की पोल खोलती है। रूस परस्त कामरेड अपनी सारी बौद्धिकता के बावजूद कैसे जमीनी सच्चाइयों ‌कितनी दूरी बना लेते हैं। कामरेड का कोट हिन्दुस्तानी कम्युनिज्म के खोखलेपन को नंगा करती है। यह कहानी पढ़ कर आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान में कम्युनिज्म का प्रयोग क्यों फेल हो गया?
मुझे याद है एक रूसी लाल कोट को प्रतीक बना कर सृंजय ने कैसे भारत के वामपंथियों को हिला कर रख दिया था। उन दिनों साहि‌त्यिक सम्मेलनों में मैं राजेन्द्र यादव व नामवर जैसे आलोचकों से 'कामरेड का कोट' की तारीफ में कसीदे पढ़ते सुना करता था। लेकिन जितना में अपने कम्युनिस्ट मित्रों को जानता हूं वह इस कहानी के लिए सृंजय को आज तक माफ नहीं कर पाए। हिन्दी साहित्य पर काबिज कम्युनिस्ट लेखकों के गिरोह ने सृंजय जैसे शानदार लेखक को साहित्य से ही बेदखल कर दिया।
मेरी नजर में सृंजय वाकई एक क्रान्तिकारी लेखक हैं। ये उन गिने चुने लेखकों में हैं जिन्हें मैं पढ़ना चाहता हूं लेकिन मेरी बदकिस्मती ये हैं कि अब वह लिखते नहीं। 'कामरेड का कोट' में जब कथा का नायक कमलाकांत उपाध्याय गुस्से में पार्टी के एक बड़े नेता रक्तध्वज से उनका रूसी लाल कोट छीनता है उनके चेहरे के भाव देखने वाले होते हैं। यह वही कामरेड रक्तध्वज थे जो कहते थे "क्रांति के लिए जरूरी है, पहले खुद को डी-क्लास करना।" क्या कामरेड रक्तध्वज खुद 'डी-क्लास' हो पाए थे। सृंजय अपनी इस कालजयी कहानी के क्लाइमेक्स में लिखते हैं-"कमलाकांत ने अट्टहास किया, "ठंड से बचने का एक हथियार है कोट,... आपने कहा था न कॉमरेड! यदि सचमुच जरूरत हुई तो अपने आप हमारे पास हथियार आ जायेगा."
जैसा मैंने पहले कहा मैं सृंजय की कहानियों से बेतरह प्रभावित हूं। मैं इस लेखक उनकी कहानियों के लिए बधाई देना चाहता था। एक इच्छा थी कि उनसे बात करूं। मुझे पता चला कि वह आसनसोल में कहीं रहते हैं। पिछले १५ सालों में कई बार मैंने उनका फोन नम्बर तलाशने की कााशिश की लेकिन निराशा हाथ लगी। जरूर मेरी कोशिश में कहीं कोई कमी रही होगी। क्योंकि मेरा साफ मानना है कि जो आप सचमुच हासिल करना चाहते हैं वह देर सबेर कर ही लेते हैं। अगर नहीं कर पाते तो इसका अर्थ है आपके प्रयास में कहीं कोई कमी है। अभी तीन दिन पहले मैंने अपने पुराने लेखक मित्र व बेहतरीन साहित्यक पत्रिका तत्‍भव के संपादक अखिलेश जी से यूं ही सृंजय जी के बारे में पूछ लिया। उन्होंने बताया कि वह आसनसोल में हैं और शायद वहां बीएसएनएल में काम कर रहे हैं। उन्होंने तत्काल वह नम्बर मुझे एसएमएस कर दिया। और फिर मैंने उन्हें उसी रात फोन किया। पहली बार में फोन नहीं उठा। लेकिन दस मिनट बाद उन्होंने रिंग बैक किया। और इसके बाद आप समझ सकते हैं कि एक गुमनाम पाठक की अपने उस प्रिय लेखक के साथ क्या बातें हुई होंगी जो उन्हें १५ साल से खोज रहा था। लेखक और पाठक के बीच एक दीवार थी जो अब ढह गई। आज मैं सार्वजनिक रूप से सृंजय जी को उनकी कालजयी रचना कामरेड का कोट के लिए एक बार फिर बधाई देता हूं।




Tuesday, October 7, 2014

अच्छे दिन


यूरोप में 100 लोगों का एक इलीट क्लब हुआ करता था। इसमें केवल यूरोप के महान लोग सदस्य बन सकते थे। महान यानी नोबल पुरस्कार विजेता, मशहूर पेंटर, मशहूर लेखक, वैज्ञानिक आदि। इस क्लब की सदस्यता मिलना  वाकई सम्मान की बात थी। क्योंकि इस क्लब में 100 से ज्यादा सदस्य किसी कीमत पर नहीं हो सकते थे। सिर्फ किसी के मरने पर जगह खाली होती थी और उसकी जगह भरने के लिए आमंत्रण भेजा जाता था। एक सदस्य की मौत के बाद नोबल जीतने वाले जार्ज बनार्ड शॉ के पास भी आमंत्रण गया। क्लब ने आमंत्रण पत्र में लिखा कि  अगर आप हमारे क्लब के सदस्य बनते हैं तो यह क्लब गौरवान्वित होगा। मैंने सुना है शॉ ने इस आमंत्रण को ठुकरा दिया। कहा-जो क्लब मेरे आने से गौरवान्वित होता हो उसमें मेरा क्या काम। ऐसा क्लब मेरे लिए तुच्छ है। मैं ऐसे क्लब में शामिल होना चाहूंगा जो मुझे लेने से इंकार करता हो।
अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयार्क टाइम्स में भारत के मंगलयान अभियान का मजाक उड़ाने  वाले कार्टून को देखकर मुझे शॉ से जुड़ी ये घटना याद आ गई। सिंगापुर के कार्टूनिस्ट ने दिखाया है कि इलीट स्पेस क्लब के लोग अखबार में भारत की इस कामयाबी की खबर पढ़ रहे हैं और बाहर भारत का एक गंवई प्रतिनिधि गाय लेकर खड़ा है और दरवाजा खटखटा रहा है। बेशक इरादा भारत का मजाक उड़ाने का है। जिसके लिए अखबार के भले संपादक ने भारतवासियों से माफी भी  मांग ली। लेकिन सच तो यही है कि मंगल पर करोडों डालर फूंक कर पहुंचने वाले देश हमारी इस कामयाबी को हजम नहीं कर पा रहे। मोदी गलत नहीं है कि दुनिया में आज भी हमारे देश की छवि सपरों और तमाशबीनों के देश की है।  लेकिन मेरी तकलीफ इस बात की है कि हमारे देश में ही कई कथित बुद्धिजीवी, महान और इलीट क्लब के लोग हमारी कामयाबियों का मजाक उड़ाते नहीं थकते। फेसबुक पर दीवारें रंगी हुई हैं। विवेकहीनता का भी एक तार्किक आधार होता है। इसलिए मित्रों से निवेदन है कि वह अपनी भावनाओं और भाषा पर नियंत्रण रखें। इंतजार करें और उम्मीद रखें अच्छे दिन जरूर आएंगे। मोदी नहीं ला पाए तो कोई और लाएगा। पर अच्छे दिन जरूर आएंगे।

Thursday, September 18, 2014

आदम की कहानी



  उफ.... इतना काम कि सिर में दर्द शुरू हो गया। अब देर रात फुर्सत मिली है। सोचता हूं हम इंसानों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है जिन्दगी जीने के लिए। आदम और हव्वा की दिलचस्प और प्यारी कहानी कभी कुरान में पढ़ी थी। आज याद आ गई। ये दुनिया, फरिश्तों और हूरों को बनाने के बाद खुदा ने मिट्टी को गूंथ कर अपनी शक्ल का एक पुतला तैयार किया। वह आदम था। फिर आदम की ही बायीं पसली से औरत को बनाया जिसे हव्वा नाम दिया गया। दोनों मजे से जन्नत में रहते थे। न कोई फिक्र न चिन्ता। लेकिन एक दिन शैतान के बहकावे में आकर इन दोनों ने खुदा की आज्ञा का उल्लंघन कर गेहूं खा लिया। (बाइबल में सेब खाने का जिक्र है)। इस गुनाह के लिए खुदा ने उन्हें जमीन पर ला पटका। और शाप दिया कि तुम्हारी औलादें मेहनत करके खाएंगी। अब उसका असर देख रहा हूं। सोचता हूं आदम मियां शैतान के बहकावे में क्यों आ गए होंगे? आप बता सकते हैं?

कल एक मित्र ने पूछा सबको खुदा ने बनाया तो शैतान को किसने बनाया? खुदा ने तो आदम के पहले सिर्फ फरिश्ते ही बनाए थे। एक फरिश्ता इब्लीस नाम का था। कुरआन की कहानी कहती है आदम को बनाने के बाद खुदा ने अपने सभी फरिश्तों से कहा कि मैंने एक नई चीज ईजाद की है। ये आदम है, सभी फरिश्तों इसका सजदा करो। सभी फरिश्तों ने ऐसा किया लेकिन इब्लीस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उसने खुदा से कहा-मैं रोशनी से बना हूं। मैं खुदा के अलावा किसी के आगे सजदा नहीं करुंगा। खुदा ने नाराज होकर इब्लीस को जन्नत से निकाल दिया और जहन्नुम यानी नर्क में भेज दिया। उसी दिन से इब्लीस शैतान बन गया। उसने खुदा से कहा जिस आदम पर तुम्हें इतना नाज है मैं उसकी औलादों को खुदा का आदेश मानने से रोकूंगा। और तब उसने आदम की बीवी हव्वा का अपना पहला निशाना बनाया। और शैतान आज भी छुपकर आदम की औलादों यानी इंसानों को बहका कर ईश्वरीय आदेशों के खिलाफ ले जाने के जतन कर रहा है।
जब तक इंसान है तब तक शैतान भी रहेगा। और हम सबको बहकाएगा। तो बेहतर है कि हम सतर्क रहें। खुदा खैर करे?
दोस्तों ने दिलचस्प सवाल पूछा है कि खुदा ने इब्लीस से ‌मिट्टी के बने आदम का सजदा करने को क्यों कहा? जबकि कुरआन में खुदा के अलावा किसी को सजदा करने की मनाही है।
खुदा ने आदम को शाप जरूर दिया लेकिन उन्हें दुनिया का पहला पैगम्बर बना कर इस धरती पर भेजा। इस्लाम में उन्हें हजरत आदम के नाम से जाना जाता है। बल्कि मैंने देखा कुरआन की शुरूआत ही इसी कहानी से होती है। खुदा ने फारिश्तों से कहा-मैं जमीन पर एक खलीफा बनाने वाला हूं। फरिश्तों ने इस पर एतराज किया। कहा-तुम धरती पर ऐसे लोगों को भेजोगे जो फसाद करें खून बहाएं। खुदा ने फरिश्तों से कहा- मैं वह जानता हूं जो तुम नहीं जानते।  (मैं खुद अब तक नहीं समझ पाया कि खुदा ने ऐसा क्यों कहा था? वह क्या जानते थे? फरिश्तों की आशंका सही थी। यही सब हो रहा है। अगर किसी मित्र के पास इसक प्रसंग की व्याख्या या टीका हो तो कृपया शेयर करें।)
कुरआन में एक और दिलचस्प कथा है। आदम की शुरूआती संतानों से खुदा खुद पहली बार मुखातिब हुए थे। उन्होंने इंसानों से  पूछा-क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूं? यह खुदा का इंसानों को पहला सम्बोधन था। खुदा के बंदों ने जवाब दिया-हां हो, बेशक हमारे पालनहार हो। खुदा ने यह भी साफ किया उन्होंने ऐसा इसलिए पूछा कहीं तुम कयामत के दिन यह न कहने लगो कि हमें तो इस बात की खबर ही नहीं थी।
तो ईश्वर सबका पालनहार है। उसका कोई भी आदेश न मानना एक गुनाह है। इब्लीस के खुदा के आदेश की नाफरमानी की। आसान शब्दों में समझे तो ये पिता का आदेश न मानने जैसा है। इब्लीस को इसकी सजा मिली और सजा आदम-हव्वा को भी मिली जिसने खुदा के आदेश की नाफरमानी कर प्रतिबंधित गेहूं खा लिया था। आदम और हव्वा से नाराज खुदा ने एक शाप और दिया था। कहा था-तुम दोनों धरती पर साथ रहोगे पर एक दूसरे के दुश्मन होगे। आदम ने तौबा की और रहमदिल खुदा ने उसे माफ कर दिया। पर कहा कयामत की मियाद तक तो तुम्हें वहां रहना होगा। 
दरअसल सभी धर्मग्रंथों में इस तरह की कथाएं प्रतीकात्मक होती है। इनमें छोटे किन्तु गहरे संदेश छुपे होते हैं। इन संदेशों को पकड़ना और उन्हें जीवन में उतारना हम इंसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। धर्मग्रंथों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। धर्मग्रंथ और इंसान के बीच आने वाले पंडितों, मौलवियों और पादरियों को एक बार हटा कर देखें। कोई धर्मग्रंथ आपको कभी गुमराह नहीं कर सकता। दुनिया के सारे धर्मग्रंथ हमारे सीधे और सरल पूर्वाजों की कल्पना है। चाहे वह अरब के लोग हों जिन्होंने खुदा के शब्दों की किताब बना कर उस पर अपना ईमान ले आए या हिन्दुस्तान में वैदिक युग के लोग जो इन्द्र से पानी बरसाने के लिए उपासना करते थे। और अपनी गायों के थनों में ईश्वर से दूध मांगते थे।
मैं नासमझ धर्म को ऐसे ही समझने की कोशिश करता हूं।
 


Tuesday, August 26, 2014

अलविदा एटनबरो



जब पहली दफा रिचर्ड एटनबरो की गांधी फिल्म देखी तब मैं करीब 12-13 साल का रहा हूंगा। और सच कहूं तो तब पहली दफा मैं चलते फिरते सिनेमा की ताकत से रूबरू हुआ। फिल्म में महात्मा का किरदार निभाने वाले शख्स बेन किंग्स्ले को देखकर मुझे पक्का यकीन हो गया कि गांधी सचमुच में ऐसे ही रहे होंगे। उनकी तेज चाल, बोलने का लहजा, तीखी निगाहें। मन में कहीं बस गया कि हां चर्चिल का वह अधनंगा फकीर जरूर ऐसा ही रहा होगा। बहुत साल बाद मैंने बेन किंग्स्ले को हालीवुड की बेमिसाल फिल्म 'शिंडलर्स लिस्ट' में एक यहूदी एकाउंटेंट और कारखाने के मैनेजर की भू‌मिका में देखा। तब वह नाजियों के जुल्म के शिकार के रूप में एकदम दूसरा आदमी था। तब मैंने पहली बार जाना की अभियन क्या चीज है। मुझे तब अमिताभ बच्चन से बड़ा हीरो मिल गया था।
लखनऊ के नावेल्टी सिनेमाघर से एटनबरो की गांधी देखने के बाद मैं वह शख्स नहीं था जो साढ़े तीन घंटे पहले था। दिलो दिमाग पर न जाने कितने तूफान चल रहे थे। मुझे अच्छी तरह याद है कि दोपहर बाद घर आ कर मैं आंखें बंद करके लेट गया था। फिल्म का एक एक सीन आंखों के सामने एक बार फिर से चलने लगा था। दक्षिण अफ्रीका के उस गुमनाम स्टेशन पर गांधी को फर्स्ट क्लास से धक्‍का देकर बाहर फेंकना। पखाना साफ करने को लेकर कस्तूरबा धक्के देकर घर से बाहर निकालना, डरते-डरते ब्रिटिश हूकूमत के खिलाफ आपने जीवन की पहली स्पीच देना और अन्त में हे राम।

मैं एटनबरो के बारे में सोचने लगा। कितनी मेहनत की होगी इस फिरंगी आदमी ने। फिर किसी ने मुझे बताया कि यह फिल्म वह पिछले बीस साल से प्लान कर रहे थे। उन्होंने नेहरू तक से इस बारे में बात की थी। वह इंदिरा से भी मिले थे। पर इंदिरा ये फिल्म नहीं देख पाईं। इंदिरा गांधी की मौत उसी साल हुई थी। उनकी मौत भी गांधी की तरह हुई थी। एटनबरो को गांधी बनाने की प्रेरणा लुई फिशर की किताब से मिली थी। सोचता हूं उन्हें गांधी की इस जीवनी में नाटकीयता के वह सारे तत्व आसानी से मिल गए थे जो किसी भी फिल्म के लिए जरूरी होते हैं। फिर उन्होंने किरदार की तलाश की। उन्होंने नसीरूद्दीन को भी गांधी के किरदार के लंदन बुलाया था। वहीं  बेन किंग्स्ले से पहली मुलाकात के बाद ही वह समझ गए कि यह रोल उनके हाथ से गया। फिल्म में नेहरू हों या जिन्ना या फिर कस्तूरबा के रोल में रोहिणी। यह एटनबरो का कमाल था कि उन्होंने मरे हुए लोग एक बार फिर पर्दे पर जिन्दा कर दिया था। कई बार मुझे लग एटनबरो एक बेहतरीन पेंटर हैं जिन्होंने सिनेमा के बिम्बों का इस्तेमाल कर जीवन्त दृश्यों का एक ऐसा एलबम तैयार किया जो एक महान कलाकृति के रूप में दुनिया के सामने आई।

इस फिल्म को देखने के बाद गांधी मेरी जिन्दगी का एक हिस्सा हो गए। मुझे लगा इस आदमी पर जितना भी काम किया जाए वह कम है। तब मैंने गांधी को पढ़ना शुरू किया। और मुझे लगा इस आदमी को एक क्या 100 एटनबरो भी नहीं समझ सकते। हालांकि एटनबरो ने इस फिल्म के शुरू में ही स्वीकार किया है कि ‌किसी भी आदमी की जीवन की कहानी एक ही बार में पूरी तरह नहीं कही जा सकती। एटनबरो सच थे। और तब मैंने महात्मा गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग पर काम शुरू किया। मैंने पाया कि महात्मा एक साथ दो जिन्दगियां जी रहे थे। एक जीवन सार्वजनिक था दूसरा आध्यात्मिक। इन दोनों जीवन में एक चीज समान थी और वह थी जिद। और अपनी जिद मनवाने के लिए वह कभी भी अपने प्राण संकट में डाल सकते थे। इसलिए कोई हैरत की बात नहीं कि फिरंगी उन्हें एक खतरनाक इंसान मानते थे। लेकिन व्यक्ति चाहे कितना महान हो मानवीय पैमाने पर वह अपने जीवन के विरोधाभासों, कमजोरियों और गलतियों से मुक्त नहीं हो सकता। 
एटनबरो नहीं रहे। मैं उनसे कभी नहीं मिला। लेकिन उनके जाने की खबर से कहीं भीतर बहुत दुखी और उदास हूं। आप मुझे दिलासा देने के लिए कह सकते हैं कि शरीर नश्वर है एटनबरो जो पीछे छोड़ गए वह शाश्वत। आप सही हो सकते हैं लेकिन मेरे पास अपनी पीड़ा से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं।

Sunday, August 24, 2014

शुक्रिया दोस्तों


मुझे याद नहीं आता कि आखिरी जन्मदिन मैंने कब मनाया था। मैं हमेशा से इसी ‌सिद्धान्त को मानता आया हूं कि कोई भी जन्मदिन, जन्म की कम और मौत की याद ज्यादा दिलाता है। हम पीछे की तरफ देखते हैं, आगे की तरफ नहीं देखते। हर जन्मदिन का मतलब सिर्फ यह है कि आदमी एक साल और मर गया, जिंदगी का एक साल और कम हुआ। आप कहेंगे ये सोच नकारात्मक है। पर सच तो यही है। ऐसे में मुझे मनोवैज्ञानिक जुंग की बात याद आती है जो कहता था आदमी मौत से इतना घबरा गया है कि उसने मृत्यु को अपने चेतन मन से बाहर कर दिया है। वह भूल कर भी मौत की बात नहीं करता। मौत का ख्याल भी कभी मन में नहीं लाता। इसी डर से शायद हम मृत्यु को बाहर रखते हैं और जन्म को भीतर रखते हैं।
इसलिए कोई हैरत की बात नही कि मनुष्य ने जन्मदिन को उत्सव में बदलने की कला विकसित कर ली। एक ऐसा उत्सव जिसकी पूरी परिकल्पना झूठ पर खड़ी है। फिर भी रात बारह बजे से फेसबुक के इनबाक्स पर जन्मदिन की बधाइयां जिस रफ्तार से गिरनी शुरू हुईं मन का एक कोना कहीं भीग गया। इतने दोस्त और शुभचिन्तक कब बन गए पता ही नहीं चला। यह बेशक एक मीठा अहसास है। इसी मिठास के साथ मैं उन आपने तमाम जाने अनजाने मित्रों को साधुवाद देता हूं जिन्होंने मुझे मेरे जन्मदिन पर शुभकामनाओं के फूल भेंट किए।

पूत के पांव



करीब पन्द्रह साल हो गए। लखनऊ में वह रिपोर्टिंग के शुरूआती दिन थे। तब वह किंग जार्ज मेडिकल कालेज हुआ करता था। हम गांधी वार्ड को नर्क का द्वार कहते थे। वार्ड के मुख्य द्वार से निकलने से पहले आपको अक्सर थोड़ा ठहरना पड़ता था क्योंकि वहां से हर दस मिनट में किसी मरीज की लाश बाहर निकलती दिखती थी। मुझे गांधी वार्ड पर एक लाइव रिपोर्ट तैयार करनी थी। हमारे फोटोग्राफर संदीप रस्तोगी ने भी तब पत्रकारिता की शुरूआत ही की थी। हम दोनों अंदर पहुंचे। रेजिडेंट डाक्टर मरीजों को देख रहे थे। और तभी हमसे बात करते-करते एक रेजिटेंट ने मरीज के बेड पर अपना एक पांव रख दिया। संदीप से तब मेरी सिर्फ आंखों आंखों में बात हुई थी। सीधे फोटो हो नहीं सकती थी। सो वह आगे बढ़ गया और दूसरी तरफ पड़े मरीजों की फोटो खींचने लगा। और वही से घूम कर पीछे से उसने यह तस्वीर ‌क्लिक की।
डॉक्टरी पढाई का पहला कदम मरीज के बिस्तर पर- जगरण में इस हैडिंग से खबर छपी तो अगले दिन हंगामा मच गया। किंग जार्ज के  रेजिडेंट डाक्टरों ने तो जागरण पर हल्ला बोलने की तैयारी कर ली थी। इत्तेफाक से हमारे तेजतर्रार संपादक विनोद शुक्ल को किंग जार्ज मेडिकल कालेज जाना था। उनकी कार पर कहीं जागरण का स्टीकर लगा था। डाक्टरों ने गाड़ी में तोड़फोड़ शुरू कर दी। किसी तरह वह बच कर वापस आए। हमे लगा कि अब गए काम से। विनोद जी के गुस्से से हम सब वाकिफ थे। संदीप तो बेतरह डर गया था। मुझे अपने कमरे में बुलाया। बोले-तुम लोग सुधरोगे नहीं। फिर खूब जोर से हंसे। बोले- मुझे ऐसे ही लड़के चाहिए। अपने जैसे दो तीन लड़के और ले आओ।
संदीप ने १९९९ की ये फोटो आज फेसबुक पर शेयर की तो पुरानी कई यादें ताजा हो गई। संदीप इस फोटो के लिए १५ साल बाद एक बार फिर बधाई।