दयाशंकर शुक्ल सागर

Monday, February 18, 2019

ऐसे लेंगे पाकिस्तान से बदला


आज मुझे इंदिरा याद आ रही हैं। 71 की जंग से पहले पूरी दुनिया इंदिरा के खिलाफ थी। शांतिवादी कबूतरों ने शांति पाठ पढ़ना शुरू कर दिया था जैसे एक वर्ग अब कर रहा है। नवम्बर 71 में इंदिरा अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन से मिली थीं। निक्सन ने साफ चेतावनी दी थी कि अगर भारत पाक पर सैन्य कार्रवाई करता है तो नतीजे खतरनाक होंगे। इंदिरा लौटीं और जंग शुरू हो गई। दो हफ्ते में जंग खत्म हो गई। 90000 पाकिस्तानी सैनिको को युद्धबंदी बना लिया गया था।
राष्ट्रपति निक्सन दुखी था। उसने अपने मुख्य सलाहाकार हेनरी किसिंजर से कहा -हमने उस धूर्त और दुष्ट औरत को चेतावनी थी फिर भी उसने ऐसा किया। क्या हमने उससे कुछ ज्यादा सख्ती से बर्ताव किया था। उस चालक बूढ़ी औरत की बातों में आकर हमने भारी गलती कर दी। दरअसल अमेरिका भारतीय फौज की सैन्य शक्ति का सही आकलन नही कर पाई थी। उनकी रिपोर्ट थी कि भारतीय ऐसे खराब पायलट होते हैं जो बमवर्षक जहाज उड़ा नही सकते। लेकिन वे गलत साबित हुए। तब हमें पाक की अक्ल ठिकाने लगाने के सिर्फ बारह दिन लगे थे। पाक सैनिकों ने रेंगते हुए आत्मसम्पर्ण किया था। यह जग एक नासूर है जिसे पाकिस्तान कभी नहीं भूल पाया।
लेकिन पिछले तीन चार दशकों में से हमारी ना की बहुत उपेक्षा हुई। मनमोहन सरकार ने रक्षा खर्च में जबरदस्त कटौतियां कीं। रक्षा मंत्रायल में बैठे बाबुओं ने अच्छी क्वालटी के जूतों तक के लिए सेना को रुला डाला। सालों साल सैनिकों को ट्रेनिंग के लिए कारतूस तक नहीं दिए गए। मोदी सरकार में सेना पर बजट बढ़ा लेकिन वह भी नाकाफी है।
अब आज की ही घटना को देखें। काफी चीजें साफ हो जाएंगी। कश्मीर में हमारे जवानों ने 32 घंटों के अंदर पुलवामा हमले के तीन आतंकियों को खोज के मार डाला। हमले की घटना के तुरंत बाद ही इस पूरे इलाके को कार्डन आफ कर लिया गया था। इसलिए ये आतंकी पुलवामा से बाहर नहीं निकल पाए। आज की मुठभेड़ में एक मेजर समेत हमारे भी तीन जवान शहीद रहे। यह हैरत की बात थी क्योंकि यह मुठभेड़ सरहद पर नहीं चल रही थी। दूसरी तरफ सिर्फ तीन से पांच आतंकी छुपे थे। सुरक्षा बलों ने पूरे गांव को घेर रखा है। फिर एनकाउंटर में हमारे चार जवान कैसे शहीद हो गए? पता किया तो मालूम चला भोर में धुंध बहुत थी। दो मीटर से ज्याद दृश्यता नहीं थी। हमारी टीम के पास एंटी फॉग बाइनोकुलर टेलीस्कोप तक नहीं थे जिससे धुंध और कोहरे में भी साफ दिखाई देता है। कई और अत्याधुनिक उपकरण नहीं हैं जो दूसरी तरफ मुहैया हैं। सामने से एक घर में छुपे आतंकियों ने अचानक अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी। जिसकी चपेट में ये सब आ गए।
तो आप ऐसे जंग लड़ेंगे। ऐसे पाकिस्तान से बदला लेंगे?



कीजिए हाय हाय क्यूँ




पुलवामा में 40 जवानों की शहादत ने मुझे जरा भी विचलित नही किया। जब मौतें इकठ्ठा होती है तो संख्या बड़ी दिखती है। पिछले करीब चार साल से कश्मीर में औसतन हर हफ्ते एक सैनिक मरता है और उसकी लाश खामोशी से ताबूत में रख कर उसके घर भेज दी जाती है। तब टीवी चैनल सिर्फ टीज़र में खबर निपटा देते है। क्या वे सैनिक सैनिक नही थे। क्या सामूहिकता शहादत को ज्यादा महान बना देती है? जम्मू में रहते मुझे हैरत होती थी कि कोई देश इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है। शांतिकाल में भी बार्डर पर हमारे सैनिक रोज मर रहे हैं और किसी को कोई परवाह नही। लिख लिख कर थक गया और अंत में मैने हथियार डाल दिये।
यकीन मानिए इन मौतों के लिये पाकिस्तान जिम्मेदार नही। दुश्मन से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो आपको कोई नुकसान नही पहुँचायेगा। इसके लिये जिम्मेदार हमारे ही देश की राजनीति है। मोदी की कश्मीर और पाकिस्तान की नीति वही है जो नेहरू की थी और अटल की थी।
केंद्र की तरीबन हर सरकार ने अलगाववादियों को पालने का काम किया है। मंत्रालय में बैठे अफसरों ने समझा रखा है कि कश्मीर को शांत रखना है तो अलगावादियों को मत छेड़ो। जबकि सच ये है कि इन अलगावादियों को आम कश्मीरी भी इज़्ज़त की नज़र से नही देखता।
अब आप देखिये पिछले दो साल से सुप्रीम कोर्ट 35A पर सुनवाई शुरू करने के लिये केंद्र और राज्य सरकार से रिपोर्ट मांग रहा है और सरकार अलगावादियों के दबाव में मंजूरी नही दे रही।
कश्मीर में मैं सैनिक कैम्पों में रहा हूँ। एक सैनिक को अकेले बाजार जाने तक की इजाज़त नही। बिना लोकल पुलिस के वे कोई कार्रवाई नही कर सकते। एक आतंकी की मौत पर लाखों की भीड़ उसके जनाजे में शामिल होती है। यही ग्लैमर देख कर नए आतंकी पैदा होते है। सेना, सीआरपीएफ यहाँ तक कश्मीर पुलिस केंद्र सरकार को लिख चुकी है कि आतंकी की लाश उसके घर वालो को न दी जाए। लेकिन पीएमओ इस फ़ाइल पर आज तक निर्णय नही ले सका।


तो आप देखिये दुःख और ग़म के इस माहौल में भी सब अपने काम कर रहे है। मोदी जी चुनावी रैलियां कर रहे हैं। जेबकतरे उनकी रैलियों में लोगों की जेबें साफ कर रहे हैं। राहुल भी पूरी संजीदगी से विपक्षी दल की भूमिका निभा रहे हैं। तेजस्वी यादव आलीशान बंगला छोड़ कर छोटे सरकारी आवास में शिफ्ट हो रहे हैं। टीवी चैनल वाले टीआरपी टीआरपी खेल रहे है।
ऐसे में ग़ालिब का एक शेर याद आ रहा है

ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ

Wednesday, January 30, 2019

कश्मीर की आजादी का सच

कश्मीर डायरी 7


खूबसूरत पहलगाम में घूमते हुए मैं खच्चर वालों की तरफ निकल आया। मैं जानना चाहता था ये क्या सोचते हैं कश्मीर की आजादी के बारे में। ये कश्मीर का आम इंसान हैं। बिना पढ़े लिखे। मजदूर चरवाहे। सीजन था पर उस दिन टूरिस्ट बिलकुल नहीं थे। सब खाली बैठे थे। मेरे साथ कोई लोकल सूत्र नहीं था। बस मेरा टैक्सी ड्राइवर था जो बारामूला का था। फिर उसी ने खच्चर वालों को कश्मीरी में बताया कि मैं नीचे यानी हिन्दुस्तान से आया हूं। मीडिया से हूं। उनसे बात करना चाहता हूं। और उन सबने मुझे घेर लिया। मैंने उन्हें सहज करने के लिए सामने पड़े पाइप पर बैठे कर बात करने का न्योता दिया। शायद मैं उन्हे ये बताना चाहता था कि मैं उनके बीच का ही एक आदमी हूं। बेशक यह प्रयोग सफल रहा अब वे थोड़ा सहज थे।

मैंने सीधा सवाल पूछा-आजादी, आखिर आपको किससे आजादी चाहिए? सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। फिर एक ने कहा-हिन्दुस्तानी फौज से चाहिए आजादी। मैंने पूछा क्यों? क्या उन्होंने तुम्हें कहीं जाने से रोका। तुम पर अपना हुक्म चलाया? तुम्हारे पैसे छीने? सब चुप थे। फिर एक बोला-वो बड़े जालिम हैं। हमें मारते हैं। हमारी बहू बेटियों गलत नजर रखते हैं। वो कोई बीस-पच्चीस लोग थे। मैंने पूछा-तुम में से कोई एक हो जिसे फौज ने परेशान किया हो? कोई एक? सब फिर एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। हमने वायरल वीडियो देखे हैं। फिर एक बोला-हमारे गांव में एक लड़का है, उसे फौज ने बेवजह पीटा। मैंने कहा-ये नहीं चलेगा। तुम मे से कोई हो तो बताए?

कोई नहीं सामने आया। फिर एक खच्चर वाले उमर ने अपना दुख बताया। उसने कहा कि उसका भाई अनंतनाग डिग्री कालेज में पढ़ता है। उसकी पढ़ाई क खर्च मैं निकालता हूं। उसने मुझसे मोबाइल फोन मांगा था। मैंने सोलह हजार का नया फोन खरीद कर उसे दिया था। लेकिन पत्थेरबाजी में इलजाम में वहां की स्थासनीय पुलिस ने वो फोन छीन ‌लिया और अब लौटा नहीं रहे। मैंने पूछा किस थाने में फोन है। उसने बताया सदर थाने में। मैंने उसका फोन नम्बर लेकर अपनी नोटबुक में लिख लिया और कहा कि दो दिन तुम्हारे भाई को फोन वापस मिल जाएगा। वह खुश हो गया। उसने अपना फोन नम्बर लिखवा दिया। ‌फिर उसके कान में किसी ने कुछ कहा। उमर ने मुझसे कहा कि मैं उसका नम्बर मिटा दूं।

हमें फोन नहीं चाहिए। मैंने पूछा- क्यों? मैं दिलवा दूंगा। मेरी पहचान है वहां। उसने कहा-नहीं वो और दुश्मन हो जाएंगे। कहीं गुस्से में भाई का पर्चा काट दिया तो उसकी जिन्दगी तबाह हो जाएगी। मैंने उसे संतुष्ट करने के लिए उस नम्बर को पेन से काट दिया। पहले मैंने सोचा था कि अनंतनाग के रिपोर्टर से कह कर उसका फोन कश्मीर पुलिस से लौटवा दूंगा। पर सोचा रहने दूं। कहीं सच में उसका भाई मुश्किल में न पड़ जाए। बमुश्किल तीन दिन बाद मैंने उमर को फोन लगा दिया। उससे टूरिस्टों की आमद के बारे में पूछना था। वह मेरी आवाज सुन कर खुश हो गया। बोला पुलिस ने भाई का फोन लौटा दिया, शुक्रिया। अब मैं उससे क्या कहता? इस शुक्रिया का मैं हकदार नहीं। पर मैं कुछ नहीं बोला। मैंने उमर से पूछा कि अब आजादी के बारे में उसका क्या ख्याल है? उधर फोन पर उसने कहा-सर आज बहुत भीड़ है यहां टूरिस्टों की। बस ऐसी ही भीड़ रहे हमें और क्या चाहिए? यही असली आजादी है।

अधिग्रहण विवाद में ही हुआ था बाबरी मस्जिद का विध्वंस




जिस कथित गैर विवादित 67 एकड़ जमीन पर आज परिंदा भी पर नहीं मार सकता वहां मोदी सरकार राम मंदिर निर्माण शुरू करने का सपना देख रही है। ये अर्जी उस सुप्रीम कोर्ट में दी गई जो 2003 में असलम भूरे मामले के फैसले में पहले ही कह चुका है कि, विवादित और गैर-विवादित जमीन अलग करके नहीं देखा जा सकता। सिर पर चुनाव हैं और कुंभ में साधु संत गुस्से में हैं। सो रातों रात चौंकाने वाले फैसले लेने वाली मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के अंदाज में नया दांव खेल दिया है। करीब 26 साल पहले इसी जमीन के अधिग्रहण के खेल में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था। तब यूपी की तत्कालीन कल्याण सरकार राम जन्मभूमि ट्रस्ट को यह जमीन लौटना चाहती थी। जबकि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन था।

इस दांव का एक मकसद तो साफ है। सरकार हिन्दू वोटरों में यह संदेश देना चाह रही है कि हम राममंदिर बनाने के लिए उतने ही उत्सुक हैं जितने की आप। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाथ बांध रखे हैं। संघ परिवार को एक तबका सुनवाई टलने पर पहले से ही सुप्रीम कोर्ट पर लानत मलानत भेज रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी दिखा दिया है कि उसे भी इस मामले में कोई खास दिलचस्पी नहीं है और न खास जल्दबाजी ही है। सुप्रीम कोर्ट में जैसे हजारों मुकदमे लंबित हैं उनमे से एक ये भी है। यह बात सुप्रीम कोर्ट खुलेआम इसके इशारे भी कर रहा है। जैसा कि अयोध्या मामले की इस साल की पहली ही सुनवाई में संविधान पीठ ने कहा- क्या ये अयोध्या विवाद का केस है? और एक सेंकड में सुनवाई खत्म कर अगली तारीख दे दी। यह घटना अगले दिन सारे अखबारों ने रिपोर्ट की।

बेशक ये बात हिन्दुओं के एक वर्ग को चिढ़ा सकती है लेकिन यह सुप्रीम कोर्ट का विशेषाधिकार है कि वह चाहे तो मामले की संजीदगी देखते हुए आधी रात को अपने घर पर अदालत लगा सकता है। मामले की संजीदगी तय करने का विशेषाधिकार भी उसी का है। भारत का जो संविधान सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई करने या बेवजह उसे टालने की छूट देता है वही संविधान केन्द्र सरकार को भी इस बात की छूट देता है कि वह किसी की अधिग्रहित की गई भूमि उसके मालिक को वापस दे दे।

बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद कांग्रेस की तत्कालीन राव सरकार ने 1993 में विवादित जमीन के आसपास की 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। छह दिसम्बर की घटना से सबक लेते हुए ऐसा इसलिए किया गया ताकि विवाद के निपटारे के बाद विवादित जमीन पर कब्जे या उपयोग में कोई बाधा डाल सके। इसमे करीब 42 एकड़ की जमीन अकेले रामजन्म भूमि ट्रस्ट की थी। अधिग्रहण से पहले भी यह जमीन न्यास के पास ही थी लेकिन उसने यहां कभी मंदिर बनाने का इरादा नहीं बनाया क्योंकि ट्रस्ट जानता है कि हिंदू मंदिरों का निर्माण गर्भगृह से शुरू होता है जो फिलहाल उस0.313 एकड़ विवादित जमीन पर है जिस पर अभी सुप्रीम कोर्ट में ठीक से सुनवाई भी नहीं शुरू हुई है। अब ट्रस्ट अगर बाहरी चहारदीवारी से मंदिर निर्माण शुरू करना चाहता है तो बेशक बात अलग हो जाती है। क्योंकि यह हड़बड़ी सरकार को हो सकती है लेकिन ट्रस्ट को नहीं। इसीलिए साधु संत सरकार के इस दांव से बहुत खुश नहीं। खुद रामजन्म भूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास ने कहा कि राम मंदिर वहीं बनेगा जहां रामलला विराजमान हैं। यानी विवादित स्थल पर।

दूसरा सबसे अहम सवाल यह भी है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस अर्जी को स्वीकार करेगा? क्या केन्द्र सरकार गांरटी ले सकती है कि गैर विवादित जमीन उसके मालिकों को लौटने के बाद विवादित जमीन पर कब्जा करने की वैसी कोशिश नहीं होगी जैसे दिसम्बर1992 में हुई थी?



याद रहे कि अधिगृहित जमीन के इसी लेनदेन के विवाद में बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया गया था। तत्कालीन राज्य सरकार ने विवादित इमारत के आसपास की 2.77 एकड़ जमीन को दस जनवरी1991 को अधिग्रहित कर लिया था। यह जमीन राम जन्म भूमि ट्रस्ट को दे दी गई। यह और आसपास की जमीन ट्रस्ट ने अलग अलग लोगों से मंदिर निर्माण के नाम पर खरीदी थी। इस जमीन पर दर्जनों छोटे बड़े मंदिर थे जो श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए जमींदोज कर दिए गए थे। इनमें हनुमानजी का एक प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर भी था जिसे तोड़ दिया गया और हनुमानजी की मूर्ति रातों रात कहीं और भेज दी गई। जमीन समतल इसलिए की जा रही थी ताकि विवादित स्थल तक जाने के रास्ते में कोई रुकावट न हो। ये सब तैयारी देख कर मुस्लिम पक्ष की चिन्ता जायज थी।मुस्लिम पक्ष का कहना था कि सरकार का यह अधिग्रहण अवैध है और उससे भी ज्यादा गलत है अधिगृहित जमीन का कब्जा ट्रस्ट को वापस देना। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में चला गया। हाईकोर्ट ने 3 नवंबर1992 फैसला रिजर्व कर दिया। 6 दिसम्बर1992 को कारसेवा का एलान था। हिंदू संगठन चाहते थे कि फैसला 6 दिसम्बर से पहले आ जाए। ऐसे में फैसला किसी के भी पक्ष में होता तो कारसेवा जायज हो जाती। और संभव है कारसेवकों में ऐसा उन्माद न होता कि वह गुंबद पर चढ़ कर उसे तोड़ने लगते। हाईकोर्ट का फैसला आया लेकिन बाबरी विध्वंस के 5दिन बाद 11 दिसम्बर 1992 को। इसमें हाईकोर्ट ने सरकार के अधिग्रहण के फैसले को गलत ठहरा दिया था। यही फैसला अगर पांच दिन पहले आ गया होता तो अयोध्या में हिंसा न भड़कती। आखिर इस 2.77 एकड़ जमीन पर छह महीने पहले भी शांतिपूर्वक कारसेवा हुई थी। लेकिन जब फैसला आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विवादित ढांचा टूट चुका था। सुरक्षाबलों ने चप्पे चप्पे पर कब्जा कर लिया था। इस कब्जे को स्थायी रूप देने के लिए केन्द्र सरकार ने 0.313 एकड़ के विवादित स्थल के अलावा उसके आसपास की 2.77 एकड़ जमीन ही नहीं बल्कि उसके कहीं आगे बढ़कर 67.7 एकड़ जमीन का बड़ा दायरा अधिग्रहित कर लिया गया। इस अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन 1994 में कोर्ट ने इस अधिग्रहण को वैध ठहराया और आगे भी कई केस में कोर्ट इसे वैध ठहराती रही है।

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद जस का तस है। सुप्रीम कोर्ट में अभी सुनवाई, तारीखें और अंत में अंतिम फैसला आना बाकी है। कोई वजह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट अधिग्रहण हटाने की इस अर्जी पर तुरंत फैसला कर दे। तो ये सारा तमाशा फिर किस लिए?





Tuesday, May 22, 2018

कश्मीर में बिना फौज के आतंक को गहरी शिकस्त दे रहे सैलानी



कश्मीर डायरी 6


श्रीनगर/पहलगाम। कश्मीर में आतंकवाद को अगर कोई ‌शिकस्त दे रहा है तो वे इस देश के बहादुर सैलानी है। आतंकवाद की तमाम घटनाओं के बावजूद कश्मीर की खूबसूरत वादियां हिन्दुस्तान के पर्यटकों को अपनी तरफ खींचती हैं। कश्मीरी ये सच जानता है इसलिए कश्मीरी के लिए सैलानी किसी मसीहा से कम नहीं। उसे खरोंच भी आ जाए तो कश्मीर अंदर तक हिल जाता है। आतंकी ये सच जानते हैं इसलिए वह सैलानियों के रास्ते में कभी नहीं आते। सैलानियों को नुकसान पहुंचा कर वे कश्मीर में एक दिन नहीं टिक सकते। इसीलिए पिछले दिनों पत्‍थरबाजी की चपेट में आए पर्यटक की मौत से पूरा कश्मीर सदमें में आ गया। ऐसे कश्मीर में पहले कभी नहीं हुआ। ये सिर्फ एक इत्तेफाक था।
दरअसल कश्मीर के दो चेहरे हैं। टूरिस्टों के लिए कुछ और सुरक्षाबलों के लिए कुछ और। गर्मियों में हमेशा से ही कश्मीर टूरिस्टों की पहली पसंद रहा है। घाटी की कमाई का अकेला सबसे बड़ा जरिया है। यही वजह है कि कश्मीर के लोग किसी भी पर्यटन स्‍थल से ज्यादा मे‌हमान नवाज और खुशदिल हैं। यहां आतंकियों का निशाना केवल सुरक्षा बल हैं टूरिस्ट नहीं। लेकिन  पत्‍थरबाजी के नए ट्रैंड ने अब सबको डरा दिया है। बीती 7 मई को श्रीनगर से गुलमर्ग जा रहे चेन्नई के सैलानी की पत्‍थरबाजी में चेन्नई मौत हो गई थी। उस दिन बंद की कॉल थी और सड़क के किनारे खड़े पत्‍थरबाजों ने लोकल टैक्सियों को निशाना बनाया। आज भी इस इलाके में सीआरपीएफ लगी है। इलके में सन्नाटा है। घटनास्‍थल से दस कदम की दूरी पर ही पुलिस चौकी है। हमने वहां के एसएचओ से बात की। वह खुद हैरत में थे। बोले-ये सिर्फ एक हादसा था। लड़कों को नहीं पता था कि टैक्सी में टूरिस्ट हैं। ये सब कैसे हो गया किसी को नहीं मालूम। इस घटना से सीमए महबूबा से लेकर डल झील का शिकारे वाला भी सहम गया था।

लेकिन कुछ दिनों सुस्ती के बाद पर्यटन फिर परवान चढ़ने लगा है। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही पर्यटक घाटी की तरफ निकल आए हैं। गुलमर्ग, पहलगाम और श्रीनगर में चहलपहल बढ़ गई है। पहलगाम के होटल लाल कोठी के मैनेजर फयाज अहमद बताते हैं कि ये वकाई टूरिस्टों के लिए हिम्मत का काम है। सारा खौफ तब तक है जब तक आप जवाहर टनल पार नहीं करते। टूरिस्ट हमसे कहते हैं- अनंतनाग से पहलगाम आने की सड़क पर आते ही सारा डर खत्म हो जाता है। वे कहते हैं कि जो एक बार हिम्मत करके कश्मीर आ गया, उसके सारे भ्रम टूट जाते हैं। वह फिर आता है और अपने साथ नए टूरिस्ट लाता है।
हमारी पहलगाम के खच्चरवालों से भी बात हुई। उमर खच्चरों से सैलानियों को पहलगाम से कश्मीर वैली, वॉटर फॉल, टूलियन लेक घुमाता है। मुम्बई और बंगाल के टूरिस्ट आए हुए हैं। दूसरे खच्चर वाले इमरान ने अपना नाम मजाक में आतंकी टाइगर की तर्ज पर इमरान टाइगर रख लिया है। वह कहता है पहलगाम अमन का शहर है, यहां कभी कुछ नहीं होता।
श्रीनगर की डल झील में शिकारा चलाने वाले सलीम कहते हैं -“ये डल लेक श्रीनगर की तारीख का गवाह रही है। चाहे कितने बुरे हालात हो जाएं ये लेक टूरिस्टों को अपने पास बुला लेती है। ऐसे रहमदिल टूरिस्टों पर पत्‍थर फेंकने वाले कश्मीरी नहीं हो सकते।” 

श्रीनगर और कश्मीर में हमारी जितने भी टूरिस्टों से बात हुई उन सबका कहना था कि कश्मीर को जितना डरावना दिखाया जाता है उतना है नहीं। सब यहां की मेहमान नवाजी की तारीफ करते हैं और यहां अगले साल फिर आना चाहते हैं।


हम सबसे कहेंगे कश्मीर आओ
श्रीनगर। महाराष्ट्र थाणे से आए दस परिवारों का ग्रुप कश्मीर के पर्यटन के सच की पूरी कहानी बयान करता है। थाणे के हरीश ने कश्मीर घूमने का प्लान अप्रैल में बनाया था। 7 मई को पत्‍‌थरबाजी में एक टूरिस्ट की मौत हो गई इसके बाद की कहानी खुद हरीश भाई की जुबानी सुनिए- “यहां आने से पहले लोगों ने बहुत सवाल उठाए साहब। टूरिस्ट की मौत की खबर सुनकर सब हिल गए। आधे लोगों ने तो कहा हमारा टूर कैंसिल कर दो। हम नहीं जाएंगे। लेकिन मैंने सबको कन्विंस किया। मैंने कहा हम गारंटी लेते हैं कुछ नहीं होगा। मेरे साथ मेरी वाइफ भी है। हम गारंटी लेते हैं। लेकिन सब पेरेंटस हैं। सबके साथ चार से चौदह साल के बच्चे हैं। सब बहुत टेंस थे, बहुत टेंस थे। फिर सब मेरे पर भरोसा कर के यहां आए।”
“फिर आपको यहां आकर अब कैसा लग रहा है ‍?” हमारे श्रीनगर संवाददाता अमृतपाल सिंह बाली ने जब ये सवाल हरीश भाई से पूछा तो उन्होंने गहरी सांस ली-“एकदम सेफ। सब कह रहे हैं मुम्बई में चैनल वाले कश्मीर के बारे में इतनी गलत न्यूज क्यों चला रहे हैं? यहां तो ऐसा कुछ नहीं दिख रहा।”
अंत में हरीश कहते हैं-“अफवाहे मत फैलाओ, लोगों को इस जन्नत में आने दो। यहां हर सड़क को मिलेट्री ने कवर कर रखा है। लोकल लोग इतने अच्छे हैं। सबको आने दो। ”
मुम्बई से आई शांति मुम्बई से आई हैं। कहती हैं कि हमें बहुत डराया गया। प्लीज डोंट गो। वहां टेरेरिस्ट हैं। इट्स नाट सेफ। लेकिन हम फिर भी आए। हम बहुत खुश हैं यहां आकर। ये सचमुच जन्नत है। यहां के लोग बहुत फ्रेंडली हैं।
गुजरात से आए राजीव भाई पहलगाम में घूम रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं कि यहां आने पर डर नहीं लगा। लेकिन सोचा देखें होता है वहां। पर यहां आके लगा कि डरने की कोई बात नहीं है।






राजनीतिक दगाबाजी से बिगड़ते चले गए कश्मीर के हालात


कश्मीर लाइव रिपोर्ट-5




अनंतनाग। अचानक क्या हुआ कि हालात इस कदर बिगड़ गए? इधर दो साल में घाटी में आतंकी गतिविधियां एकदम से बढ़ गईं। पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा की हमेशा से कोशिश थी कि कश्मीर में आतंक की कमान स्थानीय हाथों में हो। उन्होंने कश्मीरी युवाओं को बहका कर अपने संगठन में शामिल कर लिया। आपरेशन ऑल आउट की कार्रवाई में सबसे ज्यादा कश्मीरी आतंकी शिकार हुए। इसका सबसे डरावना असर ये हुआ कि लोगों ने सड़क पत्थर उठा लिए। इस सबके लिए नेशनल कांफ्रेंस महबूबा सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है, जबकि पीपल डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का कहना है कि इस पत्थरबाजी के पीछे नेशनल कांफ्रेंस हैं, और कोई नहीं।
अनंतनाग कस्बे की एक पुरानी कोठी में होमशाली बुग से नेकां विधायक अब्दुल माजिद लारमी खिड़की के किनारे कुर्सी पर बाकायदा पालथी मार के बैठे हैं।  उनके घर पर न कोई सुरक्षा गारद है, न उनके नाम का कोई बोर्ड। आमतौर पर दक्षिण कश्मीर मुफ्ती परिवार का इलाका माना जाता है। महबूबा का विधानसभा क्षेत्र अनंतनाग सर्वाधिक प्रभावित जिले शोपियां और पुलवामा से सटा है। महबूबा इस पूरे इलाके से लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं। फिर भी लारमी ने उनके गढ़ में सेंध लगाई।
लारमी कहते हैं कि, ‘विधानसभा चुनाव से पहले महबूबा की पार्टी ने भाजपा के विरोध की सारी हदें पार कर दी थीं। जनता से वादा किया था कि वह भाजपा को जवाहर टनल पार नहीं करने देगी। चुनाव के बाद वही पार्टी भाजपा से गठबंधन कर उसे ससम्मान श्रीनगर तक ले आई। ऐसा पहली बार हुआ जब जम्मू कश्मीर की हुकूमत भाजपा के हाथ में आई। ये वोटरों के लिए एक बड़ा धोखा था।’
लारमी कहते हैं रियासत में पत्थरबाजी पीडीपी की देन है।  जब उमर अब्दुल्ला की सरकार थी तो पब्लिक को पत्थरबाजी पीडीपी ने ही सिखाई थी। हमने लारमी से पूछा कि ‘पीडीपी कहती है कि अब आप के लोग पत्थरबाजी कर रहे हैं ताकि सरकार बदनाम हो, अस्थिर हो।’ जवाब में वे कहते हैं. ‘ये सफेद झूठ है।’ काफी देर इधर-उधर की बातें होती रहीं। हमने उनसे फिर पूछा. ‘आप अपने दिल पर हाथ रख कर कह सकते हैं कि इस पत्थरबाजी में आपका कोई हाथ नहीं।’ लारमी बोले, ‘दिल पे नहीं मैं कुरान पे हाथ रख कर कह सकता हूं कि इस पत्थरबाजी के पीछे हमारा कोई हाथ नहीं है। आप इन्क्वायरी करा लीजिए, अगर नेशनल कान्फ्रेंस का नाम आया तो मैं इस पार्टी को अभी छोड़ दूंगा।’

पीडीपी भी इस बात से इंकार नहीं करती कि घाटी के लोग भाजपा से हाथ मिलाने से नाराज हैं। कश्मीर के पीडीपी प्रवक्ता रफी मीर कहते हैं कि ये सच है कि 2014 के चुनाव में हमने भाजपा के खिलाफ  वोट मांगा था। लेकिन हालात ऐसे बन गए कि हमें भाजपा के साथ सरकार बनानी पड़ी। हमने जम्मू के जनादेश का सम्मान किया ताकि जम्मू-कश्मीर में खाई और न बढ़े। फिर दिल्ली में मोदी की सरकार थी। हमें लगा गठबंधन हुआ तो हम कश्मीर का मसला सुलझा लेंगे। फिर दिक्कत कहां है?  इस सवाल के जवाब में मीर कहते हैं कि इन सब चीजों में वक्त लगता है।

मोदी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे: भट
गुस्से का असली शिकार शोपियां के पीडीपी विधायक मोहम्मद यूसुफ  भट को बनना पड़ा।  हाल में ही उनके घर ग्रेनेड से हमला हुआ। भट कहते हैं कि हमने इस उम्मीद से मोदी का साथ दिया था कि वह कश्मीर के मसले को सुलझाएंगे। पर ये नहीं हुआ। शोपियां के जो लोग मेरे घर की इबादत करते थे, उन्होंने मेरा घर जला दिया।  ये राजनीतिक मसला है, परवो इसे लॉ एंड आर्डर का मसला मानते हैं। उन्हें पाक से बात करनी चाहिए। हुर्रियत नेताओं से बात कर मसला सुलझाना चाहिए। हमने पूछा, ‘लेकिन आपकी नेता महबूबा कहती हैं कि मोदी जी उनकी किसी बात से इंकार नहीं करते? इस पर भट बोले-फिर वे पाकिस्तान से बात क्यों नहीं कर रहे? जबकि महबूबा कई बार ये बात उठा चुकी हैं। पर पाकिस्तान भी तो बात करने को तैयार हो? इस सवाल का भट कोई जवाब नहीं दे पाए।