दयाशंकर शुक्ल सागर

Thursday, January 8, 2015

द मैसेज



 मैं बहुत धार्मिक आदमी नहीं हूं लेकिन मेरा साफ मानना है कि किसी की धाार्मिक भावनाओं का मजाक उड़ाना ठीक नहीं। लेकिन इसका कतई ये मतलब नहीं कि आप किसी अखबार या पत्रिका के दफ्तर पर हमला कर दें। ये जहालत है। अगर आप अपनी धार्मिक या किसी भी तरह की भावना पर काबू नहीं रख सकते है तो यकीन जानिए आप निहायत कमजर्फ इंसान हैं।
इस्लाम में मुहम्मद साहब की तस्वीर बनाना गुनाह है। पेरिस में मीडिया हाउस पर हुए हमले के सिलसिले में मुझे याद आता है कई साल पहले मैंने एक फिल्म देखी-द मैसेज। इस्लाम की शुरूआत कैसे हुई इस पर इससे बेहतरीन फिल्म आज तक नहीं बनी। फिल्म पैगम्बर मुहम्मद साहब पर है। लेकिन पूरी फिल्म में वह कहीं नहीं दिखते। डायरेक्टर मुस्तफा अक्कद ने इस बात का ख्याल रखा कि मुहम्मद साहब की तस्वीर न दिखे। वह इसमें कामयाब हुए। इस फिल्म का एक दृश्य मुझे भूलता नहीं। पैगम्बर साहब मदीने का बसा रहे थे। पहली बार नमाज के लिए गांव वालों को बुलाया जाना था। कैसे सबको बुलाया जाए। तो पैगम्बर ने अजान के लिए हब्‍शी बिलाल को चुना क्योंकि उसका गला सुरीला था। बिलाल की आवाज में जादू था। उसकी आवाज कान से सीधा दिल की गहराइयों में उतर जाती थी। फिल्म में अजान सुन कर मैं भी अंदर तक सिहर गया। जिस दुनिया में काले हब्शियों को जानवर से बद्तर समझा जाता हो उसमें इस्लाम ने बिलाल को हजरत का दर्जा दिया। तब मैं समझा क्यों इस्लाम इतनी तेजी से दुनिया में फैल गया।
मुझे यह जानकर हैरत हुई कि मुहम्मद साहब पर ईमान रखने वाले मेरे तमाम दोस्तों ने यह बेहतरीन फिल्म नहीं देखी थी। कितने ही दोस्तों को मैंने यह फिल्म बांटी। और फिल्म देखने के बाद भावुक होकर मेरे तमाम दोस्तों ने मेरे हाथ को चूम कर शुक्रिया अदा किया।
मेरे कहने का मतलब ये है कि अभिव्यक्ति का एक तरीका यह भी है। ‌अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं कि आप मुहम्मद साहब को अपनी पत्रिका का अतिथि संपदाक बना कर उनका कार्टून पहले पेज पर छापें। या टाललेट पेपर पर किसी धर्म का मजाक उड़ाएं।

Friday, November 14, 2014

शिमला को नफरत करते थे नेहरू


नेहरू की पहचान एक संवेदनशील राजनेता की रही है। उनका खुद का जीवन ऐशो आराम में बीता लेकिन गरीबों के प्रति उनमें बेपनाह हमदर्दी थी। खास तौर से बच्चों के लिए उनके मन में बहुत प्यार था। मुझे यह जानकर सुखद हैरानी हुई कि पीठ पर लादने वाले स्कूली बैग की शुरूआत की पहल नेहरू के प्रयासों से हुई। उस जमाने में बच्चे भारी बस्ते बगल में या आगे की तरफ लाद कर स्कूल जाते थे। जिससे उनकी कमर वक्त से पहले झुक जाती थी। वह चाहते थे बच्चे किताबों का बोझ लाद कर झुके हुए न चलें बल्कि सीधे सीना तान कर चलें। तो पिट्ठु बैग स्कूलों में लाजमी कर दिए गए। यह बच्चों को उनकी तरफ से दिया गया सबसे बड़ा तोहफा था। इसलिए उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाने का चलन बेहद समझदारी भरा कहा जा सकता है।
पहाडों के प्रति नेहरू में गजब का आकर्षण था। वह उन ब्रिटिश हुक्मरानों जैसे थे जिनका मन गर्मियों में पहाडों की तरफ भागता था। वह हिमाचल के कई पहाडी इलाकों में घूमते। अपने विदेशी दोस्तों को यहां के पहाड़ घुमाते। हिमाचल में मनाली उनकी पसंददीदा जगह थी। लेकिन कहते हैं शिमला उन्हें पसंद नहीं था। इसकी सबसे बड़ी वजह वह कुली थे जो रिक्‍शे पर सवारियां बैठाकर उन्हें अपने हाथों से खींचते थे। १९४५ में माल रोड पर खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ टहलते हुए उन्होंने देखा कि कैसे वही कुली ब्रिटिश राज में भी अपने रिक्‍शों पर तिरंगा लगा कर घूमते थे। पटेल की इन रिक्‍शों माल रोड घूमने की तस्वीरें हैं। लेकिन नेहरू खुद कभी इन रिक्‍शों पर नहीं बैठे। इस प्रथा को नेहरू मानवीय प्रतिष्ठा के लिए बेहद अपमानजनक मानते थे। शिमला को नापसंद करने का सिर्फ यही अकेला कारण नहीं था। उन्हें लगता कि यह शहर अंग्रेजों की नकल पर एक कस्बे की तरह बसा है। अपनी किताब लास्ट डेज आफ द ब्रिटिश राज में लियोनार्ड मोसले ने शिमला के प्रति नेहरू की वितृष्‍णा का जिक्र किया है। वायसराय ने तय किया था कि भारत पाकिस्तान के बीच बंटवारे की अंतिम बातचीत शिमला में होगी। वे १९४७ की गर्मियों के दिन थे। वायसराय लेडी माउंटबेटन को लेकर कुछ दिन पहले शिमला आ गए थे।  वह अपने साथ कोई ३५० नौकर चाकर लाए थे। शिमला की ठंडी और ताजा हवा उनमें एक खास तरह की ऊर्जा भर देती थी। ८ मई को पंडित नेहरू भी अपने खास सलाहकार कृष्‍ण मेनन के साथ वायसराय के मेहमान बन गए।
उन दिनों का जिक्र करते हुए लियोनार्ड ने लिखा-शिमला की शाम की तरह राजनीतिक संभावनाएं भी सुहानी लग रही थीं। पहाड़ की गोद में छिपे पगडंडी के रास्ते पर कैम्पबेल-जॉनसन के घर जाते हुए नेहरू ने वायसराय और उनकी पत्नी का साथ दिया। नेहरू का दिल खुला हुआ था। नेहरू ने साथ चलने वालों को बताया कि पहाडों पर चढ़ाई के वक्त किस तरह सांस और शक्ति में तालमेल बैठकर उसके अपव्यय को रोका जाता है। बच्चों के साथ वह कूदते रहे, बंदरों की तरह उछल कूद कर हंसते रहे। वायसराय भवन लौटते वक्त शिमला को देखकर उनके चेहरे पर सिर्फ एक वितृष्‍णा आई। 
बेशक ये आजादी के पहले का शिमला था।  अंग्रेजों के जाने के साथ कई बुरी प्रथाएं उनके साथ चली गईं। कई अच्छी चीजें रह गईं जो अब तक बरकरार हैं। शिमला एक खूबसूरत शहर था और है। इसकी हवा में वैसी ही ठंडक और ताजगी अब तक आप महसूस कर सकते हैं। यही वजह है कि यह आज भी हिन्दुस्तानियों का सबसे पसंदीदा हिल स्टेशन है। नेहरू की इस १२५वीं जयंती पर उन्हें याद करके हम अहद ले सकते हैं कि हम शिमला के गौरव को बरकरार रखें और यहां ऐसी कोई परम्परा शुरू न होने दें जिसे लेकर किसी के मन में वितृष्‍णा जन्म ले।


Wednesday, November 12, 2014

आचार्य कृपलानी, महात्मा और मोदी


कल सुबह मोबाइल पर मुझे मोदी का एक ट्विट मिला जिसमें उन्होंने आचार्य कृपलानी के जन्मदिन पर बधाई दी गई थी। मुझे लगा मोदी अपने एजेंडे पर बखूबी काम रह रहे हैं। उन पुराने भूले बिसरे दिग्गज नेताओं को अपने खेमे में बड़े शातिर ढंग से जोड़ रहे हैं जिन्हें खुद कांग्रेस बेदखल कर चुकी है। महात्मा पर काम करते वक्त मेरा आचार्य कृपलानी से पहला परिचय हुआ था। इस आदमी ने मुझे बेतरह हैरान किया। मुझे मालूम चला कि गांधीजी ने तो कई बच्चे पैदा करने के बाद ब्रह्मचर्य लिया और फिर भी जीवन के अंतिम क्षणों तक ब्रह्मचर्य से जूझते रहे। लेकिन आचार्य ने अपने शादी शुदा जीवन के पहले दिन से न सिर्फ ब्रह्मचर्य धारण किया बल्कि उसे मरते दम तक निभाया। कृपलानी और उनकी पत्नी सुचेता के वैवाहिक संबंधों पर तमाम तरह के तंज कसे गए। लेकिन निष्काम प्रेम नाम की कोई चीज हो सकती है यह कृपलानी और सुचेता ने साबित किया। उस जमाने में कांग्रेस में उनका बहुत सम्मान था। यहां तक गांधी भी उनसे घबराते थे। मैंने अपनी किताब महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग में गांधी और आचार्य कृपलानी के संबंधों पर काफी लिखा।
अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोग में महात्मा जब चारों तरफ से ‌घिर गए तो उन्होंने एक पत्र आचार्य को लिखा था। तब आचार्य कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। यह महात्मा का नितान्त व्यक्तिगत पत्र था जो शोध के दौरान मेरे हाथ लगा। इसमें महात्मा ने स्वीकार करते हुए लिखा-मेरी पोती मनु गांधी, जिसे हम सगा संबंध मानते हैं, मेरे साथ सोती है बिलकुल मेरी सगी की तरह। लेकिन ऐसा दैहिक सुख देने के लिए नहीं बल्कि जो चीज शायद मेरा अंतिम यज्ञ हो सकती है, उसके अंग के रूप में। फिर महात्मा ने इस बारे में विस्तार से लिखा कि कैसे उनके तमाम करीबी मित्र उनके इस प्रयोग को शंका की निगाह से देख रहे हैं।
इसके जवाब में आचार्य ने महात्मा को जो खत लिखा वह वकाई एक दस्तावेज है। जवाब लम्बा है लेकिन उनकी अंतिम पंक्ति में उन्होंने लिखा-...मेरा विश्वास है कि जब तक आपमें मुझे पागलपन और विकृति के लक्षण नहीं दिखाई देते तब तक आपके विषय में मेरा भ्रम कभी दूर नहीं होगा। लेकिन ऐसे लक्षण मुझे आप में दिखाई नहीं देते।
आप सोचिए गांधी को ऐसे दो टूक लिखने वाला व्यक्ति किस मिट्टी का बना होगा। इसलिए ऐसे व्यक्ति का जन्मदिन दिन याद रखकर ट्विट पर पूरे देश को बधाई संदेश भेजने वाला इंसान कितनी दूर की सूझ और समझ रखता होगा। ऐसे ही कोई चाय बेचने वाला शख्स दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री नहीं बन जाता? क्या ख्याल है?


Thursday, October 30, 2014

परोपकार का सच


शिमला के जिस घर में मैं रहता हूं उसके आगे की सीधी चढ़ाई है। करीब एक किलोमीटर की सीधी पहाड़ी की चढ़ाई। सड़क सकरी है लेकिन एकदम खड़ी। सीधे ९० डिग्री की चढ़ाई। सुबह ढहलने जाता हूं तो सांस फूलने लगती है। रास्ते में दम भरने के लिए कम से कम तीन ब्रेक लेने पड़ते हैं और फिर सड़क के अंतिम सिरे पर बनी बैंच पर बैठ कर सुस्ताता हूं। जिस मोहल्ले में मैं रहता हूं उसका नाम ओल्ड बीयर खाना है। पहले यहां डाल्टन नाम के किसी अंग्रेज की बियर फैक्ट्री होती थी। इसलिए यह पूरा इलाका डाल्टन स्टेट के नाम से जाना जाता है। फैक्ट्री तो अब उजड़ गई लेकिन यहां के लोग बियरखाना नहीं भूल पाए। मोहल्ले का नाम यही हो गया।
शिमला में आमतौर पर रिटायर और बुजुर्ग लोगों की भरमार है। मैं देखता हूं कैसे रोज तमाम बुजुर्गवार इस सीधी चढ़ाई पर हॉफते कांपते ऊपर चढ़ते हैं। इन्हें देखकर एक अजीब तरह की पीड़ा होती है। एक सुबह दफ्तर के लिए निकला तो देखा कि एक करीब ७० पार की बुजुर्ग महिला सड़क की आधी चढ़ाई चढ़ चुकी थी। सर्द हवा में भी पसीने से तरबतर। वजनी शरीर। वह बुरी तरह हॉफ रही थीं। चाल में लड़कड़ाहट थी शायद उन्हें गठिया था। मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी। लेकिन उनका हाल देखकर मुझे कार रोकनी पड़ गई। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि मैं आगे नहीं बढ़ पाऊंगा। वह समझ गईं कि मैं उन्हें लिफ्ट देना चाहता हूं। वह आगे आईं और मैंने कार का अगला दरवाजा खोल दिया। वह किसी तरह कार में दाखिल हुईं। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे शहर के बाहर हैं और उन्हें चेकअप के लिए अस्पताल जाना था। दफ्तर पहुंचने में देर हो गई लेकिन उन्हें अस्पताल छोड़कर मुझे एक खास तरह के सुख और शांति का अहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे एक बोझ-सा दिल पर था जो उतर गया। अगर मैं ऐसा न करता तो दिन भर परेशान और तकलीफ में रहता। सारा दिन एक अपराध बोध दिमाग पर तारी रहता।  यह कतई परोपकार नहीं था।
बहुत साल पहले मैंने एक कहानी पढ़ी या कहीं सुनी थी। एक साधु के दो शिष्य अंतिम परीक्षा के लिए तीन महीने बाद आश्रम लौटै। साधु ने दोनों से पूछा-इन तीन महीनों में तुमने परोपकार का कौन सा सर्वश्रेष्ठ काम  किया। पहले शिष्य ने बताया कि वह रात में नदी के किनारे गुजर रहा था। मैंने डूबते हुए आदमी की चीख सुनी। चाहता तो आगे बढ़ जाता। कोई देखने वाला नहीं था। नदी का पानी भी ठंडा और बर्फीला था। लेकिन मैं उसे बचा कर बाहर निकाल लाया। साधु ने कहा यह तो कोई परोपकार न हुआ। न बचाते तो जीवन भर उस आदमी की चीख तुम्हारा पीछा करती। तुम्हारी आत्मा तुम्हे कोसती। इससे बचने के लिए तुमने यह कृत किया।      
अब दूसरे शिष्य का नम्बर आया। उसने बताया कि वह जंगल से गुजर रहा था। उसने देखा कि उसका जानी दुश्मन ठीक पहाड़ के किनारे लेटा है। एक करवट लेता और हजारों फीट गहरी खाई में गिरता। मैं जानता था कि बचाने पर वह मुझे गालियां ही देता। फिर भी मैंने उसे बचा लिया। लेकिन जैसा कि मैंने कहा वह मुझे गांव में घूम-घूम कर गालियां ही दे रहा है। सबसे कह रहा है मैं मरने गया था लेकिन इस कम्बखत ने मुझे बचा लिया। पर मुझे संतोष है कि मैंने परोपकार किया। कहानी सुनने के बाद साधु ने कहा तुम्हारा प्रयास पहले से बेहतर है लेकिन परोपकार ये भी हीं क्योंकि तुम अहंकार से भरे हो। जिस कृत से अंहकार निर्मित हो वह परोपकार नहीं हो सकता।
तो जैसा कि मैंने पहले कहा था मैंने जो किया वह कतई परोपकार नहीं था। यह एक पीड़ा से मुक्ति थी। अपनी पीड़ा से मुक्त होने के लिए ही यह नेक काम हुआ। अब मैं अक्सर बुजुर्ग नागरिकों को बिन मांगे लिफ्ट देता हूं। मैं जानता हूं यह कृत मेरे सद्कर्मों के खाते में नहीं जुड़ने वाला। क्योंकि यह कृत्य एक तरह की पीड़ा और अपराधबोध से मुक्त होने के लिए किया जा रहा है। मैं जानता हूं इसमें कोई छद्म अहंकार भी नहीं है। चाहे अनचाहे संस्कारों की गठरी आपको ढोनी ही पड़ती है।



 

Thursday, October 16, 2014

तुम अब तक कहां थे कामरेड


मुझे उन दोस्तों से कतई हमदर्दी है जिन्हें साहित्य में जरा भी दिलचस्पी नहीं। वह नहीं जानते कि जीवन में वह क्या खो रहे हैं। लेखक तो खैर लिखने के लिए अभिशप्त है। वह ता-उम्र शब्दों और कल्पना की उड़ानों से मुक्त नहीं हो पाता। नहीं लिखता फिर भी झटपटाता रहता है। वह पिंजरे में बंद किसी पक्षी की तरह फड़फड़ाता है। कोई पन्द्रह साल पहले एक कथा संग्रह 'कामरेड का कोट' मेरे हाथ लगा था। यह कथा संग्रह सृंजय नाम के किसी लेखक का था। यह कहानी पहली दफा हंस के शायद फ़रवरी, १९८९ अंक में छपी थी। तब इस पर मेरी नजर नहीं पड़ी थी। लेकिन कहानी एकदम से चर्चा में आ गई। यह कहानी आज़ाद भारत में वामपंथ की पोल खोलती है। रूस परस्त कामरेड अपनी सारी बौद्धिकता के बावजूद कैसे जमीनी सच्चाइयों ‌कितनी दूरी बना लेते हैं। कामरेड का कोट हिन्दुस्तानी कम्युनिज्म के खोखलेपन को नंगा करती है। यह कहानी पढ़ कर आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि हिन्दुस्तान में कम्युनिज्म का प्रयोग क्यों फेल हो गया?
मुझे याद है एक रूसी लाल कोट को प्रतीक बना कर सृंजय ने कैसे भारत के वामपंथियों को हिला कर रख दिया था। उन दिनों साहि‌त्यिक सम्मेलनों में मैं राजेन्द्र यादव व नामवर जैसे आलोचकों से 'कामरेड का कोट' की तारीफ में कसीदे पढ़ते सुना करता था। लेकिन जितना में अपने कम्युनिस्ट मित्रों को जानता हूं वह इस कहानी के लिए सृंजय को आज तक माफ नहीं कर पाए। हिन्दी साहित्य पर काबिज कम्युनिस्ट लेखकों के गिरोह ने सृंजय जैसे शानदार लेखक को साहित्य से ही बेदखल कर दिया।
मेरी नजर में सृंजय वाकई एक क्रान्तिकारी लेखक हैं। ये उन गिने चुने लेखकों में हैं जिन्हें मैं पढ़ना चाहता हूं लेकिन मेरी बदकिस्मती ये हैं कि अब वह लिखते नहीं। 'कामरेड का कोट' में जब कथा का नायक कमलाकांत उपाध्याय गुस्से में पार्टी के एक बड़े नेता रक्तध्वज से उनका रूसी लाल कोट छीनता है उनके चेहरे के भाव देखने वाले होते हैं। यह वही कामरेड रक्तध्वज थे जो कहते थे "क्रांति के लिए जरूरी है, पहले खुद को डी-क्लास करना।" क्या कामरेड रक्तध्वज खुद 'डी-क्लास' हो पाए थे। सृंजय अपनी इस कालजयी कहानी के क्लाइमेक्स में लिखते हैं-"कमलाकांत ने अट्टहास किया, "ठंड से बचने का एक हथियार है कोट,... आपने कहा था न कॉमरेड! यदि सचमुच जरूरत हुई तो अपने आप हमारे पास हथियार आ जायेगा."
जैसा मैंने पहले कहा मैं सृंजय की कहानियों से बेतरह प्रभावित हूं। मैं इस लेखक उनकी कहानियों के लिए बधाई देना चाहता था। एक इच्छा थी कि उनसे बात करूं। मुझे पता चला कि वह आसनसोल में कहीं रहते हैं। पिछले १५ सालों में कई बार मैंने उनका फोन नम्बर तलाशने की कााशिश की लेकिन निराशा हाथ लगी। जरूर मेरी कोशिश में कहीं कोई कमी रही होगी। क्योंकि मेरा साफ मानना है कि जो आप सचमुच हासिल करना चाहते हैं वह देर सबेर कर ही लेते हैं। अगर नहीं कर पाते तो इसका अर्थ है आपके प्रयास में कहीं कोई कमी है। अभी तीन दिन पहले मैंने अपने पुराने लेखक मित्र व बेहतरीन साहित्यक पत्रिका तत्‍भव के संपादक अखिलेश जी से यूं ही सृंजय जी के बारे में पूछ लिया। उन्होंने बताया कि वह आसनसोल में हैं और शायद वहां बीएसएनएल में काम कर रहे हैं। उन्होंने तत्काल वह नम्बर मुझे एसएमएस कर दिया। और फिर मैंने उन्हें उसी रात फोन किया। पहली बार में फोन नहीं उठा। लेकिन दस मिनट बाद उन्होंने रिंग बैक किया। और इसके बाद आप समझ सकते हैं कि एक गुमनाम पाठक की अपने उस प्रिय लेखक के साथ क्या बातें हुई होंगी जो उन्हें १५ साल से खोज रहा था। लेखक और पाठक के बीच एक दीवार थी जो अब ढह गई। आज मैं सार्वजनिक रूप से सृंजय जी को उनकी कालजयी रचना कामरेड का कोट के लिए एक बार फिर बधाई देता हूं।




Tuesday, October 7, 2014

अच्छे दिन


यूरोप में 100 लोगों का एक इलीट क्लब हुआ करता था। इसमें केवल यूरोप के महान लोग सदस्य बन सकते थे। महान यानी नोबल पुरस्कार विजेता, मशहूर पेंटर, मशहूर लेखक, वैज्ञानिक आदि। इस क्लब की सदस्यता मिलना  वाकई सम्मान की बात थी। क्योंकि इस क्लब में 100 से ज्यादा सदस्य किसी कीमत पर नहीं हो सकते थे। सिर्फ किसी के मरने पर जगह खाली होती थी और उसकी जगह भरने के लिए आमंत्रण भेजा जाता था। एक सदस्य की मौत के बाद नोबल जीतने वाले जार्ज बनार्ड शॉ के पास भी आमंत्रण गया। क्लब ने आमंत्रण पत्र में लिखा कि  अगर आप हमारे क्लब के सदस्य बनते हैं तो यह क्लब गौरवान्वित होगा। मैंने सुना है शॉ ने इस आमंत्रण को ठुकरा दिया। कहा-जो क्लब मेरे आने से गौरवान्वित होता हो उसमें मेरा क्या काम। ऐसा क्लब मेरे लिए तुच्छ है। मैं ऐसे क्लब में शामिल होना चाहूंगा जो मुझे लेने से इंकार करता हो।
अमेरिका के प्रतिष्ठित अखबार न्यूयार्क टाइम्स में भारत के मंगलयान अभियान का मजाक उड़ाने  वाले कार्टून को देखकर मुझे शॉ से जुड़ी ये घटना याद आ गई। सिंगापुर के कार्टूनिस्ट ने दिखाया है कि इलीट स्पेस क्लब के लोग अखबार में भारत की इस कामयाबी की खबर पढ़ रहे हैं और बाहर भारत का एक गंवई प्रतिनिधि गाय लेकर खड़ा है और दरवाजा खटखटा रहा है। बेशक इरादा भारत का मजाक उड़ाने का है। जिसके लिए अखबार के भले संपादक ने भारतवासियों से माफी भी  मांग ली। लेकिन सच तो यही है कि मंगल पर करोडों डालर फूंक कर पहुंचने वाले देश हमारी इस कामयाबी को हजम नहीं कर पा रहे। मोदी गलत नहीं है कि दुनिया में आज भी हमारे देश की छवि सपरों और तमाशबीनों के देश की है।  लेकिन मेरी तकलीफ इस बात की है कि हमारे देश में ही कई कथित बुद्धिजीवी, महान और इलीट क्लब के लोग हमारी कामयाबियों का मजाक उड़ाते नहीं थकते। फेसबुक पर दीवारें रंगी हुई हैं। विवेकहीनता का भी एक तार्किक आधार होता है। इसलिए मित्रों से निवेदन है कि वह अपनी भावनाओं और भाषा पर नियंत्रण रखें। इंतजार करें और उम्मीद रखें अच्छे दिन जरूर आएंगे। मोदी नहीं ला पाए तो कोई और लाएगा। पर अच्छे दिन जरूर आएंगे।

Thursday, September 18, 2014

आदम की कहानी



  उफ.... इतना काम कि सिर में दर्द शुरू हो गया। अब देर रात फुर्सत मिली है। सोचता हूं हम इंसानों को कितनी मेहनत करनी पड़ती है जिन्दगी जीने के लिए। आदम और हव्वा की दिलचस्प और प्यारी कहानी कभी कुरान में पढ़ी थी। आज याद आ गई। ये दुनिया, फरिश्तों और हूरों को बनाने के बाद खुदा ने मिट्टी को गूंथ कर अपनी शक्ल का एक पुतला तैयार किया। वह आदम था। फिर आदम की ही बायीं पसली से औरत को बनाया जिसे हव्वा नाम दिया गया। दोनों मजे से जन्नत में रहते थे। न कोई फिक्र न चिन्ता। लेकिन एक दिन शैतान के बहकावे में आकर इन दोनों ने खुदा की आज्ञा का उल्लंघन कर गेहूं खा लिया। (बाइबल में सेब खाने का जिक्र है)। इस गुनाह के लिए खुदा ने उन्हें जमीन पर ला पटका। और शाप दिया कि तुम्हारी औलादें मेहनत करके खाएंगी। अब उसका असर देख रहा हूं। सोचता हूं आदम मियां शैतान के बहकावे में क्यों आ गए होंगे? आप बता सकते हैं?

कल एक मित्र ने पूछा सबको खुदा ने बनाया तो शैतान को किसने बनाया? खुदा ने तो आदम के पहले सिर्फ फरिश्ते ही बनाए थे। एक फरिश्ता इब्लीस नाम का था। कुरआन की कहानी कहती है आदम को बनाने के बाद खुदा ने अपने सभी फरिश्तों से कहा कि मैंने एक नई चीज ईजाद की है। ये आदम है, सभी फरिश्तों इसका सजदा करो। सभी फरिश्तों ने ऐसा किया लेकिन इब्लीस ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। उसने खुदा से कहा-मैं रोशनी से बना हूं। मैं खुदा के अलावा किसी के आगे सजदा नहीं करुंगा। खुदा ने नाराज होकर इब्लीस को जन्नत से निकाल दिया और जहन्नुम यानी नर्क में भेज दिया। उसी दिन से इब्लीस शैतान बन गया। उसने खुदा से कहा जिस आदम पर तुम्हें इतना नाज है मैं उसकी औलादों को खुदा का आदेश मानने से रोकूंगा। और तब उसने आदम की बीवी हव्वा का अपना पहला निशाना बनाया। और शैतान आज भी छुपकर आदम की औलादों यानी इंसानों को बहका कर ईश्वरीय आदेशों के खिलाफ ले जाने के जतन कर रहा है।
जब तक इंसान है तब तक शैतान भी रहेगा। और हम सबको बहकाएगा। तो बेहतर है कि हम सतर्क रहें। खुदा खैर करे?
दोस्तों ने दिलचस्प सवाल पूछा है कि खुदा ने इब्लीस से ‌मिट्टी के बने आदम का सजदा करने को क्यों कहा? जबकि कुरआन में खुदा के अलावा किसी को सजदा करने की मनाही है।
खुदा ने आदम को शाप जरूर दिया लेकिन उन्हें दुनिया का पहला पैगम्बर बना कर इस धरती पर भेजा। इस्लाम में उन्हें हजरत आदम के नाम से जाना जाता है। बल्कि मैंने देखा कुरआन की शुरूआत ही इसी कहानी से होती है। खुदा ने फारिश्तों से कहा-मैं जमीन पर एक खलीफा बनाने वाला हूं। फरिश्तों ने इस पर एतराज किया। कहा-तुम धरती पर ऐसे लोगों को भेजोगे जो फसाद करें खून बहाएं। खुदा ने फरिश्तों से कहा- मैं वह जानता हूं जो तुम नहीं जानते।  (मैं खुद अब तक नहीं समझ पाया कि खुदा ने ऐसा क्यों कहा था? वह क्या जानते थे? फरिश्तों की आशंका सही थी। यही सब हो रहा है। अगर किसी मित्र के पास इसक प्रसंग की व्याख्या या टीका हो तो कृपया शेयर करें।)
कुरआन में एक और दिलचस्प कथा है। आदम की शुरूआती संतानों से खुदा खुद पहली बार मुखातिब हुए थे। उन्होंने इंसानों से  पूछा-क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूं? यह खुदा का इंसानों को पहला सम्बोधन था। खुदा के बंदों ने जवाब दिया-हां हो, बेशक हमारे पालनहार हो। खुदा ने यह भी साफ किया उन्होंने ऐसा इसलिए पूछा कहीं तुम कयामत के दिन यह न कहने लगो कि हमें तो इस बात की खबर ही नहीं थी।
तो ईश्वर सबका पालनहार है। उसका कोई भी आदेश न मानना एक गुनाह है। इब्लीस के खुदा के आदेश की नाफरमानी की। आसान शब्दों में समझे तो ये पिता का आदेश न मानने जैसा है। इब्लीस को इसकी सजा मिली और सजा आदम-हव्वा को भी मिली जिसने खुदा के आदेश की नाफरमानी कर प्रतिबंधित गेहूं खा लिया था। आदम और हव्वा से नाराज खुदा ने एक शाप और दिया था। कहा था-तुम दोनों धरती पर साथ रहोगे पर एक दूसरे के दुश्मन होगे। आदम ने तौबा की और रहमदिल खुदा ने उसे माफ कर दिया। पर कहा कयामत की मियाद तक तो तुम्हें वहां रहना होगा। 
दरअसल सभी धर्मग्रंथों में इस तरह की कथाएं प्रतीकात्मक होती है। इनमें छोटे किन्तु गहरे संदेश छुपे होते हैं। इन संदेशों को पकड़ना और उन्हें जीवन में उतारना हम इंसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। धर्मग्रंथों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। धर्मग्रंथ और इंसान के बीच आने वाले पंडितों, मौलवियों और पादरियों को एक बार हटा कर देखें। कोई धर्मग्रंथ आपको कभी गुमराह नहीं कर सकता। दुनिया के सारे धर्मग्रंथ हमारे सीधे और सरल पूर्वाजों की कल्पना है। चाहे वह अरब के लोग हों जिन्होंने खुदा के शब्दों की किताब बना कर उस पर अपना ईमान ले आए या हिन्दुस्तान में वैदिक युग के लोग जो इन्द्र से पानी बरसाने के लिए उपासना करते थे। और अपनी गायों के थनों में ईश्वर से दूध मांगते थे।
मैं नासमझ धर्म को ऐसे ही समझने की कोशिश करता हूं।