दयाशंकर शुक्ल सागर

Friday, March 13, 2015

गांधी अंग्रेजों के एजेंट थे, कोई शक ?


और जैसा कि उम्मीद थी। सब काटजू के पीछे पड़ गए। काटजू साहब के मैं निजी तौर पर जानता हूं। इलाहाबाद में उनसे दो बार की मुलाकात है। बहुत मस्त इंसान हैं। कोई भरोसा नहीं कब क्या बोल दें। जजों की मर्यादा उनमें कभी नहीं  दिखी। कई बार सोचता था वह अपने चैम्बर में कैसे बर्ताव करते होंगे। वैसे मैं उनके पिता का ज्यादा बड़ा मुरीद हूं। बहुत बड़े ‌विद्धान थे। 20सवी सदी के शुरू में इलाहाबाद के अक्षय वट पर उन्होंने बहुत शोधपूर्ण काम किया है। खैर यहां बात महात्मा की है। मैं कह सकता हूं गांधी पर मेरा सामान्य लोगों से ज्यादा अध्ययन है। गांधी पर अध्ययन करते वक्त इस सिलसिले में कई चौंकाने वाले तथ्य मेरे सामने आए। अपनी पुस्तक ब्रह्मचर्य के प्रयोग के कुछ अंश शेयर कर रहा हूं। इन्हें पढ़कर शायद आप काटजू की बात समझ सकें।    
अहमदाबाद मजदूरों की लड़ाई के बाद गांधीजी खेड़ा के किसानों के आंदोलन में कूद पड़े। किसान लगान माफी का संघर्ष कर रहे थे। इस आंदोलन की बागडोर गांधीजी ने संभाल ली। लेकिन इस समय दुनिया के आसमान पर विश्वयुद्ध के बादल मंडरा रहे थे। पहला विश्वयुद्ध उसी समय शुरू हो गया जब गांधीजी इंग्लैंड होते हुए हिंदुस्तान लौट रहे थे। इंग्लैंड लड़ाई में फंसा था। भारत के आंदोलनकारी अपनी शर्तों के साथ विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ देने के लिए तैयार थे। लेकिन गांधीजी इस विचार के सख्त खिलाफ थे। उन्हें लगता कि राजभक्ति दिखाने का यह बेहतर अवसर है। राजा संकट में है इसलिए प्रजा मदद करे। भले राजा ने अपनी इस प्रजा को गुलामी की जंजीरों में जकड़ रखा हो। गांधीजी को थोड़ा जानने वालों को उस समय और हैरत हुई जब अहिंसा के व्रत से बंधे इस आदमी को उन्होंने सेना में भर्ती होने की अपील करते सुना। अंग्रेजों को पांच लाख भारतीय रंगरुट चाहिए थे। वाइसराय ने युद्ध - सम्मेलन बुलाया। यह दिल्ली में 27 से 29 अप्रैल, 1918 तक हुआ था।
    वायसराय ने सभी भारतीय नेताओं को दिल्ली बुलाया था। इनमें बाल गंगाधर तिलक और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे महत्त्वपूर्ण नेता शामिल नहीं थे। वायसराय जानते थे कि मि.जिन्ना को बुलाने का कोई मतलब नहीं क्योंकि वह बात की शुरुआत शर्त से करेंगे। भारतीय नेताओं में गांधीजी भी बुलाए गए थे। वायसराय ने जैसे ही रंगरूटों की भर्ती की बात की तैसे ही गांधीजी ने कहा कि मुझे अपनी जिम्मेदारी का पूरा ख्याल है। और तब अहिंसा के पुजारी ने युद्ध लड़ने के लिए रंगरुटों की भर्ती के लिए देश का दौरा शुरू कर दिया। रंगरूटों की भर्ती के लिए नाडियाद में 22 जून, 1918 को दिए उनके इस भाषण का अंश देखिए -  ‘हथियार चलाना बहुत जल्दी सीखना हो तो सेना में भर्ती होना हमारा कर्त्तव्य है’। मर्द और नामर्द में मित्रता नहीं हो सकती। हम नामर्द माने जाते हैं। अगर हम नामर्दों में नहीं जाना चाहते, तो हमें हथियार चलाना सीखना जरूरी है। यह निश्चय है कि हमें साम्राज्य में हिस्सेदार बनना है। तब हमें चाहे कितना ही दुख उठाना पड़े, प्राण भी देने पड़ें, फिर भी हमें साम्राज्य का बचाव करना चाहिए। अगर साम्राज्य का नाश हो जाता है तो उसके साथ हमारी महती आशाएं भी नष्ट हो जाती हैं।’12
    सेना में भर्ती करने के लिए गांधीजी ने हिंदुस्तानियों की मर्दानगी को ललकारा था। लोगों को फौज में भर्ती कराने में वह बहुत कामयाब नहीं हो पा रहे थे। लेकिन अंग्रेज अफसरों को गांधीजी का इस तरह घूम - घूम कर सेना में भर्ती की अपील करना रुचिकर लग रहा था। उन्हें लग रहा था कि यह आदमी कांग्रेस के जिद्दी नेताओं से अलग है और उनके काम आ सकता है। वह गांधीजी जैसे अप्रत्याशित व्यक्ति को अभी समझ नहीं पाए थे। यही हाल कांग्रेस का भी था। गांधीजी का यह दृष्टिकोण कांग्रेस नेताओं की समझ से बाहर था। वे नहीं समझ पा रहे थे गांधीजी चाहते क्या हैं। एस्थर भी बापू के युद्ध में शामिल होने के अद्भुत फलसफे से हतप्रभ थी। उसने बापू को लिखा - ‘मैं समझ नहीं सकी कि सत्याग्रही के नाते आपकी भावनाओं के साथ यह कहां तक मेल खाता है; या अगर दूसरे ढंग से कहूं, तो जो व्यक्ति दृढ़तापूर्वक सत्याग्रह में विश्वास करता है और जिसने सदैव और सब जगह सत्याग्रह के पालन में अपना जीवन लगा दिया है, वह दूसरों से युद्ध में शामिल होकर लड़ने के लिए किस प्रकार कह सकता है?’13
    खेड़ा आंदोलन और फौज में रंगरुटों की भर्ती के लिए गांधीजी ने दिन - रात एक कर दिए थे। इसी बीच उन्हें पेचिश हो गई। पेचिश होना गांधीजी के लिए शर्मनाक था। उन्हें भरोसा था कि और कोई रोग हो न हो लेकिन उन्हें कभी पेचिश जैसा रोग नहीं हो सकता। वह शायद 12 अगस्त, 1918 का दिन था। पेट में इतना तेज दर्द होता कि गांधीजी जैसा आंतरिक रूप से सशक्त आदमी हिल जाता। उनका मन करता कि वह चीखें। चीखने या कराहने से दर्द कम होता मालूम पड़ता है क्योंकि तब ध्यान बंट जाता है। वह कई बार बेहोश हुए। डॉक्टर ने उन्हें इंजेक्शन लगवाने की सलाह दी। लेकिन गांधीजी तब अंग्रेजी ढंग के इलाज के सख्त खिलाफ थे।
बहुत बाद में गांधीजी ने स्वीकार किया कि ‘यह उनका घोर अज्ञान था।’ उन्होंने उपवास रखा लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। उन्हें बुखार भी हो गया। शरीर दुर्बल हो गया था। गांधीजी इस तरह बीमार कभी नहीं पड़े थे। उन्हें साबरमती आश्रम लाया गया। गांधीजी को तब पहली बार लगा कि वह बचेंगे नहीं। अंत समय निकट आ गया है। उन्होंने अपने बड़े बेटे हरिलाल को लिखा -  ‘मुझे लगता है कि मैं अब जा रहा हूं। बस थोड़े दिन का मेहमान हूं। शरीर क्षीण होता जा रहा है। खुराक कुछ ले नहीं सकता। आत्मा शांत है, लगता है जाने में मुश्किल नहीं होगी। मुझे लगता है कि जो भी विरासत मैं तुम्हारे लिए और भाइयों के लिए छोड़ जा रहा हूं वह उचित है। यदि मैं पैसा छोड़ जाता तो उससे क्या लाभ होता? परंतु चरित्र की जो विरासत मैं छोड़कर जा रहा हूं वह अमूल्य है, ऐसा मैं मानता हूं। मेरी इच्छा है तुम उसे कायम रखो। धर्म की राह पर चलना।’ एक दिन उन्हें लगा कि वह
मृत्यु शैया पर पड़े हैं। सभी आश्रमवासी गांधीजी के पास इकट्ठे हो गए। गीता पाठ शुरू हो गया। गांधीजी ने अपने अंतिम संदेश कहे -  ‘भारत के नाम मेरा अंतिम संदेश यही है कि अहिंसा से ही उसे मुक्ति मिलेगी। और अहिंसा के ही द्वार पर वह विश्व की मुक्ति में अपना योगदान करेगा।’

Monday, February 16, 2015

अर्धनारीश्वर


आज शिव पार्वती का दिन है। इस्लाम और ईसाइयत जैसे तमाम धर्म मानते हैं कि औरत (हव्वा) मर्द (आदम)की बायीं पसली से बनी। लेकिन शिव पहले देवता थे जिनके बहाने भारतीय दार्शिनकों ने बताया कि स्‍त्री-पुरुष दो नहीं एक हैं। दुनिया में अर्धनारीश्वर की पहली परिकल्पना हिन्दू फिलासफरों ने की। यह रहस्यवाद का एक अजीबो गरीब विचार था। आधा शरीर स्‍त्री का आधा पुरुष का। लेकिन इसके कई सांकेतिक अर्थ हैं। इसके पीछे एक पूरा विज्ञान है। गणित का सिद्धान्त है कि जहां भी दो विरोधी चीजें सम हो जाती हैं, तो व्यक्तित्व तत्काल तीसरा हो जाता है। वह पार हो जाता है, दोनों के। वह फिर वही नहीं रह जाता है। तो हमने माना हमारा ईश्वर अर्धनारीश्वर है। हमारे दर्शनिकों ने शिव को प्रेम के सर्वोच्च शिखर पर स्‍थापित किया। आदर्श पति और गृहस्‍थ धर्म के पालन में शिव राम से कहीं आगे निकल जाते हैं। इसलिए कोई हैरत की बात नहीं कि हमारा प्राचीन साहित्य शिव -पार्वती के प्रेम में एकाकार है। प्राचीन ग्रंथों में शिव और पार्वती के प्रेम पर अन्नत कथाएं हैं। लेकिन बाद में जब से प्रेम और काम हमारे समाज के लिए एक टैबू बन गया, धार्मिक व सामाजिक कारणों से हमने इस पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। अगर आज हम उन प्रेम कथाओं का जिक्र करें तो बेशक अज्ञानी भगवाधारी वही सब हरकतें शुरू कर दें जो वे वैलेन्टाइन डे पर हर साल करते हैं। लेकिन संस्कार शिव पार्वती के प्रेम की तरह हमारे दिलो दिमाग में ऐसे एकाकार हो जाते हैं कि उससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता। शिव ने अपनी पत्नी को बराबर का दर्जा दिया, सम्मान दिया और प्यार दिया। इसलिए शिवरात्रि पर देश भर की लड़कियां व्रत रखती हैं और शिव जैसे पति की कामना करती हैं। बेशक प्रगतिशील लोग हिन्दू मान्यताओं का मजाक उड़ाएं। लेकिन अगर हम ठीक से समझें तो आधुनिक जीवन में इन आदर्शों पर चल कर हम कई नए प्रतिमान स्‍थापित कर सकते हैं।   

Wednesday, January 21, 2015

धार्मिक कट्टरता एक जहालत है



युवा मित्र यशार्थ मंजुल द्वारा भेजी गई बेहतरीन बांग्लादेशी फिल्म टेलीविजन देखी। शुक्रिया।  ये फिल्म बांग्लादेश के सुदूर गांव की कहानी है जो चारों तरफ से पानी के बीच घिरा है। गांव के इस्लामिक लीडर चेयरमैन अमीन को तस्वीरों खासतौर से टेलीविजन से नफरत है। गांव में उन्होंने टीवी देखने पर पाबंदी लगा रखी है। वह इसे हराम मानते हैं। टीवी पर इंटरव्यू भी देते हैं तो पर्दे में ताकि उनकी तस्वीर न आ जाए। अखबार भी पढ़ते हैं लेकिन अखबार में छपी सारी तस्वीरों को सफेद कागज से ढक देते हैं। वह नहीं चाहते कि आधुनिकता की हवा उनके गांव में दाखिल हो। इसके लिए उन्हें विरोध भी झेलना पड़ता है। पर वह अपनी इस्लामिक मान्यताओं पर अडिग हैं। उनके जीवन में सबसे तनावपूर्ण दौर तब आता है जब उनमें हज जाने इरादा जन्म लेता है। हज के लिए पासपोर्ट चाहिए और पासपोर्ट के लिए फोटो। मौलाना आंख बंद करके जीवन में पहली दफा अपनी तस्वीर खिंचवाते हैं। हज के लिए ढाका एयरपोर्ट पहुंचते हैं तो पता चलता है कि एजेंट ने सबको बेवकूफ बनाया है। हज जाने का उनका सपना टूट जाता है। वह मायूस होकर होटल के कमरे में आते हैं। उनका दिल टूटा हुआ है। वह किस मुंह से गांव लौटे अब। तभी सामने के कमरे से उन्हें टीवी चलने की आवाज सुनाई देती है। टीवी पर काबे की लाइव कवरेज है। वहां लाखों मुसलमान हज का अरकान अदा कर रहे हैं।  टेलीविजन पर यह चित्र देखकर चैयरमैन जार जार रोने लगते हैं। आसूंओं के साथ उनके होटों से आवाज निकलती है... ओह अल्लाह.... मैं भी मौजूद हूं। ....मैं भी मौजूद हूं। अंग्रेजी में सब टाइटल हैंः Oh GOD I'am Present. Oh GOD I'am Present.
यह फिल्म एक संदेश देती है। धार्मिक कट्टरता एक जहालत है। वक्त के साथ आपको बदलना ही पड़ेगा। हिन्दू धर्म  ऐसी जहालत से सराबोर है।  पीके हो या ओ माई गॉड। इन फिल्मों ने हिन्दू रूढियों और अंधविश्वास पर हमला बोला है। आसराम जैसे धर्म के ठेकेदार और भगवानों के कथित मैनेजर कैसे हिन्दू धर्म का मजाक उड़ा रहे हैं। समोसे की चटनी के बदले कृपा बांटने वाले निर्मल बाबा तो खुद अपने आप में मजाक हैं। उनका मजाक उड़ाने से अगर आपकी भावनाएं आहत होती हैं तो बेशक हों।  निशाने पर ऐसे पाखंडी होने चाहिए न कि हिरानी या आमिर खान। धर्म कोई भी हो वह आलोचनाओं और नए विचारों के लिए खुला होना चाहिए वर्ना कोई भी धर्म घुट कर मर जाएगा। इसलिए हिन्दू और मुस्लिम दोस्तों से विनम्र गुजारिश है कि वह धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास के खिलाफ खड़े हों।





धार्मिक कट्टरता एक जहालत है



युवा मित्र यशार्थ मंजुल द्वारा भेजी गई बेहतरीन बांग्लादेशी फिल्म टेलीविजन देखी। शुक्रिया।  ये फिल्म बांग्लादेश के सुदूर गांव की कहानी है जो चारों तरफ से पानी के बीच घिरा है। गांव के इस्लामिक लीडर चेयरमैन अमीन को तस्वीरों खासतौर से टेलीविजन से नफरत है। गांव में उन्होंने टीवी देखने पर पाबंदी लगा रखी है। वह इसे हराम मानते हैं। टीवी पर इंटरव्यू भी देते हैं तो पर्दे में ताकि उनकी तस्वीर न आ जाए। अखबार भी पढ़ते हैं लेकिन अखबार में छपी सारी तस्वीरों को सफेद कागज से ढक देते हैं। वह नहीं चाहते कि आधुनिकता की हवा उनके गांव में दाखिल हो। इसके लिए उन्हें विरोध भी झेलना पड़ता है। पर वह अपनी इस्लामिक मान्यताओं पर अडिग हैं। उनके जीवन में सबसे तनावपूर्ण दौर तब आता है जब उनमें हज जाने इरादा जन्म लेता है। हज के लिए पासपोर्ट चाहिए और पासपोर्ट के लिए फोटो। मौलाना आंख बंद करके जीवन में पहली दफा अपनी तस्वीर खिंचवाते हैं। हज के लिए ढाका एयरपोर्ट पहुंचते हैं तो पता चलता है कि एजेंट ने सबको बेवकूफ बनाया है। हज जाने का उनका सपना टूट जाता है। वह मायूस होकर होटल के कमरे में आते हैं। उनका दिल टूटा हुआ है। वह किस मुंह से गांव लौटे अब। तभी सामने के कमरे से उन्हें टीवी चलने की आवाज सुनाई देती है। टीवी पर काबे की लाइव कवरेज है। वहां लाखों मुसलमान हज का अरकान अदा कर रहे हैं।  टेलीविजन पर यह चित्र देखकर चैयरमैन जार जार रोने लगते हैं। आसूंओं के साथ उनके होटों से आवाज निकलती है... ओह अल्लाह.... मैं भी मौजूद हूं। ....मैं भी मौजूद हूं। अंग्रेजी में सब टाइटल हैंः Oh GOD Iam Present. Oh GOD Iam Present.
यह फिल्म एक संदेश देती है। धार्मिक कट्टरता एक जहालत है। वक्त के साथ आपको बदलना ही पड़ेगा। हिन्दू धर्म  ऐसी जहालत से सराबोर है।  पीके हो या ओ माई गॉड। इन फिल्मों ने हिन्दू रूढियों और अंधविश्वास पर हमला बोला है। आसराम जैसे धर्म के ठेकेदार और भगवानों के कथित मैनेजर कैसे हिन्दू धर्म का मजाक उड़ा रहे हैं। समोसे की चटनी के बदले कृपा बांटने वाले निर्मल बाबा तो खुद अपने आप में मजाक हैं। उनका मजाक उड़ाने से अगर आपकी भावनाएं आहत होती हैं तो बेशक हों।  निशाने पर ऐसे पाखंडी होने चाहिए न कि हिरानी या आमिर खान। धर्म कोई भी हो वह आलोचनाओं और नए विचारों के लिए खुला होना चाहिए वर्ना कोई भी धर्म घुट कर मर जाएगा। इसलिए हिन्दू और मुस्लिम दोस्तों से विनम्र गुजारिश है कि वह धार्मिक कट्टरता और अंधविश्वास के खिलाफ खड़े हों।





Saturday, January 17, 2015


क्या आप सूफी संत सरमद को जानते हैं


आज संत सरमद शहीद के बारे में पढ़ रहा हूं। अद्भुत आदमी था ये। वह सूफी था और औरंगजेब के हुक्‍म से मस्‍जिद में उसका कत्‍ल किया गया। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह आधा कलमा पढ़ता था। आधा कलमा था-अल्‍लाह ही एक मात्र परमात्‍मा है। वह कलमा का अगला हिस्सा मानने को तैयार नहीं था जिसमें कहा गया है सिर्फ मुहम्‍मद ही अल्‍लाह के पैगंबर है।
वह मानता था कोई भी अकेला पैगंबर नहीं हो सकता। कोई भी आदमी—फिर से जीसस हो या मोहम्‍मद या मोज़ेज या बुद्ध, एकमात्र नहीं हो सकता। सरमद का कत्‍ल कर दिया गया मुगल बादशाह औरंगजेब के हुक्‍म से। उसने मुल्लाओं के साथ साजिश की थी। लेकिन सरमद हंसता रहा। उसने कहा, मरने के बाद भी मैं यही कहूंगा।
एक दफा औरंगजेब की बेटी जेबुनिशा ने महल की खिड़की से देखा कि एक नग्न फकीर कीचड़ में खेल रहा है। उसने पूछा क्या कर रहे हो। सरमद ने कहा-जन्नत बना रहा हूं। जेबुनिशा का कहा -मुझे बेचोगे? सरमद ने कहा -जरूर। कितने में? सरमद बोले-हुक्के के तम्बाकू की कीमत में। जेबुनिशा ने जन्नत खरीद ली। सरमद ने तख्ती लगा दी -ये जन्नत जेबुनिशा की मलकियत है। एक दिन औरंगजेब ने ये देखा तो चौंक गया। बेटी से पूछा-ये क्या तमाशा है? बेटी ने सरमद के बारे में बताया। औरंगजेब सरमद से मिलने गया। कहा मेरे लिए एक ऐसी ही जन्नत महल में बना दो। सरमद बोला-ये मुमकिन नहीं। ऐसे चमत्कार रोज नहीं होते।
दिल्‍ली के मौलवी सरमद से किसी तरह छुटकारा पाना चाहते थे। लेकिन उन दिनों सरमद का जादू दिल्‍ली के लोगों पर तारी था। उसे कुछ हो जाता तो बवाल खड़ा हो सकता था। लोगों में यक अफवाह जड़ जमा चुकी थी कि सरमद दारा को एक सिंहासन देना चाहता था। औरंगज़ेब ने सरमद को बुलवा कर इस बारे में सफाई पेश करने के लिए कहा।
सरमद ने बताया कि वह किसी मिट्टी के सिंहसन की बात नहीं कर रहा था, वह तो स्‍वर्ग के सिंहासन की और इशारा कर रहा था। जब औरंगज़ेब को भरोसा न हुआ तो सरमद ने उसे कहा, ‘’आंखे बंद करो और खुद देख लो।‘’
औरंगज़ेब ने आंखे बंद कीं तो उसे यह नज़ारा दिखाई दिया कि दारा स्‍वर्ग में एक सिंहासन पर बैठा है। और औरंगज़ेब उसके सामने एक भिखारी की तरह खड़ा है। यह देखकर औरंगज़ेब आगबबूला हुआ। और तबसे सरमद उसकी आंखो की किरकिरी हो गया। उसे दहशत पैदा हुई कि यह नज़ारा सरमद कहीं और लोगों को न दिखाये।

दिल्‍ली की विशाल जामा मस्‍जिद, जहां सरमद का कत्‍ल किया गया। इस महान व्‍यक्‍ति की स्‍मृति लिये खड़ी है। बड़ी बेरहमी से, अमानवीय तरीके से उसका कत्‍ल हुआ। उसका कटा हुआ सिर मस्‍जिद की सीढ़ियों पर लुढ़कता हुआ चिल्‍ला रहा था: ‘’ला इल्‍लाही इल अल्‍लाहा।‘’ वहां खड़े हजारों लोग इस वाकये को देख रहे थे।
दिल्‍ली की मशहूर जामा मस्‍जिद से कुछ ही दूर, बल्‍कि बहुत करीब, एक मज़ार है जिस पर आज भी हजारों मुरीद फूल चढ़ाते, चादर उढ़ाने आते है। इत्र की बोतलों और लोबान की खुशबू से महक उठता है उसका परिवेश। वह मज़ार है हज़रत  सरमद की। अब जब मैं  दिल्ली गया तो वहां जरूर जाउंगा। आप भी कभी जरूर जा‌इए।



Wednesday, January 14, 2015

जीवन चलने का नाम



दोपहर जब दफ्तर से निकला तो देवदार के पेडों के बीच से बर्फ रुई के फाए की तरह मेरे कोट पर आकर चिपकने लगी थी। सफेद बर्फ के बेहद नर्म, मुलायम और मासूम फाए। हवा में एक विचित्र सा ठंडापन है। इसे आप जाड़ा नहीं कह सकते। क्योंकि हाथ और जूते में छुपे पांव में जरा भी गलन महसूस नहीं हो रही है। शिमला में यह मेरा पहला जाड़ा है। और आप यकीन मानिए ये अब तक का सबसे आरामदायक सर्दियों के दिन हैं। दिल्ली और यूपी की सर्दी एक खीज पैदा करती है। वहां की सर्द हवा में एक अजीब-सा तीखापन है। सर्द हवा आपके परिधानों को पार करके सीधे हड्डी में दाखिल हो जाती है। फिर चाहे आप कम्बल ओढ़िए या अलाव तापिए। लेकिन शिमला में ऐसा नहीं है। शरीर ढका हो तो जाड़ा त्वचा तक भी नहीं पहुंचता। हवा का ठंडापन मई-जून की हवाओं से थोड़ा ही ज्यादा सर्द होता है। मैंने इसकी वजह जाननी चाही तो पता चला यहां उत्तर भारत के अन्य राज्यों की तरह कोहरा नहीं गिरता। कोहरा हवा में एक अजीब तरह का तीखापन भर देता है। सूखा और तिक्त तीखापन।
बर्फ शाम तक पूरे शहर को अपनी आगोश में ले चुका है। देवदार के पेड़, सड़कें, बिजली के तार, घर, बाजार सब बर्फ की चादर ओढ़ चुकी है। लेकिन सर्दी का नामो निशान नहीं। रात करीब बारह बजे दफ्तर से निकला तो देखा मेरी कार भी बर्फ की चादर ओढ़े खड़ी है। पहली नजर में लगा कि कार जैसे किसी फ्रिजर में रखी हो। कार की विंड स्क्रीन बर्फ से ढकी थी। वाइपर चलाया पर कोई असर नहीं। कार स्टाट करके हीटर चलाया लेकिन कोई असर नहीं। सोचा अंदर जाकर पता करुं कि इस समस्या से निपटने के लिए स्‍थानीय लोग क्या उपाय करते हैं। फिर एक सामान्य सा आइडिया आया कि क्यों न पानी कुनकुना करके विंड स्क्रीन पर डाला जाए। गरमाहट पा कर बर्फ हट जाएगी। आइडिया काम कर गया। बाद में पता चला स्‍थानीय लोग भी यही करते हैं। पल भर में विंड स्क्रीन पारदर्शी हो गई।
तो बर्फ यहां जिन्दगी रोकती नहीं। शर्त यह है कि आप चलते रहिए। कहीं रुकिए नहीं। हिमाचल में एक बहुत सुंदर कहावत है- हिऊं बीचै हांडदा मांछ नेंई मरदा। यानी बर्फ के बीच चलता हुआ व्यक्ति नहीं मरता है, क्योंकि चलते हुए व्यक्ति को ठंड नहीं लगती।