दयाशंकर शुक्ल सागर

Friday, January 24, 2014

हां कामरेड मैं फासिस्ट हूं



और मैंने देखा कल अपनी वॉल पर उन कामरेडों ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को अकेला पा कर घेर लिया। एक कामरेड ‌मित्र ने लिखा-‘सुभाष चन्द्र बोस का आकलन समग्रता में किया जाना चाहिये न कि भावुकतापूर्ण इकतरफा तरीके से। हिटलर और तोजो जैसे नरभक्षियों से उनकी मित्रता और संबंधों को भुला देना ऐतिहासिक रूप से घातक हो सकता है।’ गोया कि सुभाषचन्द्र बोस मेरे हीरो हैं फिर भी मैंने अपने कामरेड दोस्त की इस पोस्ट को लाइक किया। लगा एक खिड़की खुली नेताजी को भावुकता से इतर सोचने-समझने की। यही तो मजा है फेसबुक का। खैर मैँ दृष्टा बन गया इस पोस्ट का। और उस दीवार में गिरने वाले कमेंट्स का जायजा लेने लगा।
पहले प्रगतिशील कामरेड ने कमेंट गिरा- फ़ासिस्‍टों के साथ मोर्चा बनाने की सोच के अलावा भी सुभाष की राजनीति के अन्‍य पहलू है जो यह ज़ाहिर करते हैं कि वह आम मेहनतकश आबादी की सामूहिक शक्ति की बजाय चंद नायकों को इतिहास का निर्माता मानते थे। उनका नारा 'तुम मुझे खून दो मैं तुम्‍हें आज़ादी दूंगा' भी इसी सोच का सूचक है। किसानों और मज़दूरों को संगठित करने की बजाय युद्ध‍बंदियों को संगठित करके आज़ाद हिन्‍द फौज के ज़रिये आज़ादी हासिल करने का रास्‍ता भी इसी ओर इंगित करता है।
इस दीवार पर एक और कामरेड अवतरित हुईं। उनकी भाषा हिकारत से भरी जैसे कोई कविता हो। उन्होंने नया फतवा जारी किया-‘वह फा‌सिस्ट तो नहीं, हां एक निम्‍न पूँजीवादी उग्र राष्‍ट्रवादी थे।’‘मार्क्‍सवाद तो शायद उन्‍होंने पढ़ा तक नहीं था और समाजवाद की उनकी समझ नितांत सतही थी। सुभाष जनक्रान्ति के पक्षधर नहीं थे। उनका आर्थिक कार्यक्रम भी नेहरू के मुक़ाबले अधिक सतही राजकीय पूँजीवादी था।’ उनके विचारों का अंत इस वाक्य से हुआ...‘अफसोस की बात है कि जो कम्‍युनिस्‍ट क्रान्तिकारी कभी उन्‍हें 'फासिस्‍ट सुभाष' कहते हुए एक छोर का अतिरेकी मूल्‍यांकन कर रहे थे, वे अब दूसरे छोर पर जाकर सुभाष को महान क्रान्तिकारी और समाजवादी तक सिद्ध करने में लगे हैं। यह अधिभूतवादी नज़रिया काफ़ी भ्रम पैदा कर रहा है। और नुकसानदायक भी है।’
इस बहस में कुछ उदारवादी कामरेडो ने हस्तक्षेप की कोशिश की लेकिन उनके विचार कुचल दिए गए। वे चुप हो गए। सोचा था इस बहस में नहीं पड़ूंगा पर नहीं रहा गया।
मैंने अपने कामरेड मित्र से निवेदन किया-‘मुझे लगता है नेताजी और उनकी आजाद हिंद फौज को थोड़ा गहराई से समझने की जरूरत है। देख रहा हूं कई लोग गलत नतीजे पर पहुंचने के लिए बेताब हैं। नेताजी का केवल एक लक्ष्य था भारत की आजादी। गांधी एंड पार्टी से निराश होने के बाद नेताजी के पास कोई और चारा नहीं बचा था। लेकिन वह जानते थे कि फा‌सिस्ट हिटलर को कैसे डील करना है। हिटलर अंत तक नेताजी की राजनीतिक विचाराधारा समझ नहीं पाया। वह उनका ‘पोलिटिकल कॉन्सेप्ट’ जानना चाहता था। सुभाष को ये नागवार गुजरा। उन्होंने एडम वॉन ट्रोफ्फ ज़ु सोल्ज (स्पेशल इण्डिया ऑफिस के चीफ) के जरिए हिटलर को जवाब भिजवाया- “अपने हिज एक्सेलेन्सी से जाकर कहिए कि मैंने अपनी सारी जिन्दगी राजनीति में बितायी है और मुझे किसी की भी सलाह की जरुरत नहीं है।”
मैंने हिकारत की कवियत्री को ‌चिढ़ाया-’क्या क्रान्तिकारी कामरेडों को याद नहीं कि इस युद्ध स्तालिन कैसे हिटलर का बाप बन गया था। सोवियत सैनिकों को एक कदम भी पीछे हटाने का आदेश नहीं था- पीछे हटने वाले सैनिकों को गोली मारने के लिए स्तालिन ने बाकायदे दस्ते तैयार कर दिए थे। इस दस्ते ने कैसे अपने ही उन सैनिकों को गोलियों से भूना था जिन्हें लड़ने के लिए बंदूक भी नहीं
दी गई थी।’
बस फिर क्या था। सुभाष बाबू तो किनारे निकल गए और मैं कामरेडो के गिरोह में फंस गया। कामरेड मित्र ने मुझे लिखा- इतिहास में हमारा आकलन हमारे इरादों से नहीं अपितु हमारे क्रियाकलापों और उनके परिणामों/ संभावित परिणामों से होता है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत छोड़ने के बाद अपने अंतिम क्षणों तक वे फासिस्टों के मित्र और कनिष्ठ सहयोगी बने रहे . और जहां तक 'स्टालिन कैसे हिटलर का बाप बन गया था' वाली टिप्पणी का प्रश्न है आशा ही कर सकता हूँ कि आप उनमें से नहीं हैं जो हर मुद्दे को भटका कर स्टालिन और साम्यवाद पर हमले का मौका तलाश करते हैं . बात सुभाष और उनके फासिस्टों से संबंधों के बारे में चल रही है इसमें स्टालिन कहाँ से आ गया ?
मैंने उन्हें सफाई दी कि- मुझे नहीं लगता सुभाष का कोई भी क्रियाकलाप उन्हें विश्व इतिहास में खलनायक ठहराता है। इसीलिए मुझे स्तालिन के क्रियाकलाप की याद आ गई ताकि कामरेड मित्रों का दिमाग एक तरफा न बहके। वैसे मुझे आपके कई विचार निजी तौर पर पसंद हैं। मैं चाहता था कि आपकी वॉल पर चल रही बहस में संतुलन बना रहे।
कामरेड मित्र ने मेरी असहमति का पूरा आदर देते हुए कहा कि- पर सुभाष को खलनायक तो यहां भी कोई नहीं ठहरा रहा है . खलनायक तो आपने स्टालिन को ठहराया है ' हिटलर का बाप ' कह कर .जबकि स्टालिन का ज़िक्र तो पूरी चर्चा में कहीं था ही नहीं . फैज़ की याद दिला दी आपने - वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था / वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है।
मैंने भी उतनी ही विनम्रता से कहा- ‘जी, लगता है हम दोनों ने एक दूसरे की दुखती नब्ज पर हाथ रख दिया। खैर स्टालिन की क्रूरता के किस्से सारी दुनिया ने सुने हैँ। वह कम से कम मेरा नायक तो नहीं हो सकता। खैर एक शेर मैं भी अर्ज कर दूं नामालुम किसका है लेकिन मौजू है- हम जो डूबे हैं अब तक तो बड़े ताव में हो, तुम ये क्यों भूल गए तुम भी इसी नाव में हो’।
यह कह कर मैंने कहा कि चलता हूं अब। कामरेड मित्र ने बेहद सभ्य लहजे में धमकाया कि यही बेहतर होगा आपके लिए।
इसी बीच बहस में एक तीसरे कामरेड आ गए। बोले- ‘ ये दया सागर जी शायद ट्रोटस्की वादी हैं ....तभी तो स्टालिन को ''हिटलर का बाप'' बता बैठे ...शायद स्टालिन को ढंग से समझ ही नहीं पाए है ..की किस परिस्थिति में फासिस्टो से लोहा लिया ...और सर्वहारा के राज्य की रक्षा की थी....।’
अब परेशान होने की बारी मेरी थी। अब ट्रोट्स्की कहां से आ गए बीच में। मैं तो बेचारे को जानता तक नहीं। ट्रोट्स्की के बारे में खोजबीन की तो पता चला उन्हें १९२९ में ही सोवियत संघ से निकाल दिया गया था. इसी के साथ कई और तथ्य पता चले। जैसे-१९३३ में हिटलर के सत्ता में आने पर, स्टालिन ने हिटलर को बधाई सन्देश भेजे थे। पता चला कि ‘स्टालिन साहब इस जुगाड़ में लगे रहे कि किसी तरह हिटलर के साथ उसका समझौता हो जाए। आखिर में सितम्बर १९३९ में स्टालिन ने यह कारनामा कर दिखाया. उसने हिटलर के साथ एक युद्ध संधि की जिसके अनुसार पोलैंड से शुरू करके समूचे यूरोप को हिटलर और स्टालिन की फौजों ने मिलकर चबा जाना था. दुनिया भर की स्टालिनवादी कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी इस संधि से हतप्रभ रह गईं।’
कुल जमा मतलब यह कि ट्रोट्स्की ठीक वैसा सोचते थे जैसा कि मैं यहां सोच रहा हूं। सोच क्या रहा हूं स्टालिन के बारे में अब तक जितना कुछ पढ़ा, समझा और यूरोप की फिल्मों में जो देखा उसी से उनके बारे में ये धरणा बनी। लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि सुभाष बाबू ने ऐसा क्या अत्याचार किया कि वह कामरेडो के निशाने पर आ गए। आपके पास एक भी तथ्य नहीं। सोच रहा हूं किसी विचारधारा का कैदी होना कितना खतरनाक है। साले, हिन्दुस्तान में जनमे। आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हो। हम जैसे सर्वहारा के टुकडों पर पल रहे हो। और गीत स्टालिन के गा रहे हो। अब आप कहेंगे मैं फासिस्ट हूं। ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा देने वाले सुभाषचन्द्र बोस के साथ खड़ा होना अगर फांसीवाद है तो हां मैं फासिस्ट हूं। कोई शक?

Saturday, January 18, 2014

विरोध में टंगी एक अपाहिज कुर्सी

मेरी यूरोप डायरी -2


जिनेवा। रात के करीब दो बजे हैं होटल क्रिस्टल के नीचे चिल्लाने की आवाजों से नींद खुल जाती हैं। खिड़की से नीचे झांकता हूं। एक आदमी और औरत झगड़ रहे हैं। आदमी कह रहा है ‘डोंट टच मी’। और उससे लिपटते हुए कह रही है ‘आई विल टच यू’। बार-बार चिल्लाते हुए एक ही वाक्य- आईविल टच यू। कौतूहलवश खिड़की का पर्दा थोड़ा और हटाता हूं। दोनों की निगाह मुझ पर पड़ती है वे झगड़ना बंद कर देते हैं। दोनों मुझसे चिल्ला कर फ्रेंच में कुछ कहते हैं। मैं मतलब निकालता हूं-आप सोइए महाराज। हम ठीक हैं। यहां मामला प्रेम का है, झगड़े का नहीं।
अगले दिन सुबह ‘नेशनस’ चला आया। ‘नेशनस’ यानी जिनेवा में यूएन का बस स्टॉप। चोरों तरफ संयुक्त राष्ट्र के कई दफ्तरों के बीच एक हरे मैदान में एक विशालकाय कुर्सी पर नजर अटक गई। इसे यहां सब इसे ‘द ब्रोकन चेयर’ के नाम से जानते हैं। स्विस कलाकार डेनिलय बरसेट की इस कृति को देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। टीक की लकड़ी से बनी यह 12 मीटर ऊंची कुर्सी जैसे हवा में लटकी है। इसका एक पाया कटा हुआ है। तीन पाए की कुर्सी उन मजदूरों की याद में बनी है जो खानों में बारूद बिछाते वक्त अपनी जान गंवा बैठे या अपाहिज हो गए। कुर्सी की कहानी भी खासी दिलचस्प है। अंगोला, कम्बोडिया और तमाम अफ्रीकी देशों में हर साल बारूदी सुरंगों से लाखों लोग मर जाते हैं या अपाहित हो जाते हैं। यह कुर्सी इन खान मजदूरों की आवाज बनकर संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय के सामने टंगी है। डेनियल कहते हैं यह कुर्सी मैं पत्थर की भी बना सकता था पर जानता हूं इंसान पत्थर नहीं हो सकता। यूएन प्रशासन ने तीन साल पहले ये कुर्सी अपने मुख्यालय के सामने लगाने की इजाजत दी थी। सोचा गया था कि संयुक्त राष्ट्र आने वाले राष्ट्राध्यक्षों को इस कुर्सी के बहाने अपंग मजदूरों की याद आएगी। शुरू में यह अपाहिज कुर्सी केवल तीन माह के लिए लगी थी पर यह हटाई नहीं गई। ‘माइन बैन ट्रीटी’ पर दुनिया के केवल 122 मुल्कों ने दस्तखत किए। हवा में लटकी इस कुर्सी को अभी कुछ और दस्तखतों का इंतजार है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के दफ्तर के ठीक सामने खाली पड़ी यह जगह अब दुनिया भर के नाराज लोगों के प्रदर्शन का केन्द्र बन गई है। लेकिन ये प्रदर्शन भी किसी पिकनिक से कम नहीं होता। कम्बोडिया से आए कुछ स्त्री पुरुष और बच्चे यहां विरोध के लिए जमा है। सारी रात हवा में अटकी यह कुर्सी दिमाग में घूमती रही। सुबह के चार बजे हैं। होटल के नीचे तेज शोर से आंखें खुल जाती हैं। खिड़की से झांकता हूं तो नीचे एक गाड़ी मशीन से सड़क साफ कर रही है। एक आदमी पालीथिन बैग में जमा कचरा उठाकर गाड़ी के पीछे डाल रहा है। उसके कंधे के नीचे एक बैसाखी है। उसका एक पांव कटा है। शायद बारूद के विस्फोट से गंवा दिया हो। उसकी नजर ऊपर खिड़की पर पड़ती है वह हाथ हिलाकर कहता है-‘बुनजोरनो।’ मैं अंदाज लगता हूं इसका मतलब ‘गुड मार्निंग’ होगा। मैं सही निकला। मेरे एक स्विस दोस्त गुर्जियों ने बताया कि यह इतालवी शब्द है जिसका अर्थ है ‘गुड मार्निंग’।
....जारी


Saturday, January 11, 2014

विश्व शांति के शहर जिनेवा में

मेरी यूरोप डायरी-1


जिनेवा यानी शांति का शहर। दुनिया भर के देश आपस में झगड़ते हैं। कभी सरहद के लिए, कभी ईंधन के लिए कभी वर्चस्व, तो कभी हथियारों पर कब्जे के लिए। लेकिन अंत में उन्हें शांति की तलाश में जिनेवा आना पड़ता है। ये शांति प्रतीकात्मक है। लाल बत्ती से फर्राटा भरती कारों के अलावा पूरे शहर में आपकों कहीं कोई शोर गुल नहीं मिलेगा। पत्थरों की विशालकाय इमारतों के सामने से गुजरती चौड़ी सड़कों पर पैदल चलते लोग खामोशी से मुस्करा
कर आपका स्वागत करेंगे कि आप विदेशी है और यहां शांति की तलाश में आए है।
मार्च बीतने वाला है लेकिन सर्दी यहां अभी विदा नहीं हुई। शून्य से 4 डिग्री कम तापमान में ठिठुरन बिल्कुल नहीं है। धूप इतनी मीठी और गुनगुनी है कि ठंड का अहसास केवल खुली सड़कों पर पैदल चलने पर होता है। पर इस ठंड में भी यहां के लोगों की गर्मजोशी हथेलियों में महसूस होती है। मेट्रो ट्रेन से एयरपोर्ट से जिनेवा शहर आने में बमुश्किल दस मिनट लगे। कार्नवीन मेट्रों स्टेशन पर उतरा तो होटल का पता करना मुश्किल पड़ रहा है। ज्यादातर लोग फ्रेंच बोलते हैं। जो फ्रेंच नहीं जानते वह जर्मन या इतालवी में बात करने लगते हैं। भाषा को लेकर उनके भीतर एक खास तरह का आग्रह है। इन्हें न अंग्रेजी बोलना पसंद है न सुनना। लेकिन इससे उनकी भलमसाहत में कोई कमी नहीं आती। मेट्रो स्टेशन पर करीब अस्सी साल की एक भद्र बुजुर्ग महिला ने दो बार इतालवी में होटल क्रिस्टल का नाम दोहराया। होतेल क्रिस्तल। ओके। फिर वह पीछे आने का इशारा करते हुए आगे बढ़ गई। यकीन कीजिए करीब डेढ़ किलोमीटर चलकर किसी शार्टकर्ट रास्ते से मेट्रो स्टेशन के बाहर पहुंची। बाहर निकलते ही मैनें पाया कि मैं होटल क्रिस्टल के सामने खड़ा हूं। मैने पीछे पलट कर देखा वह भद्र महिला बिना शुक्रिया पाने का इंतजार किए वापस स्टेशन के भीतर जा रही थीं। शायद उन्हें कोई ट्रेन पकड़नी थी। मुझे शुक्रिया कहने के लिए वापस दौड़कर उनके सामने जाना पड़ा।
दोपहर में सड़कों पर अकेले घूमते वक्त न जाने कब भूख लग गई। मैकडॉनल्ड से बर्गर लिया जो साढ़े छह स्विज फ्रैंक का था यानी भारतीय मुद्रा के हिसाब से करीब 300 रूपए का। यूरोप में अगर आप कुछ खरीदते समय यूरो या स्विज फ्रैंक को भारतीय मुद्रा में बदलते रहें तो यकीन मानिए आपको कई रातें बिना खाए गुजारनी पडेंगी। रेस्त्रां के बाहर सड़क के किनारे पत्थर की मेज पर अपनी प्लेट रख देता हूं। सामने सड़क पर तेजी से स्केट करते लड़को को देखने लगता हूं। अचानक मेरी पत्थर की मेज पर एक गौरेया आकर बैठ जाती है। एकदम निडर। मुझे लगता है कि वह खाने की मेज पर मेरा साथ देने आई है। मैं बर्गर का एक छोटा सा टुकड़ा तोड़कर उस चिड़िया की तरफ बढ़ता हूं। वह अपने दो नन्हे कदम आगे बढ़ी है। मैं अपना हाथ थोड़ा और आगे करता हूं। वह मेरे हाथों से बर्गर का टुकड़ा लेकर वही चुपचाप खाने लगती है स्विट्जरलैंड के पक्षियों में भी इतनी आत्मीयता है। मेरा दिल भर जाता है।

Monday, December 2, 2013

काशी से कैलास तक का सफरनामा



हेमंत शर्मा की किताब "द्वितीयोनास्ति" कई मायनों में अद्भुत है। रविवार को संत मोरारी बापू के हाथों से इस पुस्तक का दिल्ली में लोकार्पण हुआ। करीब तीन घंटे का यह समारोह आध्यात्मिक, राजनीतिक, साहित्य और पत्रकारिता के दिग्गजों का एक दुर्लभ संगम था। एक तरफ सुप्रसिद्ध कथा वाचक मोरारी बापू और स्वामी रामदेव थे तो दूसरी तरफ साहित्य के आचार्य स्वामी नामवर सिंह और मीडिया मुगल रजत शर्मा। एक तरफ भाजपा के राजनाथ सिंह तो दूसरी तरफ कांग्रेस के मोतीलाल वोरा। दिलचस्प संयोग है कि ये सब लोग कहीं न कहीं काशी या कैलास से एक पर्वत श्रृंखला की तरह जुड़े रहे हैं। मसलन संत मोरारी बापू तो हेमंत शर्मा को यात्रा के दौरान कैलास पर कथा बाचते मिल गए थे। और वोराजी ने यूपी का गवर्नर रहते हेमंतजी को पहली बार हिमालय के हेलीकाप्टर से दर्शन कराए थे। कैलास जाना था रजत जी को लेकिन मौसम खराब होने के कारण बीच रास्ते से हेलीकाप्टर वापस मुड़वना पड़ा। लेकिन अगले ही साल हेमंत शर्मा काशी की सेना लेकर कैलास पर्वत छू आए। और लौटे भी तो खाली हाथ नहीं अनुभव और अनुभूति दोनों की गठरी अपने साथ ले आए।
संत मोरारी बापू ने एक बहुत अच्छी बात कही कि हम जो भी लिखते हैं, कहते हैं, वह सिर्फ हमारा अनुभव है। अनुभूति इसके ऊपर की चीज है। जहां शब्द खत्म हो जाते हैं। तब संवाद संभव नहीं हो पाता। अनुभूति प्रकट होती है आंसुओं से, जो झरने से झर झर कर बहने लगते हैं। कैलास का यह यात्रा वृतांत ऐसा ही है। मैंने इलाहाबाद में इस किताब का पहला ड्राफ्ट पढ़ा था जिसे हेमंतजी ने मेल किया था। अब किताब सामने है। मैं देख रहा हूं जहां शब्द खो गए वहां अनुभूति को हेमंत जी ने किसी प्रोफेशलन प्रेस फोटेग्राफर की तरह कैमरे में कैद कर लिया। प्रभात प्रकाशन ने उन तस्वीरों को ज्यों का त्यों छाप दिया। नामवर सिंह ने कहा-कैलास यात्रा पर इतनी अच्छी किताब उन्होंने आज तक नहीं पढ़ी। संत मोरारी बापू ने कहा इस किताब का लोकार्पण करके उनके हाथ शुद्ध हो गए। मेरे बगल में बैठे वरिष्ठ खेल पत्रकार पद्मपति शर्मा तो बापू की भावुक कथा सुन कर रोने ही लगे। भोजपुरी में कहने लगे-सागर, कसिए वाले ही अइसा लिख सकते हैं। उनका आशय काशी वालों से था। मैंने देखा है काशी वाले खुद को काशी का होने का क्रेडिट देने से कभी चूकते नहीं। सब चलते फिरते इश्तेहार हैं। नामवर हो या पद्मपति शर्मा या खुद हेमंत शर्मा। लेकिन सब में एक बात कॉमन है-कबीर वाला फक्कड़पन। इसलिए हेमंत शर्मा ने कहा-ये किताब मैंने गणेश की तरह लिखी भर है। काशी स्वर्ग का द्वार है
तो कैलास स्वर्ग। इसलिए हम स्वर्गवासी हो गए।
प्रो. कृष्‍णनाथ ने इस किताब की अद्भुत समीक्षा की है। लिखा है-हेमंत के साथ कैलास मानसरोवर की अंतर्यात्रा कर आया। कैलास का दरस-परस और मानसरोवर के जल में स्नान-मज्जन तथा पान और तर्पण। ऐसा पहली बार हुआ। क्या भाव है। क्या भाषा। ऐसी भाषा काशी में ही लिखी जा सकती है। अन्यत्र नहीं। वैसा इसका वर्णन अनेक  बार पढ़ चुका हूं। किन्तु ऐसा डूब कर नहीं। क्या ऐसा फिर हो पाएगा? कोई बताए।

Saturday, November 23, 2013

एक पत्रकार का प्रायश्चित


तहलका ने इस बार गजब का तहलका मचा दिया। तरूण तेजपाल अपने किए का प्रायश्चित करना चाहते हैं। उन्होंने अपने पहले खत में लिखा उनसे फैसला करने और स्थिति का सही आकलन करने में भूल हुई। ये बहुत अर्थपूर्ण लाइन है। इसका मतलब यह है कि वह समझ नहीं पाए कि नशे में गर्क वह कन्या उनसे क्या चाहती है। वह गफलत के शिकार हो गए। जैसा कि लड़की ने अपने खत में जाहिर किया है उन्हें लगा कि उनकी बेटी की सहेली सिर्फ उन्हें प्रेम करती है। तभी उन्होंने अपनी असभ्य हरकतों को जस्टिफाई करते हुए कहा-"क्या एक से ज्यादा लोगों से प्यार करना सही है?" वह लड़की भी बिहार के किसी गांव की नहीं थी। वह मुम्बई-दिल्ली में काम करने वाली तहलका की एक तेजतर्रार पत्रकार है। उसके ब्लाग में मैंने बहुत बोल्ड और विचारोत्तेजक लेख पढ़े हैं। लेकिन स्थिति का आकलन करने में उससे भी चूक हो हुई। वर्ना एक ही तरह के हादसे का वह दो बार शिकार न होती। 
हैरत की बात है कि बड़े-बड़े खुलासे करने वाले ये खोजी और अनुभवी पत्रकार ‌‌इस नाजुक हालात का सटीक आकलन नहीं कर पाए। जाहिर है नशा बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। मशहूर लेखक व चिंतक लियो टालस्टाय अव्वल दर्जे के शराबी थे। वह अपने जीवन के अंत तक शराब नहीं छोड़ पाए। वह कहते थे इंसान शराब मजे के लिए नहीं पीता। वह इसलिए पीता है ताकि उसे अपनी अंतरात्मा के विरोधपूर्ण स्वर न सुनाई दें।  इसलिए कोई हैरत की बात नहीं कि तहलका के थिंक फेस्ट के शुरूआती भाषण में तेजपाल ने अपने सहकर्मियों को  ज्ञान का सूत्र इस उद्धोष के साथ ‌दिया  कि '...अब, जबकि आप गोवा में हैं, जितना पी सकते हैं, पीजिए, खाइए और... स्लीप विद हूएवर यू थिंक ऑफ...।'
शराब या अन्य नशीले पेय के इस्तेमाल से मनुष्य जितना अधिक चेतना शून्य बनता चला जाता है वह बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से भी उतना ही नीरस, निष्क्रिय और मंद बन जाता है। शराब का सेवन करने वाला हर शख्स यह अनुभव आसानी से कर सकता है। और मैं भी  इसका अपवाद नहीं। बावजूद इसके सारी दुनिया में शराब लोकप्रिय है। और आज से नहीं वैदिक युग से। वाल्मीकि की रामायण में भी मुझे सोम रस सेवन की लोकप्रियता के कई चौंकाने वाले प्रसंग मिले। सोम रस जितना लोकप्रिय लंका में था उतना ही अयोध्या में भी। खैर मैं तर्क देकर शराब सेवन को प्रोत्साहित नहीं कर रहा। मेरा मानना है कि शराब अपने आप में कोई नफरत करने की चीज नहीं। अहम ये है कि शराब पीने वाला कौन है। बंदर के हाथ में आप उस्तरा देकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उसका या आपका चेहरा सही सलामत बचेगा। दरअसल शराब आपकी प्रवृत्तियों को बाहरी सतह पर लाकर खड़ा कर देता है। हर इंसान के दो चेहरे होते हैं। एक चेहरा सार्वजनिक है और दूसरा निजी। सार्वजनिक चेहरे वाला सामाजिक प्राणी हिपोक्रेट होता है। वह जो नहीं है और होना चाहता है वही चेहरा समाज के सामने पेश करता है। लेकिन शराब ये सारे आवरण हटा कर आपका असली चेहरा सामने ले आती है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को अगर आपको जानना समझना है तो उसे चार पांच पैग लगवा दीजिए। फिर देखिए वह किसी किताब की तरह खुलता चला जाएगा। यह प्रयोग मैं कर चुका हूं और इसके नतीजों से मैं सौ फीसदी आश्वस्त हूं।

तरूण तेजपाल से जिन्दगी में मेरी सिर्फ एक मुलाकात है। मैं उनसे कोई चार साल पहले दिल्ली में केसी कुलिश अवार्ड फंक्‍शन में मिला था। उन्होंने मुझे अवार्ड के लिए गले मिलकर बधाई दी थी। उनकी टीम के भी  किसी सदस्य को ये अवार्ड मिला था। पहली मुलाकात में मैं किसी के बारे में अपनी राय कायम नहीं करता। तहलका की कई खोजपरक खबरों से मैं प्रभावित था हालांकि मैं जानता था कि तहलका के पीछे कई राजनीतिज्ञों  का पैसा और दिमाग लगा है। वह खबरें वैसी खालिस खबरें नहीं जैसी हम यूपी बिहार के पत्रकार ब्रेक करते हैं। हमारे पास न इतने संसाधन है न आजादी।
खैर लड़की के बयान पर यकीन करें तो तेजपाल ने जो हरकत की वह वाकई बेहद शर्मनाक है और कानून की धाराओं में जो भी सजा दर्ज है वह उन्हें मिलनी चाहिए। इस पर किसी डिबेट या बहस की जरूरत नहीं है। यह बहस भी बेकार है कि यह हरकत एक संपादक ने की या राजनेता या संत ने। क्योंकि संपादक भी हाड़ मांस का एक इंसान है। संत परम्परा वाले इस देश में आसाराम जैसे संत भी हुए हैं। वे कोई स्वयंभू संत नहीं  हैं। हजारों लाखों लोग आसाराम अनुयायी हैं।ऐसे में अगर मेरे विद्वान मित्र जस्टिस काटजू देश की 90 फीसदी  जनता को मूर्ख मानते हैं तो वह गलत नहीं हैं। सोचिए इस देश अधिसंख्य जनता मूर्ख न होती तो क्या फूलनदेवी, धनंज्जय सिंह, मुख्तार अंसारी और भी न जाने कितने ऐसे लोग संसद तक पहुंच पाते। मूर्ख जनता के देश में ही चाभी से चलने वाले पुतले जैसे प्रधानमंत्री होते हैं।
मैं शायद अपने मूल विषय से भटक गया। मैं बात कर रहा था तेजपाल के प्रायश्चित की। प्रायश्चित के भी लोगों के अलग अलग ढंग हैं। महात्मा गांधी को अगर गंदे सपने भी आ जाते थे तो भी प्रायश्चित करते थे। वह सुबह तीन बजे उठ कर बिस्तर पर कूदने लगते थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रो.निर्मल कुमार बोस ने अपनी किताब माई डेज विद गांधी में इसका विस्तृत और रोचक वर्णन किया है। नोआखली के एक वीरान आश्रम के दृश्य का उन्होंने दिलचस्प वर्णन किया। देखिए-" सवेरे 3 बजकर 20 मिनट पर मैंने गांधीजी को सुशीला नैयर से जोर से बातचीत करते हुए सुना। उनकी आवाज में परेशानी झलक रही थी। एकाएक हमें आकुल क्रंदन सुनाई पड़ा। यह गांधीजी का आवाज थी। और तब हमने दो थप्पड़ मारे जाने की आवाज सुनी। ....और बाद में जोरों की रुलाई सुनाई दी।" निर्मल दौड़ते हुए उस कोठरी के दरवाजे पर पहुंचे। भीतर देखा बापू आंख बंद किए बैठे थे। उनकी पीठ दीवार से लगी थी और आंखों में आंसू की बूंदे साफ झलक रही थीं। करीब खड़ी सुशीला भी सुबक रही थी। निर्मला की हिम्मत नहीं हुई ‌कि कुछ पूछें। वे दरवाजे से ही लौट आए। सुशीला भी उनकी बेटी की उमर की थी। इस प्रसंग को मैंने वाणी प्रकाशन से छपी अपनी किताब  "महात्मा गांधी ब्रहम्चर्य के प्रयोग" में विस्तार से लिखा है। इतिहास इसी लिए मुझे रोचक लगता है क्योंकि वह वर्तमान की बड़ी से बड़ी घटना से चौंकने का मौका नहीं देता। क्योंकि वर्तमान में ऐसा कुछ नया नहीं हो रहा जो पहले न हो चुका हो। 
वक्त और व्यक्तित्व के हिसाब से प्रायश्चित के तौर तरीके भी बदलते जाते हैं। मैं नहीं जानता कि तेजपाल के प्रायश्चित का क्या प्लान है। हो सकता है कि गोवा या दमन ‌द्वीव के किसी समन्दर के किनारे नवम्बर दिसम्बर की हसीन धूप में एकान्तवास के दौरान वह बीयर की चुस्कियां लेकर सोचें कि उनसे कहां कैसे चूक हो गई। बुद्धिजीवी टाइप के लोग अपने अपराध की सजा खुद तय करते हैं। आप मचाते रहिए हल्ला। गोवा में भाजपा की सरकार उन्हें प्रायश्‍चित के लिए जेल की शांत कोठरी मुहैया कराना चाहती है। हिसाब बराबर करने के ऐसे मौके बार-बार नहीं मिलते हैं। कलम की नोक तलवार से भी ज्यादा धारदार होती है। यह बात तरूण तेजपाल अब बखूबी समझ रहे होंगे।
    
  

Tuesday, November 19, 2013

नरक ले जाने वाली लिफ्ट में राजेंद्र यादव


कल रात मेरी किताबों की रैक में अचानक राजेंद्र यादव की किताब "नरक ले जाने वाली लिफ्ट' दिख गई। अचानक दिमाग में एक बेतुका ख्याल कौंधा  इस वक्त राजेन्द्र यादव कहाँ होंगे? क्या इसी लिफ्ट में होंगे ? या अपने गंतव्य स्थल तक पहुंच गए होंगे ?
मैं गहरी सोच में पड़ गया।  मौत के बाद इंसान कहां जाता है। ये कोई नहीं जानता। साइंस भी इस सवाल पर खामोश है। हम मौत से शायद डरते ही इसलिए हैं क्योंकि हम इस रहस्य से अनजान हैं कि मौत के बाद इंसान कहां जाता है ?  जन्नत और ज़हन्नुम जैसी जगहें  मज़हबी मुनाफाखोरों ने अपने मतलब के लिए इज़ाद की हैं। मजहबी किताबों में वो स्वर्ग की हसीन तस्वीर दिखा कर भरमाते हैं और नरक का खौफ़नाक मंजर दिखा कर डराते  हैं। करीब  दो साल पहले  मेरी मां इस दुनिया से विदा हुई।  तेरह दिन के उन तकलीफदेय शोक के दिनों मैं पूरी गरूण पुराण पढ़ गया। सिर्फ ये जानने के लिए कि मां इस समय कहां होगी ? कैसी होंगी ? शायद इस किताब से कोई सुराग मिले। गरूण पुराण में कोई उन्नीस हज़ार श्लोक हैं। बाद के आधे हिस्से में सारे श्लोक मौत के बाद के जीवन से जुड़े हैं। इस किताब में न जाने कितने तरह के नरक का ब्यौरा है। हर अपराध के लिए अलग दंड है और हर दंड के लिए अलग नरक। दो नरकों के बीच में भी एक नरक है। मैंने थक कर किताब बंद कर दी। अच्छे लोग मर कर कहां जाते हैं इस बारे मैं ये किताब कुछ नहीं बताती। अगर में गरूण पुराण को ठीक समझा हूँ तो आज की  दुनिया का एक आदमी भी स्वर्ग के सफ़र पर जाने के लिए इलेजिबिल नहीं है। महात्मा गांधी से लेकर अन्ना तक कोई नहीं।  मैं तो कत्तई नहीं। दिलचस्प है कि इस किताब में सारे वर्जित गुनाह करने के बावजूद नरक से बचने के तमाम उपाय दिए गए हैं। लेकिन हर उपाय की  अनिवार्य शर्त ये है कि आप पंडितओं  और पुरोहितों  की  जेबें  गर्म करें।  मूर्ख से मूर्ख इंसान भी गरुण पुराण पढ़ कर समझ जाएगा कि  ये किताब इस देश की गरीब, अनपढ़ और अनघड़ जनता को ठगने का षड्यंत्र है। और ये साजिश ज़ाहिरा तौर पर ब्राह्मणों ने रची  है क्योंकि अपने फायदे के लिए पुराण वुराण लिखना उन्हीं का काम था।  
 "नरक ले जाने वाली लिफ्ट' में राजेंद्र जी ने दुनिया की  बेहतरीन कहानिओं का अनुवाद किया है। "नरक ले जाने वाली लिफ्ट' इस किताब की अंतिम कहानी है जिसके लेखक हैं पार लागर क्विस्ट। यह कहानी एक बेवफ़ा बीवी की है जो अपने शौहर से लड़ कर अपने प्रेमी मि.स्मिथ के साथ अच्छा वक्त बिताने एक होटल में जाती है। दोनों एक साथ लिफ्ट से नीचे कमरे में जाने के लिए उतारते हैं। लिफ्ट में ही उनका  रोमांस शुरू हो जाता है।  तभी  अचानक उन्हें महसूस होता है कि लिफ्ट तो रुक ही नहीं रही।  वह नीचे  और नीचे की  तरफ दौड़ी चली जा रही है। दरअसल  लिफ्ट ख़राब हो गई थी और वह सीधे नरक की ओर जा रही थी। दोनों सचमुच नरक पहुंच जाते हैं।  वहाँ शैतान उन्हें रोमांस के लिए एक नारकीय कमरा मुहैया करता है। इससे पेशतर वे रोमांस शुरू करें कोई दरवाज़ा खटखटाता है। वह वेटर होता है जो नीम अँधेरे कमरे में रखे गिलास में शराब डालता है। उसकी कनपटी पर गोली का एक ताज़ा निशान है।  लैंप कि रौशनी में वह औरत वेटर का चेहरा देख कर चीख उठती है।  हे ईश्वर आर्वेड तुम ? वह कोई और नहीं बल्कि उसका शौहर था !
खैर इस कहानी का मेरी इस पोस्ट से कोई लेना देना नहीं।  मेरी दिलचस्पी राजेंद्र यादव  में है।  उम्र के लम्बे फासले के बावजूद वो मेरे दोस्त थे।  उम्र का लिहाज़ न करके मैं उनसे कोई भी अटपटा सवाल पूछ सकता था। लेकिन उनके प्रति एक अनोखे तरह के सम्मान का भाव हमेशा रहता। अगर मैं उनसे संवाद कायम कर पता तो जरुर पूछता की आप कहाँ हैं? इस नामुराद दुनिया के उस पार का जहान कैसा है ? क्या वहाँ आपको सिगार मिल जाती है। लिखने के लिए कागज़ कलम देते हैं वो लोग ! क्या वहाँ शराब का इंतज़ाम है। क्या वहाँ भी कमीने ब्राह्मण दलितों और पिछड़ों को सताते हैं ? क्या वहाँ भी रेप होते हैं। वहाँ किसी तरह का स्त्री विमर्श होता है ? क्या आपको कहीं परमानंद श्रीवास्तव या ओम प्रकाश वाल्मीकि दिखे जो आप के पीछे -पीछे ही गए हैं?  हो सकता है वो अभी नरक की लिफ्ट में  हों। पर मुंशी प्रेमचंद तो वहाँ जरुर होंगे। उनको गए तो एक ज़माना हो गया। उन्होंने तो छूटते बनारसी अंदाज़ की भोजपुरी में आपसे पूछा होगा-" का हो राजेन्दर हमार हंस के तू कउआ बना देहलअ"  इस पर राजेन्द्र जी हंस कर कहते होंगे -घबराइए नहीं मुंशी जी आपकी खबर लेने वाले दलित चिंतक पीछे आ रहे हैं।
ये मज़ाक नहीं एक पीड़ा है जो मेरे अंदर घनीभूत हो रही है। हंस शायद आगे भी छपे पर अब उसमें कांटे की बात नहीं होगी।  कहानियां होंगी पर उसमें राजेंद्र यादव की  छाया नहीं होगी। एक बात तो तय है कि राजेंद्र यादव जहाँ भी होंगे मस्त होंगे। उन्हें दुनिया कि हर खूबसूरत चीज़ से मुहब्ब्त थी।  मौत भी उनके लिए यक़ीनन खूबसूरत रही होगी।

Saturday, November 16, 2013

मोदी के देस में भंसाली की रासलीला



बस अभी अभी रात एक बजे नोएडा के वेव सिनेमा से रामलीला देखकर वापस लौटा हूँ और मूड इतना ख़राब है सोचता हूँ कि फ़िल्म पर अभी कुछ लिख कर अपना गुस्सा शान्त कर लूं. लेकिन इसे अपने ब्लॉग पर कल ही पोस्ट करूंगा जिसमें से कुछ गुस्सा सुबह तक जरुर एडिट हो जाएगा।
सच कहूं तो टाइम्स ऑफ़ इंडिया की फाइव स्टार रेटिंग और रामलीला के नाम पर हो रहे विवाद को देखकर गोलिओं की  रासलीला देखने का मन इतनी जल्दी बना लिया। और थोड़ी और ईमानदारी से कहूं तो टीवी के प्रोमो में रात दिन चल रहीं दीपिका की दिलकश आदाएं भी काफी हद तक  इस जल्दबाज़ी के लिए जिम्मेदार थीं। दीपिका पादुकोण को मैं सम्भावनाशील अभिनेत्री मानता हूं। उसमें गज़ब की  शोखी,शरारत और तीखापन है। कई दफा वो आँखों से डायलॉग करती नज़र आती है। ये जवानी है दीवानी और चेन्नई एक्सप्रेस जैसी हाल की  फिल्मों  में अलग किस्म का किरदार निभाया। वह किसी भी कैरेक्टर में वैसे ही डूब है जैसे समंदर में मछली। फिर उस गहराई से वह किसी जलपरी की  तरह बाहर  निकल कर सबको चौंका देती है। वह सचमुच बेहतरीन अदाकारा है इस फ़िल्म में ये साबित भी हो गया क्योंकि भंसाली के इशारे पर उसने छिछोरेपन के अभिनय में रणवीर का जो भरपूर साथ दिया वह यादगार रहेगा । अंग्रेजी के फ़िल्म क्रिटिक इसे दोनों के बीच कामयाब कमेस्ट्री का नाम दे रहे हैं।  रणवीर सिंह तो छिछोरेपन के अभिनय का सुपरस्टार है। मुझे याद है कि उसकी पहली फ़िल्म बैंड,बाजा बारात के एक गाने में उसकी हीरोइन ने उसे चल हट छिछोरे कहा था।  पर वह छिछोरापन फ़िल्म की कहानी का हिस्सा  था. भंसाली ने इसे अपनी फ़िल्म में छिछोरे पन का ये तत्व डाल कर फ़िल्म को हल्का और कमज़ोर बना  दिया है। मुझे याद नहीं आता कि भंसाली की  किसी फ़िल्म में एक भी गोली  चली हो लेकिन इस फ़िल्म में उन्होंने अपना ये कोटा भी पूरा कर दिया है। फ़िल्म में  गोलिओं की ऐसी रासलीला रची गई है कि  गैंग्स ऑफ़ वासेपुर की श्रंखला पीछे छूट गई है। 
 भंसाली ने फ़िल्म में पहले ही बता दिया था की ये फ़िल्म रोमिओ जूलियट के नाटक पर आधारित है. रोमिओ जूलियट शेक्सपीयर का एक दुखान्त नाटक है जिसमें दो पुराने इज्जतदार घरानों की आपसी आन की लड़ाई दिखाई गई है. आख़िर में दोनों एक दूसरे की  रज़ामंदी से बेहद नाटकीय तरीके से मर जाते हैं।  शेक्सपीयर की रोमिओ जूलियट की  कथावस्तु तो इटली से ली गई है लेकिन भंसाली ने अपनी देसी रोमिओ जूलियट के लिए मोदी के गुजरात को चुना। मोदी का नाम मैंने यहाँ ज़बरदस्ती इसलिए लिया क्योंकि उनके बिना आजकल कोई कहानी बनती और बिकती नहीं। मोदी ने अपना राजनीतिक करियर भले चाय बेच कर शुरू किया हो पर आजकल वह अपमार्केट का हिस्सा हैं। मोदी के नाम पर आप कुछ भी बेच सकते हैं. मैं देख रहा हूँ मोदी के नाम पर रिपोर्टर खूब बाई लाइन बटोर रहे हैं और नरेश अग्रवाल जैसे नेता टीवी फुटेज पा रहे हैं। । भारत रत्न लता जी से लेकर गुजरात के ब्रांड एम्बेस्डर बच्चन जी तक सबकी दूकान मोदी जी के नाम पर चल रही है. रोमिओ जूलियट में मोटांग्यू- कैप्युलेट दुश्मन घराने गुजरात के रजोड़ी और सनाड़ी से कही मेल नहीं खाते और वहां बिकने वाले हथियार गांधी के गुजरात की बेमेल तस्वीर दिखाते हैं।
 ख़ैर मैं रामलीला और रोमिओ जूलियट की बात कर रहा था. भारत में इस कथावस्तु पर कोई दो हज़ार फ़िल्में बन चुकी होंगी। भंसाली ने भी एक बचकाना प्रयोग किया है. शेक्सपीयर का  रोमिओ भी दिलफेक तबियत का नायक है उसके प्रेम की  शुरुआत भी वासना और रूप की  जलन के साथ दैहिक होती है लेकिन अंत में जाकर दिल में अटक जाती है। ऐसा ही राम यानी रोमिओ रणवीर और लीला यानी जूलियट दीपिका के साथ भी होता हैं। भंसाली की  ये प्रेम कहानी बिना किसी भूमिका के सीधी देह से शुरू होकर रास लीला को विस्तार देती चली जाती है। शेक्सपीयर से प्रेरणा लेकर लिखी गई ऐसी कहानी पर भला कौन यकीन करेगा जिसमे पहली ही मुलाक़ात में नायिका अपने ही घर में  अपने होठों से रंग लगा कर शत्रु परिवार के प्रेमी से होली खेलती हो। फ़िल्म में कहीं कहीं कुछ रोमांचक दृश्य एकदम से बांध लेते हैं लेकिन जल्द ही वे किसी छिछोरी पतंग की  डोर की  तरह हत्थे से कट जाते हैं। बाज दफा ऐसा  लगता है फ़िल्म के कुछ हिस्से भंसाली ने डायरेक्ट किये हैं और कुछ ज्यादा हिस्से डेविड धवन ने। और अगर आप घर परिवार वाले शरीफ इंसान हैं तो रामलीला दिखाने  के चक्कर में बच्चों को थियेटर लेकर मत चले जाइएगा क्योंकि अगर गोली न चली होती तो भंसाली ने कामसूत्र की एक कला तो लगभग दिखा ही दी थी।
हम दिल दे चुके सनम, ब्लैक और देवदास जैसी फ़िल्में देखने के बाद  मैं संजय लीला भंसाली काबिल डायरेक्टर  मानने लगा था. लेकिन इस फ़िल्म ने निराश किया। कच्छ के रेगिस्तान में रंग बिरंगे संगीतमय दृश्य डाल कर पब्लिक को बहुत ज्यादा देर तक बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। भंसाली सेट को भव्य बनाने और वस्त्र सज्जा की कला में माहिर हैं।  फिल्मों में लोक तत्व फ़िल्म में भंसाली ने एक गाने में प्रियंका चोपड़ा को आइटम गर्ल की तरह इस्तेमाल किया। इस गाने में रोमिओ राम के हाथ में बियर दिखती है और वह प्रियंका चोपड़ा का मुजरा देख रहे होते हैँ।  अब ये सब देख कर अगर धर्म भीरु लोग नाराज़ हो रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं.जिन्होंने वाल्मीकि रामयण पढ़ी है वो तो सब्र कर लेंगे लेकिन तुलसी के राम भक्तों का नाराज होना स्वाभाविक है. भंसाली पर इन लोगों की भावनाओं की गैर इरादतन हत्या का सीधा मामला बनता है। लेकिन हमारे देश में अभिव्यक्ति की रासलीला का अधिकार कोई कैसे छीन सकता है। जज साहब ने रामलीला के टाइटिल पर प्रतिबन्ध लगा दिया फिर भंसाली के राम फ़िल्म में जो चाहे सो करते रहें।  ये तुमने कैसी लीला रची है भंसाली प्रभु  !