दयाशंकर शुक्ल सागर

Saturday, May 14, 2016

हिन्दू आतंकवाद और इस्लाम

हिन्दू आतंकवाद शब्द का मुहावरा जिन्होंने भी गढ़ा वह निहायत ही बेवकूफ किस्म का इंसान रहा होंगे। उन्हें न भारतीय इतिहास का पता है न यहां की संस्कृति का। हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं रहा उस दौर में भी जब उन पर जुल्मों सितम की इन्तहा थी। आप उस दौर का इतिहास पढ़िए जब भारत में इस्लाम नया नया आया था। उस दौर में भारत में तीन तरह के नागरिक थे। एक तुर्क सरदार जिनके इशारे पर सल्तनत काल में शासक बने। ये जातीय श्रेष्ठता के घमंड में रहते थे। दूसरे भारतीय मुसलमान जिन्हें निहायत नीची नजर से देखा जाता था। और तीसरे गैर मुसलमान जिन्हें हिन्दू कह कर बुलाया जाता था। शुरूआती दौर में दरबार में कोई बड़ा पद हिन्दुओं  और भारतीय मुसलमानों को नहीं दिया जाता। इब्‍न बतूता के मुताबिक दरबार के मंत्री, सचिव, जज, सब विदेशी मुसलमान थे। उनके लिए खुरासानी शब्द चल पड़ा। इनकी दिलचस्पी भारत में सिर्फ लूट खसोट की थी। बर्नी ने लिखा है-सल्तनत की नीति थी कि हिन्दुओं पर इतने टैक्स लगा दिए जाएं कि बगावत की सोच तक न पाएं। उनके खेतों में सिर्फ इतना अनाज छोड़ा जाए ताकि वह गुजर बसर करें और अपने खेत छोड़ कर न भाग जाएं। बर्नी की तारीख ए फिरोजशाही की रामपुर पोथी पढ़िए। सल्तनत के जुल्मों से शिकार लोगों ने बीस गुना लगान से नाराज होकर अपने खलियान जला दिए। दस बीस लोगों के जत्‍थे बनाकर वे जंगलों में जाकर छिप गए। लगान वसूलने वाले लगान के खाली रजिस्टर लेकर राजधानी पहुंचे। नाराज सुल्तान ने लश्कर लेकर दोआब पर धावा बोल दिया। बेगुनाहों का कत्लेआम हुआ। बागियों को जिन्दा लटका दिया गया। छुटपुट तौर पर हिन्दुओं की तरफ से प्रतिक्रिया हुई। बर्नी लिखता है कि हिन्दुओं की हमलावरों के प्रति नफरत सिर्फ उनके सामाजिक बर्ताव में झलकती थी लेकिन उनकी हिंसा का जवाब हिंसा से देने का ख्याल उनके दिल में कभी नहीं आया। हिन्दुओं को सिर्फ आत्मरक्षा के लिए हिंसा की इजाजत है

ईश्वर तुम्हारे करीब है

ईश्वर की खोज-२



मेरे नास्तिक दोस्त कहते हैं ईश्वर मनुष्य की निराशा और हताशा का दूसरा नाम है। ईश्वर को हमने बनाया। हम नहीं रहेंगे तो ईश्वर भी नहीं रहेगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह सिर्फ हमारा अहंकार है कि हम उसे अपनी कृति अपनी खोज मानते हैं। जबकि सच है कि हमने उसे कभी खोजने या जानने की कोशिश नहीं की। और खोजना भी क्यों? वह तो है हमारे आसपास कहीं। हम ही उसे महसूस नहीं कर पाते। क्योंकि हमारी संवेदनाएं कहीं खो हो गई हैं।
रवींद्रनाथ की एक मशहूर रचना है-गीतांजलि। इसमें उन्होंने ईश्वर के गीत गाए हैं। इसी कृति पर उन्हें नोबल प्राइज मिला। सारी दुनिया में उनकी चर्चा हो गई। लेकिन रवींद्रनाथ के घर के पास ही एक बुजुर्ग रहता था। उसने रवींद्रनाथ से एक दिन पूछ लिया- तुमने सच में ईश्वर को जाना है? रवीन्द्रनाथ सकपका गए। ये सवाल उनसे किसी ने नहीं पूछा था। रवींद्रनाथ ईमानदार आदमी थे तो झूठ भी नहीं बोल सकते थे। वे बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए। इसके बाद तो वह बुजुर्ग उनके पीछे पड़ गया। जब रवीन्द्र नाथ दिखते वह उनसे रोक कर पूछता-तुमने सच में ईश्वर को जाना है? सच बताओ? नोबल प्राइस विनर रवीन्द्र परेशान हो गए। उस बुजुर्ग से बच कर निकलने लगे। सोचने लगे-गीतांजली लिखना गुनाह हो गया इस बुड्ढे की वजह से।
रवीन्द्रनाथ ने कभी ईश्वर को खोजने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन इस आदमी ने उनके लिए मुश्किल पैदा कर दी। वह कहीं भी जाते उनके दिमाग में यह प्रश्न होता ईश्वर कहां है? कैसा है? उसे कैसे पाया जा सकता है। उसे कैसे समझा जाए? ताकि वह उस बुजुर्ग को समझा पाएं कि हां मैंने ईश्वर को जाना है। लेकिन इसका कोई उपाय नहीं था।

कई साल गुजर गए। वे बारिश के दिन थे। नई—नई बारिश हुई। आषाढ़ का महीना और पहले मेघ बरसे। डबरे, तालाब, पोखरों पर नया पानी भर गया है। सड़क के किनारे जगह—जगह गड्डे भर गए हैं। सौंधी मिट्टी की खुशबू से उनका कमरा भर गया। बाहर आसमान में काले बादल उमड घुमड़ रहे थे। वे खुद को घर में रोक नहीं पाए। चल पड़े समुद्र की तरफ। समुद्र के तट पर खड़े थे। सूरज निकला। समुद्र में सूरज की छाया बनी, प्रतिबिंब बना। सूरज समुद्र में झलकने लगा। दर्शन किया सूरज का, दर्शन किया प्रतिबिंब का। लौटने लगे घर को। एक—एक पोखरे में सूरज झलकता था। एक—एक छोटे से डबरे में, सड़क के किनारे गंदा पानी भरा था, वहां भी सूरज झलकता था। सब तरफ सूरज झलकता था। गंदे डबरे में भी, सागर में भी, स्वच्छ पोखर में भी, सब तरफ सूरज झलकता था। रवीन्द्रनाथ नाचते हुए घर लौटे।
इस पूरी खोज में उन्हें एक सच हाथ लगा वह यह कि प्रतिबिंब कभी गंदा नहीं होता।  सूरज का प्रतिबिंब स्वच्छतम पानी में भी पड़ा है तो भी उतना ही ताजा और स्वच्छ है और गंदे से गंदे पानी में भी पड़ रहा है तो भी उतना ही पवित्र है। प्रतिबिंब तो गंदा नहीं हो सकता। रिफ्लेक्यान तो कैसे गंदा होगा! गंदा पानी हो सकता है, पर जो सूरज की छाया उसमें बन रही है, जो सूरज उसमें झांक रहा है, वह तो गंदा नहीं है। वह तो बिलकुल ताजा है, वह तो बिलकुल स्वच्छ है। उसे तो कोई पानी गंदा नहीं कर सकता।
इस अनुभव से उन्हें पता चला कि ईश्वर क्या है? वह एक बड़ा प्रतिबिम्ब है। जो हर इंसान में है। पापी में भी है पुण्यात्मा में भी। वह उतना ही शुद्ध और पवित्र है। लौटते वक्त वह बुजुर्ग भी मिला। लेकिन इस बार उसने रवीन्द्रनाथ को रोक कर वह सवाल नहीं पूछा। बुजुर्ग ने उन्हें गले लगा लिया। और कहा -तेरे चेहरे की चमक बता रही है कि तूने ईश्वर को जान लिया। अब तू नोबल से बड़े पुरस्कार का हकदार हो गया।






Monday, May 2, 2016

ईश्वर क्या हैः एक वैज्ञानिक अध्ययन



विज्ञान और नास्तिकों की बेचैनी और छटपटाहट मैं समझ सकता हूं। दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिकों में गिने जाने वाले स्टीफन हॉकिंग ने हाल में कहा है कि इस दुनिया को बनाने वाला कोई भगवान नहीं है। यह दुनिया भौतिकी के नियमों के हिसाब से अस्तित्व में आई। उनके मुताबिक बिंग बैंग गुरुत्वाकर्षण के नियमों का ही नतीजा था। स्टीफन हॉकिंग ने अपनी नई किताब 'द ग्रैंड डिजाइन' में ईश्वर की किसी भी भूमिका की संभावना खारिज करते हुए कहा कि ब्रह्मांड का निर्माण शून्य से भी हो सकता है।
पता नहीं क्यों मुझे डार्विन की थ्योरी ठीक लगती है कि इंसान जानवरों का वंशज है। ईश्वर ने उसे पैदा नहीं किया। क्योंकि उसे सीधे ईश्वर ने बनाया होता तो वह इतना उपद्रवी कैसे हो सकता है? जितना मैंने पढ़ा और समझा है मैं इसी नतीजे पर पहुंचा हूं कि हमने ईश्वर को अपनी कल्पनाओं में इन बेकार के कामों में जबरदस्ती फंसा दिया है। ईश्वर कोई मिस्‍त्री नहीं जो बनाने बिगाड़ने का काम करे। वह किसी इंसान बनाने वाली फैक्ट्री की मशीन भी नहीं जो बतौर प्रोडक्ट इंसान पैदा करता चला जाए। पहले इंसान को पैदा करे फिर एक दिन मार दे। फिर किसी नए गर्भ में जन्म दे और एक दिन उसे कत्ल कर दे। कभी रोग से कभी किसी एक्सीडेंट में या कभी उम्र के साथ शरीर को जीर्ण शीर्ण करके। फिर कभी कोई जन्म से विकृत बच्चा हो तो उसका जिम्मेदार भी ये खुदा है। पंड़ित मौलवी कहें ये तुम्हारे और इस नवजात  के पूर्व जन्म का फल है। और इसके लिए आप ईश्वर को कोसें। नही माफ कीजिए ईश्वर ये सब नहीं करता और न ये सब करना चाहता है।
और सृष्टि को बनाना और फिर उसे चलाना भी कितना बोरिंग, कितना ऊबाऊ काम है। क्या आप सोचते हैं अरबों से साल ईश्वर यही काम कर रहा है? जैसे कि वह कोई की-मैन हो। सुबह पानी की सप्‍लाई ऑन करे शाम को आफॅ करे। कुछ नहीं तो रोज सुबह उठ कर सृष्टि में घड़ी की तरह चाभी भरे।  
स्टीफन एकदम सही कह कहे हैं कि ब्रह्मांड या प्रकृति के सारे नियमों को विज्ञान से समझा जा सकता है। बस हमें सूत्र पकड़ने हैं। सटीक तौर पर वह थ्योरम खोजनी है जिससे यह सृष्टि बनी। या सृष्टि का शून्य से विस्तार हुआ तो उसका फार्मूला क्या था? यह कोई कठिन काम नहीं। मुझे पूरी उम्मीद है एक न एक दिन विज्ञान ये साबित कर देगा हमारे जिन्दा रहते।
तो ये सारा ड्रामा क्या है?
इसका जवाब मैंने वेद, उपनिषदों और आगे वेदान्त में पाया। दरअसल हमने सृष्टि और सृष्टा को अलग अलग मान लिया। जैसे कि पश्चिम ने मान लिया। लेकिन हमारे वेद फिर तैतरीय उपनिषद ने साफ कहा-शुरू में कुछ नहीं था न सत न असत न स्वर्ग न अंतरिक्ष न पृथ्वी। यानी शून्य था और उसी से सृष्टि का विस्तार हुआ।   भारतीय धर्मग्रन्थ कहते है की सृष्टि की रचना के पहले कुछ नहीं था न प्रकाश था न अन्धकार था न पृथ्वी थी न आसमान था अगर था तो सिर्फ शून्य। बाद में शंकराचार्य ने अपने अद्वैतवाद सिद्धान्त में कहा- ब्रह्मांड में सिर्फ ईश्वर है और कोई दूसरा अन्य नहीं। यानी पेड़ पौधे हवा मनुष्य जो भी है वो ईश्वर है और ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं। । विज्ञान कहता है की शून्य से अचानक ही एक बैंग के साथ ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई यानी सम्पूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति किसी एक से ही हुई है। तो शंकराचार्य और पौराणिक ग्रन्थ दोनों ही स्टीफन के दावों की पुष्टि करते हैं। विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति के पहले कुछ नहीं था।  हमारे ग्रं‌थ भी कहते है की ब्रह्मांड की उत्पत्ति कुछ नहीं था।
अब आप कहेंगे फिर ईश्वर बीच में कहां से आ गया? क्यों आ गया?
बिलकुल ठीक प्रश्न है। हमारे प्राचीन ग्रंथ और कुछ आधुनिक दार्शनिकों ने इसे बखूबी समझाया है। रसायन विज्ञान में एक अजीबो गरीब वैज्ञानिक प्रक्रिया है कैटेलेटिक एजेंट । ये ऐसे तत्वों का जोड़ है जो खुद किसी क्रिया में हिस्सा नहीं लेता लेकिन फिर भी इनके बिना कोई क्रिया नहीं हो सकती। इसे ऐसे समझें। जल यानी पानी हाईड्रोजन और ऑक्सीजन का जोड़ है। विज्ञान भी कहता है कि हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के अलावा पानी में और कुछ नहीं है। यानी जल एक रसायनिक पदार्थ है जिसका रसायनिक सूत्र H2O है। यानी हाईड्रोजन के दो अणु और आक्सीजन के एक अणु से मिलकर पानी बनता है। लेकिन विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सिर्फ हाईड्रोजन और ऑक्सीजन मिलने से पानी नहीं बनता। उसे पानी बनने के लिए कैटेलेटिक एजेंट की भी जरूरत पड़ती है। हैरत की बात है कि अगर आप हाईड्रोजन और ऑक्सीजन के जोड़ को तोड़ें तो ये केटेलेटिक एजेंट की ऊर्जा आपको कहीं नहीं दिखेगी।  केटेलेटिक एजेंट की मौजूदगी ही उसका रोल उसकी भूमिका है। ये करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। ये न हो तो पानी का अस्तित्व भी न हो। ऐसे ही ईश्वर है। वह करता कुछ नहीं सिर्फ मौजूद रहता है। उसके रहने भर से प्रकृति अपना काम करती है। कल ये प्रकृति भी नहीं रहेगी तो वह रहेगा। क्योंकि प्रकृति से पहले भी वह था। उसकी मौजूदगी के बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती। इसकी मौजूदगी में सृष्टि खुद ब खुद चलती है।
फिर आप कह सकते हैं कि बस इतना सा ही काम है तो उसका होना क्यों जरूरी है?
ये सवाल उठ सकता है। बेशक ये तार्किक प्रश्न है। इसे ऐसे समझें। हर एक बीज अपने आप में एक ब्रह्मांड है। एक बीज में कितनी आपर संभावनाएं छिपी हैं। दुनिया के सारे पेड़ नष्ट हो जाएं ‌सिर्फ एक बीज पूरे संसार को पेडों से ढक सकता है। वह बीज पेड बनेगा। उस पर फूल और फल आएंगे और उसके साथ आएंगे अन्नत बीज। फिर हर बीज से एक नया पेड़ बनेगा। यह प्रक्रिया जारी रहेगी। आप समझें ईश्वर हर बीज को अंकुरित नहीं कर रहा है। यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जिसके तहत बीज अंकुरित होते हैं। तो इस हिसाब से सारे बीज अनिवार्य रूप से अंकुरित होने चाहिए। लेकिन नहीं। ऐसा नहीं होता। सिर्फ वही बीज अंकुरित होते हैं जिन्हें ईश्वर चाहता है। बीज के अंकुरण में ईश्वर की मौजूदगी अनिवार्य है। यही ईश्वर की  महत्ता है। ये वाकई एक अबूझ पहेली है। लेकिन दिलचस्प है। ईश्वर की मेरी खोज जारी है। और आपकी?



 संदर्भ ग्रंथ-
कॉसमाालॉजी आफ ‌दि ऋग्वेदा-एच डब्लू वालिस
तैतरीय उपनिषद तृतीय संस्करण चौखम्बा प्रकाशन
आईडिया आफ गॉड -प्रिगिंल, पैटिसन
तर्कदीपिका अथल्ये का द्वितीय संस्करण
Times of Refreshing: A Worship Ministry Devotional By Tom Kraeuter, Gerrit Gustafson, Kent Henry, Bob Kauflin, Patrick Kavanaugh
Man's Fate and God's Choice: An Agenda for Human Transformation-By Bhimeswara Challa

Friday, April 29, 2016

कृपया संस्कृत का मजाक न उड़ाएं

आप संस्कृत का मजाक उड़ा रहे हैं। शौक से उड़ाइए। लेकिन इससे आप इंकार नहीं कर पाएंगे कि इसी संस्कृति की बदलौत भारत दुनिया में गणित गुरू है। जो दशमलव पद्धति decimal system आज आधुनिक गणित का आधार है। वह संस्कृत ने दिया। शून्य संस्कृत की देन है जिसके जरिए आज आप बड़ी से बड़ी गिनती लिख सकते हैं। संस्कृत में रेखागणित की खोज भी दिलचस्प ढंग से हुई। वैदिक युग में यज्ञ के लिए वेदियां बनती थीं। उन पर विभिन्न आकृतियों की सही-सही नाप बनाने के कारण इस युग में रेखागणित के सूत्रों का विकास हुआ, जो शुल्व सूत्रों के रूप में जाना गया है। शुल्व का अर्थ उस रस्सी से है जो यज्ञ की वेदी बनाने में माप के काम आती थी। बोधयान शुल्व सूत्र यानी पाइथागोरस थ्योरम संस्कृत ने दिया। दुनिया को दर्शन, भाषा शास्‍त्र, तुलनात्मक धर्म अध्ययन, विचार विज्ञान, प्राचीन आख्यायिकका विज्ञान संस्कृत ने सिखाया।
बाइबिल और कुरान जल प्रलय की कहानी से शुरू होती है। जल प्रलय की मौलिक कथा संस्कृत ने दी। बाइबिल पहली सदी में लिखी गई और कुरान सातवीं सदी में। लेकिन जल प्रलय की कहानी आपको अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में मिल जाएगी। ये ग्रंथ निर्विवाद रूप से ईसा मसीह के जन्म से हजारों साल पहले लिखे गए। जल प्रलय की कहानी भारत से मिस्‍त्र गई। फिर ग्रीक आई और उसके बाद बाइबिल में आई। कहानी में थोड़ा बदलाव जरूर हुआ पर महाप्रलय कथा किवदंती बन गई। यह कहानी ईसा के जन्म से दस हजार साल पहले की है। प्रलय के बाद मनु ने सृष्टि की। मनु की पत्नी मानवी थी जो आगे चलकर एडम और ईव फिर कुरान में आदम और हौव्वा के नाम से जाने गए। तब इस सृष्टि में सिर्फ दो लोग थे-उन्हें मनु और मानवी कहें या आदम और ईव। यह वही जल प्रलय था जिसने दुनिया को हिला दिया। कुछ विद्वान मानते हैं कि तभी हिमालय निकला। लेकिन यह असंगत है क्योंकि संस्कृत साहित्य का हिमालय से गहरा संबंध रहा है। संस्कृत का इतिहास कहता है- जल प्रलय से पहले 6 मनु थे और जल प्रलय के बाद भी न जाने कितने मनु हुए। फिर मनु स्मृति किसने लिखी ये ईश्वर जाने। हमारे विद्वान बुद्धिजीवि ये माने बैठे हैं कि जो मनु स्मृति में लिखा है वही हिन्दुत्व है। जबकि मनु की महान परम्परा और संस्कृत साहित्य के महासागर में मनु स्मृति एक मामूली किताब है जिसे शायद ही किसे ने मान्यता दी हो। संस्कृत की तमाम अन्य दंतकथाएं आपको लेटिन और फारसी में मिल जाएंगी।
हमारी बदकिस्मती है कि आधुनिक युग में संस्कृत का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ। 19सवीं सदी में मैक्समूलर, कीथ, वेबर, विंटरनित्स जैसे पश्चिमी विद्वान पहली बार इस भाषा को दुनिया के नक्‍शे पर लाए। इसके बाद रामानुजम जैसे महान गणितज्ञ ने इसी संस्कृत के बल पर आधुनिक गणित को विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत दिए। अब जब आईआईटी में संस्कृत के अध्ययन की बात हो रही है तो आप संस्कृत मजाक उड़ा रहे हैं। दरअसल आप खुद दया और उपहास के पात्र हैं। और क्या कहूं?

Monday, April 18, 2016

सलाम/नमस्ते /सत श्री अकाल


डा. जाकिर नाईक एक इस्लामिक स्कॉलर हैं। उन्हें नापसंद करने के तमाम कारणों के बावजूद मैं उन्हें पसंद करता हूं। क्योंकि वे इस्लाम के विद्वान हैं। कुरान की आयतों और हदीसों की वह वैज्ञानिक व्याख्याएं करने का दावा करते हैं जैसे हमारे हिन्दू धर्म में कई विद्वान कर्मकांडों को तमाम तरह से वैज्ञानिक ठहराते हैं। खैर कुछ दिन पहले मैं डा. जाकिर नाईक का एक वीडियो देख रहा था जिसमें एक हिन्दू ने अपना सवाल पूछने से पहले उन्हें नमस्ते किया। लेकिन डा. नाईक ने उस अभिवादन का जवाब नहीं दिया। सवाल सुनने के बाद डा. नाईक ने उन महोदय से उल्टा सवाल पूछा-आप नमस्ते का मतलब जानते हैं। सउदी के रहने वाले उस बेचारे गरीब हिन्दू को क्या पता कि नमस्ते क्या होता है। हम सब एक दूसरे को रोज नमस्ते बोलते हैं लेकिन हममे से अधिकांश लोग उसका मतलब नहीं जानते। डा. नाईक यह मनोविज्ञान जानते हैं इसलिए उन्होंने पलट कर उस बेचारे से नमस्ते का मतलब पूछ लिया। उसे बेवकूफ साबित कर उसका मजाक भी उड़ाया। फिर उन्होंने  अहंकार से लबरेज लफ्जों में कहा कि-ठीक है मैं आपको नमस्ते का मतलब बताता हूं। उन्होंने कहा नमस्ते संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है मैं आपके सामने झुकता हूं। सउदी अरब के उस हॉल में डा. नाईक के लिए खूब तालियां बजीं। आगे उन्होंने कहा-इसीलिए मैंने आपके नमस्ते का जवाब नहीं दिया। क्योंकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी के आगे झुकना हराम है।
डा. नाईक ने सही कहा इस्लाम ईश्वर के अलावा किसी के आगे झुकने की इजाजत नहीं देता। लेकिन डा. नाईक ने संस्कृत के प्रसिद्ध वैदिक मंत्र के अंश- इदं न मम की गलत व्याख्या की।  'इदं न मम' अर्थ है यह मेरा नही है, कुछ भी मेरा नहीं है। इसका प्रयोग प्रायः यज्ञ में आहुति के लिए किया जाता है। इसका नमस्ते से कोई लेना देना नहीं। इदं न मम की और कई अद्भुत दार्शनिक व्याख्याएं हैं। पर उस पर फिर कभी। लेकिन डा. नाईक को नहीं पता कि हिन्दी का नमस्ते शब्द संस्कृत के नमस शब्द से निकला है। इस भावमुद्रा का अर्थ है एक आत्मा का दूसरी आत्मा से आभार प्रकट करना। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से इसकी उत्पत्ति नमस्ते= नमः+ते। यानी तुम्हारे लिए प्रणाम से हुई। संस्कृत में प्रणाम या आदर के लिए 'नमः' अव्यय प्रयुक्त होता है, जैसे- "सूर्याय नमः" (सूर्य को प्रणाम है)।
इस भावमुद्रा की एक अध्यात्मिक व्याख्या भी है। किसी को नमस्ते कहते वक्त हमारे दोनों हाथ हृदय चक्र  पर होते हैं। ऐसा करते वक्त हमारे मन में एक दैवीय प्रेम का बहाव होता है। सिर को झुकाने और आँखें बंद करने का अर्थ है अपने आप को हृदय में विराजमान ईश्वर को अपने आप को सौंप रहे हैं। इसीलिए हमारे योगी गहरे ध्यान में डूबने के लिए भी खुद को भी नमस्ते करते हैं। दोनों हाथ हृदय चक्र पर होते हैं। जब यह किसी और के लिए किया जाए तो यह एक सुंदर भावदशा होती है। हिन्दुओं के पास अभिवादन के लिए नमस्ते के अलावा एक शब्द है-प्रणाम। ये संस्कृत के प्रणत शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है विनीत होना, नम्र होना और किसी के सामने सिर झुकाना। प्राचीन काल से प्रणाम की परंपरा रही है। जब कोई व्यक्ति अपने से बड़ों के पास जाता है, तो वह प्रणाम करता है।
इसी तरह इस्लाम में भी अभिवाद के लिए बहुत प्यारा तरीका हैं। इस्लाम में जब एक मुसलमान दूसरे मुसलमान से मिलता है तो वह एक दूसरे से अभिवादन के तौर पर ‘अस्सलामु अलय्कुम’ या ‘अस्सलामु अलय्कुम व रहमतुल्लाह’ या फिर पूरी तरह से ‘अस्सलामु अलय्कुम व रहमतुल्लाही व बरकातहू’ कहते है । जिसका मतलब होता है ‘अल्लाह की आप पर सलामती, दया और कृपा रहे’ । यह एक दुआ (प्रार्थना) है जो एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की शुभकामना और सलामती के लिए अल्लाह यानी ईश्वर से करता है।
सिखों में अभिवादन के लिए एक पद है सत श्री अकाल। आम तौर पर मेरे कई ‌सिख मित्र ससरिया काल कह देते हैं जो गलत है। चंडीगढ़ के मेरे एक पत्रकार मित्र वीपी सिंह नागरा ने पहली बार मुझे इसका अर्थ समझाया।  इसका अर्थ  है सत यानी सत्य, श्री एक सम्मानसूचक शब्द है और अकाल का अर्थ है समय से रहित। यानी ईश्वर इसलिए इस वाक्यांश का अनुवाद मोटे तौर पर इस प्रकार किया जा सकता है, "ईश्वर ही अन्तिम सत्य है"। जो अकाल है। जो कभी नष्ट नहीं हो सकता। सिखों के दसवें गुरु द्वारा यह जयकारा सिखों को दिया गया था, "बोले सो निहाल, सत श्री अकाल"। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति यह कहेगा कि ईश्वर ही अन्तिम सत्य है उसपर चिरकालिक ईश्वर का आशीर्वाद रहेगा।
तो डा. नाईक साहेब आप स्कालर होंगे इस्लाम के लेकिन आपसे आग्रह है कि किसी अन्य संस्कृतियों, परम्पराओं या धर्म के बारे में फतवा देने से पहले तथ्यों पर जरूर गौर लिया करें। ज्ञान एक अनोखी चीज है। जो नष्ट नहीं होती। अज्ञान जरूर आपको नष्ट कर देता है। 

Saturday, February 27, 2016

महिषासुर का सच-१



मैं कोई छह साल पहले मैसूर गया था। मनोरम पहाड़ियों के बीच बने चामुंडा देवी के मंदिर भी गया। दक्षिण शैली में बना वह एक खूबसूरत है। इस मंदिर में दुर्गा की एक मनमोहक प्रतिमा है। मैंने उसकी तस्वीर खींच कर उसे फ्रेम करा लिया था। लौटकर फ्रेम में मढ़ी यह तस्वीर मैंने अपनी मां को उपहार में दी थी। और तब मां का कहना था कि इससे सुंदर तोहफा मैंने उन्हें इससे पहले कभी नहीं दिया। खैर मुझे अच्छी तरह याद है तब उस इलाके में महिषासुर की कीर्ति गाथा मुझे कहीं सुनने को नहीं मिली।
इस बारे में एसआर दारापुरी साहब ने मैसूर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के प्रोफ़ेसर महेश चन्द्र गुरु के हवाले से बताया “वह एक बौद्ध राजा था जो कि आम लोगों के मानवाधिकारों का बहुत ख्याल रखता था परन्तु ब्राह्मण वर्ग ने उसे एक असुर के रूप में प्रचारित किया एवं दावा किया कि उसे चामुंडेशवरी (दुर्गा का अवतार) ने मारा था जो कि एक कल्पित देवी थी।” चामुंडा पहाड़ी पर महिषा जयंती मनाई जाती है। इस सूचना पर मुझे जरा भी संदेह नहीं न कोई हैरत है। क्योंकि हमारे देश के तकरीबन हर गांव में आपको पौराणिक आख्यानों पर ऐसे मिथक व पुराकथाएं सुनने को मिल जाएंगी। इनका न कोई ऐतिहासिक आधार है न वैज्ञानिक। यह जनश्रुतियों पर आधारित कथाएं हैं जिन्हें एकत्र करके कोई भी नया विवाद खड़ा कर सकता है। ठीक वैसे जैसे बौद्ध कथाएं कहती हैं कि सीता राम की बहन थी। फिर उन्होने साउथ के किसी लेखक सिद्धास्वामी की पुस्तक “महिषासुर मंडल” (महिषासुर राज्य) के हवाले से बताया कि पहाड़ी के प्रवेश पर महिषा की मूर्ति चिक्क्देवाराजा वाडियार के राज काल में स्थापित की गयी थी। अब देखिए इतिहास में चिक्क्देवाराजा वाडियार 1673 ईसवी में मैसूर के राजा थे। यह मुगलों का दौर था। बस इनका इतिहास बोध यही आकर खत्म हो जाता। जबकि भारत के प्राचीन साहित्य में दुर्गा एक आदि देवी रही हैं। यह परिकल्पना बेशक हमारे देश की मातृसत्तात्मक परिवार संस्कृति से निकली होगी। मातृदेवी की पूजा के चिन्ह हमारी सबसे पुरानी मोहनजोदाडो सभ्यता से मिलते हैं। उससे भी पहले हमारी कबीलाई संस्कृति में इसके सैकडों चिन्ह मिले हैं। पहली बार उत्तर वैदिक युग के साहित्य में दुर्गा का जिक्र आया। तैत्तिरीय आरण्यक में शिव को उमा या अम्बिका का पति बताया गया। केन उपनिषद में हैमवती उमा का उल्लेख है। पौराणिक ग्रंथ महाभारत में दुर्गा के दो लम्बे आख्यान स्तोत्र व भीष्म पर्व में पढ़ने को मिलते हैं। लेकिन दुर्गा और उनके सम्प्रदाय पर सबसे अधिक काम मार्कण्डेय पुराण में हुआ। आज हम दुर्गा को जिस महिषमर्दिनी के रूप में जानते हैं उसका मूल स्रोत मार्कण्डेय पुराण ही है। इस पुराण का एक हिस्सा देवी माहात्‍म्य या सप्तशती कहलाता है जो पूरी तरह देवी दुर्गा को समर्पित है। इसमें महिषासुर वध की पूरी कथा है। ये पुराण कितने प्राचीन हैं इसका अंदाजा आज तक कोई नहीं लगा सका। क्योंकि ऋग्वेद में भी पुराण शब्द का उल्लेख है। फिर भी दुर्गा सप्तशती की सबसे प्राचीन पाण्डुलिपि ९९८ ईसवी की प्राप्त हुई है। लेकिन इतिहासकार मानते हैं यह इससे भी पुराना है। जोधपुर में सर्वमंगलमांगल्ये नामक अभिलेख मिला है जो ६०८ ईसवी का है। जिसमें देवीमाहात्म्य का श्लोक अंकित है। यानी दुर्गा सप्तशती 600 ई. से भी प्राचीन है। तो महिषासुर को आराध्य मानने वालों का तर्क है कि दुर्गा ने महिषासुर को धोखे से मारा। महिषासुर एक बहादुर, स्वाभिमानी नेता था, जिसे आर्यों द्वारा शादी के झांसे में फंसाया। इस काल्पनिक कथा को प्राचीन ग्रंथ सप्तशती के तथ्य धव्स्त कर देते हैं। क्योंकि इसमें सिर्फ महिषासुर के वध का ही जिक्र नहीं है। इसके अलग अलग पाठों में ध्रुमलोचन वधन, चण्ड और मुण्ड वध, रक्तबीज वध, निशम्‍भु वध का भी जिक्र है। तो क्या देवी दुर्गा ने इन सबसे विवाह किया था? यह कल्पना भी हास्यास्पद है। तो आप समझ सकतें हैं मिथ के हवाले से कैसी फर्जी कहानियां गढ़ी जाती हैं। इसका मकसद सिर्फ दलित और आदिवा‌सियों को भड़का कर उन्हें गोलबंद करना होता है।
जारी



Thursday, February 25, 2016

मुश्किल वक्त

देखिए कितना मुश्किल वक्त है। अपनी बेटियों की तालीम के लिए अपनी तनख्वाह से कुछ पैसे बचाना चाहता हूं। लेकिन तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा इनकम टैक्स में कट जाता है। इस टैक्स का कुछ हिस्सा जेएनयू के उन लड़कों की तालीम पर भी खर्च होता है जो उस दिन कैम्पस में भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी के नारे लगा रहे थे। वे उस इंसान की बरसी मनाने के लिए जमा हुए थे जिसने फांसी से पहले खुलेआम टीवी इंटरव्यू पर कबूल किया था कि वह हिन्दुस्तान से बेतरह नफरत करने वाले गाजी बाबा का चेला है और सिर्फ पैसे के लिए आतंकी बन गया। उसने लोकतंत्र के प्रतीक हमारी संसद पर हमला किया। इसको बचाने में हमारे आठ जवान शहीद हुए। इस देश की सबसे बड़ी अदालत ने उस अफजल गुरू को फांसी की सजा सुनाई थी। तो ऐसे नारे लगाने वालों के प्रति नाराजगी स्वभाविक थी। आप इसे इंसानी कमजोरी भी कह सकते हैं। मेरा सिर्फ ये मानना है कि जेएनयू या किसी भी कैम्पस में ये पढ़ने आए हैं पढ़ें। देश की ज्वलंत समस्याओं पर मंथन करें। वाद विवाद करें। लेकिन ऐसा कुछ न करें जिससे देश के किसी आम नागरिक की भावना को ठेस पहुंचे। तो देश के एक नागरिक की हैसियत से यह सिर्फ एक स्टैंड था। ऐसे लोगों साथ देकर इनका मनोबल नहीं बढ़ाना चाहिए। लेकिन मेरे इस एक विचार ने जैसे मुझे गुनाहगार बना दिया। बुनियादपरस्त, दक्षिणपंथी, कट्टर हिन्दूवादी, ब्राह्मणवादी जैसे वे तमाम जुमले मेरे नाम के साथ जुड़ गए जिसका मैं ता जिन्दगी विरोध करता रहा हूं। मुझ पर आरोप लगे कि मैं संघ परिवार के जहरीले प्रचार का शिकार हो गया। मेरे दोस्त आधी रात को फोन करके मुझे बताने लगे कि मैं आरएसएस का एजेंट बन गया हूं। साहेब से कोई पुरस्कार पाने की लालसा में मेरा रुख बदल गया है। ये मासूम लोग समझ नहीं पा रहे कि जो संघ परिवार चालीस साल में मेरा ह्रदय परिवर्तन नहीं कर पाया वह जेएनयू के एक प्रकरण पर मुझे अपना गुलाम बना लेगा। पर मुझे कोई हैरत नहीं हुई क्योंकि कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों की जहनियत से मैं बहुत खूब वाकिफ हूं। वे खुद को बहुत उदार और विराट सोच का प्रोजेक्ट करते हैं लेकिन उनकी सोच निहायत तुच्छ होती है। उन्हें लगता है कि वे हमेशा सही होते हैं। लेकिन मैंने उन्हें हमेशा पांखड से घिरा पाया। वे मजदूरों के हितों की बात करते हैं और अपने बंगलों में बाल मजदूरों से काम कराते हैं। पूंजीवाद का विरोध करते हैं और खुद लम्बी कारों में घूमते हैं। ईश्वर से नफरत करते हैं और छुप कर मंदिरों में मूर्ति के आगे हाथ फैलाते हैं और जुमे की नमाज पढ़ते हैं। पंड़त कामरेड जनेऊ पहनते हैं और मियां कामरेड पांच वक्त की नमाज पढ़ते हैं रोजा रखते हैं। ये पाखंड है जिससे मैं नफरत करता हूं। इनके अलावा कुछ दोस्त, शुभचिन्तक या आप जो चाहे उन्हें कहें। वे भी पीछे पड़ गए। तुम्हें क्या हो गया है? तुम बदल गए हो? अरे भाई आपको क्या हुआ है? जो गलत है वह आपको दिखता नहीं। आप कहते हैं ये राष्ट्रवाद नहीं है। मैं कहता हूं राष्ट्रवाद की ढाई सौ से ज्यादा परिभाषाएं हैं। तो क्या हुआ? किसी परिभाषा में देशद्रोही नारों को जायज नहीं ठहराया जा सकता। खैर इस पर मुझे आपको कोई सफाई नहीं देनी। लेकिन यह समझ लें ऐसे मुद्दों पर आप गलत तरफ खड़े होकर देश को असली फासीवाद की तरफ ले जा रहे हैं। हालांकि मैं तब भी उसके विरोध में खड़ा हूंगा। पर तब आप मुझसे मत कहिएगा कि मैंने आपको चेताया नहीं था।