दयाशंकर शुक्ल सागर

Tuesday, December 29, 2015

हौसले की इस मासूम उड़ान को पंख दे दो सरकार


टीवी सीरियल और असल की जिंदगी में बड़ा फर्क  होता है। चर्चित टीवी सीरियल ‘उड़ान’ की प्यारी चकोर किसी भी गरीब लड़की के लिए प्रेरणा बन सकती है। लेकिन ऊना की बख्शो चकोर को नहीं जानती, क्योंकि उसके घर में टीवी नहीं है। पढ़ाई के अलावा उसका ज्यादातर वक्त अपनी भैंसों को चारा खिलाने और घर के कामकाज में ही बीत जाता है। वह पहली बार जब स्कूल के ठंडे मैदान में नंगे पांव पांच किलोमीटर दौड़कर जिला स्तरीय प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतती है तो उसे पता ही नहीं चला कि कब उसके कदमों को पंख लग गए। यह सिर्फ हौसले की उड़ान थी, जिसने आज हिमाचल की बिटिया को जिंदगी की क्रूर सच्चाई के बीच हजारों बेटियों को उम्मीद का प्रतीक बना दिया।
हमारे पास कोई कहानी नहीं थी। सिर्फ  नंगे पांव दौड़ती एक उड़नपरी की तस्वीर थी, पीछे उसके कई प्रतिद्वंद्वी बच्चे स्पाइक और ट्रैक सूट में दौड़ रहे थे। बस कहानी बन गई। एक ऐसी परीकथा जो न सिर्फ  देश बल्कि विदेशों से जुड़े हमारे आनलाइन पाठकों के दिलों को छू गई। मदद के लिए हजारों हाथ आगे बढ़े। बख्शो का गांव ईसपुर आज सबकी जुबान पर है। लोग मदद के लिए उसके गांव पहुंच रहे हैं। हमारे ईसपुर संवाद साथी मोहित पाठक ने बताया कि आज ही एक एनजीओ उनके गांव आया और उसने बख्शो को 12वीं तक पढ़ाने का जिम्मा लिया। बख्शो की विधवा मां विमला देवी इतनी भावुक हो गईं कि कुछ कहने के बजाय वह अपनी बिटिया की तरफ देखने लगती है। उम्मीद खो चुकी उनकी आंखों में सिर्फ  आंसू होते हैं। यह कह पाना मुश्किल है कि ये खुशी के आंसू है या उस पीड़ा के जो बरसों से इस अकेली मां के दिल में कहीं गुबार बन कर दफ़न थे।
विमला देवी से बात हुई तो वह कुछ ज्यादा बोल नहीं पाईं। उसके पति पवन कुमार जंगल में लकड़ी काटने का काम करते थे। इसी दौरान पेड़ गिरा और उनकी मौत हो गई। पिछले नौ साल से एक झोपड़ी में मेहनत मजदूरी करके अपनी चार बेटियों और एक बेटे का पेट पाल रही है। सरकारी तंत्र का मजाक देखिए सारे कागज जमा हैं, लेकिन आज तक उसे विधवा पेंशन शुरू नहीं हुई। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों के लिए केंद्र व राज्य सरकार की दर्जनों योजनाएं हैं। लेकिन एक भी योजना का लाभ इस गरीब परिवार को नहीं मिल रहा। बस लड़कियों को 700-800 रुपये सालाना वजीफा मिलता है। यह परिवार भुखमरी का शिकार नहीं है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि विमला के पास इच्छाशक्ति के साथ गहरी जिजीविषा है और बख्शो जैसे प्रतिभावान बच्चे हैं जो उसे कभी टूटने नहीं देंगे।
जिंदगी की दौड़ फिर भी इतनी आसान नहीं। बख्शो को शनिवार को धर्मशाला में राज्यस्तरीय दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लेना है, लेकिन उसके कोच तरसेम सैनी कहते हैं यह दौड़ बख्शो के लिए आसान नहीं होगी। उसे पत्थरी है। ज्यादा दौड़ने पर उसके पेट में तेज दर्द उठता है। जिला प्रतियोगिता की 5 किलोमीटर की दौड़ में भी यह दर्द उठा था, लेकिन पेट दबाकर उसने जीत की रेखा को पार किया। फिर गिरकर बेहोश हो गई। कई महीने पहले डॉक्टर ने पत्थरी के ऑपरेशन की सलाह दी थी, लेकिन गरीब परिवार इलाज का खर्च उठाने की हालत में नहीं है। सैनी कहते हैं इसी वजह से हम उसे ज्यादा प्रैक्टिस नहीं करा पा रहे। डॉक्टरों ने बख्शो को ज्यादा स्ट्रेस न लेने की सलाह दी है।

यह दर्दनाक कहानी अकेली बख्शो की नहीं। बख्शो जैसी हमारे प्रदेश में हजारों बेटियां हैं जिनकी प्रतिभा गरीबी की गलियों में दम तोड़ रही है। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसी प्रतिभाओं को खोजे, उन्हें तराशे और आगे बढ़ाए। बख्शो को आगे बढ़ाने के लिए अमर उजाला ने खेल निदेशक राकेश शर्मा से पहले ही दिन बात की, लेकिन उन्होंने कहा कि वह बक्शो को नहीं जानते। उन्हें पूरी कहानी बताई गई तो उन्होंने कहा वह अभी छुट्टी पर हैं। तीन दिन बाद उनसे फिर बात की गई तो उन्होंने कहा कि हां ये मामला उनके संज्ञान में आया है। बख्शो के लिए जो अच्छा हो सकेगा, वह करेंगे।
तो आप इसके लिए किसी एक अफसर को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। सरकारी सिस्टम ऐसे ही काम करता है। सरकारी तंत्र ठीक से काम करता तो विमला देवी को हर महीने कम से कम 600 रुपये विधवाओं को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन मिलती। बीपीएल योजना के तहत उसे घर बनाने के लिए पैसा मिलता और इस परिवार को झोपड़ी में बसर नहीं करना पड़ता। गरीब बेटियों के लिए नि:शुल्क इलाज योजना है। बख्शो का ठीक से इलाज होता और पेट में पत्थरी लेकर नहीं दौड़ना पड़ता।
आपके मन में कितनी ही पवित्र भावनाएं हो, लेकिन अगर आप उसे हकीकत में नहीं बदलते तो आपके इरादे नेक नहीं माने जा सकते। मानवीय अधिकारों से वंचित इस परिवार की कहानी सूबे के दूसरे गरीब परिवारों से अलग नहीं। हाल के बरसों में सरकारी तंत्र का इतना अमानवीयकरण हुआ है कि वह तकरीबन संज्ञा शून्य हो गया है। उनको कुछ भी छूता नहीं। यहां तक बच्चों की मासूम आंखें भी उन्हें नहीं पिघलाती।
ऐसी उड़न परियों की हम सिर्फ  कहानियां सामने ला सकते हैं। आशा और निराशा के थपेड़ों के बीच उनकी उदासी दूर नहीं कर सकते। बख्शो की मदद के लिए सैकड़ों हाथ आगे बढ़ गए हैं। लेकिन यकीन जानिए जब तक सरकारी तंत्र संवेदनशील नहीं होगा, हर परीकथा का अंत इतना सुखद नहीं होगा।

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