दयाश्‍ांकर श्‍ाुक्‍ल सागर

Monday, October 2, 2017

महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग भूमिका




सत्य के मुखमंडल पर
एक स्वर्णावरण चढ़ा हुआ,

प्रभु! इस आवरण को
हटाओ
ताकि मैं यथार्थ में
सत्य के दर्शन कर सकूं।
- ईशावास्य उपनिषद् से

महात्मा गांधी ने अपनी मृत्यु से ठीक एक साल पहले कहा था कि मैं शारीरिक इच्छा से मुक्त हूं या नहीं, इस बात का पता शायद मेरी मृत्यु के बाद लगे। लेकिन दुर्भाग्य है कि गांधीजी की मौत के बाद बुद्धिजीवियों ने इस प्रश्न पर चालाकी से चुप्पी साध ली। उन्हें डर था कि यह प्रश्न अगर उठाया गया तो गांधीजी की महान तसवीर खंडित होगी। गांधीवाद के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकना और दुकान चलाना कठिन हो जाएगा। इसलिए इस 'महान प्रयोग' से जुड़े तमाम सारे सवाल खामोशी से दफन कर दिए गए। सत्य और अहिंसा के अलावा महात्मा गांधी ने ब्रह्मचर्य पर कीमती प्रयोग किए। महात्मा के सत्य और अहिंसा से जुड़े प्रयोगों पर बहुत काम हुआ लेकिन ब्रह्मचर्य के प्रयोग को इतिहास की रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।
चीन के बौद्धिक जगत में एक कहावत मशहूर है-'हर महापुरुष एक सामाजिक संकट है।' महात्मा गांधी के बारे में भी यह बात बहुत दिनों तक कही जाती रही। लेकिन हत्यारे नाथूराम गोडसे ने उनके सीने में तीन गोलियां उतार कर महात्मा गांधी के जीवन और उनके विचारों पर चलने वाली तमाम बहसों को हमेशा के लिए शांत कर दिया। महात्मा गांधी अगर अपनी स्वाभाविक मौत मरते तो निःसंदेह उनके विचारों, आदर्शों और उनके प्रयोगों पर आलोचनात्मक ढंग से टीकाएं सामने आतीं। तब हम अपने महात्मा को शायद संपूर्णता से समझ पाते और उनके बारे में अपनी कोई राय कायम करते। लेकिन भारत का धर्मभीरु समाज मृतकों को उनके सारे गुनाहों के लिए न केवल माफ कर देता है बल्कि उन पर चर्चा करना भी मुनासिब नहीं समझता।
के बाद में गांधीजी पर बहुत लिखा गया और थोड़ा बहुत उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोग पर भी। इस संदर्भ में मैंने जितने लेख, किताबें और टिप्पणियां आदि पढ़ीं उनमें इस प्रयोग का जिक्र टुकड़ों में पाया। सब कुछ बहुत दबे ढके शब्दों में था ताकि गांधीजी का महात्मापनकहीं आहत न हो। सच तो यह है कि इन आधी - अधूरी जानकारियों ने ही गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बारे में गलतफहमी का माहौल पैदा किया।
ब्रह्मचर्य के प्रयोग पर पश्चिम के विद्वानों ने काफी काम किया। आर्थर कोएलस्कर ने 1960 में दॅ लोटस एंड दॅ रैबिट लिखी। एरिक एच एरिक्सन ने 1969 में गांधीज : ट्रुथ आन द ओरिजिन्स आफ मिलीटेंट नान – वायलेंस लिखी। वेद मेहता ने 1976 में महात्मा गांधी एंड हिज अपोसेल्नाम से एक बेहतरीन किताब लिखी। लेकिन अंग्रेजी में लिखी ये किताबें आम हिन्दी पाठकों की समझ और पहुंच से बहुत दूर थीं। पर इन किताबों और लेखों ने यह प्रेरणा जरूर दी कि इस गंभीर विषय पर एक लंबे और सार्थक काम की जरूरत है।
महात्मा के ब्रह्मचर्य प्रयोग पर काम करते वक्त कई मित्रों ने पूछा कि मैं कीचड़ में कंकड़ डालने का काम क्यों कर रहा हूं? जाहिर था कि वे लोग मेरे इस काम से प्रसन्न नहीं थे। मजे की बात यह थी कि इनमें से अधिकांश लोग गांधीजी के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। न उन लोगों ने कभी गांधीजी के बारे में पाठ्य पुस्तकों में दर्ज बातों के अलावा कुछ आगे पढ़ने की जहमत की थी। लेकिन फिर भी वह गांधीजी के खिलाफ कुछ भी पढ़ने - सुनने को राजी नहीं थे।
कुछ मित्रों का कहना था कि हिन्दी में यह किताब महात्मा की छवि ध्वस्त करेगी। राष्ट्रपिता के बारे में ऐसी बातों से कितनों की भावनाएं और आस्थाएं आहत होंगी। एक आदमी जो इस दुनिया में जीवित नहीं है उसके बारे में लिखने का क्या मतलब? मुझे यह तर्क बेमानी लगा। इस देश में गांधीजी की छवि इतनी कमजोर नहीं जो एक मामूली - से धक्के से टूट कर बिखर जाए। ब्रह्मचर्य के प्रयोग पर यह बहस उस समय भी हुई थी जब खुद महात्मा जिंदा थे। उन्होंने अपने ऊपर लगे एक - एक आरोप का जवाब दिया। ये जवाब बाकायदा लिखत - पढ़त में आज भी मौजूद और सार्वजनिक हैं। यह अलग बात है कि ये जवाब कई दफा बहुत ज्यादा संतोषजनक और तर्कसंगत नहीं दिखते। लेकिन अगर पाठकों को उन जवाबों से संतुष्टि मिल जाती है तो यह गांधीजी और उनके प्रयोग की सफलता कही जा सकती है या फिर गांधीजी के प्रति उनकी कोरी आस्था। इस विषय में अंतिम फैसला मैंने पाठकों पर ही छोड़ दिया है।
इतिहास का पुनर्लेखन या कहें पुनर्पाठ एक खतरे से भरा खेल है। वक्त के साथ घटनाओं के संदर्भ और अर्थ बदल जाते हैं। समय उन ऐतिहासिक घटनाओं को समझने का नजरिया बदल देता है। एड्स के इस खतरनाक युग में ब्रह्मचर्य की अपनी महत्ता और जरूरत है। गांधीजी के युग में ब्रह्मचर्य चाहे इतनी बड़ी समस्या न रही हो लेकिन आज के युग में ब्रह्मचर्य न केवल प्रासंगिक है बल्कि यह प्रश्न अनिवार्य भी होता जा रहा है। अब समय आ गया है जब हम ब्रह्मचर्य पर नए और आधुनिक ढंग से सोचें और उसे पुनर्परिभाषित करें। और इसकी शुरुआत अगर महानायक महात्मा गांधी से हो तो क्या बुरा है।
डीजी तेंदुलकर की महान ग्रंथ शृंखला महात्मा की भूमिका लिखते वक्त जवाहरलाल नेहरू ने कहा था ‘महात्मा गांधी के जीवन की असली कहानी वही लिख सकता है जो उनके जैसा महान हो।लेकिन मुझे लगता है कि अब वक्त आ गया है जब हम नए नजरिए से अपने महापुरुषों का जीवन चरित्र लिखें। और ऐसा करते वक्त हम किसी शल्य चिकित्सक की तरह तटस्थ हों। तब मन में उस महापुरुष के प्रति न श्रद्धा - भक्ति हो, न घृणा या तिरस्कार का कोई भाव। एक तरह की अनासक्ति हो। यह जोखिम भरा काम है। पर ये जोखिम उठाने होंगे।
महात्मा के ब्रह्मचर्य का प्रयोग उनके जीवन के अंतिम समय तक चलता रहा। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा की गोली मार कर हत्या कर दी गई। इससे पहले महात्मा यह कभी नहीं बता पाए कि उनके ब्रह्मचर्य के महान प्रयोग का क्या नतीजा निकला। वह इस अद्भुत प्रयोग के नतीजे दुनिया को नहीं दे पाए। महात्मा नहीं बता सके कि वह युवा लड़कियों के साथ नग्न सो कर पूर्ण ब्रह्मचर्य प्राप्त कर सके अथवा नहीं। उनके प्रयोग का रहस्य उनकी राख के साथ ही गंगा की पवित्र धारा में बह गया। लेकिन इस प्रयोग से जुड़े कई सवाल वह पीछे छोड़ गए। जिनके जवाब खोजने का साहस पुरानी पीढ़ी तो नहीं जुटा सकी, शायद नई पीढ़ी खोज ले।
2 अक्टूबर 2006

मेरी किताब-महात्मा गांधी ब्रह्मचर्य के प्रयोग की भूमिका

Friday, September 22, 2017

इस्लाम और मूर्तिपूजा



हिन्‍दुओं में मूर्ति पूजा नहीं थी। प्राचीनतम उत्‍खनन में शिवलिंग जरूर मिले लेकिन उसके पूजन के प्रमाण नहीं मिले। भारत में मूर्ति पूजन बौद्धों के प्रभाव से शुरू हुआ। महात्मा बुद्ध सारी उम्र व्यक्ति पूजा व कर्मकाण्ड के विरोधी रहे। फिर भी सबसे ज्यादा बुत उन्हीं के बने। कुछ भाषाशास्‍त्री मानते हैं कि बुत लफ्ज बुद्ध शब्द से ही जन्मा और अरब में प्रचलित हुआ। ये अलग बहस का विषय है। अरब के कबिलों के बद्दू, बूत परस्त थे। उन्होंने पत्‍थर और लकड़ी के बने इन बुतों को ही खुदा मान लिया था। उनकी मान्यता थी कि इन बुतों में खुदा की रूहें बसती हैं। ये 600 ईसवी और इसके पहले का दौर था।
अरब के ये बुत दरअसल अरब के भोले भाले कबिलेवासियों से पैसा एंठने के जरिए थे। इन्हें मक्का के धर्म स्‍थल काबे में इकट्ठा किया गया था। तो आप देखें मक्का के सरदारों की ‌जिन्दगी का दारोमदार उन खुदाओं पर था, जो मक्के के काबा में रहते थे। हर साल अरब के सारे कबिले इनकी इबादत के लिए यहां आते थे और सरदारों से खरीद फरोख्त करते जिससे उनका कारोबार चलता था। मुहम्मद साहब की एक खुदा की बात तार्किक थी। ये सरदार भी समझते थे। इन सरदारों का तर्क था कि-हम भला 300 खुदाओं की जगह एक खुदा कैसे ला सकते हैं? वह भी ऐसा खुद जो कहीं दिखता नहीं। फिर भी हर जगह मौजूद है। मक्के में मदीने में सारे जहां में चांद में भी और आफताब में भी। तो हम ऐसे खुदा को कैसे मान लें। हमारे खुदा हमारी इबादत भी हैं और दौलत भी।
आप देखें मुहम्मद साहब का एक खुदा हमारे प्राचीनतम ग्रंथों के एकेश्वर वाद के सिद्धान्त के साथ खड़ा था। हिन्दुओं ने मूर्तियों की पूजा की लेकिन उन्हें कभी खुदा नहीं माना। हिन्दुओं का ईश्वर भी दिखता नहीं पर वह हर जगह मौजूद है। हर जगह है तो इन मूर्तियों में क्यों नहीं? ईश्वर सिर्फ मूर्तियों में है ये सोचना गलत है। इसलिए मूर्ति पूजा हिन्दुओं की कोरी नासमझी नहीं थीं। वह सिर्फ ईश्वर के प्रति ध्यान में डूबने का एक माध्यम थीं।
हिन्दुओं के सनातन धर्म में एक दूसरी धारा भी है जो ईश्वर को मूर्तियों में नहीं खोजती। वह मूर्ति विरोधी है। लेकिन इन दोनों धाराओं में कभी कोई टकराव नहीं दिखा। मुझे लगता है कि मुहम्मद साहब के फलसफे की उनके व्याख्याकारों व मौलानाओं ने गलत व्याख्या की। वे भूल गए कि कुरान में मूर्ति पूजा विरोध का मतलब बुतों को खुदा समझने वालों से है। आक्रान्ताओं ने मूर्ति पूजा विरोध को इस्लाम से जोड़ कर हिन्दुस्तान में लूट और खसोट का अपना मंसूबा पूरा किया।
त्योहारों और पर्वों के मौके पर आजकल दिमाग में यही सब चल रहा है सो लिख ‌दिया।

Monday, August 8, 2016

आदम हव्वा और हिन्दुस्तान



इस्लाम में हजरत आदम की कथा है। कुरान के मुताबिक ये दुनिया, फरिश्ते और जिन्न आदि को बनाने के बाद खुदा ने मिट्टी और पानी मिलकर अपना ही एक प्रतिरूप तैयार किया। वह पहला इंसान था जिसे उसने आदम का नाम दिया। उसकी बायीं पसली से हव्‍वा बनाई। जो उनकी बीवी बनी। दोनों जन्नत के खूबसूरत बाग में रहते थे। शैतान के बहकावे में आकर दोनों ने खुद का हुक्म तोड़ा। इस जुर्म के लिए उन्हें जन्नत से निकाल कर धरती पर भेज दिया गया और खुदा ने शाप दिया तुम्हारी औलादें मेहनत करके ही खाएंगी। ये बड़ी मशहूर कहानी है जो लगभग थोड़े बदले हुए रूप में कुरान से बहुत पहले लिखे गए बाइबिल में भी मिलती है। लेकिन आदम और हव्वा धरती के किस कोने में उतारे गए यह किसी को नहीं पता। अरब वासियों की मान्यता है कि खुदा ने उनको हिन्दुस्तान में उतारा था। इसे उन्होंने "हिन्दुस्तान जन्नतनिशां" नाम दिया। उनकी मान्यता है कि उनका पहला कदम सरन्दीप पर पड़ा। प्राचीन स्वर्णद्विप यानी वर्तमान लंका को अरब वासी इसी नाम से जानते थे। उनकी मान्यता है कि आदम और हव्वा के पांव के निशान आज भी वहां के किसी पर्वत पर मौजूद हैं।
भारत के जिस प्रदेश में हजरत आदम रहे उसका नाम दजनाय था। यानी भारत वर्ष का दक्खिनी भाग। एक जमाने में अरब देश में इसी दक्षिण भाग से अनके तरह के सुदंधित पदार्थ व फल, मसाले निर्यात होते थे। उनका कहना था कि यह सब सुगंधित द्रव्य हजरत आदम अपने साथ जन्नत से लाए थे। इनमें छुआरे के अलावा नीबू और केले थे। एक अमरूद भी जन्‍न्त का फल था जो भारत में ही पाया जाता था।

मैं साफ कर दूं यह कहानी दक्षिणपंथी इतिहासकारों की गढी हुई नहीं है। ये अरबी इतिहासकारों की कथाएं हैं। इमाम जलालुद्दीन अल सुयूती की मशहूर किताब "तफसीर दूर्रे- मंसूर " के पहले ही खंड के 55वें सफे पर आपको ये कहानी मिल जाएगी। ये किताब 1505 ईसवी की है। ये कहानी उन्होंने इब्ने जरीर, इब्ने अबी हातिम और हाकिम के हवाले से दी है। ये सब आठवीं और नवीं सदी के इस्लामिक स्कालर रहे हैं।
एक कदम और आगे बढ़ते हुए मीर आजाद बिलग्रामी ने अपनी मशहूर किताब "सुबहतुल मरजान फी आसरे हिन्दोस्तान" में भारत की तारीफ में लिखा-हजरत आदम सबसे पहले भारतवर्ष में ही उतरे और यहीं उन पर ईश्वरी आदेश आया। तो यह समझना चाहिए कि यह वह देश है जहां सबसे पहले ईश्वरी संदेश आया था। इससे प्रमाणित होता है कि हजरत मुहम्मद साहेब का स्वभाविक लगाव हिन्दुस्तान से था। इसीलिए वह कहते थे- "मुझे भारतवर्ष की ओर में ईश्वरीय सुगंध आती है।" (ऐसा जिक्रकिसी हदीस में आया है)। बताता चलूं कि मीर आजाद बिलग्रामी 18सदी में भारत में अरबी, उर्दू और फारसी के बड़े स्‍कालर माने जाते हैं। https://en.wikipedia.org/wiki/Azad_Bilgrami

एक वैज्ञानिक सोच रखने के कारण में इन कथाओं को ऐतिहासिक घटना नहीं मान सकता। ये भी एक मिथ है जैसा कि आदम हव्वा, रामायण और महाभारत की कहानियों को एक मिथक माना जाता है। मिथक बन चुकी घटनाओं को प्रमाणित करना तकरीबन नामुमिकन है जब तक किसी टाइम मशीन का आविष्कार नहीं कर लेते। लेकिन फिर भी अपने अपने मिथों पर हर देश की प्रजा कहीं न कहीं आस्‍था रखती है। इन्हें हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।

जिन किताबों का जिक्र मैंने यहां किया वह अरबी और उर्दू के प्रामाणिक ग्रंथ है। इनमें से कुछ नेट पर भी उपलब्‍ध हैं। जिन इस्लामिक इतिहासकारों का मैंने हवाला दिया वे मामूली नहीं हैं। हर नाम के साथ उनका शानदार इतिहास आपको नेट पर मिल जाएगा। लेकिन इन किताबों की कभी कोई चर्चा नहीं करता। पाठ्यक्रमों में यह कहानी आपको कहीं नहीं मिलेगी। क्योंकि हमारे सारे पाठ्यक्रम मार्क्सवादी इतिहासकारों ने गढे हैँ जो ब्रिटिश इतिहासकारों के प्रभाव से कभ्री मुक्त नहीं हो पाए। जैसे दक्षिणपंथी इतिहासकार आर्यो के मूल स्‍थान की लड़ाई में ही उलझे रहे। जबकि इस तरह के तथ्य सभी स्कूली बच्चों को पढ़ाए जाने चाहिए जो हमारी कौमी एकता को न केवल मजबूत करेंगे बल्कि यहां के मुसलमान भाई भी इस धरती पर जन्म लेने पर फख्र करेंगे।




Wednesday, June 8, 2016

Tuesday, June 7, 2016

मुफ्त का माल


स्विट्जरलैंड के नागरिकों ने सरकार की ओर से मुफ़्त की राशि लेने से इंकार कर दिया। सवाल उनके आत्मसम्मान का था। स्वीट्जरलैंड सम्पन्न देश है। हर तरफ जरूरत से ज्यादा खुशहाली है। मुझे वहां भिखारी नहीं मिले। हां कार्नवीन मेट्रो स्टेशन पर लम्बे पुराने ओवर कोट में खड़े वायलनवादक जरूर मिले। वे मेट्रो और ट्राम में वायलन बजाते हैं। थोड़ी देर बाद वह वायलन बजाना बंद करके अपने ओवरकोट की जेब से एक गिलास निकलते हैं। और यात्री उसमें सिक्के डालने लगते हैं। मैं इसे भीख नहीं मानता। उनकी वायलन से निकलने वाली धुन सम्मोहित कर देती है। और आपको जेब में हाथ डाल कर स्वीट्ज फ्रेंक निकालने पर मजबूर कर देती है।
इसलिए जब ये खबर आई तो मुझे हैरत हुई कि क्या वहां की सरकार उन्हें मुफ्त भी कुछ देती होगी। मुझे याद आया कि हमारा देश सबसीडी पर चलता है। और सबसीडी को हम अपना हक मान लेते हैं। और गैस सिलेंडर या राशन में सबसीडी घटने पर हम बेतरह नाराज हो जाते हैं जैसे किसी ने हमारी जेब काट ली।

मैंने कहीं एक कहानी पढ़ी थी। गुजरात में एक अरबपति सेठ हुआ करता था। हीरे का व्यापारी था। हर साल करोडों का टर्न ओवर था। एक भिखारी उसके दफ्तर के बाहर खड़ा होकर इकतारा बजाया करता था। वह एक खास धुन बजाता जिसे सुनकर सेठ मुग्‍ध हो जाता। और चपरासी के हाथ से हजार रुपए भिजवा देता। यह सिलसिला महीनों जारी रहा। एक दिन सेठ ने कहा तुम रोज इकतारा बजाते हो मुझे पैसे भिजवाने पड़ते हैं। वक्त जाया होता है। ऐसा करो हर महीने आकर इकट्ठे दस हजार रुपए ले जाया करो। भिखारी की मौज हो गई। वह बिला नागा हर महीने बाकायदा दस हजार रुपए मैनेजर से ले जाता। कई साल ऐसे ही बीत गए। एक दिन मैनेजर ने उसके हाथ पर पांच हजार रुपए रख दिए। भिखारी बिगड़ गया। बोला-मैनेजर साहब ये क्या है? मैंनेजर बोला- सेठ दिक्कत में हैं। कारोबार में घाटा चल रहा है। फिर उनकी बेटी की शादी भी है अगले महीने। बहुत खर्चे हैं। भिखारी और नाराज हो गया। बोला- हद हो गई। अब मेरे पैसों पर सेठ अपनी बेटी की शादी करेंगे। बुलाओ सेठ को कहां है?
तो यही हाल हमारे हिन्दुस्तान का है। जो फ्री में मिलता है उसे अपना हक समझ लेते हैं। वह आरक्षण हो या सबसीडी। आपको भी सोचना चाहिए इस पर। आखिर कब तक मोबाइल पर 15 लाख के मैसज का इंतजार करते रहेंगे?

कौन नहीं चाहता कि गो हत्या पर रोक लगे



गो हत्या से जुड़ी मेरी पोस्ट पर अच्छी बहस हो गई। ये मुद्दा संवेदनशील है इसलिए इसे ढंग से समझने की जरूरत है। जल्दबाजी में आप कोई नतीजा नहीं निकाल पाएंगे। हमारा संविधान गो हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध के मसले पर बड़ी चालक तरह से खामोश है। कोई भी राज्य गो हत्या पर रोक लगाने के लिए पूरी तरह आजाद है। लेकिन संविधान में यह नीतिगत निर्देश के रूप में नहीं आता। आजादी से पहले साम्प्रदायिक दंगे के पीछे अमूमन एक ही वजह होती थी- गो हत्या। संविधानसभा में सेठ गोविंद दास और पंडित ठाकुर दास भार्गव गो हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लाने के लिए प्रस्ताव लेकर आए। यूनाइटेड प्रोविसंस के मुस्लिम प्रतिनिधि एचएस लारी भी चाहते थे कि इस मसले पर संविधान में साफ तौर पर कुछ कहा जाए ताकि देश को साम्प्रदायिक दंगों से निजात मिले। खुद डा. अम्बेडकर इसे राज्य नीति के दिशा निर्देशक सिद्धान्तों में शामिल करने को तैयार हो गए थे। लेकिन कांग्रेस की तरफ से इसका विरोध किया टीटी कृष्‍णामचारी ने किया था। वे चेन्नई के ब्राह्मण थे। वे स्वतंत्र भारत के वित्त मंत्री भी रहे। कांग्रेस में घोटालों की शुरूआत का श्रेय इन्हीं महोदय को जाता। इन्हें स्कैम में फंस कर इस्तीफा देने वाले भारत के पहले केन्द्रीय मंत्री का दर्जा प्राप्त है। तो इन पंड़ितजी का कहना था कि इस मसले पर संविधानसभा को दखल देने का कोई अधिकार नही है। गो हत्या पर प्रतिबंध के बारे में अंग्रेजों की नीति जारी रखी जाए। इसे अलग से नीति निर्देशक सिद्धान्तों में जोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। संबंधित सरकार अपने विवेक से जो चाहे वह फैसला करे। जो गो हत्या पर देश में एक कानून की बात हमेशा के लिए खत्म हो गई।
इसके बाद इस मसले पर राजनीति हुई और हो रही है। और आज त्रासदी देखिए गाय को अपनी माता मानने वाला भारत आज बीफ का निर्यात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है। कम्युनिस्टों ने अपने राज्यों में गो हत्या पर प्रतिबंध नहीं लगाया वह केरल हो या पश्चिम बंगाल। अब आप देखिए जम्मू कश्मीर मुस्लिम बहुल प्रान्त है और यहां के कानून में गो हत्या पर रोक है। गोवा में भाजपा की सरकार है और वहां गो हत्या पर पूर्ण रोक नहीं है। नागालैंड में भी लम्बे अरसे तक भाजपा के सहयोग से सरकार रही और वहां भी गो हत्या पर रोक नहीं है। गोवा का तर्क है कि यह राज्य अन्तराष्ट्रीय पर्यटन का केन्द्र है। और हम अपने मेहमानों को गाय का गोश्त परोसने से मना नहीं कर सकते। नगालैंड का तर्क है कि नगा जनता के लिए गो मांस दाल चावल की तरह है। उस पर हम रोक कैसे लगा सकते हैं। जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया था कि किस तरह मोदी सरकार ने हिमाचल हाईकोर्ट के सवाल पर दो टूक जवाब दिया कि उनके हाथ में कुछ नहीं।

तो आप देखिए संघ परिवार का सारा गो-प्रेम सिर्फ नारों में है। और आप बेवजह भावुक हुए जाते हैँ।

Saturday, June 4, 2016

नए भारत की खोज-१



एक सवाल है। जो मैं अक्सर सोचता हूं। भारत में वर्ण व्यवस्‍था इतनी खराब है तो भारत की पांच हजार साल पुरानी संस्कृति अब तक कैसे जिन्दा है? पिछली करीब नौ दस सदियों से हिन्दू-मुसलमान इस देश का अभिन्न हिस्सा कैसे बने रहे? जबकि उनके सामाजिक जीवन में एक खास दूरी हमेशा से बनी रही है? फिर भी इकबाल को क्यों कहना पड़ता है कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी?
आखिर वह क्या बात है? एक मिसाल देंखे। १४५३ में तुर्कों ने यूनान पर हमला किया। लेकिन यूनान के यूनानी यूनानी रहे और तुर्की तुर्की। यूरेशिया में टर्की एक देश है। वहां पहले यूनानी रहते थे। ट्राय की मशहूर जंग यही समुन्द्र के किनारे हुई। तब तक यहां रोमन साम्राज्य था। तुर्कों ने हमला कर उन्हें खत्म कर दिया। वहां अब भी तुर्की बोली जाती है। वह टर्की की राजभाषा है। तुर्कों ने भारत पर भी हमला किया। यहां तुर्की कभी राजभाषा नहीं बन पाई। तुर्क भारत में घुल मिल गए। अवध में वे अवधी बोलते हैं। और सिंध में सिंधी। बंगाल में बंगाली। तुर्की के कुछ शब्द हिन्दुस्तानी भाषा में घुल मिल गए। पूरे देश में आपको एक भी घर ऐसा नहीं मिलेगा जहां तुर्की बोली जाती हो। ऐसा ही इससे पहले ग्रीक, कुषाण, हुण के साथ हुआ। वह कहां हैं आज किसी को नहीं पता। इस्लाम के उदय के बाद अरब, तुर्क और मुगल आक्रमणकारी भारत आए। जाति व्यवस्‍था से त्रस्त हिन्दुओं का एक बड़ा तबका मुसलमान बना। इन नए मुसलमानों का दो तरह के इस्लाम में सम्पर्क हुआ। एक वह कट्टर कठमुल्ले जो मंगोलों के हमले से भाग कर भारत आए थे। वे मानते थे कि मुसलमान को शरीयत की लकीर का फकीर होना चाहिए। वे चाहते थे कि भारत से गैर मुसलमानों का नामो निशान मिट जाए। लेकिन सुलतानों के लिए ये संभव नहीं था। क्योंकि तमाम सख्ती के बावजूद हिन्दू जनता मुसलमान होने को राजी नहीं थी। तो उन्हें बदलना पड़ा। क्या आपको यकीन होगा कि 1320 में खुसरो खां ने दिल्ली की तख्त पर बैठते ही पहली बार गोहत्या पर रोक लगा दी और कहीं कोई विरोध हीं हुआ। लेकिन नए मुसलमानों को धर्म परिवर्तन की सजा भुगतनी पड़ी। हिन्दू समाज ने उनसे दूरी बना ली। ऐसी दूरी उन्होंने हुणों, कुषाणों के साथ नहीं बनाई थी। 

ये नए मुसलमान सामान्य तौर पर दस्तकार और कारीगर थे। इन्होंने अपनी अलग बिरादरी बना ली। वे आपस की बिरादरी में ही रोटी बेटी का रिश्ता रखने लगे। लेकिन कई पुरानी हिन्दु मान्यताओं और रीति रिवाजों को वह छोड़ नहीं पाए। इस कारण अरब और तुर्क उन्हें नीची निगाह से देखते। हां अरब और तुर्क अफसरों के आगे नम्बर बढाने के लिए वह कट्टर जरूर हो गए।
इन नए मुसलमानों के लिए दूसरी तरह का इस्लाम शेख, पीर और सूफी संत लेकर आए थे। इनकी बातें उन्हें ज्यादा समझ आती क्योंकि उनके दर्शन में उन्हें हिन्दू आध्यात्म की झलक मिलती थी। पीरों में उन्हें हिन्दू संत नजर आते। वे दरगाहों पर जाने लगे, चादरें चढ़ाने लगे, इस्लाम में संगीत की मनाही के बावजूद कव्वालियां गाने लगे। ये सब अरब में कभी नहीं हुआ। लेकिन भारत में हुआ। मुस्लिम समाज यहां के बहुसंख्यक समुदाय में पूरी तरह घुल मिल नहीं पाया। लेकिन आपसी भाई चारे और दोस्ती का रिश्ता उनमें बना रहा। वे एक दसरे की दावतों में आने जाने लगे। भले वे उनके खानपान में हिस्सा न लेते लेकिन एक दूसरे को शुभकामनाएं और दुआएं देने में पीछे नहीं रहते।

जारी