दयाश्‍ांकर श्‍ाुक्‍ल सागर

Monday, August 8, 2016

आदम हव्वा और हिन्दुस्तान



इस्लाम में हजरत आदम की कथा है। कुरान के मुताबिक ये दुनिया, फरिश्ते और जिन्न आदि को बनाने के बाद खुदा ने मिट्टी और पानी मिलकर अपना ही एक प्रतिरूप तैयार किया। वह पहला इंसान था जिसे उसने आदम का नाम दिया। उसकी बायीं पसली से हव्‍वा बनाई। जो उनकी बीवी बनी। दोनों जन्नत के खूबसूरत बाग में रहते थे। शैतान के बहकावे में आकर दोनों ने खुद का हुक्म तोड़ा। इस जुर्म के लिए उन्हें जन्नत से निकाल कर धरती पर भेज दिया गया और खुदा ने शाप दिया तुम्हारी औलादें मेहनत करके ही खाएंगी। ये बड़ी मशहूर कहानी है जो लगभग थोड़े बदले हुए रूप में कुरान से बहुत पहले लिखे गए बाइबिल में भी मिलती है। लेकिन आदम और हव्वा धरती के किस कोने में उतारे गए यह किसी को नहीं पता। अरब वासियों की मान्यता है कि खुदा ने उनको हिन्दुस्तान में उतारा था। इसे उन्होंने "हिन्दुस्तान जन्नतनिशां" नाम दिया। उनकी मान्यता है कि उनका पहला कदम सरन्दीप पर पड़ा। प्राचीन स्वर्णद्विप यानी वर्तमान लंका को अरब वासी इसी नाम से जानते थे। उनकी मान्यता है कि आदम और हव्वा के पांव के निशान आज भी वहां के किसी पर्वत पर मौजूद हैं।
भारत के जिस प्रदेश में हजरत आदम रहे उसका नाम दजनाय था। यानी भारत वर्ष का दक्खिनी भाग। एक जमाने में अरब देश में इसी दक्षिण भाग से अनके तरह के सुदंधित पदार्थ व फल, मसाले निर्यात होते थे। उनका कहना था कि यह सब सुगंधित द्रव्य हजरत आदम अपने साथ जन्नत से लाए थे। इनमें छुआरे के अलावा नीबू और केले थे। एक अमरूद भी जन्‍न्त का फल था जो भारत में ही पाया जाता था।

मैं साफ कर दूं यह कहानी दक्षिणपंथी इतिहासकारों की गढी हुई नहीं है। ये अरबी इतिहासकारों की कथाएं हैं। इमाम जलालुद्दीन अल सुयूती की मशहूर किताब "तफसीर दूर्रे- मंसूर " के पहले ही खंड के 55वें सफे पर आपको ये कहानी मिल जाएगी। ये किताब 1505 ईसवी की है। ये कहानी उन्होंने इब्ने जरीर, इब्ने अबी हातिम और हाकिम के हवाले से दी है। ये सब आठवीं और नवीं सदी के इस्लामिक स्कालर रहे हैं।
एक कदम और आगे बढ़ते हुए मीर आजाद बिलग्रामी ने अपनी मशहूर किताब "सुबहतुल मरजान फी आसरे हिन्दोस्तान" में भारत की तारीफ में लिखा-हजरत आदम सबसे पहले भारतवर्ष में ही उतरे और यहीं उन पर ईश्वरी आदेश आया। तो यह समझना चाहिए कि यह वह देश है जहां सबसे पहले ईश्वरी संदेश आया था। इससे प्रमाणित होता है कि हजरत मुहम्मद साहेब का स्वभाविक लगाव हिन्दुस्तान से था। इसीलिए वह कहते थे- "मुझे भारतवर्ष की ओर में ईश्वरीय सुगंध आती है।" (ऐसा जिक्रकिसी हदीस में आया है)। बताता चलूं कि मीर आजाद बिलग्रामी 18सदी में भारत में अरबी, उर्दू और फारसी के बड़े स्‍कालर माने जाते हैं। https://en.wikipedia.org/wiki/Azad_Bilgrami

एक वैज्ञानिक सोच रखने के कारण में इन कथाओं को ऐतिहासिक घटना नहीं मान सकता। ये भी एक मिथ है जैसा कि आदम हव्वा, रामायण और महाभारत की कहानियों को एक मिथक माना जाता है। मिथक बन चुकी घटनाओं को प्रमाणित करना तकरीबन नामुमिकन है जब तक किसी टाइम मशीन का आविष्कार नहीं कर लेते। लेकिन फिर भी अपने अपने मिथों पर हर देश की प्रजा कहीं न कहीं आस्‍था रखती है। इन्हें हम नजरअंदाज नहीं कर सकते।

जिन किताबों का जिक्र मैंने यहां किया वह अरबी और उर्दू के प्रामाणिक ग्रंथ है। इनमें से कुछ नेट पर भी उपलब्‍ध हैं। जिन इस्लामिक इतिहासकारों का मैंने हवाला दिया वे मामूली नहीं हैं। हर नाम के साथ उनका शानदार इतिहास आपको नेट पर मिल जाएगा। लेकिन इन किताबों की कभी कोई चर्चा नहीं करता। पाठ्यक्रमों में यह कहानी आपको कहीं नहीं मिलेगी। क्योंकि हमारे सारे पाठ्यक्रम मार्क्सवादी इतिहासकारों ने गढे हैँ जो ब्रिटिश इतिहासकारों के प्रभाव से कभ्री मुक्त नहीं हो पाए। जैसे दक्षिणपंथी इतिहासकार आर्यो के मूल स्‍थान की लड़ाई में ही उलझे रहे। जबकि इस तरह के तथ्य सभी स्कूली बच्चों को पढ़ाए जाने चाहिए जो हमारी कौमी एकता को न केवल मजबूत करेंगे बल्कि यहां के मुसलमान भाई भी इस धरती पर जन्म लेने पर फख्र करेंगे।




Wednesday, June 8, 2016

Tuesday, June 7, 2016

मुफ्त का माल


स्विट्जरलैंड के नागरिकों ने सरकार की ओर से मुफ़्त की राशि लेने से इंकार कर दिया। सवाल उनके आत्मसम्मान का था। स्वीट्जरलैंड सम्पन्न देश है। हर तरफ जरूरत से ज्यादा खुशहाली है। मुझे वहां भिखारी नहीं मिले। हां कार्नवीन मेट्रो स्टेशन पर लम्बे पुराने ओवर कोट में खड़े वायलनवादक जरूर मिले। वे मेट्रो और ट्राम में वायलन बजाते हैं। थोड़ी देर बाद वह वायलन बजाना बंद करके अपने ओवरकोट की जेब से एक गिलास निकलते हैं। और यात्री उसमें सिक्के डालने लगते हैं। मैं इसे भीख नहीं मानता। उनकी वायलन से निकलने वाली धुन सम्मोहित कर देती है। और आपको जेब में हाथ डाल कर स्वीट्ज फ्रेंक निकालने पर मजबूर कर देती है।
इसलिए जब ये खबर आई तो मुझे हैरत हुई कि क्या वहां की सरकार उन्हें मुफ्त भी कुछ देती होगी। मुझे याद आया कि हमारा देश सबसीडी पर चलता है। और सबसीडी को हम अपना हक मान लेते हैं। और गैस सिलेंडर या राशन में सबसीडी घटने पर हम बेतरह नाराज हो जाते हैं जैसे किसी ने हमारी जेब काट ली।

मैंने कहीं एक कहानी पढ़ी थी। गुजरात में एक अरबपति सेठ हुआ करता था। हीरे का व्यापारी था। हर साल करोडों का टर्न ओवर था। एक भिखारी उसके दफ्तर के बाहर खड़ा होकर इकतारा बजाया करता था। वह एक खास धुन बजाता जिसे सुनकर सेठ मुग्‍ध हो जाता। और चपरासी के हाथ से हजार रुपए भिजवा देता। यह सिलसिला महीनों जारी रहा। एक दिन सेठ ने कहा तुम रोज इकतारा बजाते हो मुझे पैसे भिजवाने पड़ते हैं। वक्त जाया होता है। ऐसा करो हर महीने आकर इकट्ठे दस हजार रुपए ले जाया करो। भिखारी की मौज हो गई। वह बिला नागा हर महीने बाकायदा दस हजार रुपए मैनेजर से ले जाता। कई साल ऐसे ही बीत गए। एक दिन मैनेजर ने उसके हाथ पर पांच हजार रुपए रख दिए। भिखारी बिगड़ गया। बोला-मैनेजर साहब ये क्या है? मैंनेजर बोला- सेठ दिक्कत में हैं। कारोबार में घाटा चल रहा है। फिर उनकी बेटी की शादी भी है अगले महीने। बहुत खर्चे हैं। भिखारी और नाराज हो गया। बोला- हद हो गई। अब मेरे पैसों पर सेठ अपनी बेटी की शादी करेंगे। बुलाओ सेठ को कहां है?
तो यही हाल हमारे हिन्दुस्तान का है। जो फ्री में मिलता है उसे अपना हक समझ लेते हैं। वह आरक्षण हो या सबसीडी। आपको भी सोचना चाहिए इस पर। आखिर कब तक मोबाइल पर 15 लाख के मैसज का इंतजार करते रहेंगे?

कौन नहीं चाहता कि गो हत्या पर रोक लगे



गो हत्या से जुड़ी मेरी पोस्ट पर अच्छी बहस हो गई। ये मुद्दा संवेदनशील है इसलिए इसे ढंग से समझने की जरूरत है। जल्दबाजी में आप कोई नतीजा नहीं निकाल पाएंगे। हमारा संविधान गो हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध के मसले पर बड़ी चालक तरह से खामोश है। कोई भी राज्य गो हत्या पर रोक लगाने के लिए पूरी तरह आजाद है। लेकिन संविधान में यह नीतिगत निर्देश के रूप में नहीं आता। आजादी से पहले साम्प्रदायिक दंगे के पीछे अमूमन एक ही वजह होती थी- गो हत्या। संविधानसभा में सेठ गोविंद दास और पंडित ठाकुर दास भार्गव गो हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लाने के लिए प्रस्ताव लेकर आए। यूनाइटेड प्रोविसंस के मुस्लिम प्रतिनिधि एचएस लारी भी चाहते थे कि इस मसले पर संविधान में साफ तौर पर कुछ कहा जाए ताकि देश को साम्प्रदायिक दंगों से निजात मिले। खुद डा. अम्बेडकर इसे राज्य नीति के दिशा निर्देशक सिद्धान्तों में शामिल करने को तैयार हो गए थे। लेकिन कांग्रेस की तरफ से इसका विरोध किया टीटी कृष्‍णामचारी ने किया था। वे चेन्नई के ब्राह्मण थे। वे स्वतंत्र भारत के वित्त मंत्री भी रहे। कांग्रेस में घोटालों की शुरूआत का श्रेय इन्हीं महोदय को जाता। इन्हें स्कैम में फंस कर इस्तीफा देने वाले भारत के पहले केन्द्रीय मंत्री का दर्जा प्राप्त है। तो इन पंड़ितजी का कहना था कि इस मसले पर संविधानसभा को दखल देने का कोई अधिकार नही है। गो हत्या पर प्रतिबंध के बारे में अंग्रेजों की नीति जारी रखी जाए। इसे अलग से नीति निर्देशक सिद्धान्तों में जोड़ने की कोई जरूरत नहीं है। संबंधित सरकार अपने विवेक से जो चाहे वह फैसला करे। जो गो हत्या पर देश में एक कानून की बात हमेशा के लिए खत्म हो गई।
इसके बाद इस मसले पर राजनीति हुई और हो रही है। और आज त्रासदी देखिए गाय को अपनी माता मानने वाला भारत आज बीफ का निर्यात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश है। कम्युनिस्टों ने अपने राज्यों में गो हत्या पर प्रतिबंध नहीं लगाया वह केरल हो या पश्चिम बंगाल। अब आप देखिए जम्मू कश्मीर मुस्लिम बहुल प्रान्त है और यहां के कानून में गो हत्या पर रोक है। गोवा में भाजपा की सरकार है और वहां गो हत्या पर पूर्ण रोक नहीं है। नागालैंड में भी लम्बे अरसे तक भाजपा के सहयोग से सरकार रही और वहां भी गो हत्या पर रोक नहीं है। गोवा का तर्क है कि यह राज्य अन्तराष्ट्रीय पर्यटन का केन्द्र है। और हम अपने मेहमानों को गाय का गोश्त परोसने से मना नहीं कर सकते। नगालैंड का तर्क है कि नगा जनता के लिए गो मांस दाल चावल की तरह है। उस पर हम रोक कैसे लगा सकते हैं। जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया था कि किस तरह मोदी सरकार ने हिमाचल हाईकोर्ट के सवाल पर दो टूक जवाब दिया कि उनके हाथ में कुछ नहीं।

तो आप देखिए संघ परिवार का सारा गो-प्रेम सिर्फ नारों में है। और आप बेवजह भावुक हुए जाते हैँ।

Saturday, June 4, 2016

नए भारत की खोज-१



एक सवाल है। जो मैं अक्सर सोचता हूं। भारत में वर्ण व्यवस्‍था इतनी खराब है तो भारत की पांच हजार साल पुरानी संस्कृति अब तक कैसे जिन्दा है? पिछली करीब नौ दस सदियों से हिन्दू-मुसलमान इस देश का अभिन्न हिस्सा कैसे बने रहे? जबकि उनके सामाजिक जीवन में एक खास दूरी हमेशा से बनी रही है? फिर भी इकबाल को क्यों कहना पड़ता है कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी?
आखिर वह क्या बात है? एक मिसाल देंखे। १४५३ में तुर्कों ने यूनान पर हमला किया। लेकिन यूनान के यूनानी यूनानी रहे और तुर्की तुर्की। यूरेशिया में टर्की एक देश है। वहां पहले यूनानी रहते थे। ट्राय की मशहूर जंग यही समुन्द्र के किनारे हुई। तब तक यहां रोमन साम्राज्य था। तुर्कों ने हमला कर उन्हें खत्म कर दिया। वहां अब भी तुर्की बोली जाती है। वह टर्की की राजभाषा है। तुर्कों ने भारत पर भी हमला किया। यहां तुर्की कभी राजभाषा नहीं बन पाई। तुर्क भारत में घुल मिल गए। अवध में वे अवधी बोलते हैं। और सिंध में सिंधी। बंगाल में बंगाली। तुर्की के कुछ शब्द हिन्दुस्तानी भाषा में घुल मिल गए। पूरे देश में आपको एक भी घर ऐसा नहीं मिलेगा जहां तुर्की बोली जाती हो। ऐसा ही इससे पहले ग्रीक, कुषाण, हुण के साथ हुआ। वह कहां हैं आज किसी को नहीं पता। इस्लाम के उदय के बाद अरब, तुर्क और मुगल आक्रमणकारी भारत आए। जाति व्यवस्‍था से त्रस्त हिन्दुओं का एक बड़ा तबका मुसलमान बना। इन नए मुसलमानों का दो तरह के इस्लाम में सम्पर्क हुआ। एक वह कट्टर कठमुल्ले जो मंगोलों के हमले से भाग कर भारत आए थे। वे मानते थे कि मुसलमान को शरीयत की लकीर का फकीर होना चाहिए। वे चाहते थे कि भारत से गैर मुसलमानों का नामो निशान मिट जाए। लेकिन सुलतानों के लिए ये संभव नहीं था। क्योंकि तमाम सख्ती के बावजूद हिन्दू जनता मुसलमान होने को राजी नहीं थी। तो उन्हें बदलना पड़ा। क्या आपको यकीन होगा कि 1320 में खुसरो खां ने दिल्ली की तख्त पर बैठते ही पहली बार गोहत्या पर रोक लगा दी और कहीं कोई विरोध हीं हुआ। लेकिन नए मुसलमानों को धर्म परिवर्तन की सजा भुगतनी पड़ी। हिन्दू समाज ने उनसे दूरी बना ली। ऐसी दूरी उन्होंने हुणों, कुषाणों के साथ नहीं बनाई थी। 

ये नए मुसलमान सामान्य तौर पर दस्तकार और कारीगर थे। इन्होंने अपनी अलग बिरादरी बना ली। वे आपस की बिरादरी में ही रोटी बेटी का रिश्ता रखने लगे। लेकिन कई पुरानी हिन्दु मान्यताओं और रीति रिवाजों को वह छोड़ नहीं पाए। इस कारण अरब और तुर्क उन्हें नीची निगाह से देखते। हां अरब और तुर्क अफसरों के आगे नम्बर बढाने के लिए वह कट्टर जरूर हो गए।
इन नए मुसलमानों के लिए दूसरी तरह का इस्लाम शेख, पीर और सूफी संत लेकर आए थे। इनकी बातें उन्हें ज्यादा समझ आती क्योंकि उनके दर्शन में उन्हें हिन्दू आध्यात्म की झलक मिलती थी। पीरों में उन्हें हिन्दू संत नजर आते। वे दरगाहों पर जाने लगे, चादरें चढ़ाने लगे, इस्लाम में संगीत की मनाही के बावजूद कव्वालियां गाने लगे। ये सब अरब में कभी नहीं हुआ। लेकिन भारत में हुआ। मुस्लिम समाज यहां के बहुसंख्यक समुदाय में पूरी तरह घुल मिल नहीं पाया। लेकिन आपसी भाई चारे और दोस्ती का रिश्ता उनमें बना रहा। वे एक दसरे की दावतों में आने जाने लगे। भले वे उनके खानपान में हिस्सा न लेते लेकिन एक दूसरे को शुभकामनाएं और दुआएं देने में पीछे नहीं रहते।

जारी

Saturday, May 14, 2016

हिन्दू आतंकवाद और इस्लाम

हिन्दू आतंकवाद शब्द का मुहावरा जिन्होंने भी गढ़ा वह निहायत ही बेवकूफ किस्म का इंसान रहा होंगे। उन्हें न भारतीय इतिहास का पता है न यहां की संस्कृति का। हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं रहा उस दौर में भी जब उन पर जुल्मों सितम की इन्तहा थी। आप उस दौर का इतिहास पढ़िए जब भारत में इस्लाम नया नया आया था। उस दौर में भारत में तीन तरह के नागरिक थे। एक तुर्क सरदार जिनके इशारे पर सल्तनत काल में शासक बने। ये जातीय श्रेष्ठता के घमंड में रहते थे। दूसरे भारतीय मुसलमान जिन्हें निहायत नीची नजर से देखा जाता था। और तीसरे गैर मुसलमान जिन्हें हिन्दू कह कर बुलाया जाता था। शुरूआती दौर में दरबार में कोई बड़ा पद हिन्दुओं  और भारतीय मुसलमानों को नहीं दिया जाता। इब्‍न बतूता के मुताबिक दरबार के मंत्री, सचिव, जज, सब विदेशी मुसलमान थे। उनके लिए खुरासानी शब्द चल पड़ा। इनकी दिलचस्पी भारत में सिर्फ लूट खसोट की थी। बर्नी ने लिखा है-सल्तनत की नीति थी कि हिन्दुओं पर इतने टैक्स लगा दिए जाएं कि बगावत की सोच तक न पाएं। उनके खेतों में सिर्फ इतना अनाज छोड़ा जाए ताकि वह गुजर बसर करें और अपने खेत छोड़ कर न भाग जाएं। बर्नी की तारीख ए फिरोजशाही की रामपुर पोथी पढ़िए। सल्तनत के जुल्मों से शिकार लोगों ने बीस गुना लगान से नाराज होकर अपने खलियान जला दिए। दस बीस लोगों के जत्‍थे बनाकर वे जंगलों में जाकर छिप गए। लगान वसूलने वाले लगान के खाली रजिस्टर लेकर राजधानी पहुंचे। नाराज सुल्तान ने लश्कर लेकर दोआब पर धावा बोल दिया। बेगुनाहों का कत्लेआम हुआ। बागियों को जिन्दा लटका दिया गया। छुटपुट तौर पर हिन्दुओं की तरफ से प्रतिक्रिया हुई। बर्नी लिखता है कि हिन्दुओं की हमलावरों के प्रति नफरत सिर्फ उनके सामाजिक बर्ताव में झलकती थी लेकिन उनकी हिंसा का जवाब हिंसा से देने का ख्याल उनके दिल में कभी नहीं आया। हिन्दुओं को सिर्फ आत्मरक्षा के लिए हिंसा की इजाजत है

ईश्वर तुम्हारे करीब है

ईश्वर की खोज-२



मेरे नास्तिक दोस्त कहते हैं ईश्वर मनुष्य की निराशा और हताशा का दूसरा नाम है। ईश्वर को हमने बनाया। हम नहीं रहेंगे तो ईश्वर भी नहीं रहेगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह सिर्फ हमारा अहंकार है कि हम उसे अपनी कृति अपनी खोज मानते हैं। जबकि सच है कि हमने उसे कभी खोजने या जानने की कोशिश नहीं की। और खोजना भी क्यों? वह तो है हमारे आसपास कहीं। हम ही उसे महसूस नहीं कर पाते। क्योंकि हमारी संवेदनाएं कहीं खो हो गई हैं।
रवींद्रनाथ की एक मशहूर रचना है-गीतांजलि। इसमें उन्होंने ईश्वर के गीत गाए हैं। इसी कृति पर उन्हें नोबल प्राइज मिला। सारी दुनिया में उनकी चर्चा हो गई। लेकिन रवींद्रनाथ के घर के पास ही एक बुजुर्ग रहता था। उसने रवींद्रनाथ से एक दिन पूछ लिया- तुमने सच में ईश्वर को जाना है? रवीन्द्रनाथ सकपका गए। ये सवाल उनसे किसी ने नहीं पूछा था। रवींद्रनाथ ईमानदार आदमी थे तो झूठ भी नहीं बोल सकते थे। वे बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए। इसके बाद तो वह बुजुर्ग उनके पीछे पड़ गया। जब रवीन्द्र नाथ दिखते वह उनसे रोक कर पूछता-तुमने सच में ईश्वर को जाना है? सच बताओ? नोबल प्राइस विनर रवीन्द्र परेशान हो गए। उस बुजुर्ग से बच कर निकलने लगे। सोचने लगे-गीतांजली लिखना गुनाह हो गया इस बुड्ढे की वजह से।
रवीन्द्रनाथ ने कभी ईश्वर को खोजने की कोशिश नहीं की थी। लेकिन इस आदमी ने उनके लिए मुश्किल पैदा कर दी। वह कहीं भी जाते उनके दिमाग में यह प्रश्न होता ईश्वर कहां है? कैसा है? उसे कैसे पाया जा सकता है। उसे कैसे समझा जाए? ताकि वह उस बुजुर्ग को समझा पाएं कि हां मैंने ईश्वर को जाना है। लेकिन इसका कोई उपाय नहीं था।

कई साल गुजर गए। वे बारिश के दिन थे। नई—नई बारिश हुई। आषाढ़ का महीना और पहले मेघ बरसे। डबरे, तालाब, पोखरों पर नया पानी भर गया है। सड़क के किनारे जगह—जगह गड्डे भर गए हैं। सौंधी मिट्टी की खुशबू से उनका कमरा भर गया। बाहर आसमान में काले बादल उमड घुमड़ रहे थे। वे खुद को घर में रोक नहीं पाए। चल पड़े समुद्र की तरफ। समुद्र के तट पर खड़े थे। सूरज निकला। समुद्र में सूरज की छाया बनी, प्रतिबिंब बना। सूरज समुद्र में झलकने लगा। दर्शन किया सूरज का, दर्शन किया प्रतिबिंब का। लौटने लगे घर को। एक—एक पोखरे में सूरज झलकता था। एक—एक छोटे से डबरे में, सड़क के किनारे गंदा पानी भरा था, वहां भी सूरज झलकता था। सब तरफ सूरज झलकता था। गंदे डबरे में भी, सागर में भी, स्वच्छ पोखर में भी, सब तरफ सूरज झलकता था। रवीन्द्रनाथ नाचते हुए घर लौटे।
इस पूरी खोज में उन्हें एक सच हाथ लगा वह यह कि प्रतिबिंब कभी गंदा नहीं होता।  सूरज का प्रतिबिंब स्वच्छतम पानी में भी पड़ा है तो भी उतना ही ताजा और स्वच्छ है और गंदे से गंदे पानी में भी पड़ रहा है तो भी उतना ही पवित्र है। प्रतिबिंब तो गंदा नहीं हो सकता। रिफ्लेक्यान तो कैसे गंदा होगा! गंदा पानी हो सकता है, पर जो सूरज की छाया उसमें बन रही है, जो सूरज उसमें झांक रहा है, वह तो गंदा नहीं है। वह तो बिलकुल ताजा है, वह तो बिलकुल स्वच्छ है। उसे तो कोई पानी गंदा नहीं कर सकता।
इस अनुभव से उन्हें पता चला कि ईश्वर क्या है? वह एक बड़ा प्रतिबिम्ब है। जो हर इंसान में है। पापी में भी है पुण्यात्मा में भी। वह उतना ही शुद्ध और पवित्र है। लौटते वक्त वह बुजुर्ग भी मिला। लेकिन इस बार उसने रवीन्द्रनाथ को रोक कर वह सवाल नहीं पूछा। बुजुर्ग ने उन्हें गले लगा लिया। और कहा -तेरे चेहरे की चमक बता रही है कि तूने ईश्वर को जान लिया। अब तू नोबल से बड़े पुरस्कार का हकदार हो गया।