दयाश्‍ांकर श्‍ाुक्‍ल सागर

Wednesday, January 30, 2019

कश्मीर की आजादी का सच

कश्मीर डायरी 7


खूबसूरत पहलगाम में घूमते हुए मैं खच्चर वालों की तरफ निकल आया। मैं जानना चाहता था ये क्या सोचते हैं कश्मीर की आजादी के बारे में। ये कश्मीर का आम इंसान हैं। बिना पढ़े लिखे। मजदूर चरवाहे। सीजन था पर उस दिन टूरिस्ट बिलकुल नहीं थे। सब खाली बैठे थे। मेरे साथ कोई लोकल सूत्र नहीं था। बस मेरा टैक्सी ड्राइवर था जो बारामूला का था। फिर उसी ने खच्चर वालों को कश्मीरी में बताया कि मैं नीचे यानी हिन्दुस्तान से आया हूं। मीडिया से हूं। उनसे बात करना चाहता हूं। और उन सबने मुझे घेर लिया। मैंने उन्हें सहज करने के लिए सामने पड़े पाइप पर बैठे कर बात करने का न्योता दिया। शायद मैं उन्हे ये बताना चाहता था कि मैं उनके बीच का ही एक आदमी हूं। बेशक यह प्रयोग सफल रहा अब वे थोड़ा सहज थे।

मैंने सीधा सवाल पूछा-आजादी, आखिर आपको किससे आजादी चाहिए? सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। फिर एक ने कहा-हिन्दुस्तानी फौज से चाहिए आजादी। मैंने पूछा क्यों? क्या उन्होंने तुम्हें कहीं जाने से रोका। तुम पर अपना हुक्म चलाया? तुम्हारे पैसे छीने? सब चुप थे। फिर एक बोला-वो बड़े जालिम हैं। हमें मारते हैं। हमारी बहू बेटियों गलत नजर रखते हैं। वो कोई बीस-पच्चीस लोग थे। मैंने पूछा-तुम में से कोई एक हो जिसे फौज ने परेशान किया हो? कोई एक? सब फिर एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। हमने वायरल वीडियो देखे हैं। फिर एक बोला-हमारे गांव में एक लड़का है, उसे फौज ने बेवजह पीटा। मैंने कहा-ये नहीं चलेगा। तुम मे से कोई हो तो बताए?

कोई नहीं सामने आया। फिर एक खच्चर वाले उमर ने अपना दुख बताया। उसने कहा कि उसका भाई अनंतनाग डिग्री कालेज में पढ़ता है। उसकी पढ़ाई क खर्च मैं निकालता हूं। उसने मुझसे मोबाइल फोन मांगा था। मैंने सोलह हजार का नया फोन खरीद कर उसे दिया था। लेकिन पत्थेरबाजी में इलजाम में वहां की स्थासनीय पुलिस ने वो फोन छीन ‌लिया और अब लौटा नहीं रहे। मैंने पूछा किस थाने में फोन है। उसने बताया सदर थाने में। मैंने उसका फोन नम्बर लेकर अपनी नोटबुक में लिख लिया और कहा कि दो दिन तुम्हारे भाई को फोन वापस मिल जाएगा। वह खुश हो गया। उसने अपना फोन नम्बर लिखवा दिया। ‌फिर उसके कान में किसी ने कुछ कहा। उमर ने मुझसे कहा कि मैं उसका नम्बर मिटा दूं।

हमें फोन नहीं चाहिए। मैंने पूछा- क्यों? मैं दिलवा दूंगा। मेरी पहचान है वहां। उसने कहा-नहीं वो और दुश्मन हो जाएंगे। कहीं गुस्से में भाई का पर्चा काट दिया तो उसकी जिन्दगी तबाह हो जाएगी। मैंने उसे संतुष्ट करने के लिए उस नम्बर को पेन से काट दिया। पहले मैंने सोचा था कि अनंतनाग के रिपोर्टर से कह कर उसका फोन कश्मीर पुलिस से लौटवा दूंगा। पर सोचा रहने दूं। कहीं सच में उसका भाई मुश्किल में न पड़ जाए। बमुश्किल तीन दिन बाद मैंने उमर को फोन लगा दिया। उससे टूरिस्टों की आमद के बारे में पूछना था। वह मेरी आवाज सुन कर खुश हो गया। बोला पुलिस ने भाई का फोन लौटा दिया, शुक्रिया। अब मैं उससे क्या कहता? इस शुक्रिया का मैं हकदार नहीं। पर मैं कुछ नहीं बोला। मैंने उमर से पूछा कि अब आजादी के बारे में उसका क्या ख्याल है? उधर फोन पर उसने कहा-सर आज बहुत भीड़ है यहां टूरिस्टों की। बस ऐसी ही भीड़ रहे हमें और क्या चाहिए? यही असली आजादी है।

अधिग्रहण विवाद में ही हुआ था बाबरी मस्जिद का विध्वंस




जिस कथित गैर विवादित 67 एकड़ जमीन पर आज परिंदा भी पर नहीं मार सकता वहां मोदी सरकार राम मंदिर निर्माण शुरू करने का सपना देख रही है। ये अर्जी उस सुप्रीम कोर्ट में दी गई जो 2003 में असलम भूरे मामले के फैसले में पहले ही कह चुका है कि, विवादित और गैर-विवादित जमीन अलग करके नहीं देखा जा सकता। सिर पर चुनाव हैं और कुंभ में साधु संत गुस्से में हैं। सो रातों रात चौंकाने वाले फैसले लेने वाली मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक के अंदाज में नया दांव खेल दिया है। करीब 26 साल पहले इसी जमीन के अधिग्रहण के खेल में बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ था। तब यूपी की तत्कालीन कल्याण सरकार राम जन्मभूमि ट्रस्ट को यह जमीन लौटना चाहती थी। जबकि मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन था।

इस दांव का एक मकसद तो साफ है। सरकार हिन्दू वोटरों में यह संदेश देना चाह रही है कि हम राममंदिर बनाने के लिए उतने ही उत्सुक हैं जितने की आप। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाथ बांध रखे हैं। संघ परिवार को एक तबका सुनवाई टलने पर पहले से ही सुप्रीम कोर्ट पर लानत मलानत भेज रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी दिखा दिया है कि उसे भी इस मामले में कोई खास दिलचस्पी नहीं है और न खास जल्दबाजी ही है। सुप्रीम कोर्ट में जैसे हजारों मुकदमे लंबित हैं उनमे से एक ये भी है। यह बात सुप्रीम कोर्ट खुलेआम इसके इशारे भी कर रहा है। जैसा कि अयोध्या मामले की इस साल की पहली ही सुनवाई में संविधान पीठ ने कहा- क्या ये अयोध्या विवाद का केस है? और एक सेंकड में सुनवाई खत्म कर अगली तारीख दे दी। यह घटना अगले दिन सारे अखबारों ने रिपोर्ट की।

बेशक ये बात हिन्दुओं के एक वर्ग को चिढ़ा सकती है लेकिन यह सुप्रीम कोर्ट का विशेषाधिकार है कि वह चाहे तो मामले की संजीदगी देखते हुए आधी रात को अपने घर पर अदालत लगा सकता है। मामले की संजीदगी तय करने का विशेषाधिकार भी उसी का है। भारत का जो संविधान सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई करने या बेवजह उसे टालने की छूट देता है वही संविधान केन्द्र सरकार को भी इस बात की छूट देता है कि वह किसी की अधिग्रहित की गई भूमि उसके मालिक को वापस दे दे।

बाबरी मस्जिद के ढहने के बाद कांग्रेस की तत्कालीन राव सरकार ने 1993 में विवादित जमीन के आसपास की 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। छह दिसम्बर की घटना से सबक लेते हुए ऐसा इसलिए किया गया ताकि विवाद के निपटारे के बाद विवादित जमीन पर कब्जे या उपयोग में कोई बाधा डाल सके। इसमे करीब 42 एकड़ की जमीन अकेले रामजन्म भूमि ट्रस्ट की थी। अधिग्रहण से पहले भी यह जमीन न्यास के पास ही थी लेकिन उसने यहां कभी मंदिर बनाने का इरादा नहीं बनाया क्योंकि ट्रस्ट जानता है कि हिंदू मंदिरों का निर्माण गर्भगृह से शुरू होता है जो फिलहाल उस0.313 एकड़ विवादित जमीन पर है जिस पर अभी सुप्रीम कोर्ट में ठीक से सुनवाई भी नहीं शुरू हुई है। अब ट्रस्ट अगर बाहरी चहारदीवारी से मंदिर निर्माण शुरू करना चाहता है तो बेशक बात अलग हो जाती है। क्योंकि यह हड़बड़ी सरकार को हो सकती है लेकिन ट्रस्ट को नहीं। इसीलिए साधु संत सरकार के इस दांव से बहुत खुश नहीं। खुद रामजन्म भूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास ने कहा कि राम मंदिर वहीं बनेगा जहां रामलला विराजमान हैं। यानी विवादित स्थल पर।

दूसरा सबसे अहम सवाल यह भी है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस अर्जी को स्वीकार करेगा? क्या केन्द्र सरकार गांरटी ले सकती है कि गैर विवादित जमीन उसके मालिकों को लौटने के बाद विवादित जमीन पर कब्जा करने की वैसी कोशिश नहीं होगी जैसे दिसम्बर1992 में हुई थी?



याद रहे कि अधिगृहित जमीन के इसी लेनदेन के विवाद में बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया गया था। तत्कालीन राज्य सरकार ने विवादित इमारत के आसपास की 2.77 एकड़ जमीन को दस जनवरी1991 को अधिग्रहित कर लिया था। यह जमीन राम जन्म भूमि ट्रस्ट को दे दी गई। यह और आसपास की जमीन ट्रस्ट ने अलग अलग लोगों से मंदिर निर्माण के नाम पर खरीदी थी। इस जमीन पर दर्जनों छोटे बड़े मंदिर थे जो श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए जमींदोज कर दिए गए थे। इनमें हनुमानजी का एक प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर भी था जिसे तोड़ दिया गया और हनुमानजी की मूर्ति रातों रात कहीं और भेज दी गई। जमीन समतल इसलिए की जा रही थी ताकि विवादित स्थल तक जाने के रास्ते में कोई रुकावट न हो। ये सब तैयारी देख कर मुस्लिम पक्ष की चिन्ता जायज थी।मुस्लिम पक्ष का कहना था कि सरकार का यह अधिग्रहण अवैध है और उससे भी ज्यादा गलत है अधिगृहित जमीन का कब्जा ट्रस्ट को वापस देना। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में चला गया। हाईकोर्ट ने 3 नवंबर1992 फैसला रिजर्व कर दिया। 6 दिसम्बर1992 को कारसेवा का एलान था। हिंदू संगठन चाहते थे कि फैसला 6 दिसम्बर से पहले आ जाए। ऐसे में फैसला किसी के भी पक्ष में होता तो कारसेवा जायज हो जाती। और संभव है कारसेवकों में ऐसा उन्माद न होता कि वह गुंबद पर चढ़ कर उसे तोड़ने लगते। हाईकोर्ट का फैसला आया लेकिन बाबरी विध्वंस के 5दिन बाद 11 दिसम्बर 1992 को। इसमें हाईकोर्ट ने सरकार के अधिग्रहण के फैसले को गलत ठहरा दिया था। यही फैसला अगर पांच दिन पहले आ गया होता तो अयोध्या में हिंसा न भड़कती। आखिर इस 2.77 एकड़ जमीन पर छह महीने पहले भी शांतिपूर्वक कारसेवा हुई थी। लेकिन जब फैसला आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विवादित ढांचा टूट चुका था। सुरक्षाबलों ने चप्पे चप्पे पर कब्जा कर लिया था। इस कब्जे को स्थायी रूप देने के लिए केन्द्र सरकार ने 0.313 एकड़ के विवादित स्थल के अलावा उसके आसपास की 2.77 एकड़ जमीन ही नहीं बल्कि उसके कहीं आगे बढ़कर 67.7 एकड़ जमीन का बड़ा दायरा अधिग्रहित कर लिया गया। इस अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई लेकिन 1994 में कोर्ट ने इस अधिग्रहण को वैध ठहराया और आगे भी कई केस में कोर्ट इसे वैध ठहराती रही है।

रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद जस का तस है। सुप्रीम कोर्ट में अभी सुनवाई, तारीखें और अंत में अंतिम फैसला आना बाकी है। कोई वजह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट अधिग्रहण हटाने की इस अर्जी पर तुरंत फैसला कर दे। तो ये सारा तमाशा फिर किस लिए?





Tuesday, May 22, 2018

कश्मीर में बिना फौज के आतंक को गहरी शिकस्त दे रहे सैलानी



कश्मीर डायरी 6


श्रीनगर/पहलगाम। कश्मीर में आतंकवाद को अगर कोई ‌शिकस्त दे रहा है तो वे इस देश के बहादुर सैलानी है। आतंकवाद की तमाम घटनाओं के बावजूद कश्मीर की खूबसूरत वादियां हिन्दुस्तान के पर्यटकों को अपनी तरफ खींचती हैं। कश्मीरी ये सच जानता है इसलिए कश्मीरी के लिए सैलानी किसी मसीहा से कम नहीं। उसे खरोंच भी आ जाए तो कश्मीर अंदर तक हिल जाता है। आतंकी ये सच जानते हैं इसलिए वह सैलानियों के रास्ते में कभी नहीं आते। सैलानियों को नुकसान पहुंचा कर वे कश्मीर में एक दिन नहीं टिक सकते। इसीलिए पिछले दिनों पत्‍थरबाजी की चपेट में आए पर्यटक की मौत से पूरा कश्मीर सदमें में आ गया। ऐसे कश्मीर में पहले कभी नहीं हुआ। ये सिर्फ एक इत्तेफाक था।
दरअसल कश्मीर के दो चेहरे हैं। टूरिस्टों के लिए कुछ और सुरक्षाबलों के लिए कुछ और। गर्मियों में हमेशा से ही कश्मीर टूरिस्टों की पहली पसंद रहा है। घाटी की कमाई का अकेला सबसे बड़ा जरिया है। यही वजह है कि कश्मीर के लोग किसी भी पर्यटन स्‍थल से ज्यादा मे‌हमान नवाज और खुशदिल हैं। यहां आतंकियों का निशाना केवल सुरक्षा बल हैं टूरिस्ट नहीं। लेकिन  पत्‍थरबाजी के नए ट्रैंड ने अब सबको डरा दिया है। बीती 7 मई को श्रीनगर से गुलमर्ग जा रहे चेन्नई के सैलानी की पत्‍थरबाजी में चेन्नई मौत हो गई थी। उस दिन बंद की कॉल थी और सड़क के किनारे खड़े पत्‍थरबाजों ने लोकल टैक्सियों को निशाना बनाया। आज भी इस इलाके में सीआरपीएफ लगी है। इलके में सन्नाटा है। घटनास्‍थल से दस कदम की दूरी पर ही पुलिस चौकी है। हमने वहां के एसएचओ से बात की। वह खुद हैरत में थे। बोले-ये सिर्फ एक हादसा था। लड़कों को नहीं पता था कि टैक्सी में टूरिस्ट हैं। ये सब कैसे हो गया किसी को नहीं मालूम। इस घटना से सीमए महबूबा से लेकर डल झील का शिकारे वाला भी सहम गया था।

लेकिन कुछ दिनों सुस्ती के बाद पर्यटन फिर परवान चढ़ने लगा है। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही पर्यटक घाटी की तरफ निकल आए हैं। गुलमर्ग, पहलगाम और श्रीनगर में चहलपहल बढ़ गई है। पहलगाम के होटल लाल कोठी के मैनेजर फयाज अहमद बताते हैं कि ये वकाई टूरिस्टों के लिए हिम्मत का काम है। सारा खौफ तब तक है जब तक आप जवाहर टनल पार नहीं करते। टूरिस्ट हमसे कहते हैं- अनंतनाग से पहलगाम आने की सड़क पर आते ही सारा डर खत्म हो जाता है। वे कहते हैं कि जो एक बार हिम्मत करके कश्मीर आ गया, उसके सारे भ्रम टूट जाते हैं। वह फिर आता है और अपने साथ नए टूरिस्ट लाता है।
हमारी पहलगाम के खच्चरवालों से भी बात हुई। उमर खच्चरों से सैलानियों को पहलगाम से कश्मीर वैली, वॉटर फॉल, टूलियन लेक घुमाता है। मुम्बई और बंगाल के टूरिस्ट आए हुए हैं। दूसरे खच्चर वाले इमरान ने अपना नाम मजाक में आतंकी टाइगर की तर्ज पर इमरान टाइगर रख लिया है। वह कहता है पहलगाम अमन का शहर है, यहां कभी कुछ नहीं होता।
श्रीनगर की डल झील में शिकारा चलाने वाले सलीम कहते हैं -“ये डल लेक श्रीनगर की तारीख का गवाह रही है। चाहे कितने बुरे हालात हो जाएं ये लेक टूरिस्टों को अपने पास बुला लेती है। ऐसे रहमदिल टूरिस्टों पर पत्‍थर फेंकने वाले कश्मीरी नहीं हो सकते।” 

श्रीनगर और कश्मीर में हमारी जितने भी टूरिस्टों से बात हुई उन सबका कहना था कि कश्मीर को जितना डरावना दिखाया जाता है उतना है नहीं। सब यहां की मेहमान नवाजी की तारीफ करते हैं और यहां अगले साल फिर आना चाहते हैं।


हम सबसे कहेंगे कश्मीर आओ
श्रीनगर। महाराष्ट्र थाणे से आए दस परिवारों का ग्रुप कश्मीर के पर्यटन के सच की पूरी कहानी बयान करता है। थाणे के हरीश ने कश्मीर घूमने का प्लान अप्रैल में बनाया था। 7 मई को पत्‍‌थरबाजी में एक टूरिस्ट की मौत हो गई इसके बाद की कहानी खुद हरीश भाई की जुबानी सुनिए- “यहां आने से पहले लोगों ने बहुत सवाल उठाए साहब। टूरिस्ट की मौत की खबर सुनकर सब हिल गए। आधे लोगों ने तो कहा हमारा टूर कैंसिल कर दो। हम नहीं जाएंगे। लेकिन मैंने सबको कन्विंस किया। मैंने कहा हम गारंटी लेते हैं कुछ नहीं होगा। मेरे साथ मेरी वाइफ भी है। हम गारंटी लेते हैं। लेकिन सब पेरेंटस हैं। सबके साथ चार से चौदह साल के बच्चे हैं। सब बहुत टेंस थे, बहुत टेंस थे। फिर सब मेरे पर भरोसा कर के यहां आए।”
“फिर आपको यहां आकर अब कैसा लग रहा है ‍?” हमारे श्रीनगर संवाददाता अमृतपाल सिंह बाली ने जब ये सवाल हरीश भाई से पूछा तो उन्होंने गहरी सांस ली-“एकदम सेफ। सब कह रहे हैं मुम्बई में चैनल वाले कश्मीर के बारे में इतनी गलत न्यूज क्यों चला रहे हैं? यहां तो ऐसा कुछ नहीं दिख रहा।”
अंत में हरीश कहते हैं-“अफवाहे मत फैलाओ, लोगों को इस जन्नत में आने दो। यहां हर सड़क को मिलेट्री ने कवर कर रखा है। लोकल लोग इतने अच्छे हैं। सबको आने दो। ”
मुम्बई से आई शांति मुम्बई से आई हैं। कहती हैं कि हमें बहुत डराया गया। प्लीज डोंट गो। वहां टेरेरिस्ट हैं। इट्स नाट सेफ। लेकिन हम फिर भी आए। हम बहुत खुश हैं यहां आकर। ये सचमुच जन्नत है। यहां के लोग बहुत फ्रेंडली हैं।
गुजरात से आए राजीव भाई पहलगाम में घूम रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं कि यहां आने पर डर नहीं लगा। लेकिन सोचा देखें होता है वहां। पर यहां आके लगा कि डरने की कोई बात नहीं है।






राजनीतिक दगाबाजी से बिगड़ते चले गए कश्मीर के हालात


कश्मीर लाइव रिपोर्ट-5




अनंतनाग। अचानक क्या हुआ कि हालात इस कदर बिगड़ गए? इधर दो साल में घाटी में आतंकी गतिविधियां एकदम से बढ़ गईं। पाकिस्तानी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा की हमेशा से कोशिश थी कि कश्मीर में आतंक की कमान स्थानीय हाथों में हो। उन्होंने कश्मीरी युवाओं को बहका कर अपने संगठन में शामिल कर लिया। आपरेशन ऑल आउट की कार्रवाई में सबसे ज्यादा कश्मीरी आतंकी शिकार हुए। इसका सबसे डरावना असर ये हुआ कि लोगों ने सड़क पत्थर उठा लिए। इस सबके लिए नेशनल कांफ्रेंस महबूबा सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है, जबकि पीपल डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का कहना है कि इस पत्थरबाजी के पीछे नेशनल कांफ्रेंस हैं, और कोई नहीं।
अनंतनाग कस्बे की एक पुरानी कोठी में होमशाली बुग से नेकां विधायक अब्दुल माजिद लारमी खिड़की के किनारे कुर्सी पर बाकायदा पालथी मार के बैठे हैं।  उनके घर पर न कोई सुरक्षा गारद है, न उनके नाम का कोई बोर्ड। आमतौर पर दक्षिण कश्मीर मुफ्ती परिवार का इलाका माना जाता है। महबूबा का विधानसभा क्षेत्र अनंतनाग सर्वाधिक प्रभावित जिले शोपियां और पुलवामा से सटा है। महबूबा इस पूरे इलाके से लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं। फिर भी लारमी ने उनके गढ़ में सेंध लगाई।
लारमी कहते हैं कि, ‘विधानसभा चुनाव से पहले महबूबा की पार्टी ने भाजपा के विरोध की सारी हदें पार कर दी थीं। जनता से वादा किया था कि वह भाजपा को जवाहर टनल पार नहीं करने देगी। चुनाव के बाद वही पार्टी भाजपा से गठबंधन कर उसे ससम्मान श्रीनगर तक ले आई। ऐसा पहली बार हुआ जब जम्मू कश्मीर की हुकूमत भाजपा के हाथ में आई। ये वोटरों के लिए एक बड़ा धोखा था।’
लारमी कहते हैं रियासत में पत्थरबाजी पीडीपी की देन है।  जब उमर अब्दुल्ला की सरकार थी तो पब्लिक को पत्थरबाजी पीडीपी ने ही सिखाई थी। हमने लारमी से पूछा कि ‘पीडीपी कहती है कि अब आप के लोग पत्थरबाजी कर रहे हैं ताकि सरकार बदनाम हो, अस्थिर हो।’ जवाब में वे कहते हैं. ‘ये सफेद झूठ है।’ काफी देर इधर-उधर की बातें होती रहीं। हमने उनसे फिर पूछा. ‘आप अपने दिल पर हाथ रख कर कह सकते हैं कि इस पत्थरबाजी में आपका कोई हाथ नहीं।’ लारमी बोले, ‘दिल पे नहीं मैं कुरान पे हाथ रख कर कह सकता हूं कि इस पत्थरबाजी के पीछे हमारा कोई हाथ नहीं है। आप इन्क्वायरी करा लीजिए, अगर नेशनल कान्फ्रेंस का नाम आया तो मैं इस पार्टी को अभी छोड़ दूंगा।’

पीडीपी भी इस बात से इंकार नहीं करती कि घाटी के लोग भाजपा से हाथ मिलाने से नाराज हैं। कश्मीर के पीडीपी प्रवक्ता रफी मीर कहते हैं कि ये सच है कि 2014 के चुनाव में हमने भाजपा के खिलाफ  वोट मांगा था। लेकिन हालात ऐसे बन गए कि हमें भाजपा के साथ सरकार बनानी पड़ी। हमने जम्मू के जनादेश का सम्मान किया ताकि जम्मू-कश्मीर में खाई और न बढ़े। फिर दिल्ली में मोदी की सरकार थी। हमें लगा गठबंधन हुआ तो हम कश्मीर का मसला सुलझा लेंगे। फिर दिक्कत कहां है?  इस सवाल के जवाब में मीर कहते हैं कि इन सब चीजों में वक्त लगता है।

मोदी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे: भट
गुस्से का असली शिकार शोपियां के पीडीपी विधायक मोहम्मद यूसुफ  भट को बनना पड़ा।  हाल में ही उनके घर ग्रेनेड से हमला हुआ। भट कहते हैं कि हमने इस उम्मीद से मोदी का साथ दिया था कि वह कश्मीर के मसले को सुलझाएंगे। पर ये नहीं हुआ। शोपियां के जो लोग मेरे घर की इबादत करते थे, उन्होंने मेरा घर जला दिया।  ये राजनीतिक मसला है, परवो इसे लॉ एंड आर्डर का मसला मानते हैं। उन्हें पाक से बात करनी चाहिए। हुर्रियत नेताओं से बात कर मसला सुलझाना चाहिए। हमने पूछा, ‘लेकिन आपकी नेता महबूबा कहती हैं कि मोदी जी उनकी किसी बात से इंकार नहीं करते? इस पर भट बोले-फिर वे पाकिस्तान से बात क्यों नहीं कर रहे? जबकि महबूबा कई बार ये बात उठा चुकी हैं। पर पाकिस्तान भी तो बात करने को तैयार हो? इस सवाल का भट कोई जवाब नहीं दे पाए।



Sunday, May 20, 2018

सेना कहती है आतंकियों के जनाजे रोकें, पर सुनता कौन है?


कश्मीर लाइव रिपोर्ट-4





 - जनाजों में उमड़ती है हजारों युवाओं की भीड़, भावुकता भरे गुस्से से पैदा हो रहे नए आतंकी फोटो -बासित जरगर


शोपियां। ये सबसे रोमांचकारी नजारा होता है। भावुक और दिल दहला देने वाला। कश्मीरी आतंकी के जनाजे का जुलूस। इनकाउंटर में मारे गए पोस्टमार्टम के बाद लाश आतंकी के घर वालों को सौंप दी जाती है। थोड़ी ही देर में स्ट्रेचर पर रखी लाश को भीड़ अपने कब्जे में ले लेती है और फिर शुरू होता है आजादी के नारों और दर्दनाक मातम का शोर। देखते-देखते पूरा इलाका जनसैलाब में तब्दील हो जाता है। हजारों हजार लड़के, औरतें, मर्द, बुजुर्ग जनाजे को घेरे खड़े रहते हैं। दूर दूर तक न पुलिस, न आर्मी, न सीआरपीएफ  और न कोई कश्मीरी नेता। बस कंधे पर एके-47 टांगे लम्बे बालों वाले आतंकी दिखते हैं-क्यूबा के क्रान्तिकारी चे-गेवारा जैसी कैप पहने अपने साथी को गन सैल्यूट के साथ अंतिम विदाई देने के लिए। इस आखिरी सलाम की गो‌लियों का तीखा शोर दूर सीआरपीएफ और राजपूताना रायफल्स के फौजी कैम्पों तक सुनाई देता है। सेना समझ जाती है कि दूर कहीं आतंकियों की नई फसल तैयार हो रही है।
शोपियां, पुलवामा से लेकर श्रीनगर तक की भीड़ इन जनाजों में शामिल होती है। लेकिन इस भीड़ में बाहर के मीडिया को आने की इजाजत नहीं। किसी ने आपको पहचान लिया कि तो क्रोधित। भीड़ आपको मार डालेगी। भले ही आप उनके लिए रिपोर्टिंग करने आए हों। उन्हें किसी पर यकीन नहीं। मीडिया पर तो बिलकुल नहीं
बीती 7 मई को शोपियां की पुराने जमाने की जामिया मस्जिद में सद्दाम पाडर के जनाजे में हजारों हजार युवाओं का मजमा जुटा था। अगले एक हफ्ते में पांच नए आतंकी बने जिसमें आवंतीपुरा का तौसीफ ठोकर भी शामिल था। यह वही भीड़ होती है जो नए आतंकी पैदा करती है। हर जनाजे के बाद लश्कर और मुजाहिदीन नए आतंकी बने लड़कों की तस्वीर जारी करता है। हिजबुल ने तौसीफ की भी तस्वीर जारी की। 

सेना में कर्नल स्तर के एक अधिकारी ने बताया कि दिल्ली से श्रीनगर तक की उच्चस्तरीय बैठकों में हम, सीआरपीएफ और जम्मू कश्मीर पुलिस भी कई बार ये बात लिखकर दे चुकी है कि इन जनाजों के जुलूस बंद कराएं जाएं। ये केवल कश्मीर का माहौल खराब कर रहे हैं। इसकी इजाजत देकर हम आतंकियों को महिमामंडित करने का मौका दे रहे हैं। एक जनाजे में दस नए आतंकी पैदा होते हैं। हम दस मारते हैं अगले दिन दस नए आतंकी पैदा हो जाते हैं। ऐसे में ये सिलसिला कभी नहीं खत्म होगा।
वे बताते हैं कि पहले पाकिस्तानी आतंकी के मरने पर भी जनाजा निकलता था। ढाई साल पहले लश्कर का कश्मीर कमांडर अबू कासिम मरा तो उसके जनाजे में एक लाख लोग जुट गए थे। तब से विदेशी आतंकी के जनाजों पर रोक लग गई। अब पुलिस उनकी लाश उत्तरी कश्मीर के किसी इलाके में चुपचाप दफना देती है। कोई हल्ला नहीं होता। लेकिन कश्मीरी आतंकियों के जनाजे पर कोई रोक नहीं। अधिकारी कहते हैं कि पुलिस, सेना कस्टडी में आतंकी के शव को चार पांच परिजनों की मौजूदगी में किसी अज्ञात जगह दफना देना चाहिए। लेकिन सूबे की वोट की राजनीति इसके लिए तैयार नहीं है। महबूबा सरकार ऐसे जनाजों को रोक कर पब्लिक की और नाराजगी मोल नहीं ले सकती। फिर हुर्रियत और अलगवावादी ऐसा होने नहीं देंगे क्योंकि वह कभी नहीं चाहते कि कश्मीर में हालात सुधरे।
खुले में आतंकी, आर्मी बेबस
जनाजों में आतंकी गन सेल्यूट देने जरूर आते हैं। वे खुलेआम हवाई फायरिंग करते हैं, लेकिन सुरक्षाबल कुछ नहीं कर सकते। एक अफसर ने बताया कि हमें तब बाहर निकलने के आदेश नहीं। वहां हजारों की भीड़ उमड़ती है। वह उन्माद में होती है। ऐसे में हम कोई जोखिम नहीं ले सकते। अगर हमने कोई कार्रवाई की तो सैकड़ों नागरिक हताहत हो सकते हैं।



नाबालिग को आतंकी बना तस्वीर कर दी जारी
हद तो तब हो गई जब पुलवामा में रविवार को एक नाबालिग की हथियारों के साथ फोटो सोशल मीडिया में जारी कर कर दी गई। इसमें कहा गया है कि कक्षा आठ में पढ़ने वाले छात्र आतंकी बन गया है। छात्र ने लश्कर-ए-तैयबा ज्वाइन कर लिया है। आतंकी अब नाबालिगों को संगठन में ज्वाइन करा रहे हैं। जिससे की माहौल को और बिगाड़ा जा सके।




कठोर फैसला लेना होगा: जम्‍मूू कश्‍मीर पुलिस चीफ एसपी वैद
प्रश्न: आतंकियों के जनाजे पर रोक क्यों नहीं लगा पा रही सरकार?
डीजीपी: ये कठिन राजनीतिक निर्णय है। वो कहेंगे एक तो आप हमारे बच्चों को मार रहे हैं और उसकी बॉडी भी नहीं दे रहे।
प्रश्न: सही है। लेकिन अगर आप उनको एक बॉडी देते हैं तो कल आपको उन्हें और दस नए बच्चों की बॉडी देनी पड़ेगी?
डीजीपी: बिल्कुल ठीक। हम भी नहीं चाहते कि इस तरह जनाजे निकाले जाएं। भावनाएं भड़के
  और बच्चे मोटिवेट हों। लेकिन ये निर्णय हम अकेले नहीं कर सकते। हमने इतना जरूर किया है कि ऐसे जनाजों में भड़काऊ भाषण देने पर एफआईआर दर्ज करनी शुरू कर दी है।
प्रश्न: लेकिन आपको पता है कि वहां हर बार आतंकियों के जत्थे गन सैल्यूट देने आते हैं?
डीजीपी: हां, पर वहां इतनी भीड़ होती है कि हम कार्रवाई करें तो बड़ा नुकसान हो सकता है।








Saturday, May 19, 2018

आजादी नहीं, ग्लैमर से पैदा हो रहे कश्मीर में आतंकवादी


कश्मीर डायरी-3

पुलवामा। आजादी सिर्फ एक नारा है जो कश्मीर में अपने मायने खो चुका है। अब सिर्फ कंधे पर एके 47 रखे आतंकियों का ग्लैमर है, जो खाली निट्ठले बैठे युवाओं को अपनी तरफ खींच रहा है। हिजबुल मुजाहिदीन शहीद होने के लिए तैयार बकरे की तरह, रायफल-बंदूकों से सजा कर उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर जारी कर देता है। आतंकी बन जाने ‌का ठप्‍पा लगने के बाद एक अदना-सा चौथी फेल लड़का यहां रातों रात हीरो बन जाता है। वह भीड़ के बीच घूमता है तो लोग उसके हाथ चूमने के लिए बेताब रहते हैं। कश्मीर वि.वि और कालेजों में पढ़ने वाली दर्जनों लड़कियां रातों रात उसकी फैन हो जाती हैं और कश्मीर के बहके हुए युवा इस ग्लैमर की चकाचौंध में गुमशुदाहो जाते हैं। और उनकी गुमशुदगीके बाद घर में रोना-पीटना मच जाता है क्योंकि कश्मीर में गुमशुदगी’  का मतलब है उनका बेटा आतंक की राह पर निकल गया।  
शोपियां ओर पुलवामा जिले में हर तीसरे दिन किसी घर का एक बेटा गुमहो रहा है। गुमशुदगीकी शिकायत थाने में दी जाती है और थाने तुरंत उनका ब्योरा सुरक्षा एजेंसियों की तरफ बढ़ा देते हैं। श्रीनगर के कश्मीर विवि के 33 साल के प्रो. मुहम्मद रफी भट की कहानी आतंकी बनने की पूरी प्रक्रिया का खुलासा करती है। रफी शुक्रवार को घर नहीं लौटा। अगले दिन उसकी गुमशुदगीकी रिपोर्ट लिखवा दी गई। वह सुरक्षा एजेंसियों के सर्विलांस पर आ गया।
सुरक्षा बलों के सूत्रों के मुताबिक उसकी पहली लोकेशन शोपियां में मिली जो आतंकियों का गढ़ है। आतंकी बनने के बाद पहला काम उनकी लांचिंग का होता है। इसमें नवागंतुक, कुछ स्टार टाइप के आतंकियों के संग पूरी साज-सज्जा के साथ अपना फोटो सेशन करवाता है। और ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी जाती हैं। और उस एक सेकेंड में नवागंतुक आतंक की दुनिया में बाकायदा शामिल हो जाता है। रफी की लांचिंग के लिए आतंक के कुख्यात चेहरे सद्दाम पाडर को  चुना गया था। रविवार को चार आतंकियों के साथ उसका फोटो सेशन होना था। लेकिन उससे पहले उन पांचों को शोपियां की खूबसूरत घाटी में सुरक्षा बलों ने घेर लिया। चारों तरफ से घेरने के बाद सुरक्षाबलों ने अपनी गाड़ी भेजकर रफी के परिवार वालों को सुबह मुठभेड़ स्‍थल पर बुलाया और उनसे सरेंडर करने की अपील कराई। लेकिन दूसरी तरफ से फायरिंग जारी रही और सद्दाम, रफी समेत पांचों आतंकी ढेर हो गए। अब इससे ज्यादा किसी भी देश की सभ्य और संवदेनशील फौज क्या कर सकती है।
अनंतनाग के एक सैन्य अधिकारी बताते हैं कि ये पूरा खेल ग्लैमर का है। वह देखते हैं कि कल तक ये लड़का हमारे साथ गलियों में फिरता था आज वह हीरो बन गया है। लोग उसका हाथ चूम कर सम्मान दे रहे हैं। उसे कहीं छुपना भी नहीं पड़ रहा। हजारों की भीड़ के बीच वह एके 47 लेकर घूम  सकता है। सोशल मीडिया पर सिर्फ उसी का नाम है।  वह लार्जर देन लाइफ वाली जिन्दगी जी रहा है। सैकड़ो लड़कियां उस पर मरती हैं। इतना ही नहीं एक दिन वह भी हिजबुल का पोस्टर ब्वाय बन सकता है। बस यहीं से उनके अंदर इस ज़िंदगी को जीने की चाहत पैदा हो जाती है और इस ग्लैमर से आकर्षित होकर वो आतंक की राह पर निकल पड़ते हैं।
हमने जब ये पूछा कि पोस्टर ब्वाय बनाने का इनका क्राइटेरिया क्या है? सैन्य अधिकारी जवाब में कहते हैं कि इसके लिए कौन सी पीएचडी करने की जरूरत है। शक्ल सूरत अच्छा हो, दीन की बातें कर लेता हो, बोलने में अच्छा हो, बस बन गया पोस्टर ब्वाय।
  
जारी..



इनसेट-1
72 हफ्ते से ज्यादा नहीं है़ ज़िन्दगी
आतंकी मुहम्मद रफी उनमें से था जिसका आतंकी जीवन 72 घंटे से ज्यादा का नहीं था। आपरेशन ऑलआउटके बाद कश्मीर के किसी भी आतंकी की जिन्दगी 72 हफ्ते से ज्यादा की नहीं है। लेकिन ‌फिर भी लड़के आतंक की राह पर निकल रहे हैं। केवल पुलवामा इलाके से पिछले तीन महीनों में 47 नए आतंकी सेना के रिकार्ड में हैं। कई गुमशुदाघरवालों की ओर से थानों में अब इस डर से दर्ज नहीं कराए जा रहे हैं कि वे कहीं सुरक्षा बलों के निशाने पर न आ जाएं।




 फोटो कैप्‍शन-
हिजबुल के टॉप कमांडर सद्दाम पाडर के जनाजे की मोबाइल से तस्वीरें खींचते व लाइव रिकार्डिंग करते हजारों युवा       
 फोटो बासित जरगर



Friday, May 18, 2018

बम धमाके से बचने के लिए थानों के आंगन में लगाए नेट




कश्मीर ग्राउंड रिपोर्ट: दो




पुलवामा।  यहां मौत आसमान से भी आ सकती है। अप्रत्याशित मौत से बचने के लिए पुलिस स्टेशन के आंगन की खुली छत पर ग्रीन नेट लगा दिया गया है। ताकि बाहर से कोई हैंड ग्रेनेड फेंके तो बम इस जाली से उछलकर ऊपर हवा में फटे और जान-ओ- माल का नुकसान कम से कम हो। थाने में खड़ी पुलिस की जीप के हर हिस्से पर पत्थरबाजी के निशान हैं जो बताते हैं कि पत्थरबाजों के लिए पुलिस अब नाकाबिले बर्दाश्त हो चुकी है।
ये पुलिस स्टेशन कहीं एकांत इलाके में नहीं बल्कि पुलवामा के बीच बाजार में है। इमारत पुराने जमाने की है। किले जैसी दीवारों से घिरे इस थाने पर पिछले छह महीनों में पांच बार ग्रेनेड से हमला हो चुका है। तीन बार थाने के गेट पर फायरिंग हो चुकी है। कई पुलिस वाले घायल भी हो चुके हैं। इलाके में पड़ने वाले तकरीबन सभी थानों का यही हाल है। अभी तीन दिन पहले ही थाने के एसएचओ मसरत अहमद मीर पर दिनदहाड़े जानलेवा हमला हुआ। वह बुलेट प्रूफ गाड़ी में थे, सो बच गए। श्रीनगर के रहने वाले मीर सिर्फ इसलिए आतंकियों के निशाने पर हैं क्योंकि वह पत्थरबाजों को नहीं छोड़ते। 

शोपियां खत्म होते ही पुलवामा जिला शुरू हो जाता है। यह जिला कभी केसर और दूध के लिए जाना जाता था लेकिन अब आतंकवाद के लिहाज से कुख्यात है। इसी जिले में त्राल है जहां हिजबुल का पोस्टर ब्वाय बुरहान वानी आतंकी बना था। 2016 के एनकाउंटर में वानी के मरने के बाद दर्जनों लड़के यहां से आतंकी बने। अंसार गजावत उल हिंद का चीफ  जाकिर मूसा भी इसी त्राल का है। मूसा ने चंडीगढ़ के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक की डिग्री ली। टाइगर और सद्दाम की मौत के बाद अब मूसा यहां के युवाओं का हीरो है। पुलवामा में ही पिछले साल सीआरपीएफ कैंप पर फिदायीन हमला हुआ था, जिसमें हमारे पांच जवान शहीद हुए। इसी जिले में द्रबगाम है, समीर टाइगर यही का रहने वाला था। आप समझ सकते हैं कि आतंकवाद के लिए ये जमीन कितनी उर्वरक है।


यहां का माहौल भी शोपियां से जरा भी अलग नहीं है। मैंने अपने रिपोर्टर से कहा कि मैं यहां के किसी पुलिस अधिकारी से बात करना चाहता हूं। हमारे रिपोर्टर फिदा ने कहा कि यहां पुलिस स्टेशन सबसे ज्यादा असुरक्षित है। फिर हम पुलिस स्टेशन पहुंचे। पुराने जमाने की इमारत थी। बीच में बड़ा आंगन चारों तरफ कमरे। कमरे में नौजवान एसएचओ पुलवामा मसरत मीर बैठें हैं। वह श्रीनगर के हैं। पर यहां तैनात हैं। मैं उनके पीछ टंगा बोर्ड देखता हूं। पिछले 28 साल से कोई एसएचओ यहां एक साल से ज्यादा नहीं टिका। मीर को डेढ साल हो गए। वे आतंकियों के निशाने पर हैं। क्योंकि वह किसी को बख्‍श्ते नहीं। मैंने मासूम सा सवाल पूछा-ये हरे रंग का नेट धूप से बचने के लिए है? वे हंसे। और बोले-नहीं ये नेट हमें हैंड ग्रेनेड से बचाता है। हमे लगता है कि इस नेट से लड़कर बम बाउंस होगा और ऊपर ही फट जाएगा। नीचे नुकसान कम होगा।
   
इसी जमीन पर प्रतिबंधित पॉपी की फसल भी उगाई जाती है। इसके फूलों से तेज नशीला पदार्थ ओपीएम बनता है। एसएचओ पुलवामा मसरत मीर बताते हैं कि खाली बैठे युवा पत्थरबाजी इसलिए भी करते हैं ताकि इसकी आड़ में पॉपी का अवैध कारोबार चल सके। अब इन्हें आतंक का और अच्छा बहाना मिल गया है।
इसी इलाके में लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल दोनों संगठन सक्रिय हैं। स्थानीय लोग दोनों के साथ हैं। सुरक्षाबलों ने पिछले हफ्ते यहां के चिनारबाग के टकिया मोहल्ले में लश्कर के नवीद जट्ट को घेरा था। नवीद अपने दो साथियों के संग एक घर में छुपा था। उस घर को पत्थरबाजों ने घेर लिया। ये पत्थरबाज आतंकियों को कवर देने का काम कर रहे थे। इस मुठभेड़ में सीआरपीएफ  का जवान मनदीप शहीद हो गया था। सभी आतंकी भाग निकले और शहीद की रायफल भी साथ ले गए। सुनने में ये थोड़ा अजीब लगता है।
ऐसा नहीं कि ये आतंकी बहुत प्रशिक्षित हैं। जैसा कि राजपूताना रायफल्स के एक सैन्य अधिकारी ने बताया कि अब सीमा पार में होने वाली आतंकी ट्रेनिंग तकरीबन बंद हो चुकी है। नब्बे के दशक में झुंड के झुंड लड़कों की वहां कैंपों में ट्रेनिंग होती थी। पर अब ऐसा नहीं है। कुछ लड़के सीमापार भी जाते हैं लेकिन बाकायदा पाकिस्तानी वीजा लेकर। कई दफा वीजा के लिए फार्म पर हुर्रियत नेताओं की चिट लगी होती है। ऐसे हमने कई लड़के पकड़े जो सिर्फ ‘बिरयानी’ और ‘ऐश कराने’ के लालच में इस्लामाबाद चले गए थे। एक लड़का तो सिर्फ पंद्रह साल का था। उसे वीजा पर बार्डर पार करते ही धर लिया गया था। पूछताछ में उसने बताया कि सीमापार लश्कर वालों ने उसे धोखा दे दिया। उससे पूछा गया कि क्या धोखा हुआ था तुम्हारे साथ, तो उसका जवाब था- ‘हमें कहा गया था कि तुम्हें एके-47 के साथ रात के अंधेरे में बार्डर क्रास क्त्रसस कराएंगे। लेकिन ऐसे ही ये कह कर भेज दिया कि बंदूक तुम्हें वही मिल जाएगी।‘
सैन्य अधिकारी ने बताया- लेकिन अब उनका मूवमेंट इतना आसान नहीं। नए लड़कों को यहीं शोपियां और पुलवामा के पहाड़ी और दुगज़्म इलाके में एके-47 लोड करना और चलाना सिखा दिया जाता है। इससे ज्यादा किसी ट्रेनिंग की जरूरत नहीं। फिर भी इन अप्रशिक्षित आतंकियों की गोली से हमारे जवान शहीद हो रहे हैं? इसके जवाब में अफसर कहते हैं- एके 47 किसी नौसिखिए के हाथ में थमा दी जाए तो वह भी कई लोगों को मार गिराएगा। दरअसल यह मुठभेड़ बहुत कम दायरे में होती है। जो भी गोलीबारी की जद में आएगा, मारा जाएगा। इसके लिए आतंकी का निशानेबाज होना जरूरी नहीं। फिर हमारे सामने दो मोचे होते हैं, एक आतंकी की गोलियां और दूसरी तरफ से बरसते चिकने, ठोस चट्टानी पत्थर।
शोपियां और पुलवामा में जो बंदूक उठाने की हिम्मत नहीं करते, वो ओजीडब्लू बन जाते हैं। इसे सैन्य भाषा में ओवर ग्राउंड वर्कर कहा जाता है। ये आतंकी के प्राइवेट सेकेट्री की तरह होते हैं जो उनकी हर चीज का ख्याल रखते हैं। उनके खाने पीने से लेकर उनके कपड़े लत्ते तक का। उनके सारे मूवमेंट इन्हीं के इशारे पर होते हैं। बिना ओजीडब्लू की मर्जी के कोई आतंकी से संपर्क नहीं साध सकता।

कायर हैं आतंकी
सीआरपीएफ  के एक कमांडर ने बताया कि ये नए आतंकी इतने कायर हैं कि सामने से घिरा देखकर हौसला खो देते हैं। कई तो बंदूक के घोड़े नहीं खोल पाते। चारों तरफ  से घिरा पोस्टर ब्वाय समीर टाइगर तो गन छोड़कर छत के रास्ते भागने की फिराक में था लेकिन मारा गया। तब इन्हें महसूस होता है कि गलती हो गई। अधिकांश आतंकी वहीं मुठभेड़ स्थ्ल से ही अपने मां बाप को फोन मिला कर उनसे अपने कर्मों के लिए माफी मांगते हैं। बेटे को फंसा देखकर वे दौड़े-दौड़े मुठभेड़ स्थल तक पहुंच जाते हैं। हम उनसे भी अपील कराते हैं कि वे उन्हें सरेंडर कर दें। पर वे नहीं मानते। उन्हें डर रहता है कि सेना उन्हें जिंदा नहीं छोड़ेगी।