दयाशंकर शुक्ल सागर

Friday, March 18, 2022

कश्मीर फाइल्स के बहाने

 


कहानी कहानी होती है. आधा सच और आधा फसाना. लेकिन 90' के कश्मीर के कत्ले आम के बारे में जितना मैंने पढ़ा और सुना है 'कश्मीर फाइल्स' की कहानी सौ फीसदी सच है. कुछ साल पहले जब मैं पहली दफा जम्मू के कश्मीरी पंडितों के रिफयूजी कालोनी में गया था तो दिल सच में भर आया था. कश्मीर की हरी भरी वादियों को छोड़कर उनकी दुनिया यहां दो कमरे के बंद अंधेरे उमस भरे घरों में कैद हो गई थी. मैंने महसूस किया वे अपना दर्द जाहिर नहीं होने देते थे. लेकिन अपनी आंखों में गहरी पीड़ा को चाह के भी वे छुपा नहीं पाते. आंखें जो बताती थीं कि कैसे कश्मीर में उनका शारीरिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक नरसंहार हुआ. कोई 15000 परिवार जम्मू में बस गए. कई अन्य परिवार दिल्ली, लखनऊ और दूसरे शहरों में पलायन कर गए. तीस साल में जैसे कई पीढ़ियां गुजर गईं.  तो विवेक रंजन अग्निहोत्री ने अपनी फिल्म 'कश्मीर फाइल्स'  में सच दिखाया. वैसा सच जैसा वो है. नंगा, दर्दनाक और कड़वा सच. जिस सच को दिखाने की हिम्मत तीस साल तक बालीवुड नहीं जुटा पाया. क्योंकि सच कहने और उसे सार्वजनिक करने के अपने खतरे हैं. गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग का सच मैंने अपनी किताब #अधनंगा फ़कीर में कहने की कोशिश की तो तमाम लानते मलानते झेलनी पड़ी. इस कहानी पर फिल्म बनाने के लिए बालीवुड के कई निर्देशकों से मेरी बात हुई. पर स्क्रिप्ट पसंद आने बावजूद कोई इस विषय को छूने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाया. इसलिए मैं अग्निहोत्री का दर्द समझ सकता हूं. मैं नहीं जानता कि आपने कभी स्टीवन स्पीलबर्ग की फिल्म शिंडलर्स लिस्ट देखी या नहीं. दुनिया के सिनेमा में ये फिल्म मील का पत्‍थर है. इसे न जाने कितने आस्कर मिले. इसका हर दृश्य दिल और ‌दिमाग को झकझोर देने वाला है. ये फिल्म हिटलर की हैवानियत को दिखाती है जो उसने पोलिश-यहूदी शरणार्थियों के साथ किया.  हिटलर तो फिर गैस चैम्बरों में यहूदियों को नंगा करके उनका सामुहिक कत्ल करता था लेकिन कश्मीरी पंडितो के साथ हुई हैवानियत उससे कहीं ज्यादा खौफनाक है. शिंडलर्स लिस्ट में 50 साल पुराने जन संहार की घटना को फिल्म के जरिए दिखाया गया है. जबकि कश्मीर का जनोसाइट तो अभी 30 साल पुराना है. पर फिल्म के बहाने पूरे नरैटिव को हिंदू बनाम मुस्लिम बना दिया गया.  फिल्म शिंडलर्स लिस्ट को सारी दुनिया ने सराहा. कला की दृष्टि से भी और कंटेंट के नजरिए से भी. मुझे लगता है कि  'कश्मीर फाइल्स' का आकलन भी इसी नजरिए से करना चाहिए. फिर जिन्हें राजनीति करना है करेंगे. सबसे मजेदार प्रतिक्रिया तो अभिव्यक्ति की आजादी का झंडा उठा आजादी की भीख मांगने वाले झूठे मक्कार सेकुलरों की दिख रही है. ये अरुधंती राय जैसे वही सेकुलर हैं जिन्हें कश्मीरी आतंकियों की हिंसा अभिव्यक्ति की आजादी नजर आती है लेकिन कश्मीरी पंडितों के दर्द की अभिव्यक्ति में उन्हें असहिष्णुता दिखाई दती है. तथ्यों और कला के आधार पर फिल्म का मूल्यांकन करने के बजाय वे फिल्म पर लानत मलानत भेज रहे हैं.  

और फिल्म पर  भगवा दक्षिणपंथियों का तमाशा तो और भी ज्यादा दिलचस्प है. वे ऐसा दिखा रहे हैं कि फिल्म देखकर उन्हें पहली बार इलहाम हुआ कि कश्मीरी पंडितों पर कितना अत्याचार हुआ. ऐसा कतई नहीं है कि कश्मीरी पंडितों पर 90' में हुए इस्लामिक कट्टरपंथियों के जघन्य अत्याचारों से ये हिंदू झंडबदार अनजान थे. जब ये सब हुआ केन्द्र में अब तक के सर्वाधिक कमजोर प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार थी. इस सरकार की अर्थी को कंधा देनी वाली यही बीजेपी थी जो अपने राज्यों में 'कश्मीर फाइल्स' को टैक्स फ्री कर रही है. तब इसी बीजेपी के आडवाणी जैसे लीडरान कश्मीरी पंडितों को बचाने के बजाए सत्ता में आने के लिए रथ यात्रा निकलाने की रणनीति बना रहे थे. जम्मू में रहते मैंने महसूस किया कि मोदी सरकार पहली बार कश्मीर और कश्मीरी पंडितों को लेकर सचमुच संजीदा है. आर्टिकल 370 हटा कर और पंडितों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू कराके ये सरकार ने साबित भी कर दिया. अभी जम्मू के एक मित्र ने मुझे बताया कि पोर्टल बनाकर कश्मीरी पंडितों की जमीनें वापस उनके नाम की जा रही हैं. कश्मीर में देसी और दुबई की विदेशी कंपनियां करोडों का विनिवेश करने जा रही हैं. संभवतः इसी महीने मोदी जी जिसकी शुरूआत करेंगे.

फिल्म में ज्यादातर कश्मीरी मुसलमानों को पाकिस्तान परस्त और हिंदुओं से नफरत करने वाली कौम की तरह दिखाया गया है. कश्मीर का यही कड़वा सच है. वे देश को अमूमन 'इंडिया' कह कर पुकारते हैं गोया वे कश्मीर में नहीं पाकिस्तान में हों. मैं कश्मीर के गांव-गांव हफ्तों घूमा हूं. वे आजादी के 75 साल बाद भी इंडिया पर यकीन नहीं कर पाए हैं. खुद कश्मीरी पंडितों के संगठन बताते हैं कि घाटी में अब तक कोई 650 (आरटीआई में ये गिनती 89 बताई गई है.) कश्मीरी पंडित मारे गए . श्रीनगर पुलिस के आरटीआई में दिए आंकड़े बताते हैं कि आतंकी हमलों में अब तक कोई 1635 गैर हिन्दू मारे गए. ये एक अलग नजरिया है कश्मीर को देखने समझने का. क्या इस नजरिए पर कोई फिल्म बना सकता है?  

कश्मीर के साथ इतिहास ने हमेशा से बेइंसाफी की. 12वीं सदी में कल्हण जब 'राजतरंगिणी' लिख रहे थे और देख रहे थे कि किस तरह महमूद गजनी के हमलों से बेजार उत्तर भारत के बदहवास  हिन्दू भागकर कश्‍मीर में शरण ले रहे हैं. वे अपने साथ बेशकीमती ग्रंथ साथ ला रहे थे. और देखते-देखते कश्मीर विद्वान ब्राह्मणों का केन्द्र बनता जा रहा था. 1192 यानी राजतरंगिणी की रचना पूरी होने के 44 साल बाद मुहम्मद गौरी ने भारत पर हमला का यहां मुस्लिम राज स्‍थापित किया. एक तिब्बती राजकर्मी रेंचन ने हिन्दू राजा की बेटी कोट रानी से ब्याह रचाया. वह हिन्दू बनना चाहता था पर कश्मीरी पंडितों ने ये स्वीकार नहीं किया. तो वो मुसलमान बन गया. उसकी मौत के बाद कोट रानी द लास्ट क्वीन आफ कश्मीर के नाम से मशहूर हुई. सच पूछिए तो 'कश्मीर फाइल्स' यहां से खुलती है. तो जो अग्निहोत्री ने कश्मीर फाइल्स में दिखाया वो एक बानगी भर है. असली इतिहास तो अभी बताया और दिखाया जाना बाकी है. लेकिन उसे देखने के लिए कलेजा मजबूत करना होगा. 


Saturday, March 20, 2021

नीड़ का निर्माण फिर फिर




मैंने देखा है दुनिया में हर बड़े काम का क्रेडिट पुरुष ले उड़ते हैं। जबकि हर पुरुष के परिश्रम के पीछे एक स्‍त्री का श्रम और उसकी साधना छुपी होती है। एक पुरानी और मशहूर कहावत है दुनिया के हर सफल आदमी के पीछे स्‍त्री होती है लेकिन हैरत की बात यह कि वह मुझे स्‍त्री कभी दिखती नहीं। वह कभी सामने नहीं आ पाती। पति-पत्नी का केवल एक साथ रहना दांपत्य नहीं। दांपत्य के बहुत गहरे अर्थ हैं। यह वह शब्द है जो स्त्री और पुरुष दोनों को एक बंधन में बांधकर एक करता है। दाम्पत्य प्रेम का सटीक अर्थ है-दूसरे की मौजूदगी का आनंद लेना। और परस्पर सम्मान इसका आधार है। सफल दांपत्य जीवन के सात सूत्र हैं-संयम, संतुष्टि, संतान, संवेदनशीलता, संबल, संकल्प और सर्म्पण। ऐसा मैंने शास्‍त्रों में पढ़ा है। आज की प्रेरणा दायक कहानी इसी दांपत्य जीवन पर। 



जीवन के तीसरे पड़ाव में आकर एक पुरुष शहरी जिन्दगी छोड़कर ग्रामीण जीवन जीने का सपना बुनता है कि दूर गांव में एक हमारा छोटा-सा घर होगा। घर के सामने एक बड़ा-सा बगीचा होगा। जिनके फूलों पर हर वक्त तितलियां मंडराती होंगी। जैविक खेती से दूर दूर तक लहलहाते खेत होंगे। और वह अपनी पत्नी को इसके लिए प्रेरित करता है। और ये कामना एक ऐसी पत्नी से जिसने कभी खेत नहीं देखे। जो 35 साल अपने वैवाहिक जीवन में अपने ससुराल के पैतृक गांव में केवल दो बार आई हो। जिसका जीवन आसाम के चाय बगानों की ठेठ अंग्रेजी संस्कारों में बीता हो। फिर शादी के बाद इलाहाबाद आने पर रसूखदार पति के साथ एक लम्बा सामाजिक जीवन। बड़ी महफिलों, जलसों, क्लब की पार्टियों और तमाम सामाजिक आयोजनों में जाना। सुख सुविधाएं के साथ प्रशंसा, पद, प्रतिष्ठा और परिचयों का एक विशाल दायर छोड़ कर एक गांव में आकर बसने के फैसले में पति का साथ देना। और गांव भी क्या दूर दूर तक फैले सूखे खेत और आम के कुछ पेडों का झुरमुठ। जा‌हिर है ये कोई आसान फैसला नहीं था।    

मेरे एक मित्र हैं अखिलेश कुमार मिश्र बेहद संवेदनशील, विद्वान और भले मानस। आध्यात्मिक किस्म के इंसान हैं। पुलिस इंटेलीजेंस में बड़े अफसर थे। इलाहाबाद के पॉश इलाके में उनका घर है। बच्चे बड़े होकर नौकरी करने चले गए। घर काटने को दौड़ता था। सो रिटायरमेंट के बाद उन्होंने बनारस के पास अपने गांव में जीवन जीने का फैसला किया। उन्हें लगा प्रकृति के आंचल में ही वे ईश्वर के सबसे ज्यादा करीब रह सकते हैं। और यहां से शुरू होती है मिश्र दम्पति के संघर्ष की एक यात्रा। दो साल पहले उनकी पत्नी किरण मिश्रा तीसरी बार चंदौली के पास अपने ससुराल के पैतृक गांव आईं। उनके  इरादा अपने गांव में आर्गनिक फार्म हाउस बनाना था। जैविक खेती का एक ऐसा प्रयोग आसपास के इलाकों में एक मिसाल बने। उनके लिए एक उदाहरण बनना जो गांव छोड़ कर शहरों में जा बसते हैं और फिर कभी लौट के नहीं आते। जो चंद लोग रिटायरमेंट के बाद कोशिश करते भी हैं वह बीच में हार थक कर लौट जाते हैं। लेकिन मिश्र दम्पति उनमें से नहीं थे। पहले चार दिन, फिर सात ‌दिन फिर पन्द्रह दिन के लिए इलाहाबाद से गांव आना एक जरूरत बन गई। जैसे जैसे फार्महाउस का निर्माण चल रहा था, इलाहाबाद पीछे छूटता जा रहा था। जरूरत ज्यादा यहां महसूस हो रही थी। यहां की व्यवस्था देखना, हर रोज मजदूरों का हिसाब करना, कभी ईंट कम पड़ जाना कभी सीमेंट के ट्रक का फंस जाना। एक समस्या से मुक्ति मिलती तो दूसरी व तमाम समस्याएं सामने खड़ी मुस्कुराती। पूरे दो साल लगे इस घरौंदे को बनाने में। इस दरमियान वे कभी टूटते, बिखरते, कभी निराश हो जाते। फिर एक दूसरे को समझाते, सम्‍भालते, हौसला देते लेकिन उम्मीद का दामन कभी छूटने नहीं देते। किरण जी कहती हैं-इस सबके दौरान इलाहाबाद के शहरी जीवन से दूर रहने की तकलीफ लगातार मन में रहती। कभी दो दिन के इलाहाबाद वाले घर लौटती कर लगता पूरे घर को अपनी आगोश में समेट लूं। कभी-कभी चुपके से अपने पति की नजर बचाकर वे रो भी लेती थीं। लेकिन इसके साथ फार्महाउस से लगाव भी बढ़ता जा रहा था क्योंकि यहां के पत्ते को संवारने मे हमारी कोशीशें थीं। हम हर चीज को बड़ी बारीकी से चुनते। चाहे वो कोई पौधा हो या कमरे का पर्दा। चाहे हैंडपम्प लगाने की जगह चयन हो या अन्न रखने का स्टोर बनाने के लिए जगह का चुनाव। एक मोह के धागे से नीड़ का निर्माण यहां भी शुरु हो चुका था। उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। धीरे-धीरे फार्म हाउस आकार लेने लगा। वे अपने दोस्तों को फार्म हाउस की फोटो मोबाइल पर भेजतीं। किरण जी कहती हैं- 'गांव के फार्म हाउस, हरे भरे खेत, रंग बिरंगे फूल, स्वादिष्ट रसीले फल, हरी ताजी सब्जियों की तस्वीरें देखकर रश्क करते तो मैं बिना पंख के आसमानों मे उड़ने लगती हूं। न जाने दिन में कितनी बार ईश्वर को धन्यवाद देती। जिसकी कभी मैंने कल्पना नही कि ईश्वर ने मुझे उस खुशी से नवाजा।' 

सबसे मजेदार कमेंट उनके भाई का था-'अरे ये‌ क्या नौटंकी लगाकर रखी हो तुमने किरण? कभी शानदार घर की फोटो भेजती हो‌, कभी फूलों से भरे लान की, कभी खेत खलिहानों में भी उतर जाती हो, सब्जियां भी उगा लेती हो। रामोजी स्टुडियो तो नही पहुंच गई तुम? आखिर माजरा क्या है?' तब उनकी बहन ने तुरंत उन्हें विडियो काल करके फार्म हाउस का लाइव नजारा दिखाया। वह चकित और हतप्रभ रह गए। भाई बोला-'मेरे पास शब्द नहीं है कि इसकी सुन्दरता को व्यक्त कर पाऊं तुमसे। तुम दोनों ने बहुत बारीकी से यहां की प्लानिंग की है। उजाड़ जगह को जन्नत बना दिया।'

अब फार्म हाउस बन कर तैयार है। उनके दोस्त टूरिस्ट की तरह वहां घूमने आते हैं। खेतों में उनका वक्त कब कट जाता है पता ही नहीं चलता। किरण कहती हैं- 'मुझमें कितना बदलाव आ गया है, मैं खुद हैरान हूं। बारिश मुझे बहुत पसंद हैं। बे-मौसम बारिश के तो कहने ही क्या? एक एक बूंद पर मैं झूम जाती थी। पर अब ....बारिश के साथ ही सोचती हूं इस बारिश  से हमारी फसल को नुकसान तो नहीं होगा?' सब्जियों की क्यारियों मे रोज जाकर देखना कि आज कौन-सी सब्जी कितनी है? उनको तोड़ना, सबमें बांटना सूकून देता है? अचानक ही निकल आए सब्जी, आम, फल व फूलों को देखकर मैं खुशी के मारे लगभग चिल्ला पड़ती हूं। चीजों को बनाना कितना कठिन है। फिर जब वो बन जाती है तो हम सब कठिनाइयां भूल जाते हैं। सामने दिखती है एक मुकम्मल तस्वीर। लोग तो चमकदार तस्वीर में ही उत्सुक हैं। तस्वीर के पीछे की कहानी तो बस कहानी ही रह जाती है। लेकिन फिर भी दोस्तों से बहुत संबल मिलता है।' 

तो मिश्र दम्पति का ये फैसला मुश्किल था। लेकिन ऐसे ही फैसलों में जीवन में अनुभव का एक और मजबूत घेरा बनता है। सोंधी मिट्टी की खुशबुओं और गांव के साफ नीले भीगे आसमान के पीछे उम्मीद की एक किरण हमेशा छुपी रहती है। इसी उम्मीद का नाम तो जिन्दगी है। जो इतनी बुरी नहीं जितनी की हमें अक्सर महसूस होता है। 

   

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Thursday, September 24, 2020

किसानों की कमाई से नेताओं की मौज

 


हिन्दी अखबारों में भी खेती किसानी की कवरेज को बहुत तब्बजो नहीं दिया जाता है. इसलिए कोई रिपोर्टर उसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता. खेती की खबरें और कवरेज केवल कृषि निदेशालय तक महदूद रहती है. कोई पन्द्रह साल पहले जब मैं राजनीतिक और सचिवालय की कवरेज से ऊब गया तब मैंने खुद आगे बढ़कर एग्रीकल्‍चर बीट की पेशकश की जो मुझे मिल गई. तो मैं पहली बार मंडी परिषद के दफ्तर गया. ये मेरे दफ्तर के पास ही था. जब पहली बार मंडी परिषद में दाखिल हुआ तो लगा किसी फाइव स्टार होटल में आ गया हूं. शानदार इमारत, चमचमाती इटेलियन टाइल्स की फर्श,  कमरों में वुडन वर्क. पहली नजर में लगा ही नहीं किया इस दफ्तर का खेती किसानी से कोई लेना देना होगा. कोई किसान तो इस दफ्तर में घुसने की हिम्मत नहीं कर सकता था. तब मुझे पता चला कि अरबों रूपए की ये इमारत किसानों के पैसों से ही बनी है. उस जमाने में भी मंडी अफसर के आला अफसर और मंत्रीजी की आलीशान कारों की खरीद और उसका खर्च भी किसानों के पैसे से चलता था. दरअसल सरकार किसानों के बेचे गए अनाज से तब कोई ढाई फीसदी मंडी टैक्स लेती थी. कायदे से इस पैसे का इस्तेमाल सरकार को मंड़ियों को बेहतर बनाने और गांवों में सम्पर्क मार्ग बनाने, इन सड़कों की मरम्मत और इन्हें गड्ढा मुक्त करने में खर्च करना चाहिए था. ताकि किसान आसानी से अपनी उपज लेकर मंडी तक पहुंच सके. लेकिन हर साल करोडो में आने वाले मंडी शुल्क का इस्तेमाल मंत्री और अफसर राजशाही पर खर्च करते थे. राज्य में चाहे किसी की सरकार हो. लेकिन कागजों पर गांव की सड़कें गड्ढामुक्त होती रहीं. न कोई उन्हें देखने वाला न जांच करने वाला. ये कच्चा काम था इसलिए इसका आडिट भी नहीं होता है. मंडी परिषद के कुछ गिने चुने ठेकेदार, नेता और अफसरों से मिलकर पैसे बनाने लगे. इसके इलावा भी हजार तरीके हैं यहां पैसा कमाने के वहां. देखते देखते मंडी परिषद सबसे कमाऊ विभाग बन गया. आज इससे कभी न कभी जुड़ा हर नेता और अफसर करोड़पति बन गया है. न भरोसा हो तो जांच करावा के देख लीजिए. अब जब से नया कानून आया है मंडी से जुड़े अफसर कर्मचारियों के होश उड़े हुए हैं. यूपी के किसानों को न पहले ज्यादा मतलब था मंड़ियों से न अब रहेगा. मंडी रहे या चूल्हे भाड़ में जाए. लेकिन पंजाब और हरियाणा में ऐसा नहीं है. किसानों को साहूकारों और दलालों से बचाने के लिए रोहतक के सर छोटू राम ने आजादी से पहले ही यहां देश में पहली मंडी की स्‍थापना की. समझ लीजिए खुद किसान रहे छोटू राम पंजाब-हरियाण के छोटे गांधी थे. आज भी उनका नाम वहां  के किसान सम्मान से लिया जाता है. तो उनके कारण जो मंडी कानून बना वह पंजाब हरियाणा के किसानों की ताकत बन गया और वहां की अर्थव्यवस्‍था की धुरी भी.मंडी की वजह से कि वहां के किसान शुरू से ही धन सम्‍पन्न हैं. अब उन्हें लग रहा है कि ये मंडियां खत्म हो जाएंगी तो वे एक बार फिर बड़े साहूकारों के चंगुल में फंस जाएंगे. इसीलिए इन बिलों का वहां सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है.       

 

तो कहने का मतलब चीजें इतनी आसान भी नहीं जितनी की ‌ऊपर से दिखती हैं. इन विवा‌दित बिलों के प्रभावों को बड़े परिपेक्ष्य में देखने और समझने की जरूरत है. सतही तौर पर अगर आप कोई नतीजा निकालेंगे तो बाद में बहुत पछताएंगे. क्योंकि आप किसान भले न हों एक उपभोक्ता हैं और उससे भी पहले आप इस देश के प्रबुद्ध नागरिक हैं. ये हमेशा याद रखिएगा नेता कोई संत-महात्मा हो या ईश्वर का भेजा गया कोई देवदूत. आखिर में वह नेता ही होता है.


Thursday, September 17, 2020

ज्योतिष विद्या का रहस्य




क्या आप ज्योतिष विद्या पर यकीन करते हैं? बहुत सालों तक मैं नहीं करता था. ये बड़ी बेढंगी बात लगती है कि आपसे लाखों मील दूर बैठे ग्रह नक्षत्र आपके जीवन को संचालित करें? क्या ये संभव है? अब जबकि मैं ज्योतिष विज्ञान का अध्ययन कर रहा हूं कह सकता हूं कि हां ये संभव है. न केवल संभव है बल्कि ये सब बहुत दिलचस्प है. ज्योतिष विद्या एक विज्ञान है. ये विशुद्ध गणित हैं। एक ग्रह है चन्द्रमा उसके उतार चढ़ाव से इतने बड़े समन्दर में लहरे उठती और गिरती हैं तो हम तो सिर्फ इंसान हैं जिसके शरीर में 60 फीसदी पानी है. इन दिनों मैं ज्योतिष विद्या पढ़ रहा हूं. मैंने अपनी कुंडली भी पढ़ी, जिसमें साफ साफ लिखा है- आप दूसरों को ज्ञान बांटेंगे? पढ़कर मुझे हंसी आ गई. आगे पढ़ता गया तो और बातें भी सच निकलती चली गई. अपने शुरूआती अध्ययन में जितना मैं ज्योतिष विज्ञान समझ पाया वह ये कि जिस वक्त हम जन्म लेते हैं ठीक उसी वक्त ब्रह्मांड में मौजूद ग्रह नक्षत्र हमारे जीवन की पूरी कहानी लिख देते हैं. ठीक उसकी वक्त तय हो जाता है कि हम अपने जीवन में क्या काम करने के लिए पैदा हुए हैं? हमारा जीवन कैसा होगा? हम परिवार कैसा होगा? हमारा चरित्र कैसा होगा‍‍? हमारा जीवन कितना होगा? इसी को जन्म कुंडली कहते हैं. ये सब उतना ही सटीक और वैज्ञानिक है जितना 2+2=4. लेकिन दिक्कत ये है कि हूबहू भविष्य बताने वाली इस गणित के मास्टर बहुत कम हैं. आप मुझे बस अपने जन्म का सही समय दिन, घंटे, मिनट और सेकेंड बता दें और ये बता दें कि आपका जन्म दुनिया के किस कोने में हुआ है. मैं या कोई और भी बहुत आसानी से कंप्यूटर से गणना करके बता देगा कि आपके के जन्म के समय ग्रह‌ और नक्षत्र कितने आकांक्ष पर थे और उन्होंने आपके जीवन पर क्या असर डाला जिसकी वजह से आप आज इस स्थिति में हैं. मैं आपके व्यक्तित्व के बारे में जो बातें बताऊंगा वह 90 फीसदी सही होंगी. अगर सही नहीं हैं तो इसका सिर्फ एक मतलब है कि आपके जन्म के समय के बारे में जानकारी कहीं गलत होगी. वर्ना ये गणना 100 फीसदी सही बैठती है. मजे की बात ये है कि इसमें कोई विवाद नहीं है. 

तो पहली बात जन्म कुंडली एक सेटालाइट पिक्चर की एक तरह है. ये आपके जीवन का फोटोग्राफ है. आपके जन्म के समय आसमान के ग्रह नक्षत्रों की जो तस्वीर खिंच गई उसे कोई नहीं बदल सकता. वो तस्वीर आपके जीवन से जुड़ गई जो आपकी मौत तक आपको पीछा नहीं छोड़ने वाली.  दूसरी बात ज्योतिष शास्‍त्र कहता है कि आपके जीवन में सुख दुख, अच्छे और बुरे दिन, यश अपयश ये सब जो आते जाते हैं उसकी वजह वर्तमान के ग्रह नक्षत्रों के मूवमेंट हैं जो आपके जीवन पर तात्कालिक असर डालते हैं. क्योंकि आपका जन्म एक खास ग्रह नक्षत्र के डिजाइन में हुआ है तो मौजूदा ग्रह नक्षत्रों की बदलती लोकेशन उस पर निरन्तर असर डालती रहती है. तो जीवन में कभी खुशी कभी गम के पीछे की थ्योरी की वजह यही है. 

तो अब तक जो बातें मैंने बताईं उससे साफ है कि आपका जीवन आपके नियंत्रण में बिलकुल नहीं है. आपके नियंत्रण में सिर्फ कर्म है. हो सकता है कि आप बहुत योग्य हैं, बहुत काबिल हैं बहुत कर्म करते हैं लेकिन फिर भी आप कामयाब नहीं हैं.तो इसके पीछे वजह आप नहीं है. आपके ग्रह नक्षत्र हैं जो आपके सारे कर्म के बावजूद आपको आगे नहीं बढ़ने देते. जबकि आपसे कहीं मूर्ख इंसान तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते जाता है. माफ कीजिए आप पाएंगे कि उसकी जन्म कुंडली में यही लिखा है. इसी को किस्मत या डेस्टनी कहते हैं. लेकिन इससे आप निराश कतई न हो. अपना कर्म जारी रखें. उससे आप भले आपको मनचाहा नतीजा न हासिल हो लेकिन अगर आपने थक कर किस्मत से हार मान ली और कर्म छोड़ दिया तो यकीन जानिए आपकी हालत बद से बद्तर हो जाएगी. और मजे की बात ये कि ये बात भी आपकी जन्म कुंडली में कहीं जरूर लिखी होगी.  

मेरी अब तक की बनी समझ से ज्योतिषी का काम बस यही खत्म हो जाना चाहिए. वो इसके आगे आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. क्योंकि वो किसी भी कीमत पर आपकी किस्मत नहीं बदल सकता. हां वो अपनी जेब भरने के लिए आपसे ग्रह शांति के लिए पूजा-यज्ञ-हवन आदि करने की सलाह दे सकता है. या फिर आपको कोई खास पत्‍थर सा रत्न पहनने की सलाह दे दे. लेकिन मुझे नहीं लगता इससे कोई बहुत असर पड़ता होगा. कुछ लोगों को पत्‍थर पहनने से कोई फायदा मिला भी होगा लेकिन ये सिर्फ संयोग या इत्तेफाक है. इसके पीछे कोई सांइस होगी ऐसा नहीं है. या अगर हो तो उसका आविष्कार अभी तक तो नहीं हुआ है. लेकिन आप ये मानिए कि ज्योतिष एक विज्ञान है लेकिन इसके जानकार चंद ऊंगलियों पर गिने जाने वाले लोग हैं. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 99 फीसदी ज्योतिषी फ्राड हैं. उनका ज्योतिष का ज्ञान बहुत सीमित है. लेकिन उसी से उनका काम खूब अच्छे से चल जाता है. क्योंकि लोगों को अपना भविष्य जानने में रूचि है. जिसका कोई मतलब नहीं. अपना भविष्य जानना निरी बेवकूफी है खास तौर से तब जब आप जानते हैं कि उस भविष्य को दुरुस्त करने के लिए आप या कोई और कुछ नहीं कर सकता. ये बात निराशाजनक जरूर है लेकिन जो है सो है. क्या कीजिएगा आप?  



Wednesday, September 9, 2020

अंधेर नगरी चौपट राजा

 



बनारस में एक है ठठेरी बाजार. लॉकडाउन से थोड़ा पहले ही मैं वहां गया था. बनारस के संगीतज्ञ मर्मज्ञ और काशी संगीत समाज के संयोजक कृष्णकुमार रस्तोगी के निधन पर. वे भी ठठेरी बाजार में रहते थे. गजब प्रतिभाशाली व्यक्तित्व थे लेकिन उन पर फिर कभी. तो ये ठठेरी बाजार पतली से एक गली है जहां कभी ठठेरे रहे होंगे. लेकिन आज कल तो इस गली के दोनों तरफ तरह तरह की मिठाई, नमकीन, अचार, पापड़ और न जाने कितनी चटपटी चीजों की दर्जनों दुकानें हैं. इसी गली में बनारस का मशहूर राम भंडार है. बाबा काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद जहां की पूड़ी कचौड़ी खाए बिना बनारस दर्शन अधूरा है. इसी गली में चौखंबा के पास हिंदी के प्रसिद्व साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र का घर हुआ करता था, जो आज भी भारतेंदु भवन के नाम से उपेक्षित पड़ा है. उनके पोते पर पोते आज भी वहां रहते हैं. आज इन्हीं भारतेंदु जी की जयंती है. भारतेंदु जी मुझे बचपन से याद रहे हैं अपने प्रसिद्ध नाटक 'अंधेर नगरी' के कारण. उनका अंधेर नगरी चौपट राजा का मशहूर नाटक हर युग में प्रासंगिक है, जिसमें एक विवेकहीन और निरंकुश शासन व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए राजा को अपने ही कर्मों द्वारा नष्ट होते दिखाया गया है. कहते हैं भारतेंदु ने इसकी रचना बनारस के हिंदू नेशनल थियेटर के लिए एक ही दिन में की थी. इस नौजवान ने केवल 35 साल में दुनिया छोड़ दी लेकिन उससे पहले उन्होंने इस देश को एक भाषा दी जिसे आधुनिक हिंदी कहते हैं. क्योंकि उससे पहले हिन्दी अलग अलग बोलियों में बोली और लिखी जाती थी. खड़ी बोली जिसे मैं लिख रहा हूं और आप पढ़ रहे हैं वो भारतेंदु जी की ही देन है. तो आप समझ सकते हैं कि हिंदी में ये कितना बड़ा योगदान है उनका. बचपन में बहुत कम उम्र में माता-पिता के गुजर जाने के बावजूद वे बहुत खुश मिजाज थे. पैसेवाले परिवार के खाते पीते आदमी थे. लेकिन उनमें अंग्रेजों के खिलाफ एक गहरा व्यंग्य और गुस्सा भी था. 1857 की क्रान्ति के बाद तब भारत नया नया ब्रिटेन की रानी के कब्जे में आया था. कोई 1877 का किस्सा है. इंग्लैंड का एक बड़ा अफसर एडवर्ड काशी आया था. काशी के कलेक्टर ने उनसे मिलने के लिए 500 रू की फीस रख दी. ये रकम बहुत ज्यादा थी. उस जमाने में बिजली तो थी नहीं मशाल जलाई जाती थी इसके लिए बाकायदा मशालची होते थे. तो भारतेंदु जी ने अपने मशालची को 500 रू देकर एडवर्ड के पास यह सिखा कर भेजा कि जब उनसे मिलना तो अंग्रेजी में बोलना-आई एम मशालची ऑफ मिस्टर भारतेंदु हरिश्चन्द्र. मशालची अफसर एडवर्ड को यही कह कर लौट आया. एडवर्ड का अहंकार टूट गया और वो मशालची को हैरत से बस देखे जा रहे थे. कलेक्टर शर्म से पानी पानी हो गया.                                                                                                                                                                                                                                                                                                               तो ये कहानी उन लोगों के लिए है जो मुझे कहते हैं- काहें #टेंशन लेकर बैठे हैं.. #मिडिया अपना काम कर रही हैं आप अपना करें.. हर समय आपके अनुसार थोड़ी चलेगी दुनिया.

Tuesday, August 11, 2020

राहत इंदौरी: शायरी का हुनरमंद मदारी



दुबई के उस शानदार आडिटोरियम में मुशायरे की सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी. लेकिन इस बार ऐन मौके पर राहत इंदौरी नहीं आए. राहत साहब की शायरी पढ़ने के अंदाज पर मैं गजब फिदा था. वो एक अदद ऐसा लुटेरा था जो गजल पढ़ने से पहले ही मुशायरा लूट लेता था. शेर पढ़ने का उनका नाटकीय ढंग समां बांध देता था-‘किसने दस्तक दी ये दिल पे, कौन है? फिर राहत भाई इस लाइन को अपने खास अंदाज में एक-एक लफ्ज पर जोर देकर तीन बार दोहराते थे. फिर मुशायरे में थोड़ा समां बांधेंगे-‘मैं शेर पढ़ कर बताता हूं मुन्नवर भाई आप सुन कर बताइएगा.’ फिर अगली लाइन में हाथ हिलाते हुए आपको चौकाएंगे-‘आप तो अंदर हैं, बाहर कौन है?’ इस तरह पब्लिक को किसी हुनरमंद मदारी की तरह खुश करके राहत भाई खूब तालियां बटोरते और मुशायरा लूट लेते थे. लेकिन उस बार वह दुबई नहीं आए. मैं बहुत मायूस हुआ था. मेरे दुबई के दोस्त रेहान भाई ने बताया कि उनके जिस्म में शक्कर की गिनती अचानक इतनी बढ़ गई है कि डाक्टर ने घर से निकलने से मना कर दिया. ये अफवाह नहीं पक्की खबर थी, क्योंकि इस मामले में राहत भाई अक्सर ये कह कर सब पर इलजाम लगाते हैं कि ‘अफवाह थी कि मेरी तबियत खराब है/ लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया।’ अरे भाई लोगों ने पूछ पूछ कर बीमार कर दिया कि आप खुद बे-परहेजी के शिकार हो गए. पर मैं जानता हूं शायरों की दुकान ऐसे ही चलती है.

आज शाम दफ्तर में ही था कि खबर आई कि राहत भाई नहीं रहे. ये मेरे लिए एक सदमे जैसा था. मैंने मुम्बई में अपने दोस्त आफताब भाई से पूछा- यूं अचानक कैसे? उन्होंने बताया कल रात में बात हुई. तो एकदम ठीक थे. लेकिन अभी खबर आई कि शाम दिल ने धोखा दे दिया. फेफड़े पहले से कमजोर हो चुके थे. ऊपर से चीनी वायरस का हमला. अक्सर मुशायरों में वह शेर की एक लाइन पढ़ते फिर सुनने वालों से बोलते- इसे संभाल लीजिएगा, अगर इसे संभाल लिया तो राहत इंदौरी संभल जाएगा. जब वह कोरोना के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए तो मुझे लगा उन्होंने डाक्टर से भी जरूर कहा होगा- इसे संभाल लीजिएगा डाक्टर साहब अगर इसे संभाल लिया तो राहत इंदौरी संभल जाएगा. 

लखनऊ में उनसे एक दो बार की मुलाकात है. बहुत पहले अखबार के लिए उनका ए​क इंटरव्यू भी लिया था. जो तेवर उनकी शायरी में थे वही तेवर उनकी बातचीत के लहजे में थे. 'सब की पगड़ी को हवाओं में उछाला जाए. सोचता हूं कोई अखबार निकाला जाए.' मैंने उनके इस शेर के हवाले से पूछा कि अखबारों और सहाफियों (पत्रकारों) के बारे में आपके ख्यालात अच्छे नहीं हैं? तो खूब जोर से हंसे. बोले- 'सच कहूं तो सागर भाई अखबार के बिना मेरी सुबह नहीं होती.' फिर उन्होंने अपना एक और शेर सुनाया-"बनके एक हादसा बाजार में आ जाएगा, जो नहीं होगा वह अखबार में आ जाएगा." मैंने भी मुस्कुरा कर कहा- "ये तो अखबार में जरूर आ जाएगा."  अब तक कोई बड़ा अवार्ड ने मिलने के सवाल पर उन्होंने कहा था-सारी सरकारें कम्बखत एक-सी तसीर होती हैं. अपने खिलाफ कुछ नहीं सुनना चाहतीं. एक बार तो सरकार के खिलाफ कोई शेर लिखने पर उन्हें थाने में बैठा लिया गया था. राहत भाई ने कहा-अरे दारोगा साहब इस शेर में मैंने कहां कहा कि भारत की सरकार चोर मक्कार है. दरोगा हंसे और बोले-जैसे हमें नहीं पता कि कहां कि सरकार चोर मक्कार है. ये किस्सा वे अक्सर मुशयरों में सुनाया करते थे. जितनी अच्छी शायरी वो सियासत पर करते थे उतनी ही अच्छी शायरी वे इश्को-मुहब्बत पर कहते थे. वे कहते कि मेरा शहर अगर जल रहा है और मैं कोई रोमांटिक ग़ज़ल गा रहा हूं तो अपने फ़न, देश, वक़्त सभी से दगा कर रहा हूं. मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाने की नसीहत देने वालों को राहत ने बेहद माकूल जवाब दिया- जो आज साहिबे-मसनद है कल नहीं होंगे/किराएदार है जाती मकान थोड़ी है/सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में/किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है. अब अतिवादियों को ये शेर भी बुरा लग गया. लेकिन उन्हें किसी के बुरा लगाने की परवाह कहां थी. वो तो बस शायरी करते थे जिसमें तल्खी के साथ कोई गंभीर इशारा होता था जो सोचने पर मजबूर कर देता था.. लेकिन इसमें तो शक नहीं कि राहत को हिन्दुस्तान से इश्क था जो उन्होंने लिखा- 'मैं मर जाऊं, तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना'    

खैर जब दिमाग पर पर्दा पड़ा हो तो किसी को समझाना मुश्किल है. शायर बहुत से हैं और होंगे लेकिन अब राहत जैसा शायर फिर कभी नहीं होगा. खैर आज देर रात इंदौर के खजरान कब्रिस्तान में उनको दफ्न कर दिया गया. जहां वह एक बार फिर कह सकते हैं- "दो गज सही ये मेरी मिलकियत तो है, ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया." अब ये जमींदार हिन्दुस्तान की जमीन में खाक हो गया. निकाल सको तो निकाल दो उन्हें इस मिट्टी से.  

Monday, July 6, 2020

ईश्वर के बगीचे के आम


वह सावन के रिम‌झिम महीने की एक खुशनुमा दोपहर थी। आसमान पर गहरे काले बादल छाए थे। मां और पापा दोनों घर की क्यारी में पिछले दो घंटे से व्यस्त थे। मुझे धुंधला-सा याद है कि पापा उस किचन गार्डन की मिट्टी में दबी तमाम पुरानी ईंटों को बाहर निकाल रहे थे। ये काफी परिश्रम भरा काम था क्योंकि ईंटें काफी नीचे तक दबी थीं। मैं यूनिवर्सिटी के लिए निकल रहा था। उस छोटे-से करीब दस बाई चार फीट के किचन गार्डन में आम का एक पौधा लगाने का 'यज्ञ' चल रहा था। पूछने पर पता चला कि ये आम्रपाली की कोई कलम थी, जो हमारे मामा बस्ती की किसी नर्सरी से खरीद कर लाए थे। मुझे याद है मैंने बड़ी बेपरवाही से पूछा था कि-'अब ये आम्रपाली क्या बला है?' तो पापा ने बताया कि यह दशहरी और नीलम के क्रॉस से बनी संकर प्रजाति है। इसकी जड़ें गहरी जाती हैं लेकिन पेड़ बहुत ऊंचा नहीं जाता। पांच छह साल में ये मीठे फल देने लगता है। फिर मिट्टी में दबी एक ईंट दिखाते हुए बोले-'नीचे जडों के फैलने के लिए जगह बना रहा हूं.' मैंने हैरानी से मुस्कुराते हुए सिर्फ 'अच्छा' कहा था। पापा ने वो पौधा मां के हाथों से लगवाया। ये कहते हुए कि- 'तुम्हारी मां के हाथ के लगे पौधे जी जाते हैं.' मैं यूनिवर्सिटी पढ़ने निकल गया। अगले दिन देखा तो पापा किसी फेवरीकेटर को बुलवा कर सड़क से सटे उस किचन गार्डन में लोहे की जाली लगवा रहे थे। फिर मैंने उस पौधे पर कभी ध्यान नहीं दिया। हां शाम को यूनिवर्सिटी से लौटते वक्त रोजाना सिर्फ इतना जरूर देखता कि मां रबर के पाइप से उस क्यारी में पानी दे रही होतीं। वह हमेशा स्कूटर बाहर खड़ा रखने को कहतीं ताकि कीचड़ से सने टायर लेकर मैं अंदर का बरामदा गंदा न कर दूं।


दिन, महीने और साल बीतते गए। वह आम का पेड़ मेरी स्‍मृतियों से कभी अलग नहीं हो पाया। घर में जब भी अनुष्ठान होता, घर के ही आम के पेड़ की सूखी लकड़ियां और पल्लव पूजा-हवन के काम आते। इतने बरसों में घर में कई मांगलिक कार्यक्रम हुए। आम के उस पेड़ की हरी पत्तियों से ही घर में तोरण द्वार बनाए जाते। कलश में पंच पल्लव डाल कर उसके ऊपर घी का दीया जलाया जाता। लखनऊ जैसे ठेठ शहर की कालोनी के घर में आम का 'अपना' पेड़ होना मां और पापा को कितनी खुशी का अहसास देता होगा इसका अंदाजा मैं अब इस उम्र में आकर लगा सकता हूं। अब हमारे घर आने वाले हर बसंत का स्वागत आम का यही पेड़ करता। फरवरी-मार्च के महीने में वह आम्रपाली का पेड़ बौर से लकदक हो जाता। और कभी बारिश होती तो बसंती हवा के साथ मिलकर उस अमौरी की खुशबू सांसों में जादू-सा नशा भर देती। सुबह जब पहली मंजिल की बालकनी से नीचे किचन गार्डन की तरफ देखता तो ओस की बूंदों के साथ आम के बौर चमेली के सफेद फूलों की तरह जमीन और सड़क पर बिखरे पड़े रहते। उस पेड़ पर चिड़ियों के झुंड के झुंड चहचहाते रहते। आम तौर पर कम हाइट तक बढ़ने वाले इस पेड़ का कद, हमारे दो मंजिला घर से भी ऊंचा निकल गया। जब आम का सीजन आता तो लगता कि किसी ने पेड़ पर हरे बल्ब की झालर टांग दी हो। इसके बाद एक लम्बा सिलसिला शुरू होता आम की रखवाली का। क्योंकि पेड़ घर के बाहर सड़क के किनारे था सो आम्रपाली के ललचाने वाले सुंदर आम राहगीरों के कदम रोकने लगे थे। भरी दोपहरी मां पेड़ पर पत्‍थर फेंकने वालों लड़कों को डपटतीं। कभी प्यार से बुलाकर टूटे हुए आम उन्हें बांट देतीं।


और फिर एक दिन मां नहीं रहीं। जब वह घर से अंतिम यात्रा के लिए निकल रही थीं तो मैंने महसूस किया कि उस दिन हम सबको को बिलखता देख वह पेड़ भी रोया था। दुख, पीड़ा और संताप के उन तेरह दिनों में मैं उस पेड़ को कई बार एकटक देखा करता था और तब आंखों में आंसुओं के गुबार में मुझे आम्रपाली का पौधा रोपती मां की वह पुरानी धुंधली तस्वीर दिखाई देती थी। मैं तब उन पुरानी स्मृतियों को एक झटके से अपनी यादों के धुंधलके से निकाल देना चाहता था क्योंकि वह मुझे तकलीफ पहुंचा रही होती थीं। जीवन में ऐसे क्षण कई बार आते हैं जब  जिन्दगी और मौत के बीच, सुख और दुख के बीच, आशा और निराशा के बीच, ठहरे हुए किसी एक लम्‍हे में इंसान अपनी सारी स्मृतियों को किसी गहरे समन्दर में दफन कर देना चाहता है। मुझे अच्छी तरह से याद है उस साल इस आम्रपाली पर एक भी बौर नहीं आया. और तब मैंने महसूस किया था कि पेड़ पौधे भी अपनी तरह से शोक मनाते हैं जब शिद्दत से जुड़ा कोई हिस्सा उनसे टूट जाता है। फिर चाहे वह पेड़ से अलग हुई कोई डाली या टहनी हो या कोई पत्ता क्यों न हो।

मां के चले जाने के बाद वह घर जैसे छूट ही गया। कभी कभी मुझे लगता है कि मां खूंटे से बंधी किसी गाय की तरह होती है जिसके आस पास एक दुनिया बस जाती है। उसके चले जाने के बाद ममता का वह आंचल जो ‌कभी नीला आसमान बनकर आपके ऊपर लहराता रहता है, हट जाता है और आप खुद को सूरज की तपती धूप के नीचे खड़े असहाय महसूस पाते हैं। हम सब वह घर छोड़ कर बाहर जिन्दगी की जद्दोजहद में मशगूल हो गए। अब उस घर में कोई नहीं रहता। मैं अपनी दुनिया में हूं, भाई और बहन अपने-अपने जहान में। और हम तीनों की दुनिया के बीच कहीं हमारे पापा हैं। जो एक अदृश्य और अंतरंग कड़ी बन कर हम तीनों से कहीं गहरे जुड़े हुए हैं। लेकिन हमारा वह घर वहीं है, आम का वो पेड़ वहीं हैं, उस पेड़ के पत्तों के झुरमुट में झांकता नीला आकाश वहीं है और मां से जुड़ी वह तमाम यादें वहीं उस घर के हर दरवाजे, हर खि़ड़की, और हर रोशनदान से आती सूरज की रोशनी की तरह मौजूद हैं अपने पूरे अस्तित्व के साथ। हर साल जब भी गर्मियां आती हैं उस आम्रपाली पर हजारों आम लद जाते हैं। ज्यादातर आम तो पकने से पहले ही सड़क से गुजरने वाले लड़के तोड़ ले जाते हैं। लेकिन हमारे पडोसी और पुराने मित्र विनय पांडे और उनकी सुसंस्‍कारी पत्नी रितु भरी दुपहरी हो या शाम, उन आमों की भरसक रखवाली करते हैं। हर साल चार पांच पेटी आम दूसरे शहरों में बसे हम भाई बहनों के घर पहुंच जाते हैं। हालांकि इन आमों को पहुंचाने का खर्च इनकी कीमत से कहीं ज्यादा बैठ जाता है। लेकिन हमारे अंतस की अतल गहराइयों से जुड़े ये आम इतने स्वादिष्ट और दिव्य हैं कि ये हम तक पहुंचते-पहुंचते ये बेशकीमती हो जाते हैं। पतली गुठली के ये रसीले खुशबुदार आम इतने स्वादिष्ट हैं जिनका मुकाबला दुनिया में आम की किसी अन्य वैरायटी से नहीं किया जा सकता। ये मैं इसलिए नहीं कह रहा कि इन आमों से हमारा कोई भावनात्मक रिश्ता है। आप खुद नेट पर सर्च कर सकते हैं। दुनिया भर के बाजार में आम्रपाली की सबसे ज्यादा मांग है क्योंकि इस किस्म के आमों में कैरोटीन की मात्रा सबसे अधिक रहती है। हर साल हम सब बहुत बेसब्री और बेताबी से अपने घर के आमों का इंतजार करते हैं। कभी-कभी तो सोचता हूं कि सावन की उस खुशनुमा दोपहरी में मेरी मां के आंचल तले पौधे के रूप में एक और शिशु ने करवट ली थी। जो अब बड़ा होकर अपने परिवार के बाकी सदस्यों को हर साल ये मीठे तोहफे भेजता है।


लखनऊ दशहरी और तमाम तरह के नवाबी आमों का गढ़ है लेकिन मेरे भांजे को इस पेड़ सिवा कोई और आम अच्छा ही नहीं लगता। उसे इन आमों में 'नानी की खुशबू ' महसूस होती है क्योंकि उसकी नानी उसके लिए पके आम हमेशा सबसे अलग छुपा कर रखतीं थीं। दिल्ली में अपने दादू के साथ रह रही मेरी प्यारी भतीजी सारे सीजन सिर्फ 'अपने घर' के आम का इंतजार करती है। परसों उसे आम मिले तो भावुक हो गई। बोली- 'बड़े पापा इस आम के पेड़ को कभी कटने मत दीजिएगा.' और इन आमों के शिमला पहुंचते ही मेरी शरारती बेटी को ताराहाल कान्वेंट की अपनी क्लास की दोस्तों को जलाने का मौका मिल जाता है। शिमला की हर लड़की के पास अपने गांव के सेब बागान के किस्से हैं। उसके जवाब में वह दादी के इस पेड़ और इसके मीठे आमों का बखान करते नहीं थकती। वह इतराते हुए कहती है-"तुम्हे क्या पता मेरी ग्रैंड मां हर साल हमें 'ईडन आफ गार्डन' से ये मीठे आम भेजती हैं।" अब तो मुझे भी लगने लगा है कि ये दिव्य आम हमारे किचन गार्डन के नहीं वाकई ईडन आफ गार्डन यानी ईश्वर के बागीचे से ही आते होंगे।


तो आप देखिए आम के एक अदद पेड़ के बहाने कैसे बच्चे अपनी प्यारी दादी-नानी को आज भी याद करते हैं। इस संस्मरण का यही संदेश है। कैसे एक छोटा सा पौधा व्यक्ति को पर्यावरण से एकाकार करता है। आप भी अपने मां-पिता के हाथों मीठे आम का एक पेड़ लगवाइए। कहीं भी। उस पर थोड़ा-सा ध्यान दीजिए उसकी रक्षा कीजिए। यकीन जानिए वे खुद बड़े हो जाएंगे। वो पेड़ उनके न रहने पर भी बरसों बरस उन्हें स्‍मृतियों में जिंदा रखेगा। देह मर जाती है लेकिन उस देह की कृति और कीर्ति कभी नहीं मरती। वह इंसान हो या कोई पेड़। आप कभी महसूस कीजिएगा कोई भी पौधा लगाते वक्त आपकी हथेलियों की गर्माहट उस पौधे की जडों के साथ हमेशा के लिए जमीन में बची रह जाती है, जैसे ढलता हुआ सूरज अपनी तमाम तपिश खोने के बावजूद दूसरों के लिए अपनी थोड़ी-सी गर्माहट अपने अंदर हमेशा बचाए रखता है।

End